कृषि

आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20: यह कृषि क्षेत्र की चुनौतियों का समाधान कैसे करेगा?

  • Blog Post Date 17 फ़रवरी, 2020
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Sudha Narayanan

Indira Gandhi Institute of Development Research

sudha@igidr.ac.in

इस वर्ष का आर्थिक सर्वेक्षण, जोकि वित्त मंत्रालय का प्रतिनिधि दस्तावेज है, हाल ही में संसद में पेश किया गया था। यह ऐसे वक्त में आया है जिसमे भारत आर्थिक मंदी और ग्रामीण तंगी के दौर से गुजर रहा है। इस पोस्ट में, सुधा नारायणन ने कृषि के दृष्टिकोण से आर्थिक सर्वेक्षण की समीक्षा की है, तथा साथ ही रिपोर्ट में उल्लिखित मुद्दों को हल करने का एक वैकल्पिक तरीका भी प्रस्तुत किया है।

 

अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति पर इस वर्ष का आर्थिक सर्वेक्षण हाल ही में संसद में पेश किया गया था। हाल के वर्षों की तरह, यह सर्वेक्षण भी दो भागों में है। पहले भाग में समकालीन मुद्दों पर मुख्य आर्थिक सलाहकार के दृष्टिकोण का वर्णन है जो समय को परिभाषित करते हैं; दूसरी रिपोर्ट में मुख्‍यत:, वर्ष के आर्थिक घटनाक्रमों का पारंपरिक रूप से वर्णन किया गया है। दोनों खंडों में निदान और समाधान का मिश्रण प्रस्‍तुत किया गया है, प्रत्येक अध्याय में, उसमें वर्णित सेक्टर के लिए आगे की दिशा को प्रदर्शित किया गया है। यह आलेख कृषि के दृष्टिकोण से आर्थिक सर्वेक्षण की आलोचनात्‍मक समीक्षा करता है।

पिछली बार सर्वेक्षण में कृषि के लिए समर्पित अध्याय वर्ष 2017-18 में - 'जलवायु, जलवायु परिवर्तन और कृषि' पर था। तब से, कृषि का विकास दर और भी गिर गया है (2017-18 में 5% से 2019-20 में 2.8% तक); यह गिरावट अर्थव्यवस्था के लिए समग्र रूप से अधिक है (जोकि उसी अवधि में 6.9% से 4.9% तक गिर गई थी)। कृषि मजदूरी दर जो पहले से ही 2017-18 तक कम हो गई थी, उस में कुछ सुधार केसंकेत दिखाई दे रहे हैं (आकृति 1)। इस अवधि के कुछ हिस्‍से में निर्माण क्षेत्र में मजदूरी में गिरावट आ चुकी है। मनरेगा1 जैसे कार्यक्रम, जो छोटे किसानों और भूमिहीन श्रमिकों के लिए जलवायु और स्थूल-आर्थिक झटकों के प्रभाव को कम करते हैं, उसके अंतर्गत न तो उचित और न ही समय पर मजदूरी प्रदान करते हैं। यह देखते हुए कि कृषि से संबंधित परिवारों की आय का 32% भाग मजदूरी (राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय - एनएसएसओ, 2013) का होता है, विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों (दो हेक्टर से कम भूमि वाले) की स्थिति अच्‍छी दिखाई नहीं दे रही। उपभोक्ता के लिए, जिसमें खेती वाले परिवार भी शामिल हैं, कीमतों में वृद्धि के साथ वर्ष 2019 शायद 'प्याज का वर्ष' के रूप में याद किया जाएगा, जो कि 2010 और 1997-98 के संकटों की याद दिलाता है, जब किसान को उचित लाभ नहीं मिला था। इन रुझानों में एक अल्पकालिक आर्थिक आपातकाल अंत:स्‍थापित है, लेकिन यह लंबी अवधि की चुनौतियों को भी दर्शाता है, जिनमें से कुछ भारतीय कृषि में गहन संरचनात्मक मुद्दों के परिणामस्‍वरूप उत्‍पन्‍न हुए हैं।

