समष्टि अर्थशास्त्र

कोविड-19: भारत को प्रभावी रूप से लॉकडाउन से बाहर निकालना

  • Blog Post Date 10 जून, 2020
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भारत अपने कोविड-19 लॉकडाउन से बाहर आने की कगार पर है। इस लेख में, सुगाता घोष और सरमिष्ठा पाल ने भारत को लॉकडाउन से प्रभावी ढंग से बाहर निकालने के लिए विशेषज्ञ सलाह के कार्यान्वयन से संबंधित चुनौतियों की जांच की है। उनका तर्क है कि केंद्र सरकार एक राष्ट्रीय रणनीति बनाने में अंतर-सरकारी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए और बहुत कुछ कर सकती है ताकि नीतिगत कमजोरियों को दूर किया जा सके, परीक्षण और ट्रैकिंग को बढ़ाने के लिए राज्यों को आवश्यक धनराशि जारी की जा सके और भय एवं अफवाह फैलने से रोकने हेतु फर्जी खबरों और गलत सूचनाओं को विनियमित किया जा सके।

 

कोविड-19 से बुरी तरह प्रभावित हुए कुछ यूरोपीय देशों के नक्शेकदम पर चलते हुए, भारत ने भी कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए लॉकडाउन लागू किया और अब हम इस लॉकडाउन से बाहर आने की कगार पर है। एक महीने से अधिक समय के कड़े लॉकडाउन के बाद, लॉकडाउन में कुछ छूट देने की मांग तेजी से बढ़ रही है क्‍योंकि इसके कारण आर्थिक नुकसान में लगातार वृद्धि हो रही है, परंतु संक्रमण भी लगातार बढ़ रहा है। इस संदर्भ में, हम अर्थव्यवस्था को फिर से शुरू करने के लिए, भारत की इस लॉकडान से बाहर निकलने की रणनीति की समीक्षा कर रहे हैं।

भारत में कोविड-19 लॉकडाउन को अब आगे दो सप्ताह तक, यानि 18 मई तक, और बढ़ा दिया गया है, हालांकि सरकार ने 20 अप्रैल से, चयनित क्षेत्रों के लिए, लॉकडाउन नियमों में कुछ ढील देना शुरू कर दिया था। केंद्र ने जिलों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया है - रेड, ऑरेंज और ग्रीन ज़ोन, जिनकी साप्‍ताहिक रूप से समीक्षा की जाएगी। स्वास्थ्य सचिव ने दावा किया कि यह वर्गीकरण बहु-तथ्यात्मक था, तथा यह मामलों, उनके दोगुना होने की दर और परीक्षण एवं निगरानी प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए किया गया था। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, बेंगलुरु, और कोलकाता सहित पूरे भारत के सभी प्रमुख शहर रेड ज़ोन में हैं। केंद्र ने राज्यों को वायरस के प्रसार की किसी संभावना को समाप्त करने के लिए सुरक्षा उपायों के रूप में इन कंटेनमेंट ज़ोन के आसपास बफर जोन बनाने के लिए भी कहा है।

