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कोविड-19 लॉकडाउन और आपराधिक गतिविधियाँ: बिहार से साक्ष्य

  • Blog Post Date 10 जुलाई, 2020
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कोविड-19 महामारी से लड़ने के लिए लागू किया गया लॉकडाउन समाज के लिए व्यापक रूप से परिणामकारी था। रुबेन का यह आलेख पुलिस से प्राप्‍त अद्यतन सूचना का उपयोग करते हुए बिहार में आपराधिक गतिविधियों पर लॉकडाउन के प्रभाव का विश्लेषण करता है। परिणाम बताते हैं कि लॉकडाउन ने कुल अपराध में 44% की कमी की। अन्‍य अपराधों के सा‍थ, हत्याओं (61%), चोरी (63%), और महिलाओं के खिलाफ अपराध (64%) जैसे विभिन्न प्रकार के अपराधों के संबंध में बड़े नकारात्मक प्रभाव देखे गए हैं।

 

कोविड-19 महामारी ने दुनिया में एक ठहराव ला दिया है, कई देशों की अर्थव्यवस्थाएं खतरे में है, और अभूतपूर्व मानवीय एवं सामाजिक आर्थिक नुकसान हो रहा है। वायरस के प्रसार को रोकने के लिए दुनिया भर की सरकारों द्वारा सख्त लॉकडाउन लागू किए गए हैं। मार्च के अंत में, भारत ने दुनिया का सबसे बड़े लॉकडाउन लागू करने का फैसला किया, जिसके कारण लगभग 130 करोड़ लोग अपने घरों में ही कैद से हो गए। दुर्भाग्य से, जब तक कोविड-19 का खतरा पूरी तरह से समाप्‍त नहीं हो जाता, तब तक दुनिया भर में लॉकडाउन की स्थिति बनी रहेगी।

लॉकडाउन को लागू करने के लिए, सरकारों ने पुलिस संसाधनों को अपराध की रोकथाम से हटा कर उन्‍हें घरों में रहने के आदेशों के अनुपालन कराने तथा दंड लगाने संबंधी कार्रवाइयां कराने में लगा दिया है। यह उस स्थिति में अधिक समस्‍या पैदा कर सकता है जब लोगों की तुलना में पुलिस अधिकारियों की संख्या कम हो (जैसा कि भारत में है), क्योंकि इससे अपराधियों को अपनी आपराधिक गतिविधियों को बढ़ाने का मौका मिल जाता है। हालांकि, लॉकडाउन के कारण आवाजाही पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण अपराधियों को अपना शिकार ढ़ूंढ़ने में भी कठिनाई आती है। लॉकडाउन का अपराध पर शुद्ध प्रभाव स्पष्ट नहीं है, और क्या कुछ विशेष प्रकार के अपराध लॉकडाउन से अधिक प्रभावित हैं, यह अभी पता नहीं है।

हालिया शोध (पॉबलेट-काज़नैव 2020) में, मैंने बिहार राज्य में लॉकडाउन का आपराधिक गतिविधियों पर होने वाले प्रभाव का अध्ययन किया है। बिहार राज्‍य विशेष रूप से दिलचस्प है क्योंकि इसमें प्रति 1,00,000 जनसंख्या पर पुलिसकर्मियों की संख्या देश में सबसे कम है1। इसलिए, यहां पहले से ही अधिक भार झेल रहे पुलिस बल पर लॉकडाउन लागू होने के कारण अतिरिक्‍त दबाव पड़ गया है। साथ ही, 22 मार्च, रविवार को बिहार सरकार द्वारा तत्काल प्रभाव से लागू किये गए लॉकडाउन के परिणामस्वरूप, आवश्यक वस्तुएं एवं सेवाएं प्रदान करने वाले लोगों को छोड़कर अप्रत्‍याशित रूप से अन्‍य सभी लोगों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई और सभी प्रतिष्ठानों को बंद करा दिया गया।

