पर्यावरण

उषारमुक्ति परियोजना: नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए संस्थानों का संगम

  • Blog Post Date 30 जनवरी, 2020
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पश्चिम बंगाल सरकार की एक परियोजना ‘उषारमुक्ति’ को राज्य के पश्चिमी हिस्से में नागरिक समाज संगठनों के सहयोग से क्रियान्वित किया जा रहा है, ताकि मिट्टी और पानी के संरक्षण के लिए मनरेगा के तहत जल विभाजक (जलग्रहण क्षेत्र) गतिविधियां की जा सकें। इस नोट में, अश्विनी कुलकर्णी ने परियोजना क्षेत्र में किए अपने दौरे के आधार पर इसके पीछे के मुख्य विचार और अभिनव कार्य प्रणाली का वर्णन किया है।

 

जब एक किसान कहता है कि रबी के मौसम में आलू और उनके हापा (खेत तालाब) में बत्तख पालन करने से, उस वर्ष उनके परिवार की आय में रु.50,000 से रु.60,000 तक की वृद्धि होगी, तब आशा से भरे उनके यह शब्‍द लंबे समय तक आपके दिमाग में रह जाते हैं। देश भर में चल रहे ग्रामीण संकट को देखते हुए, यह स्वीकार करना मुश्किल नहीं है कि यह एक दुर्लभ कथन है, और यह कथन तब और भी दुर्लभ हो जाता है जब यह परिवार एक सीमांत किसान का परिवार हो जिसके पास सिंचाई का कोई स्रोत नहीं होता है। उनके खेत में एक साधारण से हापा ने इस आशा को जन्‍म दिया है। पानी और मिट्टी की बहाली एवं संरक्षण के लिए यह केवल एक गतिविधि नहीं है बल्कि यह उस योजना का एक हिस्‍सा है जिसका आधार सोच समझकर तैयार की गई जलग्रहण क्षेत्र-आधारित योजना है।

यह पश्चिम बंगाल के पश्चिमी भाग के ब्लॉकों का परिदृश्य है। ये एक जंगल महल नामक क्षेत्र है, जो पहाड़ी है और यहां प्रति वर्ष 1,000-1,500 मिलीमीटर वर्षा होती है। यहां छोटे और सीमांत एससी/एसटी (अनुसूचित जाति/जनजाति) परिवार रहते हैं, जो मुख्य रूप से वर्षा आधारित - खेती में लगे हुए हैं और सिंचाई सुविधाओं तक उनकी पहुंच नहीं है। यह क्षेत्र पारंपरिक तौर पर राज्य का एक आर्थिक रूप से पिछड़ा क्षेत्र माना जाता है - और अब मिट्टी की खराब गुणवत्‍ता और घटते भूजल स्तर के साथ, स्थिति केवल बदतर ही हो सकती है। इसके लिए पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा उषारमुक्ति (सूखे से मुक्ति) नामक एक परियोजना तैयार की गई है।

जलग्रहण क्षेत्र नकाशा और उसके तहत की गतिविधियों को छह महीने से अधिक समय में तैयार किया गया था। इस क्षेत्र में काम करने वाले स्वंयंसेवी संस्था (सीएसओ–सिविल-सोसाइटी संगठनों) ने गाव के लोगों के साथ मिलकर इस योजना पर काम किया है, जिसमें परामर्शी भागीदारी प्रक्रिया में नक्शे और गतिविधि योजना तैयार करने में - प्रत्येक स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी– सेल्फ हेल्प ग्रूप्स) के माध्यम से प्रत्येक चरण में महिलाएं शामिल हैं। इन सीएसओ में, 55 में से सात संस्थाओं को भारत रूरल लाइवलीहुड्स फाउंडेशन (बीआरएलएफ) का समर्थिन मिला हुआ हैं, जो ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा प्रवर्तित एक संस्था है। बीआरएलएफ़, वर्ष 2012 से, मध्य भारत की मध्यवर्ती बेल्ट में आदिवासी किसानों की आजीविका के अवसरों को बढ़ाने के लिए काम कर रहा है। बीआरएलएफ़, स्वयंसेवी संस्थाओं को वित्तीय एवं क्षमता-निर्माण सहायता के साथ महत्वपूर्ण तकनीकी ज्ञान हस्तांतरण की सुविधा भी प्रदान करता है। सीएसओ ने बीआरएलएफ से जलग्रहण क्षेत्र तकनीकों का बुनियादी प्रशिक्षण प्राप्त कर इसे आगे गाव के स्वयंसेवकों को प्रदान किया। ग्रामीणों को जलग्रहण क्षेत्र के सिद्धांत पर संगठित करना और योजना प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना सीएसओ द्वारा अर्जित ग्रामीणों के विश्वास के कारण हासिल किया गया है। ये तो हम मान सकते है की वामपंथी सोच और हिंसा से प्रभावित किसी क्षेत्र में, इस विश्वास को हासिल करना आसान नहीं है!

