समष्टि अर्थशास्त्र

वर्ष 2019-20 के केंद्रीय बजट में सामाजिक संरक्षण

  • Blog Post Date 17 जुलाई, 2019
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Sudha Narayanan

Indira Gandhi Institute of Development Research

sudha@igidr.ac.in

इस पोस्ट में सुधा नारायणन ने केंद्रीय बजट 2019 में सामाजिक संरक्षण से संबंधित प्रावधानों का विश्लेषण किया है। उनका तर्क है कि बजट के आंकड़ों से लगता है कि सरकार समाज कल्याण की अनेक योजनाओं के मामले में सही रास्ते पर चल रही है, लेकिन भारत में सामाजिक संरक्षण के ढांचे को वह धीरे धीरे कमज़ोर कर रही हो सकती है। 

 

इस बात पर व्यापक सहमति है कि ज्यादातर मामलों में सामाजिक संरक्षण राज्य का दायित्व है। इसे मोटे तौर पर लोगों के जोखिम में पड़ने में कमी लाकर, और बेरोजगारी, बहिष्करण, बीमारी, निःशक्तता तथा वृद्धावस्था से जुड़े जोखिमों से निपटने की क्षमता बढ़ाकर, गरीबी और असुरक्षा में कमी लाने के उपाय के रूप में समझा जाता है। गरीबों और असुरक्षित स्थिति वाले लोगों को ऐसी सहायता देना वस्तुतः यूनाइटेड नेशंस सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स का प्रमुख हिस्सा है (गोल 1.3)। हर साल पेश किया जाने वाला केंद्रीय बजट भारत सरकार को अपनी नीतिगत प्राथमिकताएं स्पष्ट करने का मौका देता है। खुद बजट भाषण में ही सामान्यतः सामाजिक सहायता, बीमा, और श्रम बाजार संबंधी हस्तक्षेपों सहित विभिन्न कार्यक्रमों के लिए आबंटनों पर विचार होता है। हालांकि बजट को शायद ही कभी सरकार के इरादों और कार्रवाइयों के आधिकारिक वक्तव्य के रूप में देखा जाता है, लेकिन आबंटनों की छानबीन यह देखने में उपयोगी साबित होती है कि वह बताई गई नीति के अनुरूप है या नहीं, और सामने मौजूद कार्यभार के अनुपात में है या नहीं। 

यह दुर्भाग्यपूर्ण तरीकों से अलग ढंग का बजट था। हाल के वर्षों में हमें शायद ही कोई बजट देखने को मिला है जिसमें हमारे समय की अनेक जरूरी चिंताओं का उल्लेख या सामाजिक संरक्षण में राज्य की भूमिका की स्पष्ट पहचान नहीं की गई हो। इसमें गरीबी का उल्लेख सिर्फ एक बार काला धन से निपटने के प्रस्तावित हस्तक्षेपों के संबंध में (पैरा 7 में) किया गया। वहीं, रोजगार और नौकरियों का उल्लेख रोज़गार निर्माण, कौशल निर्माण, और पारंपरिक उद्योगों के पुनर्सृजन में सहयोग के लिए मददगार कर नीति के बहुत सीमित संदर्भ में किया गया। रोज़गार निर्माण की जरूरत पर तो उचित ही जोर है, लेकिन न तो बेरोजगारी की वर्तमान स्थिति और व्यापक ग्रामीण विपदा को और न ही आय संबंधी झटकों के लिहाज से असुरक्षित लोगों के लिए विश्वसनीय सुरक्षा जाल उपलब्ध कराने की जरूरत को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है। जैसे विश्वसनीय सुरक्षा जाल के बतौर मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना)1 की सुस्थापित भूमिका है लेकिन मनरेगा और ग्रामीण विपदा के समय उसकी भूमिका का कोई उल्लेख नहीं किया गया। 

उसमें कुपोषण का भी कोई उल्लेख नहीं है। यह एक हठी समस्या है जिसके लिए काफी निवेश की, खास कर माताओं, बच्चों और किशोरियों को लक्षित करने की जरूरत पड़ती है। स्वच्छ भारत अभियान के सन्दर्भों और बजट के दृष्टि से संबंधित वक्तव्य में संक्षिप्त उल्लेख को छोड़कर स्वास्थ्य का भी नाम मात्र का ही उल्लेख किया गया है। बजट सरकार की प्राथमिकताओं का जिस हद तक संकेत देता है, उससे दिखता है कि 5 ट्रिलियन (50 खरब) अमेरिकी डॉलर की बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के उसके प्रयासों में व्यापक आधार वाले सामाजिक संरक्षण का सुनिर्धारित एजेंडा उसकी दृष्टि से गायब है। 