अपराध पर लॉकडाउन के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए, मैंने पुलिस थानों की अद्यतन प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर)2 से प्राप्त आपराधिक मामले-स्तर की जानकारी और अचानक लागू किए गए राज्यव्यापी लॉकडाउन का उपयोग किया है। मैंने अपराध पर लॉकडाउन के कारण-संबंधी प्रभाव का पता लगाने के लिए 'प्रतिगमन अंतराल उपागम' का प्रयोग करते हुए, उन तारीखों के आसपास आपराधिक गतिविधि की तुलना की है जब लॉकडान लागू किया गया था। इस अर्थ में, यदि लॉकडाउन के अलावा, अपराध को प्रभावित करने वाले अन्य सभी कारक बदलती हुई तारीखों पर असतत रूप से नहीं बदलते हैं, तो यह रणनीति अपराध पर लॉकडाउन के प्रभाव का एक सुसंगत अनुमान प्रदान करती है।

क्या लॉकडाउन आपराधिक गतिविधि को प्रभावित करते हैं?

2020 की शुरुआत से 27 मई तक, बिहार में 80,000 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज किए गए। लॉकडाउन से पहले, एक पुलिस स्टेशन में औसतन प्रति दिन 0.7 आपराधिक मामले आते थे (महीने में 21 मामले), जबकि लॉकडाउन लागू होने के बाद यह संख्या घटकर 0.5 हो गई (महीने में 15 मामले)। अपराध पर लॉकडाउन के कारण-संबंधी प्रभाव का अनुमान लगाने के लिए, मैंने पहले अपराधों की अस्थायी अवस्थिति का लेखा-जोखा दिया और ऊपर वर्णित दृष्टिकोण का उपयोग किया है। आकृति 1 में अपराधों की संख्या पर लॉकडाउन के प्रभाव को दर्शाया गया है (महीने के दिन के अनुसार नीचे जाते हुए)3। जिस दिन लॉकडाउन लागू किया गया था (0 दिन), उस दिन आपराधिक गतिविधियों में एक असतत कमी है, जिसके उपरांत लॉकडाउन के बढ़ने के बाद ऊपर की ओर रुख है। विशेष रूप से, अनुमान से पता चलता है कि लॉकडाउन ने कुल अपराध में 44% की कमी की है। यह बड़ी कमी बताती है कि अपराधियों को अपने शिकारों को खोजने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जो अपराध की रोकथाम में शामिल पुलिस अधिकारियों की कमी की तुलना में अपराध पर अधिक प्रभाव डालता है।

आकृति 1. अपराधों की संख्या पर लॉकडाउन का प्रभाव - स्थानीय रैखिक प्रतिगमन का दैनिक अनुमान

नोट: मोटी रेखाओं में अनुवर्ती स्थानीय रेखीय प्रतिगमन के आधार पर अपराधों की कुल संख्या के लिए अनुमानित मान (दिन के हिसाब से नीचे जाते हुए) प्रदर्शित किया गया है। 'दिन' लॉकडाउन के शुरू होने के बाद से दिनों की संख्या है जिसे ‘0’ दिन कहा गया है। फैला हुआ आलेख, अपराधों की कुल संख्या का दैनिक औसत है, जो महीने के दिन के अनुसार नीचे जा रहा है।

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क्या अलग-अलग प्रकार के अपराधों पर प्रभाव भी अलग-अलग होता है?

अपराध पर लॉकडाउन के प्रभाव का विश्लेषण करते समय, अपराधों की प्रकृति और उन स्थितियों पर विचार करना महत्वपूर्ण है, जहां वे होते हैं। इससे उन कारणों को जानने में अतिरिक्त अंतर्दृष्टि मिलती है जिनके कारण हमें अपराध में इतनी बड़ी कमी दिखाई पड़ती है। कुछ अपराध दूसरों की तुलना में अधिक अतिसंवेदनशील होते हैं - (i) शिकारों को ढूंढने में कठिनाई, या (ii) पुलिस अधिकारियों को लॉकडाउन को लागू करने के लिए लगाया जाना, या दोनों। उदाहरण के लिए, संपत्ति के अपराध, जैसे कि चोरी, जो पैसे से प्रेरित होते हैं और आमतौर पर गलियों में होते हैं, दोनों माध्‍यमों से प्रभावित हो सकते हैं, जबकि हत्या जैसे जुनूनी अपराध केवल अपराधियों द्वारा शिकार को उसी जगह और समय पर मिलने में असमर्थता से प्रभावित हो सकते हैं।