योजना तैयार होने के बाद, गाव के लोग, ग्राम सभामें इस पर चर्चा करते हैं और फिर इसे मनरेगा1 (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) में ग्राम पंचायत (ग्राम परिषद) के बजट में शामिल किया जाता है। यहां सरकार की भूमिका आती है। राज्य सरकार ने यह सुनिश्चित करते हुए कि लोगों को आवश्यकता होने पर काम उपलब्ध कराया जाएगा और योजनाबद्ध तरीके से गतिविधियों के सेट को पूरा किया जाएगा, इन योजनाओं को प्राथमिकता देने के लिए खुद को प्रतिबद्ध किया है।

मिट्टी और जल संरक्षण के लिए मिलकर काम करने वाले संस्थान

इसमें तीन निकायों की भूमिका होती है-स्थानीय सीएसओ, बीआरएलएफ और राज्य सरकार –ये तीनों इस क्षेत्र में बहने वाली सात नदियों को फिर से जीवित करने के लिए एक संगम की तरह काम कर रहे हैं। इस कठिन इलाके की मिट्टी और पानी की स्थिति को बहाल करने के लिए उनका राज्य सरकार के मनरेगा विभाग के साथ औपचारिक समझौता है। ग्रामीणों के प्रयासों के माध्‍यम से जलग्रहण क्षेत्र योजनाओं के नियोजन, क्रियान्वयन और निगरानी को इन निकायों द्वारा सुगम बनाया जा रहा है।

जलग्रहण क्षेत्र सिद्धांत पर आधारित परियोजनाएं महत्वपूर्ण साबित हुई हैं और ये मिट्टी और पानी के संरक्षण का संभवतः एकमात्र तरीका है। फिर भी, वर्षों से, केन्द्रीय एवं राज्य के बजट में इसे खास महत्व नहीं दिया जा रहा है। हालांकि जलग्रहण क्षेत्र का तकनीकी पहलू काफी स्पष्ट है, फिर भी इसके सामाजिक इंजीनियरिंग पहलू को एक सूक्ष्म दृष्टिकोण की आवश्यकता है। उषारमुक्ति परियोजना में इसे अत्‍यंत महत्‍वूर्ण स्‍थान दिया गया है।

इस तरह की परियोजनाओं के व्यापक पहलू हैं-जलग्रहण क्षेत्र-आधारित गतिविधियों के सेटका तकनीकी डिजायन, विभिन्न निकायों के आपसी समन्वय, और उनकी भूमिका एवं वित्त के संदर्भ में प्रत्येक निकायों का क्षमता-निर्माण।

जलग्रहण क्षेत्र-आधारित संरचनाओं के लिए, सीएसओऔर बीआरएलएफ़द्वारा एक खाका तैयार किया गया है। ये सभी संरचनाएँ मनरेगा के तहत अनुमति प्राप्‍त कार्यों में बड़ी आसानी से शामिल हो जाती हैं। सीएसओकी क्षमता-निर्माण, और सीएसओएवं राज्य के अधिकारियों के बीच बुनियादी समन्वय कार्य बीआरएलएफ़द्वारा किया गयाहै, जबकि जिला और स्थानीय अधिकारियों के बीच समन्वय कार्यसीएसओद्वारा किया गया है। कार्यान्वयन का यह डिजाइन उषारमुक्ति परियोजना की अंतर्दृष्टि में से एक है।

