मानव विकास

क्या राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन ने बिहार में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग में सुधार किया है?

  • Blog Post Date 10 जनवरी, 2020
  • लेख
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Saswata Ghosh

Institute of Development Studies Kolkata

ghosh.saswata@gmail.com

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Zakir Husain

Presidency University, Kolkota

dzhusain@gmail.com

बिहार सामाजिक-आर्थिक रूप से एक पिछड़ा राज्य है जिसका मातृ और बाल स्वास्थ्य सूचकों के संबंध में रिकॉर्ड लगातार खराब रहा है। यह लेख, स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय पतिदर्श सर्वेक्षणों के आंकड़ों के आधार पर इस तथ्‍य का मूल्यांकन करता है कि बिहार में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग में सुधार पर राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) का क्‍या प्रभाव पड़ा है। यह दर्शाता है कि एनआरएचएम इन सेवाओं के उपयोग को बढ़ाने तथा सार्वजनिक सुविधाओं में संस्थागत प्रसवों पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय को कम करने में प्रभावी रहा है।

बिहार सामाजिक एवं आर्थिक रूप से एक पिछड़ा राज्य है जिसका मातृ और बाल स्वास्थ्य सूचकों के संबंध में रिकॉर्ड लगातार खराब रहा है। इसलिए, वर्ष 2005 में, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम)1 के शुरुआती दौर में, इसे एक ऐसे राज्य के रूप में चिन्हित किया गया जिस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता थी और इसे एम्‍पॉवर्ड ऐक्शन ग्रुप (ईएजी; सशक्त कार्रवाई समूह)2 राज्यों की में रखा गया। हालांकि राष्ट्रीय स्तर पर एनआरएचएम को एक सफल कार्यक्रम माना गया है, परंतु यह महत्वपूर्ण है कि क्षेत्रीय स्तर पर, विशेष रूप से बिहार जैसे ईएजी राज्यों में हुई इसकी प्रगति का आकलन किया जाए तथा ऐसे सभी राज्‍यों में से प्रत्येक राज्य के लिए उपयुक्त कार्यान्‍वयन रणनीति बनाई जाए।

इसलिए इस लेख में, हमने तीन मुख्य उद्देश्यों के साथ, बिहार राज्य में मातृ स्वास्थ्य सेवा उपयोग के स्तर का विश्लेषण करने का प्रयास किया है:

(क) मातृ देखभाल सेवाओं के उपयोग को प्रभावित करने वाले कारकों और एनआरएचएम से पहले और बाद की अवधियों के बीच में सुविधा की पसंद की पहचान करना;

(ख) विशेष रूप से सार्वजनिक सुविधाओं में संस्थागत प्रसवों में वृद्धि करने के क्षेत्र में जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई)3 की प्रभावशीलता का आकलन करना; तथा

(ग) एनआरएचएम के पूर्व और बाद की अवधियों में सुविधा के प्रकार (सार्वजनिक और निजी) के अनुसार मातृ देखभाल4 (संस्थागत प्रसव और देखभाल के तीनों घटकों - प्रसव पूर्व देखभाल (एएनसी), संस्थागत प्रसव, और प्रसवोत्तर देखभाल (पीएनसी) पर अलग-अलग) पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) का अनुमान लगाना। इसके अतिरिक्‍त, प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) को प्रभावित करने वाले कारकों की भी पहचान करना।

आंकड़े और तरीके

हमने विश्लेषण करने के लिए राष्ट्रीय पतिदर्श सर्वेक्षण (एनएसएस) के 60वें (2004) और 71वें (2014) दौरों की अनुसूची 25 में एकत्रित, यूनिट-स्तर के आंकड़ों का उपयोग किया5। ये दो वर्ष क्रमशः एनआरएचएम के पूर्व और बाद की अवधियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

