शासन

विकास की गति के लिए प्रभावी शासन के ज़रिए राज्य की क्षमता का निर्माण

  • Blog Post Date 19 अगस्त, 2025
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Maitreesh Ghatak

London School of Economics

m.ghatak@lse.ac.uk

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Karthik Muralidharan

University of California, San Diego

kamurali@ucsd.edu

आई4आई अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं के बीच संवाद का आयोजन करता रहता है, जिनमें भारत में विकास और वृद्धि से जुड़े 'बड़े मुद्दों' या भविष्य के विचारों पर विशेषज्ञों के साथ गहन चर्चा होती है। इस वीडियो चर्चा में, जिसका सारांश हिंदी में उपलब्ध है, कार्तिक मुरलीधरन (कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो) ने अपनी नई पुस्तक, ‘एक्सेलरेटिंग इंडियाज़ डेवलपमेंट : ए स्टेट-लेड रोडमैप फॉर इफेक्टिव गवर्नेंस’ पर मैत्रीश घटक (लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स) के साथ पुस्तक के प्रमुख विषयों पर विस्तार से बातचीत की।

मूल विडियो पॉडकास्ट के रूप में भी उपलब्ध है।

कार्तिक मुरलीधरन इस पुस्तक को लिखने के पीछे की मूल प्रेरणा को साझा करते हुए कहते हैं अर्थशास्त्री इस बारे में बात करते हैं कि सरकार को क्या करना चाहिए, लेकिन अक्सर यह नहीं पूछते कि क्या सरकार सिफारिशों को लागू करेगी या फिर उसके पास ऐसा करने की क्षमता भी है या नहीं। यह पुस्तक शासन-व्यवस्था को लागू करने वाले दो प्रमुख घटकों, राजनेताओं और नौकरशाहों, की और से मिलने वाले प्रोत्साहनों और बाधाओं की रुपरेखा प्रस्तुत करती है। मूल समस्या यह है कि राज्य की क्षमता का प्रतिफल आमतौर पर लम्बी अवधि में प्राप्त होता है और इसलिए, चुनावी चक्र हमेशा ऐसे निवेशों को प्रोत्साहित नहीं करता है। साथ ही, नौकरशाही पर परिणाम दिखाने का दबाव होता है, तब भी जब उनके पास आवश्यक संसाधन नहीं होते हैं। उधर, चुने जाने के बाद राजनेता कुछ  न कुछ सही करने की इच्छा रखते हैं। ऐसे में शिक्षाविद छूटे हुए अवसरों पर प्रकाश डालकर अपना योगदान दे सकते हैं, जिन पर नीति निर्माता अपना ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं।

इस पुस्तक में दावा किया गया है कि शासन-व्यवस्था में निवेश से दस गुना तक का लाभ मिल सकता है। इस क्रम में मैत्रीश घटक सवाल उठाते हैं कि क्या निहित स्वार्थ सभी के लिए समान लाभ वाले नीतिगत विकल्पों को लागू होने से रोक सकते हैं? ज़ाहिर है कि किसी कानून को लागू करने या जवाबदेही में सुधार करने के हर प्रयास से किसी न किसी की स्थिति और खराब होने की आशंका होती है और इसके कारण वे बदलाव का विरोध करेंगे। फिर भी, जैसा कि पुस्तक में वर्णित है, यदि किसी नीति के चलते बड़ी संख्या में लोगों की स्थिति बेहतर होती है तो इससे उस पर अमल के लिए राजनीतिक समर्थन भी मिल जाता है। विचार यह है कि समानता और दक्षता को बारीकी से देखा जाए, किस पहलू को मज़बूत करने के लिए क्या छोड़ना पड़ सकता है उसको देखा जाए और उन क्षेत्रों में निवेश किया जाए जहाँ सुधार की गुंजाइश है।

