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बच्चों के अभियान द्वारा एक गाँव को नशा-मुक्त बनाने की यात्रा

  • Blog Post Date 21 जनवरी, 2020
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Shirish Khare

Shantilal Muttha Foundation

shirish2410@gmail.com

केवल दो वर्षों में, महाराष्ट्र के सांगली जिले में एक स्कूल के छात्रों और उनके शिक्षक के प्रयासों ने पूरे गांव के शराब की लत को समाप्त कर दिखाया। इस नोट में, शिरीष खरे ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि गाँव के लोगों की कहानियों के बारे में बात करने और उन्हें साझा करने से यह परिवर्तन कैसे लाया गया।

 

नशे के आदी किसी व्यक्ति के पीने की आदत को बदलना आसान काम नहीं होता। मगर, महाराष्ट्र के सांगली जिले में स्थित एक स्कूल के छत्रों ने पूरे गाँव को नाशमुक्त कर दिखाया। इस स्कूल ने तंबाकू और शराब का सेवन कर नशा करने वाले लोगों को नशे से मुक्ति दिलाई। यहां के छोटे बच्चों ने सिर्फ दो साल में हजारों लोगों की सोच बदल दी। वहाँ के शिक्षकों ने बताया कि यह मुलवर्धन का परिणाम है, जो एक स्कूल-आधारित मूल्य शिक्षा कार्यक्रम है जिसे शांतिलाल मुत्था फाउंडेशन (एक गैर-लाभकारी संस्था) द्वारा जिम्मेदार और लोकतांत्रिक नागरिकों का पोषण करने के लिए शुरू किया गया है।

पांडेझरी, पश्चिम महाराष्ट्र के सांगली शहर से लगभग 150 किलोमीटर दूर जत नामक ब्लॉक का एक छोटा-सा सूखाग्रस्त गांव है। यहां के किसान ज्वार और बाजरा उगाते हैं। इसके अलावा, जब खेतों में पानी उपलब्ध होता है तब अंगूर की खेती को प्राथमिकता दी जाती है। इस स्थान में घारें सामान्यत: एक दूसरे दूर हैं और यहाँ की आबादी अपेक्षाकृत कम। चंद्रकांत कांबले इस गांव के सरपंच हैं।

चंद्रकांत कहते हैं, ''कोई डेढ़ दो साल पहले की बात है, ऐसी घटना घटी जिसके बारे में मैंने सोचा नहीं था। मेरा बेटा अरविंद, जो दूसरी कक्षा में पढ़ता है, उसने मुझसे कहा कि वह खाना नहीं खाएगा। मैंने खाना खाने के लिए उसे बहुत मनाया, और मानते हुए उससे उसकी इस जिद का कारण पूछा। तब उसने मुझसे नशा बंद करने की मांग की!'' अरविंद की यह बात सुनकर वे हैरान रह गए।  इस बात को समझने के लिए वे अगले दिन अरविंद के स्कूल पहुंचे। वहाँ उनकी मुलाक़ात दिलीप वाघमारे से हुई जो उसे पढ़ाते हैं।

चंद्रकांत बताते हैं, ''दिलीप सर से मिलने के बाद उन्होंने पूरे गांव को नशा मुक्त बनाने की अपनी योजना के बारे में बताया।''

जब चंद्रकांत ने दिलीप को पूरी घटना के बारे में बताया, तब दिलीप ने उन्हे मूल्यवर्धन के बारे में प्रबुद्ध करते हुए कहा कि उनके स्कूल के बच्चों ने कक्षा में सीखने की कुछ गतिविधियों के दौरान अपनी और अपने आसपास के लोगों की अच्छी और बुरी आदतों के बारे में वर्णन किया। ऐसा करते हुए बच्चों ने इस बात पर भी चर्चा की कि किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए तंबाकू और शराब का सेवन कैसे और कितना बुरा होता है। यही कारण था कि अरविंद भी नहीं चाहता था कि उसके पिता नशा करें और यदि वे नशा छोड़ दें तो पूरी बस्ती और गांव के बाकी लोगों की नशे की लत छुड़ाने में मदद मिलेगी।

दिलीप के अनुसार, इन बातों को सुनकर चंद्रकांत जी भावुक हो गए। और फिर सरपंच होने के नाते उन्होंने नन्हें बच्चों के नेतृव्य में गांव में नशा-मुक्ति अभियान चलाने का संकल्प लिया। दिलीप के मुताबिक नशा-मुक्ति का यह अभियान बहुत चुनौतीपूर्ण था। वे बताते हैं, ''तीन सौ की आबादी वाली हमारी बस्ती के इस स्कूल में पढ़ने के लिए पचास बच्चे भी नहीं थे1। इसलिए, हमारे सामने पहली चुनौती थी- हम क्या करें?''

