मानव विकास

ग्रामीण भारत में स्कूल का चयन: धारणा बनाम वास्तविकता

  • Blog Post Date 15 अक्टूबर, 2020
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कम शुल्क वाले निजी स्कूलों की संख्या मे वृद्धि होने के साथ भारत में स्कूलों के विकल्पों में काफी वृद्धि हुई है और इसे स्कूली शिक्षा के लिए बाजार-आधारित दृष्टिकोण के अंतर्गत महत्वपूर्ण माना जाता है। ग्रामीण भारत में चार राज्यों में एक क्षेत्र अध्ययन के आधार पर, इस लेख में बताया गया है कि किस प्रकार माता-पिता अपनी पसंद में शैक्षिक रूप से कई महत्वहीन, महत्वाकांक्षी कारकों पर अधिक जोर देते हैं और कैसे कम शुल्क वाले निजी स्कूलों की उनकी पसंद अक्सर गलत जानकारी पर आधारित होती है।

 

सार्वजनिक और कम शुल्क वाले निजी स्कूल (एलएफपीएस) दोनों में ही वृद्धि के साथ स्कूल प्रणाली के विस्तार होने के परिणामस्वरूप यह कहा जा सकता है कि अपेक्षाकृत वंचित माता-पिता के पास अब इस तरह के स्कूलों तक पहुँच के लिए अधिक विकल्प उपलब्ध हैं। शैक्षिक बहस में एक ओर, एक बाजार तंत्र के रूप में इस विकास की सराहना की जाती है, जिसमें बेहतर प्रदर्शन करने वाले निजी स्कूलों द्वारा अक्षम सार्वजनिक स्कूलों (शाह और मिरांडा 2013) को व्यवस्‍था से बाहर किया जाना सुनिश्चित होगा। तो दूसरी ओर, अन्य लोगों ने इस बात पर ध्यान आकर्षित किया है कि पहले से ही विभक्त हो चुकी स्कूल प्रणाली एलएफपीएस (हारमा 2011, श्रीवास्ताव 2007, रैविच 2010, 2013, ओईसीडी (आर्थिक सहयोग और विकास हेतु संगठन), 2016) की अनियमित वृद्धि के साथ किस प्रकार और विभक्त हो जाएगी।

माता-पिता अपने बच्चों के लिए स्कूल का चयन कैसे करते हैं

अजीम प्रेमजी फाउंडेशन द्वारा किए गए एक हालिया अध्ययन में, हम यह समझने की कोशिश करते हैं कि माता-पिता स्कूल का चयन कैसे करते हैं, स्कूल को चुनने में कौन से विचार महत्वपूर्ण हैं और ये कारक स्कूलों की वस्तुनिष्ठ वास्तविकता को कैसे दर्शाते हैं (लाहोटी और मुखोपाध्याय 2019)। तीन भागों वाले क्षेत्र अध्ययन में निम्नलिखित शामिल थे: (ए) चार राज्यों (छत्तीसगढ़, कर्नाटक, राजस्थान और उत्तराखंड) में 10 जिलों में 25 गांवों में 1,210 परिवारों (2,464 बच्चों को शामिल करते हुए) का सर्वेक्षण; (बी) इन स्थलों में 121 सार्वजनिक और निजी स्कूलों में प्रधानाचार्यों और शिक्षकों पर प्रशासित एक 'स्कूल सूचना टूल’ के साथ स्कूल प्रक्रियाओं के प्रेक्षण ताकि स्कूलों के बारे में माता-पिता की धारणाओं तथा स्कूलों में शिक्षा की वस्तुनिष्ठ वास्‍तविकता का मिलान किया जा सके; और (ग) अर्ध-निर्मित, गुणात्मक साक्षात्कार कार्यक्रम जिसके द्वारा 50 माता-पिता, 12 मुख्य अध्यापकों, और 24 शिक्षकों के उप-नमूने से मात्रात्मक विश्लेषण से निकलने वाले मुद्दों पर डेटा एकत्र किया गया।

प्रत्येक जिले में एक ब्लॉक चुना गया था, और अधिकांश ब्लॉक वे थे जिनमें संबंधित जिला मुख्यालय स्थित है। प्रत्येक ब्लॉक में अध्ययन के लिए विशिष्ट स्थल एक ऐसा सीमांकित क्षेत्र था जिसमें निर्धारित मानदंडों के आधार पर गांवों का एक सेट (लगभग 2-3 पड़ोसी गांवों का समूह) शामिल था, जिसमें सार्वजनिक और निजी स्कूलों का संतुलित मिश्रण किया गया था ताकि अध्ययन के लिए स्कूल के विकल्पों (सार्वजनिक और निजी दोनों) में विविधता सुनिश्चित की जा सके।