पुस्तक एक ढाँचा प्रस्तुत करती है, जिसमें विचार, हित और संस्थाएँ शामिल हैं, ताकि अंततः अपनाई जाने वाली नीतियों को बारीकी से समझा जा सके। शोधकर्ताओं की भूमिका सार्वजनिक मंच पर विचारों को लाने की है ताकि ये विचार सार्वजनिक चर्चा में शामिल हों और संबंधित राजनेता उन पर प्रतिक्रिया दे सकें। पिछले 20 वर्षों में सूक्ष्म डेटासेट, कंप्यूटिंग शक्ति और कारण अनुमान पर अधिक ध्यान देने के सन्दर्भ में हुई प्रगति से हमें अप्रभावी सरकारी व्यय का पता लगाने में मदद मिलती है। मानव विकास के उदाहरण पर विचार करें तो ज़्यादातर धनराशि नियमित सरकारी कर्मचारियों के वेतन में बिना शर्त बढ़ोतरी पर खर्च की जाती है, जबकि विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि इससे कार्यनिष्पादन पर कोई असर नहीं पड़ता। दूसरी ओर, समुदाय में एक दूसरी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की नियुक्ति से बच्चों के अधिगम और पोषण पर उल्लेखनीय रूप से सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसलिए, किसी विशेष क्षेत्र के समान बजट में भी, धनराशि को बेहतर उद्देश्यों के लिए अंतरित किया जा सकता है।

आर्थिक प्रणालियों के दृष्टिकोण से मैत्रीश घटक नीति-निर्माण में आसान परिणामों का अधिकतम लाभ उठाने के लिए तीन अंतर्निहित तंत्र प्रस्तुत करते हैं- पहला है तकनीकी परिवर्तन, यह एक बाहरी कारक है जो कुछ कार्यों को सम्भव बनाता है। दूसरा है किसी कार्य को बेहतर तरीके से करने के ठोस साक्ष्य और तीसरा है राजनीतिक प्रतिस्पर्धा। वे यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षणों (आरसीटी) को लेकर अपनी शंकाएँ साझा करते हैं- क्या सरकार ऐसी नीतियाँ अपनाएगी जो प्रभावी साबित हो चुकी हैं, और क्या वे नीतियाँ प्रयोगात्मक परिस्थितियों की तरह ही काम करेंगी?

मुरलीधरन बताते हैं कि विशिष्ट हस्तक्षेपों के विस्तार की वकालत करने के बजाय, इस पुस्तक के प्रति उनका दृष्टिकोण यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षणों (आरसीटी) से प्राप्त साक्ष्यों से व्यापक सिद्धांतों को निकालना है। इसलिए, ज़ोर लचीली सार्वजनिक प्रणालियों के निर्माण और शासन-व्यवस्था को अधिक कुशल बनाने के लिए कार्यप्रणाली के संस्थागत तरीकों पर केन्द्रित है। यह पुस्तक बेहतर डेटा संग्रह प्रणालियों, कार्मिक प्रबंधन, राजस्व और व्यय प्रणालियों और शासन-व्यवस्था एवं बाज़ार के बीच अंतर्संबंध स्थापित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है। यद्यपि इनमें से प्रत्येक क्षेत्र का अनुभवजन्य शोध में अन्वेषण किया गया है, इस पुस्तक का उद्देश्य इन अध्ययनों से प्राप्त प्रभावी संगठनात्मक सिद्धांतों को एक साथ लाना है जो न केवल सार्वजनिक क्षेत्र पर, बल्कि निजी और गैर-लाभकारी क्षेत्रों पर भी लागू होते हैं।

घटक इस बात की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं क्योंकि आरसीटी में जिन प्रोत्साहनों का परीक्षण किया जा रहा है, उनमें से कई अभिसंधि के प्रतिरोधी नहीं हैं तो क्या लक्ष्य ऐसे प्रोत्साहनों को डिज़ाइन करना होना चाहिए, जिन्हें एक बार लागू करने के बाद, ख़त्म करना या नज़रअंदाज़ करना आसान न हो? इससे एक गहरा सवाल उठता है कि व्यवस्था की अखंडता को बनाए रखने के लिए किस प्रकार के संस्थागत निवेश किए जा सकते हैं। मुरलीधरन सुझाव देते हैं कि जिन हस्तक्षेपों में सबसे अधिक स्थायित्व है, वे बजट प्रक्रिया में सुधार के लिए सूक्ष्म-स्तरीय सुधार हैं। हालांकि सरकार की अकुशलता अक्सर भ्रष्टाचार से जुड़ी होती है, लेकिन उनका कहना है कि यह समस्या का केवल एक छोटा सा हिस्सा है। अधिकांश अकुशलता कम कर्मचारियों वाली नौकरशाही के भीतर संस्थागत जड़ता में निहित है। वे वार्षिक बजट प्रक्रिया के एक भाग के रूप में कर्मचारियों के युक्तिकरण अभ्यास का उदाहरण देते हैं। हालांकि प्रोत्साहन मायने रखते हैं, कई लाइन विभागों में वर्तमान में लागत दक्षता को ध्यान में रखकर काम करने की प्रेरणा का अभाव है। वे अकुशलता को दूर करने के लिए एक सूक्ष्म दृष्टिकोण, उपयोगी कार्यों को समाप्त किए बिना सुधारों को आगे बढ़ाना, की वकालत करते हैं।

