सामाजिक पहचान

दक्षिण भारत के ग्रामीण इलाकों में नीतिगत झटकों से निपटना: विश्‍वसनीयता के निर्धारक तत्व के रूप में सामाजिक नेटवर्क

  • Blog Post Date 06 नवंबर, 2019
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Christophe Jalil Nordman

French Research Institute for Sustainable Development

nordman@dial.prd.fr

सामाजिक नेटवर्क में विश्‍वसनीयता एवं भागीदारी एक दूसरे से अंतरनिहित रूप से परस्‍पर संबंधित हैं। यह आलेख दक्षिण भारत के ग्रामीण इलाकों में विश्‍वसनीयता के निर्धारक तत्वों को चिह्नित करता है, जहां विश्‍वसनीयता एवं साख पर आधारित लेनदेन के माध्यम से झटकों का सामना करने का तंत्र सुस्‍थापित है, तथा 2016 के नोटबंदी से मिले झटके के परिणाम स्वरूप यह और भी मजबूत हो गया है यह दर्शाता है कि सामाजिक वार्तालाप विश्‍वसनीयता को सुदृढ़ कर सकते हैं, हालांकि यह झटकों के परिणाम स्वरूप पनपने वाले वार्तालाप के प्रकार पर निर्भर है

विकासशील देशों में कई लेन-देन – वैयक्तिक साख प्राप्त करने से लेकर कार्यस्थल की चर्चाओं और व्यावसायिक लेन-देनों तक - औपचारिक संस्थानों की बजाय वैयक्तिक, अनौपचारिक संबंधों (तथाकथित ‘सामाजिक पूंजी’) को तेजी से शामिल कर रहे हैं। लेन-देन के संपादन के औपचारिक माध्‍यमों की गैर-मौजूदगी के चलते सामाजिक नेटवर्कों द्वारा सुगमित बाजारों की कार्यात्‍मकता का अनिवार्य तत्‍व है- विश्‍वसनीयता (फुकुयामा 1995, पुतनाम 2001)। फिर भी, अनौपचारिक वार्तालापों को सुविधाजनक बनाने में इसकी महत्‍ता के बावजूद, विश्‍वसनीयता के मूल को जानने की हमारी समझ सीमित है। फेहर (2009) इस बात का ध्यान देते हैं कि सामाजिक नेटवर्क जैसे अनौपचारिक संस्थान विश्‍वसनीयता को मजबूती प्रदान करने की क्षमता रखते हैं परंतु, चूंकि भरोसा एवं नेटवर्क अंतरनिहित रूप से परस्‍पर संबंधित हैं, एक अनौपचारिक संबंध को स्थापित करना कठिन कार्य है: अन्‍य लोगों के प्रति विश्‍वसनीयता के बारे में व्‍यक्ति की आस्‍था को प्रभावित करने वाले कारक अन्‍य लोगों के विश्‍वसनीयता के अनुभव हैं, जो बदले में अंतर्वैयक्तिक वार्ताओं एवं आस्‍थाओं को पोषित करते हैं।

सामाजिक वार्तालाप और विश्‍वसनीयता के बीच में एक अनौपचारिक संबंध को समझने की कोशिश में अर्थशास्‍त्र के शोध-पत्रों ने अप्रत्‍याशित झटकों (द्वंद्व, हिंसा) एवं अर्थनैतिक चालों के प्रयोग का आश्रय लिया (फेरोन एवं अन्य 2009, वूर्स एवं अन्य 2012, रोह्नर एवं अन्य 2013, गिल्‍लीगन एवं अन्य 2014)। चलिए हम सामान्‍य रूप से, भारत में की नीति (नवंबर, 2016) को बहिर्जात भिन्‍नता (हिल्‍गर एवं नॉर्डमैन 2019) के स्रोत के रूप में इस्‍तेमाल करते हुए एक गतिशील ग्रामीण व्‍यवस्‍था में विश्‍वसनीयता के निर्धारक तत्‍वों की पहचान करते हैं। मूलड्रयू (1998) ने पूर्व आधुनिक इंग्लैंड, जहॉं नकदी की कमी ने अनौपचारिक ऋण की वर्धित मांग और अनौपचारिक लेन-देन की बहुतायतता की स्थिति उत्‍पन्‍न कर दी थी, के मामले में नकदी वंचित अर्थव्‍यवस्‍था में विश्‍वसनीयता और सामाजिक नेटवर्क की भूमिका को पहचाना। विश्‍वसनीयता एवं साख पर आधारित लेन-देन के माध्यम से झटकों का सामना करने का एक समान तंत्र आज के ग्रामीण दक्षिण भारत में सुस्‍थापित हो चुका है और नोटबंदी से मिले झटके के परिणाम स्वरूप यह तंत्र और भी मजबूत हो गया है।

