गरीबी तथा असमानता

कोविड-19: ऑनलाइन कक्षाएं और डिजिटल विभाजन

  • Blog Post Date 17 अप्रैल, 2020
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Abhiroop Mukhopadhyay

Indian Statistical Institute, Delhi Centre

abhiroop@isid.ac.in

भारत में कोविड-19 का संक्रमण बढ़ने के कारण विश्वविद्यालयों को बंद रखने का औचित्यपूर्ण दबाव है। ऑनलाइन शिक्षण एक ऐसी व्‍यवस्‍था है जिस पर कई संस्थान विचार कर रहे हैं, लेकिन क्या भारतीय छात्रों के पास ऑनलाइन पढ़ाई हेतु मज़बूत नेटवर्क है? इस पोस्ट में, अभिरूप मुखोपाध्याय का तर्क है कि भारतीय घरों में इंटरनेट की उपलब्धता दयनीय है, और विशेषकर ग्रामीण भारत में रहने वाले अनावासी छात्रोंके घरों तक इंटरनेट की पहुंच की और भी कमजोर है। ऑनलाइन शिक्षण इसलिए अधिकांश संस्थानों के लिए निरर्थक कार्य है।

 

कोविड-19 के प्रकोप के डर के कारण भारत में स्कूलों और विश्वविद्यालयों को बंद कर दिया गया है। ऑनलाइन शिक्षण एक ऐसी व्‍यवस्‍था है जिस पर कई संस्थान विचार कर रहे हैं, लेकिन क्या भारतीय छात्रों के पास ऑनलाइन पढ़ाई हेतु मज़बूत नेटवर्क है? प्रारंभिक डेटा विश्लेषण इंगित करता है कि ऑनलाइन शिक्षण भारत के अधिकांश छात्रों एवं संस्थानों के लिए एक निरर्थक कार्य है!

‘चिंता न करें, ऑनलाइन कक्षाओं के साथ उनके जीवन में ज़ूम करें’ - वर्तमान लॉकडाउन के दौरान कई विश्वविद्यालयों इसे अपना नारा बना लिया है। अधिकतर संस्थानों के प्रमुखों को यह उम्‍मीद है कि कोविड-19 के अप्रत्याशित आगमन की समस्‍या का समाधान ऑनलाइन शिक्षण द्वारा किया जा सकता है। इसमें परेशानी यह है कि इंटरनेट के माध्यम से केवल कुछ छात्रों से जुड़ना आसान होगा और कई छात्र तक पहुंच पाना काफी कठिन होगा। ऐसा करने में, न केवल अध्‍यापन कला से समझौता किया जाएगा, बल्कि छात्रों को जो सिखाया जा सकता है उसमे भी असमानता बढ़ सकती है – छात्रों को मिल रहे शिक्षण संसाधनों तक उनके पहुँच में डिजिटल विभाजन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। कई सार्वजनिक संस्थानों ने ऐसी समस्याओं के लिए ऑनलाइन विकल्प आज़माने की कोशिश भी नहीं की है जो प्रशासकों के लिए वास्तविक चिंता का कारण बन रहा है।

यह मामला इतना सरल नहीं है – वासी तो, भारत में किसी भी चीज तक पहुंच की असमानता सर्वव्यापी है, लेकिन भारत में तृतीयक स्तर के संस्थानों में पहुंचने वाले अधिकांश छात्रों ऐसे हैं जो अपने सामाजिक समूह में सबसे अधिक विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं। शायद, इंटरनेट के माध्यम से इन छात्रों तक पहुंचना संभव है। लेकिन तथ्य क्या हैं?