लॉकडाउन में ढील देने के तरीके पर विशेषज्ञों के विचार

दुनिया भर से विशेषज्ञ सलाहों के संबंध में लॉकडाउन से बाहर निकलने के इन नियमों का मूल्यांकन करना महत्वपूर्ण है। डेवाट्रिपॉन्ट एवं अन्‍य ने सुझाव दिया है कि यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं को फिर से शुरू करने में मदद करने के लिए स्वस्थ श्रमिकों की पहचान करने की आवश्यकता है। कॉटलिकॉफ ने अमेरिका के लिए कॉर्नेल प्रोफेसर, पीटर फ्रेज़ियर द्वारा विकसित साप्ताहिक पॉलिमरेज़ चेन रिएक्शन (पीसीआर) टेस्ट-आधारित परिवार समूह परीक्षण किए जाने का प्रस्ताव दिया है। अमेरिका में अन्य लोगों ने जीवन दृष्टिकोण के प्रमाण-आधारित मूल्य पर विचार किया है। उदाहरण के लिए, हमरमेश ने लॉकडाउन को उठाने पर होने वाले शुद्ध लाभ की गणना की है, जो अमेरिका में छह महीने के लिए औसत जीवन मूल्य और नौकरी के नुकसान के बीच का अंतर है। इन सब में अंतर्निहित विचार यह है कि लॉकडाउन को तब उठाया जा सकता है जब इससे बाहर निकलने से शुद्ध लाभ धनात्‍मक हो जाता है। भारतीय संदर्भ में, रे एवं अन्‍य ने 40 वर्ष से कम आयु के वयस्कों को काम करने के लिए लौटने की अनुमति (दबाव नहीं) प्रदान करने की सिफारिश की है, बशर्ते संक्रमण को सीमित करने के लिए बड़े पैमाने पर एंटीबॉडी परीक्षण किए जाएं। हालांकि अधिकांश विशेषज्ञ अर्थव्यवस्था को फिर से शुरू करने के लिए स्वस्थ श्रमिकों/ परिवारों की पहचान करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हैं, लेकिन भारत द्वारा लॉकडाउन में ढील दिए जाने के पहले प्रयास में जिलों को रेड, ऑरेंज और ग्रीन ज़ोन में वर्गीकृत करने पर जोर दिया गया है। हालाँकि, इस बारे में बहुत कम आधिकारिक जानकारी है कि केंद्र और राज्य परीक्षण, ट्रैकिंग एवं उपचार को बढ़ाने के लिए किस प्रकार अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं, जब​​कि वैज्ञानिकों ने बार-बार चेतावनी दी है कि इस महामारी से निपटने के लिए केवल लॉकडाउन ही पर्याप्त नहीं होगा। केंद्र और राज्यों के बीच, विशेषकर विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में मतभेद भी बढ़ रहे हैं। कुछ राज्यों ने पहले ही यह चिंता जताई है कि केंद्र द्वारा किया गया यह वर्गीकरण राजनीति से प्रेरित है।

निश्चित रूप से, 130 करोड़ के इस देश में विशेषज्ञ सलाह को प्रभावी ढंग से लागू करना सरल नहीं है, जहां असमानता, गरीबी, और कुपोषण के कारण युवा लोगों का भी स्वास्थ्य खराब रहता है, जो अक्सर ऐसे परिवारों में रहते हैं जहां बुजुर्ग परिजन (भारतीय जनगणना) सहित कई पीढि़यां एक साथ रहती हैं। यहां कुछ जैविक अनिश्चितताएं भी हैं और एक लॉकडाउन से बाहर निकलने की इष्टतम रणनीति तैयार करने के लिए उनके प्रति भी सावधानी बरतने की आवश्यकता है। चूंकि ऐसे व्‍यक्ति, जिनमें कोई लक्षण नहीं है परंतु सेरोलॉजिकल (सीरम विज्ञानी) परीक्षण में वे पॉजिटिव आए हैं, वे भी वायरस फैला सकते हैं और एक निश्चित समय के लिए अन्‍य लोगों को संक्रमित कर सकते हैं। अत: रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पॉलीमरेज़ चेन रिएक्शन (आरटी-पीसीआर) परीक्षण के माध्यम से यह सत्यापित करने की आवश्यकता होगी कि ये प्रतिरक्षा व्यक्ति अब वायरस से संक्रमित नहीं हैं। केवल ऐसे व्‍यक्तियों को ही काम पर लौटने की अनुमति दी जाए जो सेरोलॉजिकल परीक्षण में पॉजिटिव आते हों और आरटी-पीसीआर परीक्षण में नेगेटिव आते हों। दोनों परीक्षणों के संयुक्त उपयोग से प्रतिबंध हटने के कुछ हफ्तों के भीतर वायरस के वापस लौटने का खतरा कम हो जाएगा, हालांकि अधिक लोगों लिए परीक्षणों को बढ़ाने में समय लगने की संभावना है।