परिणाम

सूची 1 में प्रसवपूर्व, प्रसव और प्रसवोत्‍तर देखभाल मिलने, और प्रदाता के प्रकार द्वारा एनआरएचएम के पूर्व और बाद की अवधियों में प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) की मात्रा का वर्णन है। बिहार में 2004 से 2014 के बीच मातृ देखभाल के हर घटक में उल्‍लेखनीय वृद्धि हुई। उदाहरण के लिए, अध्ययन अवधि के दौरान एएनसी सेवाओं की प्राप्ति 54.8% से बढ़कर 96.2% हो गई, जबकि संस्थागत प्रसव की वृद्धि लगभग चार गुना अर्थात मात्र 18.5% से 70.8% तक बढ़ गई।

सूची 1: बिहार में प्रदाता के अनुसार, मातृत्‍व देखभाल का लाभ उठाने तथा प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) के विवरणात्‍मक आंकड़े, 2004 तथा 2014

चर 2004 2014
सार्वजनिक निजी कुल सार्वजनिक निजी कुल

किसी भी प्रकार का प्रसव पूर्व देखभाल (एएनसी)

9.0

45.8

54.8

69.7

26.5

96.2

संस्‍थागत प्रसव

4.1

14.4

18.5

52.5

18.3

70.8

प्रसवोत्‍तर देखभाल (पीएनसी)

9.9

44.2

54.1

48.3

30.4

78.7

तीनों मातृत्‍व देखभाल सेवाएं

0.4

7.4

10.7

26.0

8.4

46.4

संस्‍थागत प्रसव पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई)

(2004-05 की स्थिर कीमत पर) ($6 में)

34

32

32

25

126

52

तीनों मातृत्‍व देखभाल सेवाओं पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई)

(2004-05 की स्थिर कीमत पर) ($6 में)

12

51

15

37

221

58

स्रोत: लेखकों द्वारा एनएसएस आंकड़ों से गणना।

वर्ष 2004-2014 के दौरान मातृ देखभाल प्राप्‍त करने हेतु सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का उपयोग कई गुना बढ़ गया, जबकि इसी अवधि के दौरान निजी सुविधाओं के उपयोग में या तो गिरावट आई या मामूली वृद्धि हुई। उदाहरण के लिए, सार्वजनिक सुविधाओं में संस्थागत प्रसवों में 13 गुना (4.1% से 52.5%) की वृद्धि हुई है, जबकि निजी सुविधाओं में यह वृद्धि मामूली अर्थात 14.4% से 18.3% है। सार्वजनिक सुविधाओं में एएनसी में लगभग आठ गुना वृद्धि देखी गई, जबकि निजी सुविधाओं में यह 45.8% से घटकर 26.5% रह गई। इसके साथ ही, 2004-2014 के दौरान सार्वजनिक सुविधाओं से तीनों मातृ देखभाल सेवाओं का उपयोग 0.4% से 26% तक काफी मात्रा में बढ़ गया, जबकि अध्ययन अवधि के दौरान निजी सुविधाओं में यह 7.4% से 8.4% तक बढ़ गया।

सूची यह भी बताती है कि, हालांकि 2004-2014 के दौरान सार्वजनिक सुविधाओं में संस्थागत प्रसव पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) $634 से $725 तक घट गया था, यह निजी सुविधाओं में $632 से $6126 तक लगभग चार गुना बढ़ गया। हालाँकि, मातृ देखभाल के तीनों घटकों पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) में सार्वजनिक सुविधाओं में तीन गुना ($612 से $6 37 तक) और निजी सुविधाओं में चार गुना से अधिक ($6 51 से $6221 तक) की वृद्धि हुई।

हमने पाया कि संभावित भ्रामक चरों की रेंज को नियंत्रित करने के बाद भी 2004-2014 के दौरान संस्थागत प्रसव की संभावना में 11.73 गुना वृद्धि हुई है। संस्थागत प्रसव की संभावना उम्र, शहरी निवास, माध्यमिक या उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्ति और घरेलू स्तर पर संपन्नता के स्तर में वृद्धि के साथ भी बढ़ी है; मगर, अल्पसंख्यकों और सामाजिक रूप से हाशिए के वर्गों में इसमें गिरावट आई है।