घर पर इंटरनेट और सामान्य रूप से इंटरनेट तक पहुंच के बीच अंतर

राष्‍ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण द्वारा एकत्र किए गए शिक्षा पर सर्वेक्षण (2014) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में केवल 27 प्रतिशत परिवार ही ऐसे हैं जिनके किसी एक सदस्य के पास इंटरनेट सुविधा उपलब्ध है। इंटरनेट की उपलब्धता का अर्थ यह नहीं है कि परिवार के पास वास्तव में घर पर इंटरनेट हो। वास्तव में, वो परिवार जिनके पास इंटरनेट उपलब्ध है उनमे से केवल आधे (47 प्रतिशत) ऐसे हैं जिनके पास कंप्यूटिंग उपकरण (स्मार्टफोन सहित) हैं। सामान्यत: जिन लोगों के घर में इंटरनेट है वे इस बात की जानकारी दे देते हैं, इस लिए कितने घरों में इंटरनेट है इसके पुख्ता अनुमान न होते हुए भी मोटे तौर पर उसका अनुमान लगाया जा सकता है। और इससे यह सूचना भी मिलती है कि उनके पास ऐसा उपकरण है या नहीं जिसका उपयोग किसी वेबसाइट पर जाने के लिए किया जा सकता है। इस परिभाषा का उपयोग करते हुए यह कहा जा सकता है कि भारत में केवल 12.5 प्रतिशत ​​छात्रों के परिवारों में इंटरनेट का उपयोग होता है। यहाँ शहरी-ग्रामीण विभाजन भी है – शहरी क्षेत्रों में 27 प्रतिशत के पास इंटरनेट है और ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 5 प्रतिशत के पास। वर्तमान संकट को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि जो छात्र घर वापस चले गए हैं उनके लिए ऑनलाइन कक्षाएं आयोजित करना कारगर सिद्ध नहीं होगा। शायद यही वह दृष्टिकोण है जो लोगों को ऑनलाइन कक्षाओं के बारे में आशंकित कर रहा है।

इस समय घर पर इंटरनेट और सामान्य रूप से इंटरनेट तक पहुंच के बीच अंतर महत्वपूर्ण है। भारत के कुछ राज्यों में यह अंतर बहुत अधिक है। जहाँ, केरल में 51 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास विभिन्‍न स्रोतों के माध्यम से इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है, वहीं केवल 23 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के घर में इंटरनेट की पहुंच है; यह अंतर आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी स्पष्ट दिखता है जहां 30 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में इंटरनेट का उपयोग होता है, लेकिन घर पर इंटरनेट की पहुंच केवल 2 प्रतिशत परिवारों तक ही है। पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे राज्यों में, जिनमें पारंपरिक रूप से प्रवासी छात्र बड़ी संख्या में हैं, केवल 7-8 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास इंटरनेट तक पहुंच है; जिस अनुपात में घर तक इंटरनेट की पहुँच है वह एक बहुत छोटी संख्या है। भारत के राज्यों में शहरी परिवारों के बीच इंटरनेट पहुंच का अंतर कम है; हालाँकि, शहरी परिवारों में घर तक इंटरनेट की पहुंच स्पष्ट रूप से अभी भी गंभीर बाधा हो सकती है, क्योंकि बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में केवल 18 और 21 प्रतिशत (क्रमशः) शहरी परिवार ही ऐसे हैं जो घर पर कोई वेबसाइट खोल/देख सकते हैं।

जैसा कि ऊपर बताया गया है, एक तर्क दिया जा सकता है कि तृतीयक स्तरीय शिक्षा प्राप्‍त कर रहे छात्र एक चयनित समूह से हैं, इसलिए घर पर उनकी कनेक्टिविटी बहुत बेहतर हो सकती है। ऐसे बच्‍चे जो शहरी परिवारों से संबंधित हैं और विश्वविद्यालयों में अध्ययन करते हैं उनमें से 85 प्रतिशत बच्‍चों की इंटरनेट तक पहुँच है, लेकिन घर तक इंटरनेट की पहुँच केवल 51 प्रतिशत लोगों के पास होने की संभावना है; ग्रामीण परिवारों के बच्चों में, उनमें से केवल 28 प्रतिशत के पास घर पर इंटरनेट की पहुंच उपलब्‍ध है। इस तरह की कम पहुंच एक बड़ी चिंता का विषय है क्योंकि विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले 55 प्रतिशत बच्चे ग्रामीण परिवारों से हैं। ऐसे में, इंटरनेट के माध्यम से ऐसे बच्चों को दिया जा रहा ऑनलाइन शिक्षण, भारी मात्रा में ग्रामीण भारत के बच्‍चों को पढाई से वंचित कर देगा।

