मानव विकास

माध्यमिक स्तर के अधिगम में सुधार : रेमिडियल शिविरों और कक्षा में शिक्षकों के लचीलेपन की भूमिका

  • Blog Post Date 21 जून, 2024
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Sabrin Beg

University of Delware

sabrin.beg@gmail.com

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Jason Kerwin

University of MInnesota

jkerwin@umn.edu

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Adrienne Lucas

University of Delaware

alucas@udel.edu

भारतीय शिक्षा प्रणाली की एक प्रमुख दुविधा यह है कि बच्चे स्कूल तो जा रहे हैं, लेकिन वास्तव में ढ़ंग से सीख नहीं रहे हैं। यह लेख ओडिशा में हुए एक प्रयोग के आधार पर, माध्यमिक विद्यालय में अधिगम की कमी के सम्भावित समाधानों की खोज करता है। इसमें पाया गया है कि अनुकूलित सुधारात्मक या रेमिडियल कार्यक्रम सीखने की प्रक्रिया में सुधार और सीखने के स्तर के बारे में शिक्षकों की धारणाओं में सुधार लाते हैं। लेकिन पाठ योजनाओं में शिक्षक स्वायत्तता को बढ़ाने से होने वाले लाभ इतने स्पष्ट रूप से नहीं दिखते

छात्रों की शिक्षा में सुधार लाना एक अंतर्राष्ट्रीय प्राथमिकता है- संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य, एसडीजी 4 इसी प्राथमिकता को दर्शाते हुए सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सीखने के लक्ष्य को पाने का प्रयास करता है। इस वैश्विक शैक्षिक संकट के बीच भारत एक चौराहे पर खड़ा है। देश में प्राथमिक और माध्यमिक, दोनों स्तरों पर स्कूल में नामांकन की दर में वृद्धि हुई है, लेकिन स्कूल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान नहीं कर रहे हैं। यद्यपि छात्रों ने स्कूल में दाखिला तो लिया है लेकिन वास्तव में वे सीख नहीं रहे हैं, जिसके कारण कई छात्र अपनी कक्षा के अनुरूप अधिगम के कई स्तर नीचे रह जाते हैं। न केवल सीखने का स्तर कम है बल्कि अलग-अलग छात्रों में यह व्यापक रूप से अलग-अलग भी है। माध्यमिक विद्यालय के छात्रों की एक ही कक्षा में भी काफी अलग-अलग क्षमताएँ हैं। एक ही कक्षा के भीतर, सीखने के स्तरों में इस भिन्नता को कम करने और बुनियादी कौशल में सुधार लाने के लिए दुनिया भर में बहुत ज़ोर दिया जा रहा है (विश्व बैंक, 2018)।

भारत सभी के लिए समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे सुनिश्चित करे? हम अपने हाल के एक शोध (बेग एवं अन्य 2023) में स्कूल में अधिगम की खाई को पाटने के अभिनव समाधानों की खोज करके इस प्रश्न का समाधान करना चाहते हैं। हम अपना ध्यान इस के दो महत्वपूर्ण तत्वों पर केन्द्रित करते हैं- छात्रों के स्तरों के अनुरूप सुधारात्मक या रेमिडियल शिक्षा कार्यक्रम और कक्षा में बढ़ी हुई स्वायत्तता के माध्यम से शिक्षकों का सशक्तिकरण।