यह भी प्रकट हुआ है कि शहरी, शिक्षित और संपन्न महिलाओं द्वारा निजी सुविधाओं में प्रसव की काफी अधिक संभावना है, जबकि अधिक आयु तथा अल्पसंख्यक समुदायों और सामाजिक रूप से हाशिए वाले वर्गों की महिलाओं द्वारा निजी सुविधाओं में प्रसव की संभावना काफी कम है। वर्ष 2004-2014 के दौरान, सार्वजनिक सुविधाओं की तुलना में निजी सुविधाओं में संस्थागत प्रसव की संभावना 90% घट गई।

सूची 2 वियोजन7 से प्राप्त परिणामों को दर्शाती है जिससे ज्ञात होता है कि संस्थागत प्रसव में 94% की वृद्धि-सार्वजनिक संस्थानों में 96% की वृद्धि और निजी संस्थानों में 36% की गिरावट में विभाजित हुई है-जिसके लिए जेएसवाई, सर्वेक्षण के वर्ष और विलोपित चर को जिम्मेदार माना जा सकता है। यह देखते हुए कि बिहार में जेएसवाई के लागू होने से पहले, 13 वर्षों में संस्थागत प्रसव में केवल 10 प्रतिशत अंकों की वृद्धि हुई थी, जबकि अगले दशक में (जब एनआरएचएम आरंभ हुआ था) यह लगभग तीन गुना बढ़ गई है, हम यह तर्क दे सकते हैं कि, बिहार में जेएसवाई के बिना संस्थागत प्रसव में इतनी बड़ी वृद्धि संभव नहीं हो सकती थी।

सूची 2. बिहार में शिशु जन्म पर जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई) के प्रभाव: एक वियोजन विश्लेषण

संस्‍थागत प्रसव सार्वजनिक संस्‍थानों में प्रसव निजी संस्‍थानों में प्रसव
विशुद्ध प्रतिशत विशुद्ध प्रतिशत विशुद्ध प्रतिशत

वर्षों में अंतर

0.518

100%

0.480

100%

0.039

100%

भार = 1

मॉडल द्वारा स्‍पष्‍ट

0.039

7.48%

0.022

4.68%

0.012

31.93%

अस्‍पष्‍ट (आंशिक रूप से एनआरएचएम के कारण)

0.479

92.52%

0.457

95.32%

0.026

68.07%

भार = 0

मॉडल द्वारा स्‍पष्‍ट

0.022

4.24%

0.016

3.30%

0.015

38.90%

अस्‍पष्‍ट (आंशिक रूप से एनआरएचएम के कारण)

0.496

95.76%

0.464

96.70%

0.024

61.10%

नोट: विनियोजनों को शिुशु जन्म हेतु मॉडलों में शामिल चरों को नियंत्रित करने के बाद वर्ष (2004 और 2014) के प्रतिगमन मॉडलों को नियोजित (प्रोबिट) करके किया गया था।

स्रोत: लेखकों द्वारा एनएसएस आंकड़ों से गणना।

हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि एनआरएचएम के बाद की अवधि में सार्वजनिक सुविधाओं में संस्थागत प्रसव पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) एनआरएचएम से पहले की अवधि की तुलना में 30% कम था; तथापि, एनआरएचएम के बाद की अवधि में सार्वजनिक सुविधाओं में मातृ देखभाल के तीनों घटकों पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) में एनआरएचएम से पहले की अवधि की तुलना में 13% की वृद्धि हुई है। एनआरएचएम से पहले की अवधि में संस्थागत प्रसव के लिए सार्वजनिक सुविधाओं में प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) की तुलना में, एनआरएचएम के बाद की अवधि में निजी सुविधाओं में प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) की संभावना 249% बढ़ी है, तीनों मातृ देखभाल घटकों के लिए यह वृद्धि और भी अधिक यानि 322% पाई गई। इससे यह इंगित होता है कि वर्ष 2004 और 2014 के बीच प्रसव और अन्य मातृ देखभाल संबंधी खर्चों के लिए निजी सुविधाओं में प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) काफी बढ़ गया है।