सबसे पहले हम पाते हैं कि स्कूल की पसंद, कुल मिलाकर, जटिल है, जिसमें अलग-अलग माता-पिता के लिए अलग-अलग कारक महत्वपूर्ण है। शिक्षण-अधिगम की धारणा माता-पिता के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक है। इसके अलावा, कई माता-पिता अनुशासन और सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण कारक मानते हैं जो उनकी पसंद को निर्धारित करते हैं। निजी स्कूलों को चुनने वाले माता-पिता के लिए शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी होना एक महत्वपूर्ण कारक है जबकि जिन माता-पिता ने सार्वजनिक स्कूलों को चुना है उनके लिए खर्च एक महत्वपूर्ण कारक है।

दूसरा, आसपास के क्षेत्र में निजी और सार्वजनिक स्कूलों के बीच प्राथमिकताओं के संदर्भ में अध्ययन में पाया गया है कि माता-पिता की प्राथमिकताएं विशिष्ट स्कूलों में केंद्रित नहीं हैं, चाहे वे निजी हों या सार्वजनिक। 25 गांवों में, जहां माता-पिता अपने बच्चों को आसपास के क्षेत्र में सबसे पसंदीदा स्कूल में भेजना चाहते हैं उसके एक निजी स्कूल या सार्वजनिक स्कूल होने की संभावना लगभग समान है।

गुणात्मक साक्षात्कार, स्कूल पसंद की जटिल प्रकृति को और मजबूत करते हैं। अन्य बातों के अलावा यह माता-पिता द्वारा किए गए प्रारंभिक विकल्पों पर पुनर्विचार और संशोधन करने और उनके आपस में (एक निजी स्कूल से दूसरे निजी स्कूल में) तथा स्कूल प्रकार (निजी स्कूल से सार्वजनिक स्कूल में) में बदलने, दोनों में प्रकट होता है। यह भी देखा जाता है कि कुछ माता-पिता सांस्कृतिक पूंजी तक पहुंच के लिए अपनी आकांक्षाओं के कारण इन स्कूलों के बारे में अपनी पुनर्विचार धारणाओं के बावजूद पहले से ही चुने गए निजी स्कूलों की अपनी पसंद को जारी रखते हैं।

माता-पिता की धारणाएं और स्कूल की वास्तविकताएं

हम स्कूल की दो खास विशिष्टताओं अर्थात शिक्षा का माध्यम और शिक्षक की विशेषताओं के बारे में माता-पिता की धारणाओं (सर्वेक्षण टूल से) की तुलना करते हैं कि वास्तव में स्कूलों में इन विशेषताओं को किस प्रकार प्रकट किया जाता है (स्कूल सूचना टूल से)।

पहली विशिष्टता के संदर्भ में हम पाते हैं कि माता-पिता द्वारा शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी को बताए जाने, स्कूलों द्वारा आधिकारिक रूप से शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी बताए जाने, और स्कूलों में शिक्षा के माध्यम के रूप में उपयोग किए जाने में काफी बड़ी विसंगति है। निजी स्कूलों में जाने वाले बच्चों में से 39% के माता-पिता ने बताया कि उनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में जाते हैं। तथापि, जो बच्चे निजी स्कूलों में जाते हैं उनमें से केवल 22% की शिक्षा का आधिकारिक माध्यम अंग्रेजी है (जैसा कि स्कूल प्राधिकारियों द्वारा बताया गया है)। इसके अलावा स्कूल प्रेक्षणों से पता चलता है कि निजी स्कूलों में जाने वाले बच्चों में से केवल 10% की शिक्षा का माध्याम वास्तव में अंग्रेजी है।

तालिका 1. जो माता-पिता यह समझते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ रहे हैं उन बच्चों की शिक्षा का आधिकारिक और वास्तविक माध्यम (%)