घटक पुस्तक की समीक्षाओं में उठाई गई एक चिंता को सामने लाते हैं कि सरकार पर नियंत्रण और संतुलन को बिगाड़े बिना सरकार (शासन-व्यवस्था) की क्षमता कैसे बढ़ाई जा सकती है। उदाहरण के लिए, आयकर प्रणालियों या आधार में व्याप्त अक्षमताएँ शासन की दमनकारी शक्तियों और कमज़ोर आबादी के बीच कुछ हद तक सुरक्षा प्रदान कर सकती हैं। मुरलीधरन का तर्क है कि अगर हम इस लोकतांत्रिक आधार को स्वीकार करते हैं कि सरकारों को मतदाताओं की इच्छाओं को पूरा करना चाहिए, तो उनके पास प्रभावी ढंग से ऐसा करने की क्षमता होनी चाहिए और कुप्रबंधन एवं बहिष्करण को रोकने के लिए सुरक्षा उपाय लागू किए जाने चाहिए।

इस चर्चा का समापन भविष्य में इस दिशा में और अधिक शोध व चिंतन के विचार के साथ होता है। हालांकि हम प्रयोगात्मक रूप से भारतीय राज्यों में नीतियों के क्रियान्वयन को 'यादृच्छिक' नहीं बना सकते, फिर भी राज्यों में भिन्नताओं का लाभ उठाकर यह देखा जा सकता है कि विभिन्न सरकारों, संस्कृतियों और संस्थानों के सन्दर्भ में समान हस्तक्षेप कैसे काम करते हैं।

अंग्रेज़ी के मूल लेख और संदर्भों की सूची के लिए कृपया यहां देखें। मूल विडिओ के हिन्दी सबटाइटल्स उपलब्ध हैं। उन्हें देखने के लिए आप यूट्यूब की सेटिंग में सबटाइटल्स के विकल्प को ऑन करने के बाद, हिन्दी भाषा चुनिए।

लेखक परिचय : मैत्रीश घटक 2004 से लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पोलिटिकल साइंस में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। वे 2009 से जर्नल ऑफ डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स के प्रधान संपादक हैं और 2006 से एसटीआईसीईआरडी में आर्थिक संगठन व सार्वजनिक नीति शोध कार्यक्रम के निदेशक हैं। ऋषभ कुमार मैसाचुसेट्स बोस्टन विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर हैं। वे देशों के भीतर और उनके बीच आय व धन के वितरण में रुचि रखते हैं तथा वर्तमान व ऐतिहासिक असमानता/गरीबी, आर्थिक विकास व राजनीतिक अर्थव्यवस्था के बारे में लिखते हैं। कार्तिक मुरलीधरन सैन डिएगो स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं, और वे अर्थशास्त्र में टाटा चांसलर एनडोव्ड़ चैर भी हैं। भारत में जन्मे और पले-बढ़े कार्तिक ने हार्वर्ड से अर्थशास्त्र में एबी (सुम्मा कम लाउडे), कैम्ब्रिज से अर्थशास्त्र में एमफिल और हार्वर्ड से अर्थशास्त्र में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। वह अमरीका में नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च (एनबीईआर) के रिसर्च एसोसिएट, ब्यूरो फॉर रिसर्च एंड इकोनॉमिक एनालिसिस ऑफ डेवलपमेंट के एक सहयोगी, जमील पॉवर्टी एक्शन लैब नेटवर्क के सदस्य, सेंटर फॉर इफेक्टिव ग्लोबल एक्शन के एक सहयोगी और इनोवेशन फॉर पॉवर्टी एक्शन के एक शोध सहयोगी हैं। प्रोफ़ेसर मुरलीधरन की प्राथमिक शोध रुचियों में विकास, सार्वजनिक और श्रम अर्थशास्त्र शामिल हैं।

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