विचार-विमर्श

इस अनुसंधान के मुख्य निष्कर्ष इस प्रकार हैं। पहला, संस्थागत प्रसव अन्य संभावित भ्रामक चरों को नियंत्रित करने के बाद भी बिहार में वर्ष 2004 से 2014 के बीच 11.73 गुना बढ़ा है, जबकि इसी अवधि में निजी सुविधाओं में प्रसव सार्वजनिक सुविधाओं की तुलना में 90% तक कम हुआ। दूसरा, जेएसवाई सफल रही है, खासकर गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए सार्वजनिक सुविधाओं तक लाने में। हमने पाया कि सार्वजनिक संस्थानों में प्रसव में 96% वृद्धि का कारण जेएसवाई, सर्वेक्षण के वर्ष, और विलोपित चर हो सकते हैं, जिनमें से सर्वेक्षण के वर्ष की भूमिका सबसे कम है। तीसरा, यद्यपि मातृ-देखभाल के तीनों घटकों पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) में पूर्व-एनआरएचएम अवधि की तुलना में 13% की वृद्धि हुई, एनआरएचएम के बाद की अवधि में भ्रामक चरों की रेंज को नियंत्रित करने के बाद भी सार्वजनिक सुविधाओं में संस्थागत प्रसव पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) में 30% तक की गिरावट आई। अंतिम, एनआरएचएम के बाद की अवधि में संसाधनों की दृष्टि से गरीब राज्‍य बिहार में निजी सुविधाओं में मातृ स्वास्थ्य पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) में एक बड़ी वृद्धि महसूस की गई।

तथापि, हमारा अध्ययन, बिहार में मातृ स्वास्थ्य सेवा के उपयोग में प्रदाताओं की पसंद के बारे में एक महत्वपूर्ण असमानता को इंगित करता है। निरक्षर, गरीब, अनुसूचित जाति/जनजाति और गैर-हिंदू महिलाओं की तुलना में शहरी, शिक्षित, संपन्न वर्गों और उच्च जाति के हिंदू परिवारों से संबंधित महिलाओं में सार्वजनिक और निजी दोनों सुविधाओं में संस्थागत प्रसव का विकल्प चुनने की संभावना अधिक है। ये निष्कर्ष सार्वजनिक सुविधाओं में देखभाल की गुणवत्ता और निजी सुविधाओं (घोष एट अल 2015, मोहंती और कस्तूर 2017) में सेवाओं का लाभ उठाने में वित्‍तीय रूप से समर्थ होने से संबंधित चिंताओं को दोहराते हैं। यह भी ध्यान दिए जाने योग्‍य है कि हालांकि सार्वजनिक सुविधाओं में एएनसी का लाभ उठाने और संस्थागत प्रसव में उल्‍लेखनीय वृद्धि हुई है परंतु इसके अनुरूप न तो सार्वजनिक और न ही निजी सुविधाओं में तीनों मातृ स्वास्थ्य सेवाओं के उपयोग में वृद्धि हुई। इससे, बिहार में मातृ स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं पर निरंतर ध्‍यान दिए जाने की स्थिति पर सवाल उठता है जिसके बारे में अन्य अध्ययनों (मैकडॉगल एट अल 2017) में भी आवाज उठाई गई थी तथा यह भविष्य में जेएसवाई के कार्यक्षेत्र के पुनर्गठन की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।

हमारे निष्कर्ष यह भी बताते हैं कि हालांकि अध्ययन अवधि के दौरान बिहार में सार्वजनिक सुविधाओं में संस्थागत प्रसव पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) में गिरावट आई, संस्थागत प्रसव पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) में समग्र वृद्धि पूरी तरह से निजी सुविधाओं में प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) में हुई कई गुना वृद्धि के कारण थी। यह राष्ट्रीय स्तर पर देखे गए ट्रेंड (मोहंती और कस्तोर 2017, गोला एट अल. 2016) के अनुरूप है। इसके अलावा, एनआरएचएम के बाद की अवधि में सार्वजनिक सुविधाओं में भी एएनसी और पीएनसी पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) में वृद्धि हुई है। यह संभवतः बिहार में ऐसी सुविधाओं हेतु परिवहन की लागत, दवाओं और नैदानिक परीक्षणों की अनुपलब्धता और अन्य अनौपचारिक भुगतानों में वृद्धि का संकेत देता है। प्रसव देखभाल पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) में समग्र वृद्धि के लिए इस तथ्य को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है कि बिहार में सार्वजनिक सुविधाओं की तुलना में निजी सुविधाओं में सीज़ेरियन प्रसव अधिक किए जाते हैं (महापात्र एट अल. 2018) ।