तो फिर सामाजिक संरक्षण कार्यक्रमों के लिए आबंटन के लिहाज से वास्तव में हमें क्या मिला है? गौरतलब है कि किसी खास कार्यक्रम के लिए बजट आबंटन का अर्थ अक्सर यह नहीं होता है कि उतनी रकम वास्तव में खर्च होती है। जैसे वृद्धों, निःशक्तों और विधवाओं के लिए पेंशन सहित कई कार्यक्रमों का क्लस्टर रहे राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (नेशनल सोशल असिस्टेंस प्रोग्राम, एनएसएपी) के लिए 2018-19 में 9,975 करोड़ रु. का आबंटन किया गया था, लेकिन संशोधित अनुमान कम यानी 9,200 करोड़ रु. था। इसका उलटा भी सही हो सकता है। जैसे 2018-19 में मनरेगा के लिए बजट आबंटन 55,000 करोड़ रु. था लेकिन योजना के तहत काम की अप्रत्याशित मांग के कारण जनवरी 2019 में उसके लिए 6,084 करोड़ रु. का अतिरिक्त आबंटन किया गया। अतः बजट आबंटनों के मूल्यांकन में सावधानी बरतने की जरूरत होती है। तालिका 1 में केंद्र द्वारा वित्तपोषित मुख्य योजनाओं के लिए आबंटन प्रस्तुत किया गया है जिनमें से कुछ में सामाजिक संरक्षण के पहलू शामिल हैं, जैसे रोजगार गारंटी, माताओं और बच्चों के पोषण को आगे बढ़ाने के लिए खास आहार-आधारित योजनाएं, विधवाओं के लिए पेंशन और नकद सहायता तथा गर्भवती तथा शिशुवती माताओं के लिए नकद अंतरण, और बीमा जैसे स्वास्थ्य संबंधी हस्तक्षेप। तालिका 1 में 2019-20 के आबंटनों को 2017-18 के वास्तविक व्ययों, 2018-19 के बजट आबंटनों और जहां प्रासंगिक है वहां 2018-19 के लिए बाद में हुए संशोधनों के विपरीत प्रस्तुत किया गया है। 

तालिका 1. 2017-18 के वास्तविक व्यय, 2018-19 के बजट आबंटन, और 2018-19 के संशोधित आबंटन के विपरीत 2019-20 के बजट आबंटन

कार्यक्रम

बजट 2019-20 (करोड़ रु.)

2017-18 के वास्तविक व्यय से प्रतिशत परिवर्तन

2018-19 के संशोधित अनुमान से प्रतिशत परिवर्तन

2018-19 के बजट अनुमान से प्रतिशत परिवर्तन

1.

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम

60,000

8.8

-1.8

9.1

2.

राष्ट्रीय विद्यालय मध्याह्न भोजन कार्यक्रम

11,000

21.0

10.6

4.8

3.

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (IGNOAPS)

6,259

2.4

4.8

-4.7

4.

राष्ट्रीय पारिवारिक लाभ योजना

673

26.8

-0.4

-12.9

5.

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पेंशन योजना (IGNWPS)

1,939

6.7

-1.5

-14.1

6.

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय निःशक्त पेंशन योजना (IGNDPS)

247

11.8

-4.6

-10.7

7.

आंगनवाड़ी सेवाएं (भूतपूर्व कोर ICDS)

19,834

30.9

10.9

21.4

8.

प्रधान मंत्री मातृत्व वंदना योजना (PMMVY)

2,500

22.1

108.3

4.2

9.

किशोरियों के लिए योजना

300

-33.4

20.0

-40.0

10.

राष्ट्रीय शिशुशाला योजना

50

2.5

66.7

-61.1

11.

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (ग्रामीण और शहरी)

32,995

4.7

7.5

9.5

12.

राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना (RSBY)

156

-65.8

-48.0

-92.2

13.

आयुष्मान भारत – प्रधान मंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY)