वे कहते हैं कि सबसे पहले उन्होंने बच्चों के लिए 'अच्छी और बुरी आदतों' विषय पर कुछ विशेष सत्र आयोजित किए। जिसमे नशे के कारण होने वाले बुरे प्रभावों पर चर्चा कराई गई। फिर बच्चे अपने घर, आस-पड़ोस और मोहल्लों में नशे के नुकसान बताने लगे। बच्चों ने गांव के लोगों को बताया कि तंबाकू खाने से देश और दुनिया में कितने लोगों को मुंह का कैंसर हुआ है। स्कूल के बच्चे गांव के लोगों को मुंह के कैंसर वाली तस्वीरे दिखाते। एक समय ऐसा भी आया जब इन बच्चों के परिवार वालों ने बच्चों के साथ मिलकर पूरे गांव में नशा-मुक्ति के लिए एक रैली निकाली।

तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली आरती कौरे ने बताया, ''जब मैंने अपने दादा से गुटखा छोड़ने को कहा तो वे नहीं माने। मेरे बार-बार मना करने पर भी वे चोरी-चोरी गुटखा खाते थे। एक बार मैंने उन्हें गुटखा खाते देखा तो मैं रोनी लगी। तब उन्हें कहना पड़ा कि रो मत, देख अब नहीं खा रहा और ना आगे खाऊंगा!''

तीसरी की ही गोडप्पा धनसरी कहती है, ''मेरे बाबा मुझे पैसा देकर गुटखा लाने को कहते। एक दिन मैं उनसे बोली ये (गुटखा) खाना इतना अच्छा है तो मैं भी खाऊंगी! वे बोले गुटखा बहुत गंदा होता है। मैं बोली ऐसा होता तो आप खाते ही नहीं। ऐसा बोल-बोलकर मैंने उनका गुटखा खाना बंद कराया।''

एक ग्रामीण, गोड़प्पा कुलाड़े बताते हैं कि नशा इतना आसानी से नहीं छूट रहा था। लेकिन, बच्चों के प्यार में हम पिघल गए। गोड़प्पा कुलाड़े के मुताबिक, ''दो साल पहले गांव में गुटखा खाने का चलन काफी ज्यादा था। आज हो सकता है पचास में से एक आदमी गुटखा खाते दिख जाए। लेकिन, अब सारे गांव वाले ऐसे आदमी को गुटखा खाने के लिए मना करते हैं।''

दिलीप बताते हैं कि उन्होंने स्कूल स्तर पर कई सांस्कृतिक कार्यक्रम कराए। ‘नशा छोड़ना क्यों जरुरी है? ’ जैसे विषयों पर कई व्याख्यान आयोजित कराए। इनमें बाहर से नशे से संबंधित विषयों के विशेषज्ञ बुलाए गए। इनमें चिकित्सक और सामाजिक कार्यकर्ता भी शामिल थे। इसके अलावा नशा मुक्ति शिविर भी लगाए गए।

ग्रामीण बालाजी पडलवार बताते हैं, ''ऐसा नहीं है कि मुझे शराब की बुराई के बारे में कुछ पता ही नहीं था, मगर जब बच्चों के साथ पूरा गांव शराब पीने के लिए मना करने लगा तो मैंने सोचा की आखिर नशा करके माहौल क्यों खराब करूँ।''

अंत में, एक बुर्जुग महिला कल्पना कौरे ने कहा, ''बड़े होने के नाते हमारा काम होता है बच्चों को अच्छी आदते सिखाएँ, पर हमें बच्चों ने बताया कि क्या अच्छा है और क्या बुरा, और किस चीज़ से क्या नुकसान होता है। पहले तो बुरा भले लगता है, पर बाद में तो अच्छा हीं लगने लगता है।''

नोट्स: 

  1. दिलीप अपनी स्कूल में पहली से चौथी कक्षा के लगभग 48 छात्रों को पढ़ाते हैं, जिनमें से 26 लड़के हैं और 22 लड़कियां हैं। साल 2017 से, मुलवर्धन को स्कूल में लागू किया गया है। 

लेखक परिचय: शिरीष खरे पुणे स्थित शांतिलाल मुथा फाउंडेशन में एक संचार प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं।

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