माध्यमिक विद्यालय की शिक्षा में सम्भावित नवीन हस्तक्षेप

प्राथमिक विद्यालयों के मौजूदा मूल्याँकन से पता चलता है कि बच्चों को कक्षा स्तर के बजाय उनके पठन स्तर के आधार पर पढ़ाने से समग्र शैक्षिक उपलब्धि में काफी सुधार हो सकता है (बनर्जी एवं अन्य 2017, बनर्जी एवं अन्य 2010, दुफ्लो एवं अन्य 2020, दुफ्लो एवं अन्य 2011, लक्ष्मीनारायण एवं अन्य 2013)। हालांकि, क्या माध्यमिक विद्यालयों में भी यही दृष्टिकोण काम करता है या नहीं, यह दो कारणों से एक खुला प्रश्न है। पहला, यह स्पष्ट नहीं है कि यहाँ अधिगम में अंतराल कितना बड़ा है। माध्यमिक विद्यालय में प्रवेश के लिए छात्रों को आम तौर पर उच्च-दांव वाले मानकीकृत परीक्षणों से गुज़रना होता है। सिद्धांततः इन परीक्षाओं से सबसे कमज़ोर छात्रों को बाहर हो जाना चाहिए, लेकिन हमारे अध्ययन में पाया गया है कि ये परीक्षाएं ऐसा करने में प्रभावी नहीं हैं। साथ ही, माध्यमिक विद्यालय के छात्र प्राथमिक विद्यालय के छात्रों की तुलना में अधिक उम्र के होते हैं और इस प्रकार सबसे कुशल और सबसे कमज़ोर छात्रों के बीच का अंतर अधिक बढ़ जाता है। दूसरा, भले ही यहाँ बड़े अंतराल मौजूद हों, माध्यमिक स्तर पर सुधारात्मक शिक्षा हस्तक्षेपों का बड़े पैमाने पर परीक्षण नहीं किया गया है। क्या माध्यमिक विद्यालय में ऐसा करने के लिए बहुत देर हो चुकी है?

साथ ही, भले ही माध्यमिक स्तर पर सुधारात्मक शिक्षण दृष्टिकोण सफल रहे, यह स्पष्ट नहीं है कि इसे प्रभावी ढंग से लागू कैसे किया जाए। ऐसे दृष्टिकोण को कैसे डिज़ाइन किया जाए-  क्या शिक्षकों को विषय-वस्तु प्रदान करने में अधिक लचीलापन और स्वायत्तता मिलनी चाहिए, या क्या पाठ और विषय-वस्तु अधिक मानकीकृत होनी चाहिए?

शिक्षकों को स्वायत्तता देना उनके प्रदर्शन और इसलिए, अंतिम शिक्षण परिणामों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। भारतीय सरकारी स्कूल खराब परिणामों वाले अत्यधिक अनुशासित सार्वजनिक क्षेत्र सेवा वितरण का एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं। शिक्षकों (जिन्हें अग्रणी सिविल सेवक माना जा सकता है) को सख्त समय सारिणी पर कक्षा-स्तरीय पाठ्यक्रम का पालन और पूरा करने का निर्देश दिया जाता है, भले ही पाठ्यक्रम लगभग आधे छात्रों के सीखने के स्तर से कम से कम एक कक्षा स्तर आगे का हो। इस प्रकार के मानकीकृत शिक्षण दृष्टिकोण और एकरूप कार्यान्वयन की अपेक्षाएं, उस प्रणाली में व्यावहारिक हो सकती हैं, जिसमें मार्गदर्शन के लिए सीमित अवसर हों या शिक्षक पृष्ठभूमि और प्रशिक्षण के सन्दर्भ में बाधाएं हों। विकल्प यह है कि शिक्षकों को यह निर्णय लेने दिया जाए कि क्या और कैसे पढ़ाना है, जिससे रचनात्मकता और आंतरिक प्रेरणा की सम्भावना बढ़ेगी (पियरसन और मूमॉ 2005, स्कालविक और स्कालविक 2014) लेकिन साथ ही शिक्षकों के लिए हस्तक्षेप न करके काम से बचना भी सम्भव हो जाएगा। क्या अनुशासित करना बुरा है, जो स्थानीय निर्णयकर्ताओं से विवेकाधिकार छीन लेता है, या क्या वह यह सुनिश्चित करने में मदद करता है कि कार्यक्रम उचित ढंग से क्रियान्वित किए जाएं?