इसके अलावा, घर पर रहने के आदेशों का विभिन्न अपराधों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। उदाहरण के लिए, लॉकडाउन के कारण घरेलू हिंसा से संबंधित अपराध बढ़ सकते हैं, चूंकि अपराध घर के अंदर होता है और अपराधियों और पीड़ितों को लंबे समय तक एक ही स्थान पर सीमित कर दिया जाता है। अपराधों की श्रेणियों में अंतर प्रभावों का अध्ययन करने के लिए, मैंने निम्नलिखित प्रकार के अपराधों की पहचान करने हेतु भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) का उपयोग किया है, जैसे लूट, चोरी, डकैती, हत्या, अपहरण, दंगे, महिलाओं के खिलाफ अपराध, और सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के खिलाफ अपराध4

आकृति 2 प्रत्येक प्रकार के अपराध पर लॉकडाउन के तत्काल प्रभाव को दर्शाती है। उनकी विविध प्रकृति के बावजूद, सभी अपराध श्रेणियों के लिए बड़े प्रभाव हैं। चोरी की संख्या में 63%, सेंधमारी में 49%, लूट में 56%, हत्याओं में 61%, अपहरण में 88%, दंगों में 77% और महिलाओं के खिलाफ अपराध में 64% की कमी आई है। अपराधों के प्रकारों को देखते हुए, ये परिणाम आगे इस तथ्‍य का समर्थन करते हैं कि अपराध में कमी का मुख्य कारण सड़कों पर संभावित शिकारों की कमी है। यद्यपि लॉकडाउन के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के खिलाफ अपराधों में 143% की वृद्धि हुई है। इसका अर्थ यह है कि बड़ी संख्‍या में लोग अभी भी बाहर निकल रहे हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये परिणाम लॉकडाउन लगाने के आस-पास की तारीखों पर लॉकडाउन के प्रभाव को दर्शाते हैं।

आकृति 2. अपराध की श्रेणी के अुनसार, लॉकडाउन का अपराध पर प्रभाव का अनुमान

नोट: विभिन्न प्रकार के अपराधों के लिए प्रतिगमन अंतराल अनुमान दिखाए गए हैं। आश्रित चर अपराधों की संख्या है जो महीने के दिनों के अनुसार नीचे जाती है। प्रतिदर्श में लॉकडाउन की शुरुआत के 21 दिनों के भीतर की तारीखें हैं। प्रतिदिन पुलिस-थाना स्तर पर सर्वेक्षण किया गया है।

क्या लॉकडाउन प्रतिबंधों की गंभीरता और अवधि मायने रखती है?

लॉकडाउन के सामाजिक आर्थिक परिणामों को कम करने के लिए, केंद्र सरकार ने कोविड-19 मामलों की संख्या और वायरस के प्रसार के आधार पर भारत भर के जिलों को वर्गीकृत करके प्रतिबंधों में ढील दी। प्रतिबंधित जोनों के संबंध में यह परिवर्तन लॉकडाउन की शुरुआत के लगभग एक महीने बाद हुआ। मैंने यह जांच करने के लिए प्रतिबंधित क्षेत्रों का उपयोग किया कि क्या लॉकडाउन की गंभीरता आपराधिक गतिविधियों को अलग तरह से प्रभावित करती हैं?

