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चुनावी चक्र और अपूर्ण लोक निर्माण परियोजनाएं: भारत में एमपीएलएडी योजना का विश्लेषण

  • Blog Post Date 17 जनवरी, 2020
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Anjali Thomas

Georgia Tech University

anjalitb3@gatech.edu

सरकारों द्वारा आरंभ किए गए लोक निर्माण कार्यक्रमों का सफल निष्पादन अक्सर स्थानीय स्तर की ऐसी अनेक प्रकार की परियोजनाओं के पूर्ण होने पर निर्भर करता है जिन्‍हें नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए वास्तविक सुविधाएं सृजित करने के उद्देश्य से बनाया जाता है। हालांकि, व्यावहारिक रूप से, इन परियोजनाओं का काफी बड़ा अनुपात अक्सर अपूर्ण रहता है। यह लेख संसद-सदस्‍य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीएलएडीएस), जोभारत में लोक निर्माण परियोजनाओं के लिए निर्वाचन क्षेत्र विकास निधि है,के अंतर्गत होने वाली परियोजनाओं के अपूर्ण रहने के कारण की जांच करता हैं।

 

दुनिया के कई हिस्सों में, सरकारें लोक निर्माण कार्यक्रमों को लागू करती हैं जिनका उद्देश्‍य नागरिकों को विविध प्रकार की वस्तुएँ और सेवाएँ प्रदान करना होता है। इन कार्यक्रमों का सफल निष्पादन अक्सर स्थानीय स्तर की ऐसी अनेक प्रकार की परियोजनाओं के पूर्ण होने पर निर्भर करता है जिन्‍हें नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए वास्तविक सुविधाएं सृजित करने के उद्देश्य से बनाया जाता है। हालांकि, व्यावहारिक रूप से, इन परियोजनाओं का काफी बड़ा हिस्सा अक्सर अपूर्ण रहता है। परियोजना के क्रियान्वयन में ऐसी विफलताएँ क्यों होती हैं? हमारा शोध इस प्रश्‍न की जांच संसद-सदस्‍य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीएलएडीएस) के तहत लोक निर्माण परियोजना के लिए निर्वाचित क्षेत्र विकास निधि के परिप्रेक्ष्‍य में करता है। एमपीएलएडीएस के तहत प्रत्येक भारतीय सांसद को अपने निर्वाचन क्षेत्र में सड़क, स्कूल-बिल्डिंग या पेयजल सुविधाओं में सुधार जैसे बुनियादी ढांचों को सृजित करने के लिए प्रति वर्ष 5 करोड़ रुपए आवंटित किए जाते हैं। यह योजना में सांसदों को अपने विवेक के हिसाब निर्णय लेने देती है कि किन लोक निर्माण परियोजनाओं की सिफारिश किन जिला प्राधिकारियों को दी जाए जो इन सिफारिशों को मंजूरी देने और परिणामी परियोजनाओं को लागू करने के लिए उत्‍तरदायी हैं। यद्यपि कार्यान्वयन की प्रक्रिया आधिकारिक तौर पर जिला नौकरशाही के हाथों में है लेकिन ऐसे कई माध्‍यम हैं जिनके द्वारा सांसद इस प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। मगर कई ऐसे उदाहरण हैं जिनमें सांसद सिफारिश करते हैं और उन पर प्रारंभिक अनुमोदन तो मिल जाता है लेकिन अंत में वे अपूर्ण रह जाती हैं। परियोजनाओं के पूरा होने में ये अलग-अलग विफलताएँ मिल कर उन समग्र कठिनाइयों को बनाती हैं जिनका सामना एमपीएलएडीएस ने "लोगों की महसूस की गई जरूरतों को पूरा करने" के अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने में किया है।1 हमारे हालिया शोध (थॉमस एवं डारसी, जो अभी चल रहा है) में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि किन कारणों से एमपीएलएडीएस के तहत परियोजनाएं अपूर्ण रह जाती हैं।

एमपीएलएडीएस परियोजनाओं को पूरा करने की विफलता को समझना

हमारा तर्क है कि एमपीएलएडीएस के तहत परियोजनाओं को पूरा करने की विफलताओं में एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण सांसदों के लिए चुनावी चक्रों द्वारा उत्पन्न प्रोत्साहन में पाया जा सकता है। लोकसभा (संसद का निचला सदन) में भारतीय सांसद हर पांच साल में चुनावों का सामना करते हैं और ये चुनाव अत्यधिक प्रतिस्पर्धी होते हैं। हालांकि चुनावी प्रतिस्‍पर्धा को आम तौर पर सकारात्मक माना जाता है, फिर भी हमारा तर्क है कि सांसद चुनावों से ठीक पहले प्रतिस्पर्धात्मक दबावों का सामना करते हैं जिनके कारण परियोजनाएं दो चैनलों के माध्यम से अधूरी रह सकती हैं।