ओडिशा में किया गया प्रयोग

हम ओडिशा में नौवीं कक्षा के छात्रों के सन्दर्भ में इन दो मुद्दों का अध्ययन करते हैं। ओडिशा भारत के सबसे गरीब राज्यों में से एक है, जहाँ की साक्षरता दरें देश की सबसे कम दरों में शामिल हैं। यह विषम अधिगम प्रगति की चुनौतियों का उदाहरण है : हमारे आंकड़े दर्शाते हैं कि माध्यमिक विद्यालयों के 50% छात्र गणितीय ज्ञान के बुनियादी अंतरराष्ट्रीय मानक को प्राप्त करने में असफल रहते हैं और इसके विपरीत, शीर्ष 5% छात्र अन्य निम्न आय वाले देशों के शीर्ष छात्रों की तुलना में उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं।

हमारे अध्ययन के दो व्यापक लक्ष्य थे। पहला, हम ‘उत्कर्ष’ नामक एक अभिनव कार्यक्रम का मूल्याँकन करते हैं, जो भारतीय सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली की बाधाओं के भीतर, माध्यमिक स्तर पर अधिगम में सुधार करने का प्रयास करता है। दूसरा, हम यह परीक्षण करते हैं कि क्या शिक्षक की अनुकूलनशीलता कार्यक्रम के क्रियान्वयन और छात्रों को मिलने वाले उसके लाभ को प्रभावित करती है। हमने यादृच्छिक मूल्याँकन करने के लिए ट्रांसफॉर्म स्कूल्स, पीपल फॉर एक्शन (पीएफए) और ओडिशा विद्यालय और जन शिक्षा विभाग के सहयोग से कार्य किया। हमने ओडिशा के जयपुर और ढेंकनाल जिलों के 300 सरकारी माध्यमिक विद्यालयों को यादृच्छिक रूप से तीन समूहों में से एक में रखा :

  • मानक उत्कर्ष समूह- इन विद्यालयों को उत्कर्ष का मूल संस्करण प्राप्त हुआ, जहाँ शिक्षकों ने पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार कार्यक्रम के विषयों और पाठ योजनाओं को क्रियान्वित किया।
  • लचीला उत्कर्ष समूह- इन विद्यालयों को उत्कर्ष का एक संस्करण प्राप्त हुआ, जहाँ शिक्षकों को अपने छात्रों की ज़रूरतों के अनुसार विषयों और/या समय-सीमाओं को अनुकूलित करने के लिए स्पष्ट रूप से अधिक स्वायत्तता और आंशिक लचीलापन दिया गया था।
  • तुलनात्मक समूह- इन विद्यालयों को उत्कर्ष का संस्करण नहीं दिया गया।

हमने इस अध्ययन के लिए आधारभूत और अंतिम सर्वेक्षणों और स्कूल वर्ष के दौरान निगरानी यात्राओं के माध्यम से व्यापक प्राथमिक डेटा एकत्र किया। आधारभूत अवधि के दौरान, छात्रों का एक संक्षिप्त सर्वेक्षण कराया गया तथा उनके ओडिया भाषा, गणित और अंग्रेज़ी कौशल का मूल्याँकन किया गया। यह देखने के लिए मध्यावधि दौरे आयोजित किए गए कि क्या अध्ययन वाले छात्र उपस्थित थे और क्या कार्यक्रम का क्रियान्वयन अपेक्षित रूप से किया जा रहा था। हमने हस्तक्षेप के बाद छात्रों का फिर से मूल्याँकन किया। हमने आधारभूत और अंतिम अवधि में प्रत्येक स्कूल के सम्बंधित विषय पढ़ाने वाले शिक्षकों और प्रधानाध्यापकों का भी साक्षात्कार किया।