शिक्षा का आधिकारिक माध्‍यम

शिक्षा का वास्‍तविक माध्‍यम

हिंदी

43

52

कन्‍नड

5

5

अंग्रेजी

52

25

मिला-जुला

0

18

इसके अलावा 25% माता-पिता यह समझते हैं कि उनके बच्चों की शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है, जो वास्तविकता (तालिका 1) से मेल खाता है। जिन बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में अध्ययनरत माना जा रहा है उनमें से आधे से ज्यादा (57%) वास्तव में प्रमुख क्षेत्रीय भाषा अर्थात हिंदी या कन्नड़ में पढ़ रहे हैं। इनमें से लगभग 18% बच्चे एक ऐसे स्कूल में पढ़ते हैं, जिसमें किताबें तो अंग्रेजी में होती हैं, लेकिन पढ़ाई के दौरान शिक्षक उन्हें प्रमुख क्षेत्रीय भाषा में अनुवाद करके पढ़ाते हैं (तालिका 1 में 'मिला-जुला' के रूप में वर्गीकृत)।

दूसरी विशिष्टता के संदर्भ में, जब शिक्षक की विशेषताओं के बारे में माता-पिता की धारणा तथा शिक्षकों की विशेषताओं के स्कूल-स्तरीय आंकड़ों की तुलना की जाती है, तो निजी स्कूलों के लिए दोनों के बीच एक बेमेल संबंध प्राप्‍त होता है। निजी स्कूलों के लिए देखा जाता है कि ऐसे माता-पिता जो शिक्षक की विशेषताओं को स्कूल के चयन हेतु शीर्ष तीन कारकों में से एक महत्वतपूर्ण कारक के रूप में मानते हैं, उनके बच्चों का बेहतर शिक्षक विशेषताओं वाले स्कूल में जाना जरूरी नहीं है।

इस विश्लेषण में माता-पिता को दो श्रेणियों में बांटा गया था: एक वे जो अपने बच्चों के स्कूल की पसंद को नियंत्रित करने में शिक्षक की विशेषताओं को महत्वपूर्ण मानते हैं, और दूसरे वे जो शिक्षक की विशेषताओं को महत्वपूर्ण नहीं मानते हैं। वास्तव में दूसरी श्रेणी की तुलना में पहली श्रेणी में माता-पिताओं द्वारा चुने गए स्कूलों में अकादमिक रूप से योग्य शिक्षकों का प्रतिशत कम (76 बनाम 87%), पेशेवर योग्यता वाले शिक्षकों का प्रतिशत कम (64 बनाम 74%), और शिक्षकों का औसत अनुभव कम (74 बनाम 79 महीने) है (तालिका 2)।

तालिका 2. शिक्षक विशेषताएँ: माता-पिता की धारणाएँ बनाम स्कूल की वास्तविकताएँ

स्‍कूल

माता-पिता की धारणाएं

% स्‍नातक शिक्षक

% पेशेवर योग्‍यता रखने वाले शिक्षक

शिक्षक का औसत अनुभव
महीनों में

सार्वजनिक

ऐसे माता-पिता जिनके लिए शिक्षक की विशेषताएं महत्‍वपूर्ण हैं

96

98

169

ऐसे माता-पिता जिनके लिए शिक्षक की विशेषताएं महत्‍वपूर्ण नहीं हैं

92

98

164

निजी

ऐसे माता-पिता जिनके लिए शिक्षक की विशेषताएं महत्‍वपूर्ण हैं

76

64

74

ऐसे माता-पिता जिनके लिए शिक्षक की विशेषताएं महत्‍वपूर्ण नहीं हैं

87

74

79

इसलिए एलएफपीएस के मामले में, विश्लेषण से ज्ञात होता है कि माता-पिता की धारणाओं तथा स्कूल की वास्तविकताओं में काफी अंतर है। हालांकि माता-पिता बताते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ रहे हैं परंतु ऐसे अधिकांश बच्चों की वास्तविकता यह है कि उन्हें अंग्रेजी में नहीं पढ़ाया जा रहा है। इसी तरह, हालांकि माता-पिता स्कूलों का चयन करने के बारे में बताते हैं कि वे ऐसा करते समय शिक्षक की विशेषताओं की परवाह करते हैं, लेकिन औसतन वे अंतत: ऐसे स्कूलों का चयन करते हैं जिनमें अन्य स्कूलों की तुलना में कम योग्य शिक्षक होते हैं।