साथ ही, वायरस के प्रति प्रतिक्रिया एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में अलग-अलग होती है। यहां तक ​​कि एक निर्धारित उम्र और लिंग प्रोफ़ाइल के लिए, अश्वेत और एशियाई लोगों के उच्च रक्तचाप, मधुमेह और कार्डियो-वैस्‍कुलर रोगों से पीड़ित होने की अधिक संभावना है, इसलिए उन्‍हें कोविड-19 से प्रभावित होने का अधिक खतरा है। एक अच्छी तरह से वित्त पोषित और सक्रिय स्वास्थ्य प्रणाली के बिना, भारत जैसे अत्यधिक आबादी वाले देश में इन सभी का प्रबंधन करना कठिन होगा, जिसने सेरोलॉजिकल परीक्षण की तैयारी हाल ही में ही शुरू की है। इस चार्ट में विभिन्न भारतीय राज्यों में सरकारी और निजी परीक्षण सुविधाओं की स्थिति को दर्शाया गया है जो इन सुविधाओं की अपर्याप्‍तता के साथ-साथ राज्यों के बीच भारी भिन्नताओं को इंगित करता है। उदाहरण के लिए, गुजरात के पास कोविड-19 के पुष्ट मामलों की तुलना में बहुत कम परीक्षण सुविधाएं हैं। अखबारों की रिपोर्ट बताती है कि 3 फरवरी को इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआार) को महत्वपूर्ण कोविड परीक्षण का प्रभारी बनाया गया था, और काउंसिल ने बिना अधिक अनुभव के कारण परीक्षण किट के आदेश में गड़बड़ी कर दी और अभी भी यह परीक्षण को बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहा है।

यह और भी अनिश्चित है कि यह बीमारी कब और कहां हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, जो लोग कोविड-19 से उभर चुके हैं, उन्होंने चाहे सुरक्षात्मक प्रतिरक्षा विकसित की हो या नहीं, वे फिर से संपर्क में आने पर पुन: संक्रमण और अधिक गंभीर बीमारी का शिकार हो सकते हैं (जैसा कि डेंगू जैसे कुछ अन्य संक्रमणों के साथ होता है, हालांकि यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि क्‍या सार्स-कोव-2 के मामले में भी ऐसा हो सकता है)। भले ही जनसंख्‍या का बहुत बड़ा हिस्‍सा महामारी की पहली लहर में संक्रमित नहीं हुआ, लेकिन जैसे ही सामाजिक दूरी के उपायों में ढील दी जाएगी तो उनके संक्रमित होने या उनके द्वारा संक्रमित करने की संभावना है। ऐसे लोगों की पहचान करना, जो उन क्षेत्रों की यात्रा कर चुके हैं, जहां यह बीमारी फैली हुई है, या संक्रमित लोगों के संपर्कों को पहचानने और उन्‍हें आइसोलेट करने के लिए, डिजिटल डाटा कोविड-19 के खिलाफ भारत की सामूहिक बचाव रणनीति विकसित करने में महत्वपूर्ण संसाधन बन गया है।

विशेषज्ञ सलाह के कार्यान्वयन से संबंधित चुनौतियां

डिजिटल ट्रैकिंग के लिए अप्रैल की शुरुआत में आरोग्य सेतु ऐप की शुरुआत करने के बाद, सरकार ने अब 4 मई को शुरू किये गये लॉकडाउन के तीसरे चरण से सभी सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए इसका उपयोग अनिवार्य कर दिया है। हालांकि, पिछले एक महीने में, इस मोर्चे पर प्रगति सीमित रही है। यह कुछ हद तक यह दर्शाता है कि केवल सीमित संख्‍या लोगों के पास स्मार्ट फोन हैं; एक अनुमान के अनुसार 2017 में 138 करोड़ भारतीयों में से 46.2 करोड़ पास स्मार्ट फोन थे, और केवल 8.3 करोड़ ने 2 मई तक यह ऐप डाउनलोड किया था। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि डर और सरकार पर विश्वास की कमी बढ़ती जा रही है; जबकि ऐप वायरस के प्रसार का पता लगाने के कारणों को वैध कर सकता है लेकिन ऐसी आशंकाएं भी हैं कि इन शक्तियों के कारण नागरिक स्वतंत्रता का आसानी से दुरुपयोग किया जा सकता है। वास्तव में, भारत लॉकडाउन के दौरान असहमतियों के और अधिक दृढ़ होने, सरकार की आलोचनाओं को दबा दिए जाने का गवाह बना है। इस प्रकार यह महामारी मूल मानवाधिकारों की अवहेलना करने का अवसर पैदा कर सकती है, जिससे वायरस के खिलाफ लड़ाई पीछे छूट सकती है।