मुख्य परिणाम

हम कक्षा 9 के छात्रों के लिए कार्यान्वयन के एक स्कूल वर्ष के आधार पर चार मुख्य परिणामों को दर्ज करते हैं। सबसे पहला, छात्र अपने कक्षा स्तर से काफी पीछे थे- कक्षा 9 का एक औसत छात्र अंग्रेज़ी, गणित और ओडिया में 4 से 5 कक्षा पीछे था, और इस में स्कूल के भीतर भी काफी भिन्नता थी। भारत और बांग्लादेश में जैकर एवं अन्य (2022) द्वारा किए गए अध्ययन के विपरीत, शिक्षकों को बड़े पैमाने पर पता था कि छात्र कक्षा स्तर से काफी पीछे थे, हालांकि उनके अनुमानों में पर्याप्त अनिश्चितता थी। दूसरा, दोनों हस्तक्षेपों (मानक और लचीले उत्कर्ष समूह) ने छात्रों के अधिगम में सुधार दर्शाया- लगभग 0.1 मानक विचलन (एसडी)1, जो तुलनात्मक समूह की तुलना में सीखने में 58% वृद्धि के बराबर है। हस्तक्षेप के दोनों संस्करणों से कक्षा 3 और कक्षा 5 स्तर की दक्षता प्राप्त करने की सम्भावना बढ़ गई, लेकिन प्रयोग की एक वर्ष की अवधि में छात्रों को कक्षा 9 के स्तर की निपुणता तक नहीं लाया जा सका। इन हस्तक्षेपों से न तो कक्षा-स्तर का ज्ञान प्रभावित हुआ और न ही उन छात्रों को कोई नुकसान पहुँचा जो पहले से ही कक्षा 9 की योग्यता प्राप्त कर चुके थे। यह सुधारात्मक पाठ शुरू करने की एक प्रमुख चिंता थी। वास्तव में, हम पाते हैं कि अंतिम परीक्षण स्कोर और आधारभूत योग्यता स्तरों के वितरण में वृद्धि हुई है। 

तीसरा, कार्यक्रम के अंतर्गत शिक्षकों को पढ़ाने के लिए कोई अतिरिक्त प्रोत्साहन नहीं दिए जाने के बावजूद, दोनों हस्तक्षेप तरीकों में कार्यान्वयन की गुणवत्ता उच्च थी। लचीलेपन ने काम से जी चुराने को प्रेरित नहीं किया। शिक्षक आमतौर पर निर्धारित समय पर उत्कर्ष संस्करण पढ़ाते थे, लेकिन हमेशा उस दिन के लिए निर्धारित पाठ नहीं पढ़ाते थे। मानक उत्कर्ष और लचीले उत्कर्ष दोनों समूहों के शिक्षकों ने कार्यक्रम को संशोधित किया, कभी अलग-अलग विषयों का चयन किया और कभी गैर-उत्कर्ष या पाठ्यक्रम-स्तरीय विषयों को पढ़ाया।

लचीले उत्कर्ष समूह के गणित शिक्षकों द्वारा अधिक उन्नत विषयों को पढ़ाने के लिए लचीलेपन को अपनाने की अधिक सम्भावना थी। इस लचीलेपन से गणित में पीआईएसए स्कोर2 में सुधार के रूप में लाभ हुआ और ऐसा प्रतीत नहीं हुआ कि इसका असर अन्य सुधारात्मक विषयों में प्रदर्शन पर या कमज़ोर छात्रों पर पड़ा। अंत में, शिक्षकों ने अपने छात्रों के सीखने के स्तर के बारे में अधिक सटीक धारणाएँ बनाईं। इसलिए, भले ही उनका मानना ​​था कि उन्हें और उनके छात्रों को कार्यक्रम से लाभ हुआ, फिर भी उन्होंने अपने छात्रों को तुलनात्मक समूह के शिक्षकों की तुलना में कमज़ोर माना।

सबक और नीतिगत निहितार्थ

माध्यमिक विद्यालय स्तर पर उपचारात्मक अनुदेश की प्रभावशीलता के बारे में सीमित साक्ष्य उपलब्ध हैं। मौजूदा साक्ष्य में या तो स्कूल प्रणाली के बाहर के ट्यूटर्स को लेकर स्कूल के दिन के बाहर हस्तक्षेप का उपयोग किया गया है (मुरलीधरन एवं अन्य 2019) या कक्षा-स्तर की सामग्री पर ध्यान केन्द्रित किया गया है (बेग एवं अन्य 2022)। हालांकि हम दर्शाते हैं कि माध्यमिक स्तर पर मौजूदा शिक्षकों द्वारा प्रदान की जाने वाली उपचारात्मक शिक्षा छात्रों की सीखने की क्षमता को बढ़ा सकती है। यह अध्ययन नीतिगत दृष्टि से अत्यधिक प्रासंगिक है, क्योंकि इस कार्यक्रम को ओडिशा (जिसकी जनसंख्या 4 करोड़ है) और दक्षिणी राज्य कर्नाटक (जिसकी जनसंख्या 6 करोड़ है) में लागू किया गया है।