आकृति 1. कृषि और मनरेगा में वास्तविक मजदूरी

p>आकृति में दिये गए अंग्रेज़ी शब्दों का अर्थ:

Realwage (deflated by CPI-AL)–वास्तविक मजदूरी (खेतिहर मजदूरों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक द्वारा अपस्फीति);

MNREGA wage – एमएनआरईजीए मजदूरी;         

Men (agriculture) – आदमी (कृषि);      Women (agriculture) – औरत (कृषि)

नोट: कृषि मजदूरी खाद्यान्‍न उत्‍पन्‍न करने और जुताई के लिए वित्तीय वर्ष का औसत है; मनरेगा मजदूरी भुगतान की गई औसत मजदूरी को संदर्भित करता है।

स्रोत: मनरेगा मजदूरी, अखिल भारतीय आधिकारिक कृषि मजदूरी, और कृषि श्रमिकों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का उपयोग करते हुए लेखक द्वारा निर्मित।

यह आम बात जानते हुए कि ग्रामीण संकट आर्थिक मंदी के केंद्र में ग्रामीण संकट है, यह पूरी तरह से उपयुक्‍त था कि दीर्घकालीन सुधारों को ध्‍यान में रखते हुए तथा अल्पकालिक आपातकाल से निपटने के तरीकों के साथ ग्रामीण संकट के लिए एक समर्पित अध्याय रखा जाए।इन विपरीत स्थितियों के बीचसंतुलन स्‍थापित करना आसान नहीं है और संसाधन सीमित हैं। 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने के बहु-प्रचारित लक्ष्य पर चिंतन करने का भी यह उचित समय है; जबकि 2022 अब ज्‍यादा दूर नहींहै, यह लक्ष्य स्‍वयं ही अधिक दूर नहीं दिखता2। निम्नलिखित खंड में, मैंने कृषि से संबंधित मुख्य मुद्दों का एक चुनिंदा सारांश प्रस्तुत किया है। फिर मैंने रिपोर्ट में उल्लिखित मुद्दों के वैकल्पिक समाधान भी सुझाए हैं जो संभवतया अधिक शिक्षाप्रद हो सकते हैं।

कृषि के बारे में सर्वे क्या कहता है?

हालाँकि, ग्रामीण और कृषि संबंधी मुद्दों के लिए एक समर्पित अध्याय उपस्थितनहीं है, फिर भी खंड 1 का बाज़ारों का दुर्बलीकरण: जब सरकारी हस्तक्षेप मदद करने के बजाय चोट ज्यादा पहुंचाता हैनामक चौथा अध्याय, कृषि से संबंधित कम से कम तीन प्रमुख नीतियों को संदर्भित करता है। पहला आवश्यक वस्तु अधिनियम, 19553 (ईसीए) है; दूसरा खाद्यान्न भंडारण नीति अर्थात विशेष रूप से भारतीय खाद्य निगम (एफ़सीआई) द्वारा की गई खरीद से संबंधित है; और तीसरा समग्र रूप से कर्ज माफी संबंधित योजनाओं के बारे में हैं। इन तीनों नीतियों पर वास्तव में पुनर्विचार की आवश्यकता है, क्योंकि जैसा कि रिपोर्ट में तर्क दिया गया है, इन तीनों के अवांछनीय एवं अप्रत्‍याशित परिणाम हैं, और वे भी संभवतः उच्च लागत पर। रिपोर्ट में इन नीतियों को स्पष्ट रूप से "अनावश्यक" के रूप में वर्णित किया गया है जो विलोप करने लायक हैं। हालांकि ये उपाय एक विचित्र निदान पर आधारित हैं और औचित्य के रूप में पेश किया गया विश्लेषण स्पष्ट रूप से बहुत कम अंतर से महत्‍वहीन है।