इससे राज्यों के बीच संकट प्रबंधन के समन्वय में केंद्रीय नेतृत्व की विफलता स्पष्ट रूप से दिखती है। स्वास्थ्य का विषय भारतीय संविधान की राज्य सूची में है। चूंकि अचानक लॉकडाउन के कारण राज्य सरकारों की वित्‍तीय स्थिति अत्‍यधिक खराब हो गई, अत: इस संकट से निपटने के लिए राज्यों द्वारा स्वास्थ्य देखभाल के प्रावधान को केंद्र सरकार के पर्याप्त वित्त पोषण द्वारा समर्थित किये जाने की आवश्यकता है। विशेषज्ञों द्वारा एक बड़े आर्थिक पैकेज हेतु बार-बार मांग किए जाने के बावजूद, अभी तक कोविड-विशिष्ट फंड स्‍थापित नहीं किया गया है, जैसा कि अमेरिका और जापान में स्‍थापित किया गया है। अब तक, केंद्र ने 28 राज्यों को, 2020-21 के लिए राज्य आपदा प्रतिक्रिया शमन निधि (एसडीआरएमएफ) की पहली किस्त में अपना आधा हिस्सा अर्थात रु 11,092 करोड़ जारी किया है। इस निधि का उपयोग क्लस्टर कंटेनमेंट, क्‍वारंटीन हेतु तथा स्वास्थ्य, नगरपालिका, पुलिस और अग्निशमन कर्मचारियों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों की खरीद के लिए किया जा सकता है। इस बीच, प्रधान मंत्री (पीएम) और अधिकांश राज्यों के मुख्यमंत्रियों (सीएम) ने विभिन्न कोविड राहत निधियों की शुरुआत की है। 28 मार्च को घोषित, पीएम के विवादास्पद पीएम-केयर्स फंड ने विभिन्न सीएम राहत कोषों की तुलना में काफी अधिक धन जुटाया है, और इसका श्रेय मुख्य रूप से पीएम द्वारा अर्जित कॉर्पोरेट संरक्षण को जाता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि पीएम-केयर्स फंड की कोई जवाबदेही नहीं है, इसे सरकारी लेखा परीक्षा से छूट दी जा रही है, और इसके बारे में अब तक बहुत कम जानकारी सार्वजनिक की गई है कि पैसा कैसे खर्च किया जा रहा है। 14वें वित्त आयोग के सदस्य गोविंद राव ने जोर देकर कहा है कि राज्यों को प्रदान किए जाने वाले केंद्रीय वित्त पोषण में स्पष्टता की कमी है, जोकि कोविड-19 से लड़ाई जीतने के लिए आवश्यक है। इसके अलावा, एसडीआरएमएफ की ओर जारी की गई राशि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्यों के प्रति संभावित पूर्वाग्रह को दर्शाती है। आवंटित धन उन राज्यों में दर्ज संक्रमणों की संख्या या जनसंख्या के घनत्व को नहीं दर्शाता है। कई राज्‍यों में यह नाराजगी थी कि छोटे राज्यों, जैसे कि हिमाचल प्रदेश को एसडीआरएमएफ के हिस्से के रूप में अधिक राशि (रु. 204 करोड़) प्रदान की गई है, जो संकट प्रबंधन में केंद्र और राज्यों के बीच विश्वास की कमी को उजागर करता है।