हमारे सन्दर्भ में, शिक्षक तब भी कक्षा-स्तर की सामग्री पढ़ा रहे थे, जब उनके छात्र कक्षा स्तर से काफी पीछे थे, जिसके सम्भावित तीन कारण थे : (i) उन्हें लगा कि उन्हें पाठ्यक्रम पूरा करना चाहिए या शायद उन्हें उस स्तर पर पढ़ाना अच्छा लगता था, (ii) उन्हें अपने छात्रों के सीखने के स्तर के बारे में पता नहीं था, या (iii) उन्होंने पाया कि उपचारात्मक शिक्षण में समय और प्रयास दोनों की ही दृष्टि से लागत अधिक लगती है। इस कार्यक्रम ने शिक्षकों को स्पष्ट रूप से यह बताकर इन चिंताओं को कम करने में मदद की कि इस वैकल्पिक, सुधारात्मक पाठ्यक्रम के लिए समय निकालना महत्वपूर्ण था, जिससे उन्हें कक्षा-स्तरीय पाठ्यक्रम से हटकर पढ़ाने की स्वतंत्रता मिली। शिक्षकों को पता था कि उनके छात्र कक्षा स्तर से नीचे थे, लेकिन उन्होंने कमी की सीमा को कम करके आंका- उत्कर्ष कार्यक्रम ने शिक्षकों को अपने छात्रों के सीखने के स्तर के बारे में अधिक सही धारणाएँ दीं। अंततः कार्यक्रम में ऐसी सामग्री और मार्गदर्शिकाएं उपलब्ध कराई गईं, जिनसे उपचारात्मक शिक्षण को सरल बनाया जा सका। शिक्षक पाठ्यक्रम को पूरा करने पर ध्यान केन्द्रित कर रहे थे, आंशिक रूप से इसलिए क्योंकि उनसे यही अपेक्षा की जाती थी और आंशिक रूप से इसलिए, क्योंकि उनके पास उपचारात्मक शिक्षण में शामिल होने के साधन नहीं थे। जैसे ही शिक्षकों को ऐसे साधन और प्रशिक्षण दिए गए, उपचारात्मक शिक्षण की लागत कम हो गई तथा उन्हें इस पर ध्यान केन्द्रित करने की अनुमति मिल गई, तो उन्होंने उच्च स्तर की निष्ठा के साथ कार्यक्रम को क्रियान्वित किया, जिससे कक्षा-स्तर की दक्षताओं को नुकसान पहुँचाए बिना छात्रों के सीखने की क्षमता में वृद्धि हुई।

