सामाजिक पहचान

नेता और नागरिक: भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी

  • Blog Post Date 16 अप्रैल, 2021
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Ella Spencer

International Growth Centre

E.G.Spencer@lse.ac.uk

भारत में आगामी राज्य चुनावों के संदर्भ में की जाने वाली चर्चाओं में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी एक प्रमुख तत्व के रूप में उभरी है। इस पोस्ट में, नलिनी गुलाटी और एला स्पेन्सर ने देश में महिलाओं के राजनीतिक जुड़ाव के विभिन्न पहलुओं जैसे सरकार में प्रतिनिधित्व, राजनीतिक नेता या सक्रिय नागरिकों के रूप में महिलाओं के साक्ष्य का पता लगाया है।

डब्‍ल्‍यूईएफ (वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम) ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2020 के अनुसार, भारत राजनीतिक सशक्तिकरण के मामले में 18वें स्थान पर है जोकि सूचकांक के अन्य आयामों में अपनी रैंक से कहीं बेहतर है: आर्थिक भागीदारी और अवसर में 149वें, शिक्षा प्राप्ति में 112वें, स्वास्थ्य और उत्‍तरजीविता में 150वें और समग्र सूचकांक में 108वें स्‍थान पर है। राजनीतिक सशक्तिकरण रैंकिंग ब्रिटेन की 20वीं रैंक और अमेरिका की 68वीं रैंक से उल्‍लेखनीय रूप से ऊंची है।

राजनीतिक सशक्तिकरण के लिए उप-सूचकांक राजनीतिक निर्णय लेने के उच्चतम स्तर पर महिलाओं और पुरुषों के बीच अंतर को मापता है, जिसके अंतर्गत मंत्रा‍लयिक पदों पर महिलाओं और पुरुषों के अनुपात, संसदीय पदों पर महिलाओं और पुरुषों के अनुपात और पिछले 50 वर्षों में राज्य के प्रमुख के रूप में महिलाओं और पुरुषों के अनुपात का प्रयोग किया जाता है। चूंकि भारत में प्रधान मंत्री के रूप में इंदिरा गांधी के कार्यकाल की अवधि 1966 से 1977 तक और फिर 1980 से 1984 में उनकी हत्‍या तक रही अत: इस संदर्भ में भारत की स्थिति मजबूत दिखाई पड़ती है। हालांकि एक प्रमुख महिला नेता के रूप में गांधी की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन यह कुछ हद तक सूचकांक में भारत की स्थिति के संबंध में हमारी व्याख्या को बदल देता है। इस सूचकांक का निर्माण करने वाले अन्य दो मापों के अनुसार मंत्रालयिक पदों पर 30% महिलाओं के साथ भारत की रैंकिंग 69वीं है और संसद में महिलाओं के मामले में 17% के साथ 122वीं है। उप-सूचकांक गणना में राज्य-स्तरीय नेतृत्व को शामिल करने में भी विफल रहता है, जिसमें महत्‍वपूर्ण शक्तियां निहित होती हैं। भारत के 28 राज्यों में से, वर्तमान में केवल पश्चिम बंगाल में एक महिला मुख्यमंत्री है।

इसके अलावा, राजनीतिक सशक्तिकरण उप-सूचकांक पूरी तरह से नेतृत्व पर केंद्रित है। इस पोस्ट में, हम भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी से जुड़े ऐसे कई क्षेत्रों के साक्ष्य तलाशते हैं जिसमें भारत की राजनीतिक प्रणाली के विभिन्न स्तरों पर उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व, उनका राजनीतिक नेतृत्व और सक्रिय महिला नागरिक जैसे विषय शामिल हैं।