गुणात्मक साक्षात्कार भी माता-पिता की धारणा और स्कूल की वास्तविकताओं के बीच असमानता के लिए संभावित स्पष्टीकरण प्रदान करते हैं। एक ओर, निजी स्कूलों के माता-पिता की पसंद को महत्वाकांक्षी मानदंडों जैसे कि बच्चों को अंग्रेजी का सतही ज्ञान प्राप्त करना और ठीक तरह से कपड़े पहनना और व्यवहार करना सीखने आदि से दृढ़ता से निर्धारित किया जाता है। इसके अलावा ये मानदंड उस 'सामाजिक दूरी' का एक रूप भी प्रकट करते हैं जो अपने बच्‍चों को निजी स्‍कूलों में भेजने वाले माता-पिता उन गरीब परिवारों से रखना चाहते हैं जिनके बच्‍चों की पहुंच सार्वजनिक स्‍कूलों तक है। दूसरी ओर, एलएफपीएस पड़ोसी गांवों में नामांकन के लिए व्यवस्थित मार्केटिंग और छवि निर्माण के प्रयासों को अंजाम देता है। ये मार्केटिंग प्रयास उन्‍हीं मानदंडों पर प्रकाश डालते हैं जो माता-पिता की आकांक्षाओं में देखा जाता है। परिणामस्वरूप, गैर-शैक्षिक गुणवत्ता मानकों को माता-पिता की दोनों आकांक्षाओं यानी निजी स्कूलों की सांस्कृतिक पूंजी और बाजार-उन्मुख प्रथाओं द्वारा प्रबलित किया जाता है।

अध्ययन के निष्कर्ष बाजार आधारित नीतिगत कदमों जैसे स्कूल पसंद और वाउचर के एक अविवेकी समर्थन के खिलाफ सतर्क करते हैं। वे इस सरल धारणा को भी चुनौती देते हैं कि माता-पिता की पसंद भली-भांति जानकारी और सदैव स्कूलों के आकलन के लिए सबसे महत्वपूर्ण शैक्षिक मानदंडों पर आधारित होती है। इसके अतिरिक्त अध्ययन से विशिष्ट स्कूल विशेषताओं के बारे में माता-पिता की धारणाओं और स्कूल की वास्तविकताओं के बीच उन विशेषताओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण अंतर का पता चलता है, जिनके आधार पर अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजते हैं।

क्या माता-पिता गुमराह होते हैं या उन्‍हें केवल निजी-स्कूल विशेषताओं के बारे में गलत जानकारी होती है? हमारा फील्डवर्क बताता है कि इसमें दोनों की ही कुछ न कुछ भूमिका है। ऐसा लगता है कि एक ओर माता-पिता सांस्कृतिक पूंजी की आकांक्षा के कारण अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने भेजते हैं। वहीं दूसरी ओर, निजी स्कूल बाजार आधारित प्रथाओं के माध्यम से इन आकांक्षाओं पर प्रतिक्रिया देते हैं। इसलिए, ऐसा प्रतीत होता है कि इस पारस्परिक प्रक्रिया में माता-पिता उन गैर-शैक्षिक मानदंडों पर अधिक जोर देते हैं जिन्‍हें इन स्कूलों में शिक्षण-अधिगम की गुणवत्ता के साथ मिला दिया जाता है। यद्यपि यह दिखाई नहीं पड़ता लेकिन इस प्रक्रिया में शिक्षक की क्षमता जैसे शैक्षिक गुणवत्ता के महत्वपूर्ण मापदंड का महत्‍व कम हो जाता हैं।

यह अध्ययन विशेष रूप से एलएफपीएस के संदर्भ में शैक्षिक प्रथाओं एवं स्कूलों की वास्तविकताओं के, तथा माता-पिता की उनकी शैक्षिक गुणवत्ता के बारे में धारणाओं के बीच इस विषम जानकारी की प्रकृति को बेहतर ढ़ंग से समझे जाने की आवश्‍यकता पर जोर देता है। माता-पिता की स्कूल पसंद के संबंध में अधिक बारीक समझ की भी आवश्यकता है। मुख्य रूप से उनकी निर्णय लेने की प्रक्रिया के संदर्भ में जिसमें उनकी बाधाओं, प्राथमिकताओं और उपलब्ध जानकारी पर आधारित कई कारकों का संश्लेषण और विचार शामिल रहते हैं।

लेखक परिचय: राहुल लाहोटी बैंगलोर स्थित अजीम प्रेमजी यूनिवरसिटि में अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर हैं। राहुल मुखोपाध्याय अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के एक रिसर्च ग्रुप के साथ सहबद्ध हैं, और अजीम प्रेमजी यूनिवरसिटि के स्कूल ऑफ एजुकेशन में विजिटिंग फैकल्टी हैं।

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