विश्वास की कमी से अफवाह और भय उत्‍पन्‍न हो सकता है, जिससे भारत में अस्थिरता और समाज के विभाजित होने का खतरा पैदा हो सकता है। यह स्थिति धार्मिक विश्वासों, गलत सूचनाओं और फर्जी खबरों से और खराब हो सकती है, जिन्‍हें कभी-कभी निर्वाचित जन प्रतिनिधियों द्वारा महामारी को सांप्रदायिक रूप देने के लिए प्रचारित किया जाता है। कोविड-19 के इलाज के रूप में जड़ी-बूटियों और होम्योपैथिक दवाओं (परीक्षण और ट्रैकिंग के बजाय) की सिफारिश करने के लिए सरकार के आयुष मंत्रालय की सलाह की आलोचना की गई है। यहां तक ​​कि जब पीएम ने वायरस से लड़ने के लिए विशिष्ट दिनों में विशिष्ट समय पर विशिष्ट संख्या में मोमबत्तियां जलाने या लोगों को ताली बजाने के लिए आह्वान किया तो इसे भी आधुनिक वैज्ञानिक तर्क के स्‍थान पर ज्योतिष और अंकशास्‍त्र में विश्‍वास के साथ जोड़ा गया है। चूंकि अफवाह फैलाने और साइबर अपराध को नियंत्रित करने के लिए सरकार की ओर से कोई सक्रिय प्रयास नहीं हुए हैं, अत: प्रभावी नीति निर्माण हेतु वैज्ञानिक सलाह का उपयोग करने के लिए सरकार की वास्‍तविक इच्छा के बारे में चिंताएं बनी रहेंगी। वास्तव में, इस बात के भी सबूत मिले हैं कि सरकार ने स्‍वयं द्वारा नियुक्त वैज्ञानिक टास्कफोर्स को दरकिनार कर दिया है, और इस प्रकार वह लॉकडाउन में ढील की अपनी कुशल योजना को अनदेखा कर रही है।

आज के राजनीतिक नेताओं में से कुछ को संभवतया शायद हीं कभी ऐसी महामारी और आर्थिक पतन का सामना करना पड़ा है। हालाँकि, केरल राज्य ने अपने सीमित साधनों के भीतर वैज्ञानिक एवं पारदर्शी रूप से, और लगातार कोविड-19 से निपटने के लिए उल्लेखनीय नेतृत्व देखा है। आईसीएमआर ने 2 मई को कहा कि परीक्षण और रोकथाम रणनीतियों के लिए वह "केरल मॉडल का जिक्र करता रहेगा", हालांकि केरल और कुछ अन्य भारतीय राज्यों के बीच बहुत बड़ा अंतर अवश्‍य बना हुआ है। हालांकि पीएम मोदी सार्क (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) देशों के बीच एक क्षेत्रीय सहयोग पर जोर दे रहे हैं, फिर भी हमें परीक्षण और ट्रैकिंग के लिए सर्वसम्मति पर आधारित राष्ट्रीय रणनीति पर जोर देने के लिए कोई भी आशाजनक राष्ट्रीय प्रयास देखने को नहीं मिल रहा है जबकि लंबी दूरी की ट्रेनों और बसों का संचालन फिर से शुरू हो गया है। केंद्र और विशेष रूप से विपक्ष शासित राज्यों के बीच मतभेद प्रतिदिन बढ़ रहा है, जैसा कि हाल ही में प्रवासी मजदूरों के संकट को दूर करने में वित्तपोषण और प्रबंधन के विषय पर घिनौनी लड़ाई उजागर हुई जिसने ‘भारतीयता’ की अवधारणा को कमजोर किया है। देश निश्चित रूप से नीतिगत कमजोरियों को दूर करने के लिए अंतर-सरकारी विश्‍वास और सहयोग को बढ़ावा देने हेतु आवश्यक नेतृत्व प्रदान करने, परीक्षण और उपचार को बढ़ाने के लिए राज्यों को कोविड के वित्तपोषण को बढ़ाने, और भय तथा अफवाहों को रोकने के लिए फर्जी खबरों और गलत सूचनाओं को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी नेतृत्‍व हेतु अपने प्रधान मंत्री की ओर देख रहा है। हम आशा करते हैं कि वे परिस्थितियों को बदल सकें।

लेखक परिचय: सरमिष्‍ठा पाल गिल्डफोर्ड (यूनाइटेड किंगडम) स्थित सरे विश्वविद्यालय में वित्तीय अर्थशास्त्र की प्रोफेसर हैं। सुगाता घोष लंदन (यूनाइटेड किंगडम) स्थित ब्रूनेल विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं।

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