मुख्य परिणामों के अनुरूप, साक्ष्‍यों से पता चलता है कि लॉकडाउन के शुरुआती प्रतिबंधों में ढ़ील देने से अपराधों में वृद्धि हुई। हालांकि, प्रतिबंधात्मक लॉकडाउन की तुलना में कम प्रतिबंधित लॉकडाउन में अपराध में वृद्धि कम है, जिससे यह पता चलता है कि इसका एक और माध्‍यम हो सकता है। दिलचस्प है कि प्रतिबंध क्षेत्रों में परिवर्तन ने हिंसक अपराधों को कुछ खास प्रभावित नहीं किया था, जबकि आर्थिक रूप से प्रेरित अपराधों पर इसका प्रभाव पड़ा था। इससे पता चलता है कि लंबे समय तक लॉकडाउन द्वारा पैदा हुई आर्थिक मंदी इस परिणाम को बढ़ा सकती है। सख्त और लंबे समय तक लागू किए गए लॉकडाउन उपाय आर्थिक गतिविधि को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं, बेरोजगारी को बढ़ाते हैं, और व्यक्ति के वित्तीय परिणामों को प्रभावित करते हैं, जो अपराध और महिलाओं के खिलाफ हिंसा (एंडरबर्ग एवं अन्‍य 2016, भालोत्रा एवं अन्‍य 2020) को प्रभावित करने वाले प्रासंगिक कारक हैं (मोकन और बाली 2010, बेल एवं अन्‍य 2018)। दरअसल, लॉकडाउन में लगभग एक महीने के बाद, अधिक प्रतिबंधात्मक लॉकडाउन ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा में वृद्धि को दर्शाया है। राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा प्राप्त शिकायतों के विश्लेषण के माध्यम से भी इसकी पुष्टि की गई है, जहां प्रतिबंधात्मक क्षेत्रों में रिपोर्ट किए गए मामलों में सर्वाधिक 140% की वृद्धि हुई है।

भविष्य के लॉकडाउन के लिए सबक

इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निहितार्थ यह है कि लॉकडाउन के कारण अपराध में आई बड़ी कमी अधिकारियों को महामारी नियंत्रण के लिए पुलिस संसाधनों को मुक्त करने की अनुमति दे सकती है। इसके अलावा आपराधिक गतिविधि के संबंध में यह सिफारिश की जाती है कि कम प्रतिबंधात्मक लॉकडाउन को लागू किया जाए जिसमें नियंत्रित तरीके से व्यवसायों और दुकानों के कामकाज की अनुमति दी जाती है। यह आर्थिक कारकों तथा अपराध को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने से रोक सकता है। इसके अतिरिक्त, संसाधनों को उन अपराधों से निपटने के लिए पुन: विनियोजित किया जाना चाहिए जो लॉकडाउन के उप-उत्पाद के रूप में बढ़ सकते हैं, जैसे कि उच्च प्रतिबंध क्षेत्रों में महिलाओं (घरेलू हिंसा) के खिलाफ हिंसा आदि।

टिप्पणियाँ:

  1. डेटा ऑन पुलिस ऑर्गनाइजेशन 2019 रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में प्रति 1,00,000 लोगों पर पुलिस अधिकारियो की संख्या 81 है, जबकि भारत के लिए यह संख्‍या 158 है।
  2. प्रथम सूचना रिपोर्ट एक लिखित दस्तावेज है जो अपराध के कथित रूप से घटने की शिकायत प्राप्त होने पर पुलिस द्वारा तैयार किया जाता है, जिसके बाद पुलिस जांच शुरू कर सकती है।
  3. दिनों के दौरान अपराधों को तुलनीय बनाने के लिए, हम महीने के दिनों में लगातार अंतर को दूर करने के लिए माध्‍य (औसत) से विचलन का उपयोग करते हैं। यदि महीने के अंत तक रिपोर्ट किए गए मामलों की संख्या लगातार अगले महीने की शुरुआत की तुलना में अधिक है, तो अपराधों पर लॉकडाउन के प्रभाव के इन झुकावों के लिए यह कारक नहीं है।
  4. महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिए सबसे आम आरोप 'महिला के साथ मारपीट या उसके शील भंग करने की मंशा से किया गया आपराधिक बल प्रयोग है'। इसमें इस प्रकार के 70% से अधिक अपराध शामिल हैं।

लेखक परिचय: रुबेन पॉबलेट-काज़नैव ने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) से अर्थशास्त्र में पीएच.डी. की है।

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