पहला — जिसे हम ‘मतदाता मांग चैनल कहते हैं – यह बताता है कि मतदाताओं द्वारा मांग की गई परियोजनाएं उनके पूरी होने की अंतर्निहित संभावना के संदर्भ में भिन्न होती हैं। हालांकि कुछ प्रस्तावित परियोजनाएं अपेक्षाकृत सरल हैं, लेकिन कुछ बहुत जटिल हैं और प्रशासनिक या तकनीकी कारणों से उनके अधूरी रहने की आशंका ज्यादा है। इन कारणों में ऐसे परियोजना प्रस्ताव शामिल हैं जिनमें कार्यक्रम की आवश्यकताओं हेतु एक या एक से अधिक अपवादों की जरूरत होती है, या जहां भूमि या अन्य संसाधनों का उपयोग करने की अनुमति प्राप्त करना मुश्किल हो सकता है। आमतौर पर, एक सांसद इनमें से दूसरे प्रकार की परियोजनाओं की सिफारिश करने के लिए अनिच्छुक हो सकता है। तथापि, चुनावों से ठीक पहले, सांसद परियोजनाओं के पूरा होने की संभावना पर विचार किए बिना उन परियोजनाओं की सिफारिश करके मतदाताओं को संतुष्ट करने के बढ़ते हुए दबाव का सामना करते हैं। यह आंशिक रूप से इसलिए है कि यदि कोई सांसद किसी परियोजना को चुनावों से ठीक पहले प्रस्तावित करता है, तो मतदाता परियोजना के अंतिम परिणाम – इसकी पूर्णता या इसमें कमी का पता केवल आने वाले चुनाव के बाद ही लगा सकते हैं और अक्सर यह परिणामों से बहुत दूर होता है। इस प्रकार, एक सांसद जो मतदाताओं के प्रति अपनी जवाबदेही का संकेत देने की कोशिश कर रहा है, वह चुनाव चक्र में अन्य समय की तुलना में चुनाव से ठीक पहले सिफारिश करने के लिए सहमत होने वाली परियोजनाओं के संबंध में अधिक ढीले मानकों को अपनाने के लिए तैयार हो सकता है।

दूसरा — जिसे हम ‘पदधारी परिवर्तनकहते हैं – यह बताता है कि परियोजनाओं को पूरा करने में विफलता इस तथ्य से प्रेरित है कि चुनावों के कारण अक्सर किसी निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद की पहचान में बदलाव होता है। एक नवनिर्वाचित सांसद अपने पूर्ववर्ती सांसद द्वारा प्रस्तावित परियोजनाओं का श्रेय लेने में सक्षम नहीं हो सकता है और इसलिए ऐसी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए अधिक प्रयास करने में रुचि नहीं रख सकता है।

ऊपर वर्णित दोनों चैनल एमपीएलएडीएस परियोजनाओं के बारे में कई परीक्षण योग्य परिकल्पनाओं का सुझाव देते हैं। पहला, हम उम्मीद करते हैं कि चुनावी चक्र के दौरान चुनाव से ठीक पहले, अन्य समय की तुलना में, अपूर्ण लोक निर्माण परियोजनाओं के लिए समर्पित धन का एक बड़ा हिस्सा होगा। दूसरा, जब चुनाव परिणाम में उस निर्वाचन क्षेत्र में पदधारी सांसद चुने जाने के बजाय नया सांसद आता है तो चुनावों से ठीक पहलेअंतत: अपूर्ण लोक निर्माण कार्यों के लिए समर्पित धन आनुपातिक रूप से ज्यादा होगा। तीसरा, हम उम्मीद करते हैं कि किसी चुनाव से ठीक पहले प्रस्तुत परियोजना प्रस्ताव में अन्य समय में प्रस्‍तुत परियोजना प्रस्तावों की तुलना में लागत, प्रशासनिक या तकनीकी मानदंडों का उल्लंघन करने की संभावना अधिक होगी। हम सीधे इस बात को नहीं माप सकते कि इन योग्यताओं को पूरा करने के लिए परियोजना प्रस्ताव किस हद तक विफल होते हैं। हालाँकि, इस तरह के उल्लंघन आम तौर पर सांसद और जिला नौकरशाह के कार्यालय के बीच चर्चा और बातचीत का कारण बनते हैं, हम तीसरे निहितार्थ की जांच इस परीक्षण के द्वारा करते हैं कि क्या औसतन अन्य समय में प्रस्तुत परियोजना प्रस्‍ताव की तुलना में चुनावों से ठीक पहले प्रस्तुत किए गए प्रस्ताव के अनुमोदन में अधिक समय लगता है।