दुनिया भर में इस बात पर सहमति है कि कृषि बाजारों के संदर्भ में, विशेष रूप से भारत जैसे विकासशील देशों में, हमें विनियमन या नीतियों के नए रूपों की आवश्यकता है जो कालभ्रमित विनियमों एवं नीतियों की जगह ले सकें, बजाय इसके कि विनियम एवं नीतियां हों ही ना, क्योंकि स्पॉट बाजारों की संरचना विरली ही प्रतिस्पर्धी है। संभवतया इस पर इस अध्याय में बिल्कुल विचार नहीं किया गया है।

यद्यपि ईसीए के मनमाने उपयोग को दशकों से एक समस्या के रूप में चिह्नित किया गया है और कई समितियों ने इसे हटाने की सिफारिश भी की है, पर इसको हटाने से न तो अस्थिरता की समस्या का समाधान होगा और न ही थोक-खुदरा बाजार के विस्‍तार की समस्‍या का। वास्तव में, ईसीए की प्रभावहीनता का अर्थ यह नहीं है कि हमें किसी विनियमन की आवश्यकता ही नहीं है, बल्कि इससे यह प्र‍तीत होता है कि हमें कृषि बाजारों में अधिक प्रभावी और पारदर्शी विनियमन की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, एक परामर्श यह कहता है कि कमौडिटी बाजारों में सरकारी योजनाओं (वस्तुओं की खरीद और बिक्री के माध्यम से) को पारदर्शी या प्रारंभिक मूल्य बैंड से जोड़ा जा सकता है; इसलिए ईसीए का अधिक प्रभावी ढंग से और पारदर्शी रूप से उपयोग किया जा सकता है (चंद समिति रिपोर्ट, 2018)

इसी अध्याय में, रिपोर्ट यह दिखाने के लिए कि कैसे ईसीए अस्थिरता और थोक-खुदरा मूल्य कील (आकृति 8ए और 9, खंड) दोनों को कम करने में अप्रभावी है, चावल और चने की दाल (एक फली) के बीच विपरीतता प्रदर्शित करता है। जबकि उस अवधि में, जब ईसीए की कार्रवाई नहीं हुई थी चावल की कीमत स्थिर रहती थी, लेकिन ईसीए कार्रवाई के बावजूद चने की दाल की कीमत स्थिर नहीं रहती। हालांकि, कुछ पन्नों के बाद, रिपोर्ट ने बाधाकारी प्रतियोगिता के लिए चावल खरीद नीतियों की आलोचना की है। विडंबना यह है कि रिपोर्ट यह नहीं मानती कि आकृति 8ए और 9ए में दर्शाई गई चावल की कीमतों में स्थिरता मुख्य रूप से भारी बाजार हस्तक्षेप के कारण है, चाहे इस प्रक्रिया में, सरकारी खरीद, प्रतियोगिता से बाहर रह जाती है। इसी प्रकार की तुलनाओं पर आधारित ये उदाहरण स्थिति को स्पष्ट करने के बजाय भ्रमित करते हैं।

सवाल केवल विनियमन या नीतियों के वर्तमान रूपों को हटाने के बारे में नहीं है। बल्कि हमें यह पहचानने में भी कि विनियमन का कौन-सा रूप किस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए सबसे कारगर है और हमें विनियमन के किस वांछित इष्टतम स्तर की ज़रूरत है। इनमें से कई को "अनावश्यक" तथा दुर्बलीकरण प्रतिस्‍पर्धा के रूप में समझना, यह अनुमान लगाने जैसा है कि ये बाजार आरंभ से प्रतिस्‍पर्धी हैं, अथवा इनके न होने पर प्रतिस्‍पर्धी हो जाएंगे – यह भारत के कृषि बाजारों के संबंध में एक अत्‍यंत त्रुटिपूर्ण धारणा है। जैसा कि खरीद के संबंध में, यह देखते हुए कि खरीद लागत का अधिकांश भाग वास्तव में किसानों को हस्तांतरित होता है (2010-17 में लगभग 60% औसत), खरीद का विघटन अपनी स्वयं की लागत से जुड़ा हो सकता है यदि किसानों को अन्य तरीकों से मुआवजा नहीं दिया जाता है। यह विश्लेषण इन नीतियों को हटाने के व्यापारगत प्रभावों की उपेक्षा करता हुआ दिखता है।