वर्तमान निष्कर्षों के आधार पर, यह परिणाम निकाला जा सकता है कि एनआरएचएम बिहार में मातृ देखभाल सेवाओं के उपयोग को बढ़ाने और सार्वजनिक सुविधाओं में संस्थागत प्रसव पर प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) को कम करने में प्रभावी रहा है। क्षैतिज समानता सुनिश्चित करना और देखभाल की निरंतरता बनाए रखना राज्य के सामने प्रमुख चुनौतियां हैं। देखभाल की निरंतरता को तभी बनाए रखा जा सकता है जब एनआरएचएम के तहत प्रदाताओं और सेवा प्राप्तकर्ताओं को नकद प्रोत्साहन केवल तभी प्रदान किया जाए जब देखभाल की निरंतरता की शर्त को पूरा किया गया हो। इसके अलावा, मूल्य निर्धारण और देखभाल की गुणवत्ता के संबंध में निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को विनियमित किया जाना चाहिए, जो बिहार में नैदानिक स्थापना अधिनियम (सीईए) के सख्‍त कार्यान्वयन के लिए आवश्यक है (केशरी 2018)। इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक सुविधाओं के इष्टतम उपयोग के लिए अनिवार्य होगा कि सार्वजनिक सुविधाओं तक आसानी से पहुंचने के लिए परिवहन साधन उपलब्‍ध कराए जाएं, सार्वजनिक सुविधाओं के भीतर दवाओं और नैदानिक परीक्षणों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए, और देखभाल की गुणवत्ता में सुधार किया जाए।

नोट्स:

  1. राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ती स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने, स्वास्थ्य गुणवत्ता में सुधार लाने और मातृ और शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए वर्ष 2005 में शुरू किया गया था। वर्ष 2013 में, इस मिशन को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के रूप में नए सिरे शुरू किया गया था जिसके दो घटक थे, एनआरएचएम और राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन (एनयूएचएम)।
  2. भारत में, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तरांचल, और उत्तर प्रदेश के आठ सामाजिक आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों को 'एम्‍पॉवर्ड एक्‍शन ग्रुप' (ईएजी) के रूप में जाना जाता है – ये राज्‍य जनसांख्यिकीय संक्रमण के मामले में पिछड़े हैं और इन राज्‍यों में देश में सबसे अधिक शिशु मृत्यु दर है।
  3. जननी सुरक्षा योजना (जेएसवाई) राष्ट्रीय मातृत्व मिशन के तहत वर्ष 2005 में शुरू किया गया एक सुरक्षित मातृत्व कार्यक्रम है। इसे गरीब गर्भवती महिलाओं के बीच संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देकर मातृ और नवजात मृत्यु दर को कम करने के उद्देश्य से लागू किया जा रहा है।
  4. प्रत्‍यक्ष व्‍यय (ओओपीई) को उस राशि के रूप में परिभाषित किया गया है जो मातृत्‍व देखभाल के विभिन्‍न घटकों का लाभ उठाने के दौरान महिला द्वारा खर्च की गई कुल राशि में से प्रतिपूर्ति की गर्इ राशि को घटाने पर प्राप्‍त होती है।
  5. अध्ययन बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के अनुदान द्वारा समर्थित था।
  6. कतिपय सांख्यिकीय तकनीकों का उपयोग करके एक सांख्यिकीय मॉडल के घटक को अपने संघटक भागों में विभाजित करने की प्रक्रिया।
  7. इस आलेख में $ का प्रयोग अमरीकी डॉलर के लिए किया गया है।

लेखक परिचय: सास्वता घोष एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट (आद्री), पटना के परिसर स्थित सेंटर फॉर हेल्थ पॉलिसी (सीएचपी) में डेमोग्राफी और जनसंख्या स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं। ज़ाकिर हुसैन प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं।

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