6,400

लागू नहीं

166.7

लागू नहीं

अधिकांश सामाजिक संरक्षण कार्यक्रमों के लिए बजट आबंटन में पिछले साल से बहुत कम वृद्धि हुई है। अनेक मामलों में तो वृद्धि मुद्रास्फीति की दर की भरपाई करने भर ही है। हालांकि वास्तव में सभी मामलों में व्यापक और विश्वसनीय सामाजिक संरक्षण हासिल करने के लिए जितना जरूरी है, उससे वे काफी पीछे रह गए हैं। वे अनेक कार्यक्रमों में मौजूद गंभीर कमियों को दूर करने के अवसर से भी वंचित होते दिख रहे हैं। जैसे, बुजुर्गों और विधवाओं के लिए पेंशन महज 200 रु. प्रति माह है और यह रकम 2006 से अपरिवर्तित है। समेकित बाल विकास सेवा (आइसीडीएस) के लिए आबंटन मुश्किल से आंगनवाड़ी3 सेविकाओं और सहायिकाओं के बढ़े वेतन को पूरा करने के लिए ही पर्याप्त है जिसकी घोषणा 2018 में की गई थी। इसके कारण आंगनवाड़ी की बुनियादी अधिसंरचना और सेवाओं के लिए जरूरी महत्वपूर्ण सुधारों के लिए कुछ भी नहीं बचता है। गर्भवती और शिशुवती महिलाओं को महत्वपूर्ण सहायता उपलब्ध कराने वाली प्रधान मंत्री मातृत्व वंदना योजना4 के लिए 2,500 करोड़ रु. का आबंटन किया गया है जो गत वर्ष के बजट अनुमान से लगभग 4 प्रतिशत अधिक है। इस योजना के तहत ट्रांसफर 5,000 रु. प्रति माता ही रह गया है जबकि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में 6,000 रु. अनिवार्य है। और वह ट्रांसफर भी पहले बच्चे के जन्म तक ही सीमित है और उसको पाने के लिए ढेर सारी शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं। हाल में हुए बदलाव एक महत्वपूर्ण घटक के प्रति सहायता में कमी को ही व्यक्त करते हैं और दर्शाते हैं कि इनके लिए न तो कवरेज बढ़ा है न प्रति व्यक्ति आबंटन। यह तथ्य कि 2018-19 के संशोधित अनुमान से इसमें 108 प्रतिशत की वृद्धि की गई है, महज यह दर्शाता है कि कार्यक्रम में कोई खिंचाव नहीं आ पाया है। मनरेगा के लिए आबंटन 2018-19 के संशोधित अनुमान के 61,084 करोड़ रु. से कम है। यह ऐसी स्थिति में है जब हाल में मनरेगा के लिए मांग उसके रूटीन आबंटन से अधिक हो गई है। आलोचकों ने स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए अपर्याप्त आबंटन पर पहले ही ध्यान दिलाया है जो लोक स्वास्थ्य व्यय को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.5 प्रतिशत तक पहुंचाने की स्वास्थ्य नीति संबंधी वचनबद्धता से काफी कम है। इसके अतिरिक्त, जिन योजनाओं के लिए आबंटन में सबसे अधिक वृद्धि की गई है, जैसे कि प्रधान मंत्री जन आरोग्य योजनाके लिए, तो उसे गरीबों की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए प्राइवेट प्रोवाइडर्स को क्षतिपूर्ति देने के लिहाज से तैयार किया गया है। 

स्वाभाविक है कि यह सामाजिक संरक्षण का व्यापक विचार नहीं है और ऐसी अनेक पहलकदमियां हैं जिनके लिए कुल मिलाकर काफी आबंटन किया गया है।6 हालांकि यह बात इस तथ्य से हमारा ध्यान नहीं मोड़ पाती है कि व्यापक सामाजिक संरक्षण की बात आने पर बजट सौम्य उपेक्षा का स्पष्ट संकेत दर्शाता है। दिलचस्प बात यह है कि बजट भाषण में “सामाजिक कल्याण” वाक्यांश का उपयोग सिर्फ स्वैच्छिक संगठनों को पूंजी बाजारों से फंड प्राप्त करने में सक्षम बनाने के संदर्भ में (पैरा 34 में) किया गया है। बजट के आंकड़ों से यह प्रभाव पैदा होता है कि सरकार समाज कल्याण की अनेक योजनाओं के साथ सही रास्ते पर चल रही है, लेकिन भारत में सामाजिक संरक्षण के ढांचे को वह धीरे धीरे कमज़ोर कर रही हो सकती है।   

नोट्स: 

  1. मनरेगा में राज्य-स्तरीय वैधानिक न्यूनतम मजदूरी पर अकुशल शारीरिक श्रम का काम करने के लिए इच्छुक वयस्क सदस्यों वाले ग्रामीण परिवारों के लिए साल में 100 दिनों की दिहाड़ी मजदूरी की गारंटी की जाती है।
  2. यहां केंद्र द्वारा वित्तपोषित योजनाओं में केंद्र प्रायोजित योजनाओं (सेंट्रली स्पॉन्सर्ड स्कीम्स) का उल्लेख किया गया है जिनमें कोर स्कीम्स और कोर ऑफ द कोर स्कीम्स शामिल हैं।
  3. आंगनवाड़ी भारत सरकार द्वारा समेकित बाल विकास सेवा (ICDS) कार्यक्रम के अंग के रूप में 1975 में शुरू किए गए बच्चों की देखरेख के केंद्र हैं जिसका मकसद बच्चों के भूख और कुपोषण से लड़ना है। आंगनवाड़ी का अर्थ ‘आंगन आधारित आश्रय’ होता है।
  4. प्रधान मंत्री मातृ वंदना योजना केंद्र सरकार द्वारा 2011 में देश के 52 जिलों में पायलट के बतौर शुरू किया गया मातृत्व सहायता कार्यक्रम है। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भवती और शिशुवती महिलाओं को आय संबंधी सहायता देने के जरिए माताओं ओर बच्चों के स्वास्थ्य (MCH) में काफी सुधार लाने की संभावना है।
  5. प्रधान मंत्री जन आरोग्य योजना 2018 में शुरू की गई आयुष्मान भारत योजना (राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण मिशन) के दो घटकों में से एक है। इस योजना का लक्ष्य गरीबों और असुरक्षित समूहों पर आपदा के कारण अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में होने वाले वित्तीय बोझ में कमी लाना है।
  6. इनमें से कुछ के नाम प्रधान मंत्री श्रमयोगी मानधन, प्रधान मंत्री कर्मयोगी मानधन, असंगठित श्रमिक भीम योजना के बतौर लिए जा सकते हैं।
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