हमारा विश्लेषण एक डेटासेट पर आधारित है, जिसे हमने 1993 से 2015 के बीच की अवधि को कवर करते हुए, एमपीएलएडीएस कार्यक्रम की वेबसाइट और भारतीय निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध परियोजना-स्तरीय आंकड़ों को मिला कर इकट्ठा किया है। हम किसी निर्वाचन क्षेत्र में उसके पदधारी सांसद द्वारा जिस तारीख को परियोजना प्रस्‍ताव दिया गया था उसके माह के आाधार पर परियोजना प्रस्‍ताव को निर्दिष्‍ट करते हैं। फिर हम आंकड़े एकत्रित करने के समय पर प्रत्येक परियोजना प्रस्ताव की अंतिम पूर्ण स्थिति को रिकॉर्ड करते हैं। इस जानकारी का उपयोग करते हुए, हम एमपीएलएडीएस के तहत प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र-माह में पूर्ण एवं अपूर्ण परियोजनाओं हेतु बजट आवंटन निर्धारित करने में सक्षम होते हैं।

आकृति 1. चुनाव अवधि और पूर्णता स्थिति के अनुसार परियोजनाओं के लिए औसत आवंटन

आकृति में दिये अँग्रेजी शब्दों का अनुवाद

Amount in Indian Rupee: राशि - भारतीय रुपये में

Completed/incomplete project: पूर्ण/अपूर्ण परियोजना

Election/Non-election period: चुनाव/गैर-चुनाव अवधि

हमारे तर्क के पहले निहितार्थ की जांच करने के लिए, आकृति 1 दर्शाती है कि पूर्ण और अपूर्ण परियोजनाओं को बजटीय आवंटन इस तथ्‍य के आधार पर बदलता है कि उनके लिए बजट आवंटन राष्ट्रीय चुनाव (चुनाव-पूर्व अवधि) के 24 महीने पहले किया गया था या किसी अन्य समय (गैर-चुनाव अवधि) में। आकृति स्पष्ट रूप से दिखती है कि जबकि गैर-चुनाव अवधि में अपूर्ण परियोजनाओं के लिए आवंटित औसत राशि की तुलना में पूर्ण की गई परियोजनाओं के लिए आवंटित औसत राशि बहुत अधिक है, यह अंतर चुनाव-पूर्व की अवधि में कम हो जाता है। इस प्रकार, हमारे तर्क के अनुरूप, चुनाव-पूर्व अवधि में अपूर्ण परियोजनाओं के लिए आवंटित धन की औसत राशि में वृद्धि और पूर्ण परियोजनाओं के लिए आवंटित धन की औसत राशि में कमी प्रदर्शित होती है। यही पैटर्न तब भी रहता है जब हम एक अधिक कठोर सांख्यिकीय विश्लेषण करते हैं, जिसके लिए कई वैकल्पिक स्पष्टीकरण जवाबदेह होते हैं जैसे कि सांसद का पूर्वाग्रह तथा चुनाव-पूर्व अवधि में प्रस्तावित परियोजनाओं की संख्या और बजट में वृद्धि के कारण नौकरशाह की क्षमता पर उत्पन्न होने वाला संभावित दबाव।

आगे के विश्लेषण हमारे इस दूसरे निहितार्थ को भी समर्थित करते हैं कि चुनावों से ठीक पूर्व प्रस्तावित परियोजनाओं के पूर्ण होने की संभावना उन निर्वाचन क्षेत्रों में विशेष रूप कम होती है जहां पदधारी में परिवर्तन हुआ है। हमारे तीसरे निहितार्थ के अनुरूप, हम यह भी पाते हैं कि किसी निर्वाचन क्षेत्र-माह में प्रस्तावित परियोजनाओं की संख्या और बजट चरों को नियंत्रित करने के बावजूद, अन्‍य समय पर प्रस्‍तावित परियोजनाओं की तुलना में चुनावों से ठीक पूर्व प्रस्तावित परियोजनाओं के अनुमोदन में औसतन अधिक समय लगता है। अत: कुल मिलाकर, परिणाम हमारी इस व्याख्या के अनुरूप हैं कि चुनावी चक्रों और अपूर्ण परियोजनाओं के बीच आपस में संबंध होता है।