कर्ज माफी के संबंध में, रिपोर्ट यह बताती है कि पूर्ण छूट प्रदान करना निश्चित रूप से हानिकारक है, और वास्तव में व्यथित लोगों की पहचान करना चुनौतीपूर्ण और महंगा है। हालांकि यह वास्तव में मान्य है कि कर्ज़ माफी का उपयोग नियमित रूप से नहीं किया जाना चाहिए, यह सुझाव देना कि अल्पावधि में भी इसके एक उपशामक के रूप में उपयोग करने की कोई जगह नहीं है, बेबुनियाद4 प्रतीत होता है।

सर्वेक्षण का खंड 2 में ‘कृषि और खाद्य प्रबंधनपर परंपरागत अध्‍याय नीतिगत सुधार के लिए अधिक सतर्क दृष्टिकोण प्रदान करता है। इसमें और भी  अधिक मुद्दों को शामिल किया गया है। आर्थिक सर्वेक्षण के हालिया संस्करणों में तीन चीज़ें विपरीत हैं।

पहला यह कि किसानों की आय दोगुनी करने की रणनीति, और प्रधानमंत्री आवास योजना (पीएमएफबीवाई) जैसी योजनाओं की चर्चा करते समय पिछले वर्षों की अतिशयोक्ति से अलग है। इसके बजाय, हमारे पास एक विस्‍तृत दृष्टिकोण है जिसमें कई मुद्दे शामिल हैं, जैसे मशीनीकरण, सूक्ष्म सिंचाई, आय समर्थन, खरीद कार्यक्रम, बीमा, भंडारण, खाद्य प्रसंस्करण, डेरी एवं मछ्ली-पालन और कृषि अनुसंधान के लिए समर्थन की आवश्यकता।

दूसरा, पिछली रिपोर्ट के विपरीत, यह कृषि के लिए एक मजबूत, सुसंगत दृष्टि को स्पष्ट नहीं करता, सिवाय समापन खंड के – जिसमें कहा गया है कि किसान की आय दोगुनी कैसे हो सकती है और उन नीतियों को रेखांकित करती है जो लघुबहुल-कृषि के लिए प्रासंगिक हैं। फिर भी, समापन दृष्टिकोण एवं शेष अध्‍याय आपस में खास अच्छी तरह से नहीं जुड़ते हैं। सर्वेक्षण (खंड 2) कम होती कृषि विकास दर के बारे में अवांछित रूप से चिंता व्‍यक्‍त नहीं करता, इसके बजाय यह बताता है कि यह संरचनात्मक परिवर्तन के अनुरूप है। घटती विकास दर की तुलना में यह शायद अधिक चिंताजनक है क्योंकि यह देखते हुए कि कई लोगों को अन्य गैर-कृषि क्षेत्रों में रोजगार नहीं मिलता है, यह कृषि के उस दृष्टिकोण को सुझाता है जो ग्रामीण वास्तविकताओं के साथ असंगत प्रतीत होता है, जिसमें भूमि और खेती कई लोगों के लिए गिरावट वाला विकल्प है।

तीसरा और विशेष चिंताजनक मुद्दा है पिछले वर्षों से निरंतरता की अनुपस्थिति। आर्थिक सर्वेक्षण के हाल के संस्करणों में पर्याप्त आवंटन के साथ कई भरोसेमंद और कई गैर भरोसेमंद नीतियों की चर्चा की गई थी, लेकिन इस सर्वेक्षण में उन नीतियों का कोई ज़िक्र नहीं है। उदाहरण के लिए, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट (ई-एनएएम), ज़ीरो-बजट नेशनल फार्मिंग (जेडबीएनएफ) पर चर्चा को हाल के सर्वेक्षण में कोई स्‍थान नहीं दिया गया है। इसी तरह के विलोपनों में 2019 के ड्राफ्ट बीज बिल और 2017-18 के 'वन मिलियन फार्म पॉन्ड्स (दस लाख खेत में तालाब)' कार्यक्रम शामिल हैं। इनमें से कुछ, जैसे कि एफपीओ और ई-एनएएम संस्थागत संदर्भ को आकार देने में महत्वपूर्ण हैं, जिसमें छोटे धारक काम करते हैं। क्या सरकार ने शायद इन्हें सुधार के लिए केंद्र बिंदु के रूप में महत्‍व नहीं दिया है? यह कहना मुश्किल है।