भारत में महिलाओं का राजनीतिक प्रतिनिधित्व

1992 के 73वें संवैधानिक संशोधन ने यह अनिवार्य कर दिया कि देश में ग्राम-पंचायत के मुखिया के एक तिहाई पद महिलाओं के लिए आरक्षित होने चाहिए। यह नीति स्थानीय स्तर पर महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए लागू की गई थी। तब से, इस नीति के प्रभाव पर विचार करने के लिए कई शोध किये गये हैं, जो यह दर्शाते हैं कि ग्राम सरपंच के रूप में चुनी गई महिलाओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है (डुफ्लो 2005)। इसके अलावा ओ’कॉनेल (2020) द्वारा किए गए एक अनुभव-जन्‍य अध्ययन से पता चलता है कि यह अनिवार्यता 1990 के दशक के मध्य से राज्य और राष्ट्रीय विधायिका सीटों पर चुनाव लड़ने वाली महिला उम्मीदवारों में वृद्धि के एक बड़े हिस्से का कारण रही है।

हालांकि उच्च पदों पर महिला प्रतिनिधित्व कम बना हुआ है। विशेष रूप से, राज्य स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी पिछड़ गया है और संस्थागत शक्ति और निर्णय लेने में समर्थ महत्वपूर्ण पदों से महिलाएं बाहर हो गईं हैं। आईजीसी ने अपनी वेबसाइटों के माध्‍यम से 30 मार्च 2021 तक राज्य सरकार के नेतृत्व की संरचना पर डेटा एकत्र किया है। नागालैंड, सिक्किम और मणिपुर सहित भारत के छह राज्यों में कोई महिला मंत्री नहीं है। ऐसा कोई राज्‍य नहीं है जहां महिला मंत्रियों की संख्‍या एक तिहाई के आस-पास भी हो जबकि महिला मंत्रियों का उच्चतम अनुपात तमिलनाडु में 13% है, और 68% राज्यों में राज्य नेतृत्व की भूमिकाओं में 10% से कम महिला प्रतिनिधित्व है। नीचे आकृति 1 भारतीय राज्यों में मंत्रालयिक पदों में महिला प्रतिनिधित्व की कम दरों को दर्शाती है।

आकृति 1. राज्य सरकारों में महिला मंत्रियों का अनुपात

टिप्‍पणी: ग्राफ में उन राज्‍यों को शामिल नहीं किया गया है जहां कोई महिला मंत्री नहीं है।

राज्‍य सभा (संसद का उच्‍च सदन) में वर्ष 2010 में महिला आरक्षण विधेयक पारित किया गया जिसमें भारत के संविधान में संशोधन करने और लोकसभा (संसद के निम्‍न सदन) तथा सभी राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। हालांकि, कानून बनने के लिए विधेयक को लोकसभा (निम्‍न सदन) द्वारा अभी भी वो‍ट के लिए पटल पर रखा जाना बाकी है। सरकार के सभी स्तरों पर महिला राजनीतिक प्रतिनिधित्व में वृद्धि की आवश्यकता को मान्यता देते हुए हाल की सार्वजनिक चर्चाओं में इस विधेयक को फिर से प्रमुखता से उठाया गया है।

राजनीतिक नेताओं के रूप में महिलाएं

यह विचार भी व्‍यक्‍त किया जाता है कि स्थानीय सरकार में महिला राजनीतिक प्रतिनिधि अपने पुरुष रिश्तेदारों के लिए केवल एक साधन मात्र हैं। यदि ऐसा होता तो हमें राजनीतिक नेताओं द्वारा लैंगिक आधार पर चयन किए गए नीति विकल्पों में कोई अंतर दिखाई नहीं पड़ना चाहिए क्‍योंकि आरक्षित सीटों पर महिला नेताओं द्वारा पदधारण किए जाने के मामले में भी इन्‍हें पुरुषों द्वारा ही नियंत्रित किया जाएगा। तथापि, चट्टोपाध्याय और डुफ्लो (2004) द्वारा किए गए प्रसिद्ध अध्ययन में इस बात को नकार दिया गया है। पश्चिम बंगाल और राजस्थान में 265 ग्राम सभाओं पर एकत्रित किए गए डेटा का उपयोग करते हुए, वे पाते हैं कि एक पार्षद की सीट के आरक्षण का सार्वजनिक वस्तुओं के प्रावधान पर बड़ा प्रभाव होता है, जबकि महिला नेता महिलाओं द्वारा अधिक मूल्‍यवान समझी जाने वाली सार्वजनिक वस्‍तुओं में अधिक निवेश करती हैं (उदाहरण के लिए, पेय जल)।