इस परियोजना का दूसरा मूल्यवान और प्रसन्‍नतादायक पहलू है कि यह मनरेगा को वह मायने प्रदान कर रहा है जिसके लिए मनरेगा योजना बनी है। इसमें मनरेगा का उपयोग सबसे उपयुक्त तरीके से किया जाता है, और इसके सभी उद्देश्यों को उचित प्रकार से रखा जाता है। यदि कोई इसके दिशानिर्देशों को ध्यान से पढ़ता है, तो उसे यह ज्ञात होगा कि मनरेगा का उद्देश्य मिट्टी और जल संरक्षण उपायों को अपनी पहली प्राथमिकता के रूप में समर्थन करना है। इसे ग्राम सभा की प्रक्रियाओं को मजबूत करने के लिए बनाया गया है, और सबसे महत्वपूर्ण बात, यह अत्‍यंत आवश्यक मजदूरी रोजगार प्रदान करता है। यह परियोजना क्षेत्र किसान और मजदुर के पलायन के लिए जाना जाता है। इस प्रकार, आजीविका के अवसरों को बढ़ाने वाली संपत्ति सृजित कर, इन गांवों में मजदूरी-रोजगार उपलब्ध कराना, और चूंकि यह स्वयं खेत मजदूरों द्वारा योजनाबद्ध हैं, अत:,मनरेगा कार्यान्वयन के स्‍तर पर यह एक ‘सपने के सच होने’ जैसा है।

पश्चिम बंगाल सरकारमनरेगा के तहत प्रति वर्ष रुपये 5000 करोड से अधिक खर्च कर रही है बल्कि पिछले वर्ष तो यह राशि लगभग रुपए 8000 करोड तक पहुंच गई थी। यहां प्रति परिवार औसत व्यक्ति दिन, राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है, और वहीं उषारमुक्ति परियोजना क्षेत्र में यह राज्य औसत से भी ज्यादा है।

इसमें से कुछ भी कभी भी आसान नहीं हो सकता; समन्वय की प्रारंभिक अवधि महत्वपूर्ण है। इसमें शामिल सभी निकायों में सर्वसम्मति बनाने और बुनियादी समझ विकसित करने के लिए समय और ऊर्जा की आवश्यकता होती है। हालांकि यह ज्यादा समय लेने वाली प्रक्रिया है, पर सीएसओएवं ग्रामीणों, सीएसओएवं बीआरएलएफ़, बीआरएलएफ़एवं राज्य प्रशासन के बीच बातचीत एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, जो कि अत्‍यंत महत्वपूर्ण हैं। यह इस कहानी का मूल आधार है; बाकी नंबर और अन्य उपलब्धियाँ बाद में आती हैं।

उषारमुक्ति परियोजना की उपलब्धियां

उषारमुक्ति परियोजना कई उपलब्धियां हैं। पहले की बंजर भूमि पर अब कई हेक्टेयर में फैले आम के बाग दिखाई देते हैं, इसके अलावा अन्य फलदार और सामाजिक वानिकी के पेड़ भी हैं। कुछ वर्षों के बाद इनसे लाभ मिलने लगेगा। ग्रामीणों ने बताया कि केवल दो वर्षों में, पहले की वनस्‍पतियां, औषधीय पौधे जो दुर्लभ हो गए थे, अब उन क्षेत्रों में दिखने लगे हैं जहाँ नमी बरकरार है। लोग इसे उनके प्रयासों के लिए प्रकृति की प्रतिक्रिया के रूप में देखते हैं।

इसी प्रकार आगे बढ़ते हुए, यदि पश्चिम बंगाल की सरकार उषारमुक्ति के लिए संस्थानों के एक संगम के रूप में एक नया तरीका तैयार कर सकती है, तो क्या मनरेगा के कार्यान्वयन के लिए अन्य राज्यों की सरकारों द्वारा ऐसे नए उपाय नहीं अपनाए जा सकतें?

टिप्पणियाँ:

  1. मनरेगा एक ग्रामीण परिवार को एक वर्ष में 100 दिनों के मजदूरी-रोजगार की गारंटी देता है, जिसके वयस्क सदस्य राज्य-स्तरीय सांविधिक न्यूनतम मजदूरी पर अकुशल मैनुअल काम करने के लिए तैयार हैं।

लेखक परिचय: अश्विनी कुलकर्णी नासिक स्थित प्रगति अभियान नामक स्वयंसेवी संस्था की निदेशक हैं।

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