निष्कर्ष

वर्ष 1993 में अपनी शुरुआत के बाद से, एमपीएलएडीएस ने विद्वानों और मीडिया का ध्यान इस कारण से आकर्षित किया है कि इसके राजनीतिक स्वरूप के कारण समय-समय पर धन का न्‍यून उपयोग या  दुरुपयोग होता है (जैसे कीफर और खेमानी 2009, ब्लेयर 2017, थॉमस बोहलकेन 2018)। हमारा शोध अलग है लेकिन इस योजना से संबंधित परिदृश्‍यों पर प्रकाश डालता है - परियोजनाओं के पूरा होने में असफल होना और यह दर्शाता है कि ये विफलताएँ चुनावी चक्रों के द्वारा कैसे आकार लेती हैं। दरअसल, हमारा निष्कर्ष एक जिज्ञासु पैटर्न पर प्रकाश डालता है जिससे सांसद अन्य समय की तुलना में चुनाव से ठीक पूर्व परियोजनाओं के लिए काफी अधिक धन आवंटित करते हैं जो अंततः अपूर्ण रह जाती हैं। हम यह भी दिखाते हैं कि कैसे चुनावों से उत्पन्न प्रतिस्पर्धात्मक दबाव मतदाता मांग और पदधारी के परिवर्तन के माध्यम से इन पैटर्न को जन्म देते हैं।

हमारे निष्कर्षों में भारत के लिए कई नीतिगत निहितार्थ हैं, जिनमें से कुछ को एमपीएलएडीएस कार्यक्रम में परिवर्तन के साथ क्रियान्वित किया जा सकता है और बाकि का भविष्य के लोक निर्माण कार्यों के कानूनों और विनियमों को बनाने के लिए विचार किया जाना चाहिए। एमपीएलएडीएस के भीतर, एमपीएलएडीएस निधि की खर्च न की गई राशि एक वर्ष से स्‍वत: अगले वर्ष में ले जाने (रोलओवर) से राजनीतिज्ञ प्रत्‍याशित चुनावी तारीखों से पहले परियोजनाओं हेतु अपनी सिफारिशों पर ध्‍यान केंद्रित करने में सक्षम होते हैं, जो उच्‍च परियोजना विफलता की दर से जुड़ा हुआ है। इस स्वत: रोलओवर प्रावधान को समाप्त करके इस प्रभाव को कम किया जा सकता है। इसके अलावा, विशिष्ट लोक निर्माण परियोजनाओं की प्रगति के संबंध में पदधारी के प्रयासों, या उसकी कमियों के बारे में मतदाताओं को जानकारी प्रदान करने से, नवनिर्वाचित सांसदों को अपने पूर्ववर्तियों द्वारा किए गए प्रस्तावों को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। राजनैतिक दल सक्षम पदधारियों को उसी निर्वाचन क्षेत्र में फिर से चुनाव में खड़े होने के माध्‍यम से प्रोत्साहित कर इसमें मदद कर सकते हैं जो भविष्य के किसी भी विवेकशील खर्च कार्यक्रमों पर लाभकारी प्रभाव डाल सकते हैं। अधिक व्यापक रूप से, हमारे शोध से पता चलता है कि ऐसी नीतियां जो विवेकाधिकार को न्‍यूनतम करती हैं और जिनमें परियोजना प्रस्तावों की मंजूरी के लिए अधिक कठोर और मानकीकृत मानदंडों की आवश्यकता होती है वे भी लोक सेवा के प्रावधान पर लोकतांत्रिक चुनावों के नकारात्मक प्रभाव को कम कर सकती हैं, क्योंकि जनता द्वारा विधिनिर्माताओं से अधिक जवाबदेही और पारदर्शिता के लिए मांग की जा सकती है ताकि वे ऐसे कार्यक्रम बनाएं जो जनता के लिए लाभदायक हों न कि पदधारी राजनीतिज्ञों के हितों का समर्थन करें। 

नोट्स:

  1. संसद सदस्‍य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीएलएडीएस), दिशा-निर्देश, भारत सरकार, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय, जून 2016: https://www.mplads.gov.in/MPLADS/UploadedFiles/MPLADSGuidelines2016English_638.pdf.

लेखक परिचय: अंजलि थॉमस जॉर्जिया टेक यूनिवर्सिटी स्थित सैम नून स्कूल ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। और जोनाथन डार्सी वहीं अंतर्राष्ट्रीय संबंध में पीएच.डी. कर रहे हैं। 

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