अन्य अध्ययन महिला राजनीतिक नेताओं की प्रभावशीलता की ओर इशारा करते हैं लेकिन यहां अनुभव महत्वपूर्ण है। महाराष्ट्र में 2008 (साठे एवं अन्‍य 2013) में किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि जिस गांव की मुखिया महिला है वहां बुनियादी सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता बेहतर है, जब उसका कार्यकाल 3-3.5 वर्ष रहा हो। अफरीदी एवं अन्‍य द्वारा किए गए एक आईजीसी अध्ययन (2017) में यह पाया गया कि जिन महिला नेताओं को कार्य का कोई भी पूर्व अनुभव नहीं है वे शुरुआत में अच्‍छी प्रकार से कार्य नहीं कर पातीं, परंतु वे तेजी से सीखती हैं और अनारक्षित सीटों पर पुरुष नेताओं के समान ही कार्य करती हैं। इसलिए, सकारात्मक कार्यवाई और राजनीति में महिलाओं की भागीदारी से संबंधित नीतियों की प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए क्षमता-निर्माण और संस्थागत समर्थन की आवश्यकता है।

पुनर्वितरण नीतियों के साथ महिला राजनीतिक नेताओं के जुड़ाव को देखते हुए, कोई भी यह सोच सकता है कि वे कम से कम लघु से मध्यम अवधि में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में कम प्रभावी हैं। एक आईजीसी अध्ययन में, भालोत्रा एवं अन्‍य (2018) इसके विपरीत साक्ष्‍य देते हैं। 1992-2012 की अवधि के लिए भारत में 4,265 विधानसभा क्षेत्रों के आंकड़ों की जांच करते हुए, वे पाते हैं कि महिला विधायक पुरुष विधायकों की तुलना में अपने निर्वाचन क्षेत्रों में प्रति वर्ष लगभग 1.8 प्रतिशत अधिक अंकों से आर्थिक निष्‍पादन को बढ़ाती हैं। शोधकर्ता इस आश्‍चर्यजनक परिणाम का श्रेय महिला नेताओं के कम भ्रष्ट, अधिक कुशल और अपने पुरुष समकक्षों से अधिक प्रेरित होने को देते हैं।

परंतु, ‘क्या शक्ति संपन्‍न महिलाएं वास्तव में कम भ्रष्ट होती हैं?’ – यह एक अनुत्‍तरित प्रश्‍न है। ग्रामीण बिहार में एक मानवनिर्मित क्षेत्र प्रयोग के आधार पर, गंगाधरन, जैन, मैत्रा और वेस्‍सी (2015) यह दर्शाते हैं कि ऐसे गांव जहां पहले एक महिला गांव की मुखिया रह चुकी है, वहां ऐसा देखा गया है कि एक नेता के रूप में कार्य करते हुए महिलाएं पुरुषों की तुलना में संसाधनों के विनियोजन हेतु अधिक तत्‍पर होती हैं। लेखकों द्वारा इस संबंध में की गई व्‍याख्‍या में यह संभावना व्‍यक्‍त की गई है कि महिला नेताओं को खराब व्यवहार किए जाने की आशंका रहती है, जिसके कारण वे दूसरों की तुलना में अपने आपको कमजोर मानने लगती हैं और नकारात्मक व्यवहार करती हैं। अथवा, एक ऐसे वातावरण में जहां महिलाओं को नेतृत्व के कुछ ही अवसर उपलब्‍ध होते हैं, वे केवल लघुकालिक परिणामों के लिए कार्य करती हैं और जब उन्‍हें कोई अवसर प्राप्‍त होता है तो वे एक-बारगी निर्णय लेती हैं क्योंकि उन्‍हें फिर से चुने जाने की उम्मीद नहीं होती है।