ऐसा महसूस होता है कि दीर्घकालीन कृषि सुधार के लिए इस वर्ष का क्या महत्‍व है, यह मानने के बजाय, सर्वेक्षण ने उन कार्यक्रमों को प्रदर्शित किया है जिनमें किसानों के लिए किसी भी प्रकार के हस्तांतरण शामिल हैं। इन्हें कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियों को प्रतिबिंबित किए बिना उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उदाहरण के लिए, पीएमएफबीवाई से जुड़ी चुनौतियों के सीमित होने पर यह उपयोगी है, लेकिन वास्‍तव में इनमें से कोई भी पीएम-किसान (प्रधान मंत्री किसान सम्‍मान निधि), पीएमकेएसवाई (प्रधान मंत्री किसान सम्पदा योजना), और उर्वरकों हेतु प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) से जुड़ी नहीं है। इन कार्यक्रमों में से प्रत्येक को कार्यान्वयन में उल्‍लेखनीय बाधाओं का सामना करना पड़ा है। अतीत में की गई पहलों की सफलताओं और असफलताओं की गंभीर चर्चा, उस मार्ग की हमारी समझ के लिए महत्वपूर्ण है जिसे हम कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए मज़बूती से अपना सकते हैं।

कृषि आज ऐसा क्षेत्र बन गया है जिसमें कई प्रकार के लोगों का जटिल सम्मिश्रण है, जिसमें जैविक एवंवैकल्पिक कृषि से जुड़े किसान, पुनर्जीवित होने की कोशिश कर रहे किसान संगठन, और निजी क्षेत्र, वित्त, विस्तार और विपणन क्षेत्र में तकनीकी रूप से संचालित कृषि स्टार्ट-अप शामिल हैं। कृषि पारिस्थितिकी तंत्र में इन लोगों के कार्यों के परिणामों और संभावनाओं को प्रतिबिंबित करने का यह सही समय है। एक और उल्लेखनीय कमी महिला किसानों के भविष्‍य पर चुप्पी है – जो कि एक ऐसी चिंता थी जिसे पिछले सर्वेक्षणों में स्‍थान मिला था।

चर्चा की पुनर्रचना: आर्थिक सर्वेक्षण क्या कर सकता था

भारतीय कृषि, अपनी सभी विविधताओं और बहुलता के साथ, एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। अल्पकालिक आवश्‍यकताओं और दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधार के बीच चयन की कठिन चुनौतीहै। आज की आवश्‍यकता है कि कृषि सुधार के दीर्घकालिक दृष्टिकोण को त्‍यागे बिना, उपशामकों के माध्यम से अल्पकालिक संकट को दूर करने के तरीकों की तलाश की जाए।

इनमें से बाद वाली आवश्‍यकता के साथ दो तात्कालिक चुनौतियाँ जुड़ी हैं। पहला विनियमन के विभिन्‍न प्रकारों में से उन विकल्पों को रेखांकित करना है जो लंबे समय में भारतीय कृषि के लिए सबसे अच्‍छी तरह काम करेंगे और संस्थानों एवं तकनीकी क्षमता के संदर्भ में हमारी तैयारियों का आकलन करेंगे, साथ ही वहां तक पहुंचने के लिए एक रोडमैप तैयार करेंगे। इसके लिए उत्पादकों और उपभोक्ताओं के हितों के बीच संतुलन स्‍थापित करना होगा। दूसरा समर्थन के प्रकारों में से चयन करना है। इनपुट सब्सिडी और मूल्य-आधारित समर्थन से दूर हटना लाभप्रद है क्‍योंकि पर्यावरणीय क्षति और अधिक पारदर्शी आय समर्थन के संदर्भ में इसके परिणाम हानिकारक रहे हैं। फिर भी, इनका डिज़ाइन और वितरण तंत्र चुनौतीपूर्ण बना हुआ है, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि इन नीतियों को काश्‍तकारों और महिला किसानों तक पहुँचाने की आवश्यकता होगी, जो भविष्य के किसान होंगे। हम पहले से ही जानते हैं कि किसानों की पहचान, स्पष्ट भूमि रिकॉर्ड, और सीधी भुगतान योजनाओं में आधार को जोड़ने से जुड़ी कठिनाइयों के कारण बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