इस देश में कई विश्वविद्यालय और संस्थान आवासीय कार्यक्रम संचालित करते हैं। लगभग 50 लाख छात्र, जो सभी विश्वविद्यालय स्तर के छात्रों का 15 प्रतिशत हिस्सा है - अपने घरों से दूर रहते हैं। उनमें से एक बड़ा हिस्सा (55 प्रतिशत) ग्रामीण परिवारों से आने वाले छात्रों का है। वर्तमान संकट के कारण छात्रावासों को खाली करवा दिया गया है और छात्रों को घर वापस जाने के लिए कहा गया है। ये छात्र ऑनलाइन शिक्षण के प्राथमिक संभावित प्राप्तकर्ताओं में से एक हैं। ये छात्र वास्तव में अधिक चयनित हैं लेकिन उनमें से लगभग 48 प्रतिशत के पास घर में इंटरनेट उपलब्ध है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले केवल 42 प्रतिशत छात्रों के पास घर पर कोई वेबसाइट खोल/देख सकते हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में निवास करने वाले छात्रों में से 69 प्रतिशत छात्र ऐसे हैं जो घर पर ऑनलाइन हो सकते हैं।

घर पर इंटरनेट पहुंच कम होने के कारण

ग्रामीण क्षेत्र के घरों में, समस्या उपकरणों के स्वामित्व की है क्योंकि आधे से अधिक घरों में स्मार्टफोन या कंप्यूटर नहीं है। शहरी परिवारों के बीच यह समस्या कम गंभीर है, क्योंकि ऐसे 71 प्रतिशत परिवारों के पास ये उपकरण हैं, इसलिए वहां बाधा इंटरनेट कनेक्शन की पहुंच से संबंधित है।

सभी विश्वविद्यालय के छात्रों (ऊपर उल्लिखित) के बीच समग्र पहुंच के सापेक्ष छात्रावास में रहने वाले छात्रों के लिए उच्चतर घरेलू इंटरनेट पहुंच का अर्थ यह है कि, जिस समूह में वास्तव में घरेलू इंटरनेट पहुंच सबसे खराब है वे 'अनावासी छात्र' हैं, विशेषकर जिनके घर ग्रामीण भारत में हैं। ऐसे अनावासी छात्रों से कैसे जुडा जाए? हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि वे अध्ययन के लिए शहरों में हीं जाते हैं, फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों के कम से कम 30 प्रतिशत ऐसे लोग जिनके पास घर में इंटरनेट उलपब्ध नहीं है, वे अपने घरों से 5 किलोमीटर या उससे अधिक दूर स्थित संस्‍थानों पर जाकर अध्ययन करते हैं।

अगर विश्वविद्यालय लंबे समय तक बंद रहे, तो क्या किया जाना चाहिए?

निष्कर्षत:, भारतीय घरों में इंटरनेट की उपलब्धता दयनीय है। यह समस्या, भारत में कम इंटरनेट कवरेज के साथ-साथ इस तथ्य का एक संयोजन है कि कई परिवारों के पास स्मार्टफोन (या अन्य आवश्यक उपकरण) नहीं हैं जिस पर वे इंटरनेट का उपयोग कर सकते हैं। भारत में कोविड-19 का संक्रमण बढ़ने के कारण विश्वविद्यालयों को बंद रखने का औचित्यपूर्ण दबाव है, ऑनलाइन शिक्षण का सुझाव देते समय इन आंकड़ों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। भले दीर्घकालिक रणनीतियों में ईथरनेट कनेक्टिविटी बढ़ाना, या मोबाइल डेटा हेतु सब्सिडी देना शामिल हो सकता है, पर उपकरण का स्वामित्व, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले बच्चों के लिए, उतना ही चिंता का विषय है। यदि विश्वविद्यालय लंबे समय तक बंद रहते हैं तो विश्वविद्यालयों के लिए यह आवश्यक होगा कि वे शिक्षण कार्य हेतु छात्रों को सस्ते स्मार्टफोन उपलब्‍ध कराएं। यह मज़बूत इंटरनेट हेतु भुगतान किए जाने वाली किसी भी सब्सिडी के अतिरिक्त है (यह मानते हुए कि यह एक अचूक समस्या है)। ऐसी मदद के बिना, भारत के अधिकांश संस्थानों के लिए ऑनलाइन शिक्षण निरर्थक कार्य है।

लेखक परिचय: अभिरूप मुखोपाध्याय भारतीय सांख्यिकी संस्थान (दिल्ली) के अर्थशास्त्र विभाग में प्रोफेसर हैं।

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