लेकिन, यह पाया जाता है कि महिला राजनीतिक नेताओं की उपस्थिति के अन्य सकारात्मक सामाजिक परिणाम भी होते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए अय्यर और मणि (2012) यह पाते हैं कि 1993 के संशोधन के परिणामस्वरूप महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी के बाद महिलाओं के खिलाफ रिकॉर्ड किए गए अपराधों में 26% की बढ़ोतरी हुई है। गहराई से अध्‍ययन करने पर, शोधकर्ताओं को पता चलता है कि इसका कारण महिलाओं के खिलाफ होने वाले वास्तविक अपराधों में वृद्धि नहीं, बल्कि ऐसे अपराधों की बढ़ती रिपोर्टिंग है। महिला राजनीतिक प्रतिनिधियों के अधीन पुलिस की संवेदनशीलता में वृद्धि हुई है, जो महिलाओं को अपनी चिंताओं को उठाने के लिए प्रोत्साहित करती है।

जबकि आमतौर पर यह माना जाता है कि महिला राजनीतिक नेता समाज में लड़कियों और महिलाओं के लिए रोल मॉडल के रूप में काम कर सकती हैं, लेकिन तंत्र राजनीतिक उम्मीदवारी के लिए कार्य करता हुआ नहीं दिखाई पड़ता है। 1980-2007 के दौरान भारत के सभी राज्यों के चुनावों को शामिल करने वाले निर्वाचन क्षेत्र-स्तर के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए, भालोत्रा, क्लॉट्स-फिगुएरस, और अय्यर (2018) पाते हैं कि एक महिला की चुनावी जीत के बाद नई महिला उम्मीदवारों के प्रवेश में गिरावट आती है। यह गिरावट लैंगिक पूर्वाग्रह वाले राज्‍यों तथा पुरुषों द्वारा नेतृत्‍व किए जाने वाले राजनीतिक दलों में अधिक देखी जाती है, जोकि गैर-पारंपरिक भूमिका निभा रही महिलाओं के खिलाफ पुरुषों की आक्रामक प्रतिक्रिया के संगत है (उदाहरण के लिए, गंगाधरन एवं अन्‍य 2014 देखें)।

सक्रिय नागरिक के रूप में महिलाएं

भारत में मतदाताओं के लिंगानुपात (प्रत्येक 1,000 पुरुष मतदाताओं पर महिला मतदाताओं की संख्या) में 1960 के दशक में 715 से बढ़कर 2000 के दशक में 883 तक प्रभावशाली वृद्धि प्रदर्शित हुई है तथा 2019 के आम चुनाव में पहली बार पुरुषों की तुलना में महिलाओं द्वारा अधिक मतदान किए जाने की संभावना थी। फिर भी, महिलाओं को राजनीतिक रूप से उन्मुख सार्वजनिक गतिविधियों जैसे चुनाव अभियान या विरोध प्रदर्शन में भाग लेने या किसी राजनीतिक पार्टी के साथ पहचान स्‍थापित करने की संभावना कम होती है।