किसान समर्थन के डिजाइन निर्माण में बहुत कुछ नवाचार राज्यों से आया है, कुछ केंद्र से, और प्रत्येक का अपना डिजाइन, लक्ष्य समूह, और हस्तांतरण का तरीका है। इसके उदाहरण हैं मध्यप्रदेश काभावांतर भुगतान योजना (बीबीवाई), जो एक मूल्य की कमी का भुगतान करने की प्रणाली है; उर्वरकों के लिए डीबीटी; ओडिशा में आजीविका और आय संवर्धन (कालिया) के लिए कृषक सहायता; तेलंगाना में रायतु बंधु; पूरे भारत में पीएम–किसान और पीएमएफबीआई; और बिहार राज्य फसल सहायता योजना (बीआरएफएसवाय)। आज जबकि हम किसानों को समर्थन हेतु सर्वश्रेष्‍ठ तरीके को आकार दे रहे हैं तो इन सभी मॉडलों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। आर्थिक सर्वेक्षण इस तरह की चर्चा के लिए आदर्श स्थान होता।

संक्षेप में, आर्थिक सर्वेक्षण 2019-20 ने वर्तमान संकट को दूर करने के लिए अल्पकालिक उपायों की तात्कालिकता को स्पष्ट करते समय दीर्घकालिक सुधार-विनियमन और समर्थन का रूप, जो भारतीय कृषि के लिए सर्वश्रेष्‍ठ हो सकता है, के लिए एक मार्ग को स्पष्ट रूप से रेखांकित करने का एक अवसर गंवा दिया। ऐसा करते हुए, यह साफ-साफ देखा जा सकता है कि सर्वेक्षण में कृषि के संबंध में स्पष्ट, दूरदर्शी-नीति रणनीति का अभाव है।

टिप्पणियाँ:

  1. मनरेगा एक ग्रामीण परिवार को एक वर्ष में 100 दिनों के मजदूरी-रोजगार की गारंटी देता है, जिसके वयस्क सदस्य राज्य-स्तरीय वैधानिक न्यूनतम मजदूरी पर अकुशल मजदूरी करने को तैयार हैं।
  2. किसानों की आय दोगुनी करने के संबंध में दलवाई समिति (2016) ने कहा था कि लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, किसानों की वास्तविक आय को 4% की चक्रवृद्धि वार्षिक दर से बढ़ाना होगा। यह केवल बाद में ही स्पष्ट किया गया है कि किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य इसे नाममात्र के संदर्भ में दोगुना करना है। एनआईटीआई (नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने 1 फरवरी 2020 को प्रणय रॉय के साथ एनडीटीवी पर साक्षात्कार में इसे "उल्लेखनीय" माना।
  3. उपभोक्ता हितों की रक्षा के लिए और आवश्‍यक वस्‍तुओं को उचित मूल्य पर उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराने के उद्देश्‍य से, उपभोग के लिए आवश्यक समझी जाने वाली कतिपय वस्‍तुओं के उत्पादन और वितरण को विनियमित करने हेतु आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 को अधिनियमित किया गया था।
  4. इन तर्कों और अध्ययनों की समीक्षा के लिए नारायणन और मेहरोत्रा ​​(2019) और सेन (2017) को देखें, जो इस तरह की कर्ज माफी के लिए भूमिका पर जोर देते हैं।

लेखक परिचय: सुधा नारायणन मुम्बई स्थित इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट फॉर डेवलपमेंट रिसर्च में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।

 

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