हमारे परिणाम इस बात के नए साक्ष्य भी प्रदान करते हैं कि क्या सेवा के बिंदु पर संशोधन करने से अत्यधिक कठोर नौकरशाही में कामकाज में सुधार होता है। सार्वजनिक क्षेत्र में सेवा वितरण में सुधार लाने के लिए किए गए अधिकांश अध्ययन, सेवा प्रदाताओं को प्रोत्साहन प्रदान करने या समुदाय के सदस्यों को पंजीकरण के लिए सशक्त बनाने पर केन्द्रित हैं (ब्योर्कमैन और स्वेन्सन 2009, दुफ्लो एवं अन्य 2012)। बढ़ते शोध साहित्य में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि अत्यधिक कठोर नौकरशाही फ्रंट-लाइन सिविल सेवकों (बैंडिएरा एवं अन्य 2020, ब्लूम एवं अन्य 2015) के बीच स्वायत्तता बढ़ाकर सेवा वितरण में सुधार ला सकती है, हालांकि किसी पदानुक्रमित नौकरशाही में इष्टतम प्रथाओं को खोजना मुश्किल है (बनर्जी एवं अन्य 2021)। फिर भी, यह स्पष्ट नहीं है कि क्या इन सुधारों से शैक्षिक गुणवत्ता में सुधार होगा- पाइपर एवं अन्य (2018) का तर्क है कि लिखित पाठ छात्रों की सीखने की क्षमता में सुधार करते हैं, लेकिन कुछ हद तक लचीलापन इष्टतम है। हमारे अध्ययन के अनुसार, लचीलापन सीमांत रूप से लाभदायक है। शिक्षक इस अवसर का उपयोग, जब उपयुक्त हो कठिन विषय-वस्तु पढ़ाने के लिए करते हैं, जिससे आधारभूत ज्ञान पर छात्रों के प्रदर्शन में कमी आए बिना, अधिक कठिन प्रश्नों पर उनके प्रदर्शन में सुधार होता है। हमें इस बात के भी प्रमाण मिले हैं कि लचीलापन शिक्षकों के मनोबल और उनकी नौकरी के दृष्टिकोण के लिए फायदेमंद हो सकता है। हालांकि अतिरिक्त लचीलापन प्रदान करने से होने वाले लाभ बहुत बड़े नहीं हैं, सम्भवतः इसलिए क्योंकि शिक्षकों को पहले से ही निर्धारित पाठ योजनाओं से हटने की स्वतंत्रता दी गई है।

टिप्पणियाँ:

  1. मानक विचलन एक ऐसा माप है जिसका उपयोग उस सेट के माध्य (औसत) मान से मूल्यों के एक सेट की भिन्नता या फैलाव की मात्रा को मापने के लिए किया जाता है।
  2. पीआईएसए या अंतर्राष्ट्रीय छात्र मूल्याँकन कार्यक्रम आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) द्वारा किया जाने वाला एक विश्वव्यापी अध्ययन है जिसका उद्देश्य गणित, विज्ञान और पठन में 15 वर्षीय छात्रों के प्रदर्शन को मापकर शैक्षिक प्रणालियों का मूल्याँकन करना है।

अंग्रेज़ी के मूल लेख और संदर्भों की सूची के लिए कृपया यहां देखें।

लेखक परिचय : सबरीन बेग डेलावेयर विश्वविद्यालय के अल्फ्रेड लर्नर कॉलेज ऑफ बिज़नेस एंड इकोनॉमिक्स में सहायक प्रोफेसर हैं। एनी फिट्ज़पैट्रिक ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के कृषि, पर्यावरण और विकास अर्थशास्त्र विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। जेसन केरविन अनुप्रयुक्त अर्थशास्त्र विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और मिनेसोटा विश्वविद्यालय में मैकनाइट लैंड-ग्रांट प्रोफेसर, जे-पीएएल में संबद्ध प्रोफेसर और आईजेडए में एक रिसर्च फेलो हैं। एड्रिएन लुकास भी डेलावेयर विश्वविद्यालय के लर्नर कॉलेज ऑफ बिजनेस एंड इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्र विभाग की प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष हैं, नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च (एनबीईआर) की रिसर्च एसोसिएट, अब्दुल लतीफ जमील पॉवर्टी एक्शन लैब (जे-पीएएल) की फैकल्टी एफिलिएट, सेंटर फॉर ग्लोबल डेवलपमेंट (सीजीडी) में नॉन-रेजिडेंट फेलो और पॉवर्टी एक्शन (आईपीए) के लिए इनोवेशन के रिसर्च नेटवर्क सदस्य हैं। खांडकर वहीदुर रहमान ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में विकास के भविष्य पर ऑक्सफोर्ड मार्टिन कार्यक्रम के लिए पोस्ट डॉक्टरल शोधकर्ता हैं, जहाँ वे अर्थशास्त्र विभाग के एसोसिएट सदस्य भी हैं।

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