उत्तर प्रदेश (अय्यर और मणि 2018) में किए गए एक सर्वेक्षण से ज्ञात होता है कि सबसे बड़ा लैंगिक अंतराल वास्तव में चुनावी भागीदारी के बजाय गैर-चुनावी भागीदारी (उदाहरण के लिए, ग्राम सभाओं में भाग लेने) में हैं। लैंगिक अंतराल को आंशिक रूप से इन कारकों द्वारा समझाया जाता है जैसे कि महिलाओं को राजनीतिक संस्थानों और चुनावी नियमों के बारे में काफी कम जानकारी होती है; वे स्व-मूल्यांकन किए गए नेतृत्व कौशल के संबंध में पुरुषों से पीछे होती हैं; और उन्‍हें बाहर जाने के लिए अनुमति की आवश्यकता होती है। राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की उपस्थिति बढ़ाने के तरीकों की खोज करते हुए, मध्य प्रदेश में एक प्रयोग (प्रिल्‍लामान 2018) यह दर्शाता है कि जिन महिलाओं ने स्व-सहायता समूह (एसएचजी)1 में भाग लिया था, उनके ग्राम सभा की बैठकों में भाग लेने या स्थानीय नेताओं पर दावा करने की दो गुना अधिक संभावना थी। यह बताया गया है कि सकारात्मक प्रभाव काफी हद तक महिलाओं की उस समन्वित कार्रवाई का परिणाम है जिसमें वे प्रतिनिधित्व की मांग करने के साथ-साथ पुरुषों की आक्रामक प्रतिक्रिया का विरोध करती हैं।

ऊपर उल्लिखित अध्ययन में चट्टोपाध्याय और डफ्लो (2004) यह दर्शाते हैं कि नीति निर्धारण प्रक्रिया में महिलाओं के भाग लेने की तब अधिक संभावना होती है जब उनकी ग्राम परिषद की नेता एक महिला हो। जब प्रधान महिला होती है, तो ग्राम संसद2 में प्रतिभागियों की संख्‍या में महिलाओं का प्रतिशत काफी अधिक होता है (6.9% से 9.9% तक बढ़ जाता है)। इन गांवों की महिलाओं द्वारा पिछले छह महीनों में प्रधान से अनुरोध या शिकायत करने की संभावना भी दो गुनी बढ़ जाती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि यह स्थिति इस विचार के संगत है कि राजनीतिक संचार नागरिकों और नेताओं के समान लिंग के होने से प्रभावित होता है। उन्होंने इस संभावना को भी सामने रखा कि इस प्रकार नीति निर्धारण प्रक्रिया में ग्रामीण महिलाओं की बढ़ी हुई भागीदारी महिला प्रधानों के नीतिगत निर्णयों में भूमिका निभा सकती है।

हालांकि भारत में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए अभी भी एक लंबा रास्ता तय करना है, विशेष रूप से सरकार के उच्च स्तर पर, जहां अधिक महिला राजनीतिक नेताओं की उपस्थिति और अधिक महिलाओं द्वारा अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करने की आवश्यकता है, हम एक ऐसे नीतिगत बदलाव की उम्मीद कर सकते हैं जो भारत में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी एवं अवसर, शिक्षा प्राप्ति और स्वास्‍थ्‍य एवं उत्‍तरजीविता के अन्य संकेतकों पर बेहतर प्रदर्शन में योगदान कर सकता है।

इस ब्लॉग का मूल संस्करण आईजीसी के साथ साझेदारी में अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ था।

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टिप्पणियाँ:

  1. एसएचजी एक ही गांव की 10 से 20 महिलाओं के ऐसे अनौपचारिक संगठन हैं जो अनौपचारिक बचत और ऋण संस्थानों के रूप में कार्य करते हैं।
  2. ग्रामीण स्तर पर पंचायत के क्षेत्र के भीतर मतदाता सूची में पंजीकृत लोगों से युक्त निकाय को ग्राम संसद कहा जाता है। कई राज्यों में, इसे ग्राम सभा के रूप में जाना जाता है।

लेखक परिचय: नलिनी गुलाटी आईजीसी इंटरनैशनल ग्रोथ सेंटर के इंडिया सेंट्रल प्रोग्राम में कंट्री इकोनॉमिस्ट और आइडियास फॉर इंडिया की प्रबंध संपादक हैं। एला स्पेंसर इंटरनैशनल ग्रोथ सेंटर की प्रभाव एवं अध्ययन निदेशक है।

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