भारत में परिस्थिति एवं नोटबंदी

हमने अध्‍ययन के लिए आंकड़े तमिलनाडु से एकत्रित किए हैं। संपूर्ण भारत की तरह, तमिलनाडु ने पिछले दशक में न केवल एक प्रभावशाली आर्थिक प्रगति देखी है, साथ हीं यह भारत के अति विकसित, शहरीकृत और औद्योगिकृत राज्‍यों में से एक है – यहाँ ऐसे परिवर्तन हुए हैं जिसने इस क्षेत्र को और अधिक प्रगतिशील बना तो दिया है, परंतु ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच असमानता की एक गहरी खाई भी खोद दी। इस दोमुखी विकास ने श्रम बाजार और सामाजिक ढांचे में पुरानी संरचनाओं के साथ रिश्‍तों के नए रूपों को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया है: उच्‍चतर जाती जाती(अधिकांशत: जमींदारों) के शहरों में विस्थापित होने ने भूमि एवं श्रम की पुन:संरचना को प्रांरभ किया (गुरेन एवं अन्यएवं अन्य 2015), और पारंपरिक रूप से जमींदारों द्वारा दी जाने वाली सुरक्षा धीरे-धीरे श्रमिकों के संविदाकरण से बदल गई। पारंपरिक रूप से वर्चस्‍व प्राप्‍त जाती से मध्‍यम एवं निम्‍नतर जातियों को भूमि हस्तांतरण ने स्‍थानीय शक्ति संरचना को नया आकार दिया और इसलिए तदनुसार नेटवर्क संरचनाओं को भी दिया। जाती एवं लिंग के अनुसार व्‍यवसाय के सख्‍त वर्गीकरण एवं अनुक्रम पर आधारित कृषि संरचना का तीव्र रूप से विरोध कर पुन:विन्‍यास किया जा रहा है, जिसमें सामाजिक नेटवर्क बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

08 नवंबर, 2016 को शाम 08 बजे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने उच्‍चतम मूल्‍य के दो प्रचलित बैंकनोटों - रु. 500 और रु.1000 के बंदी की घोषणा की। आधी रात से ही इन दो नोटों को बैंक में नए नोटों से बदला जाना था, जिससे लगभग 86% की मुद्रा आपूर्ति प्रभावित हुई। इस नीति से यह आशा थी कि यह अर्थव्‍यवस्‍था को मजबूत करेगी, भ्रष्‍टाचार, अनैतिक अर्थव्‍यवस्‍था, काले धन, और आतंकवाद से लड़ने में योगदान देगी। परंतु, कार्यान्‍वयन की प्रक्रिया में कई तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ा जिसके परिणामस्वरूप नकदी की अत्‍यधिक कमी आ गई। चूँकि, अनुमानत: 98% भारतीय उपभोक्‍ता लेन-देन करने में नकद का इस्तेमाल करते हैं (पीडब्‍ल्‍यूसी, 2015); इस कदम ने रोजगार, दैनिक वित्‍तीय प्रक्रियाओं, और तीन माह से अधिक अवधि के लिए नेटवर्क के प्रयोग को काफी प्रभावित किया, क्‍योंकि लोग अपनी आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों को जारी रखने के लिए अपने नेटवर्क पर अधिक दृढ़ता से भरोसा करते थे। इसके अतिरिक्‍त, नए नोट असमान तरीके से बांटे गए। तमिलनाडु में प्रदत्‍त 44% नए नोट तीन निजी बैंकों को वितरित किए गए जिनकी 900 शाखाएं थीं, जबकि, 9000 शाखाओं वाले सार्वजनिक बैंकों, विशेषकर ग्रामीण इलाकों को बचा हुआ अंश प्राप्‍त हुआ। (घोष एवं अन्य 2017)

सर्वेक्षण और पद्धतियाँ

हमारा शोध ग्रामीण तमिलनाडु के ग्रामीण इलाकों से एक अनूठे आंकड़ा-संग्रहण पर आधारित है, जिसका शीर्षक है भारतीय सर्वेक्षण में नेटवर्क, रोजगार, ऋण, गतिशीलता और कौशल (एनईईएमएसआईएस) जो 2016-171 के दौरान तमिलनाडु के कडलूर, विल्‍लुपुरम, कांचीपुरम और तिरुपुर जिलों के 19 गांवों में दो समायावधियों (अगस्‍त से नवंबर, 2016 की शुरूआत तक और जनवरी से मार्च, 2017 तक) में आयोजित किया गया।

एनईईएमएसआईएस में व्‍यापक पारिवारिक और वैयक्तिक-स्‍तर के मॉड्यूल शामिल हैं जो घर के मुखिया और यादृच्छिक रूप से चुने गए घर के छोटे सदस्‍य (18 वर्ष से अधिक और 35 वर्ष से कम उम्र के ) द्वारा पूरा किया गया। नमूने के तौर पर वैयक्तिक सर्वेक्षण में 952 लोगों का सर्वेक्षण किया गया।

प्रत्‍येक गाँव में, हमारे नमूने में गाँव के ‘ऊर’2 नामक हिस्‍से (जहां अधिकांश उच्‍चतर और मध्‍यम जाती के लोग रहते हैं) के आधे लोगों को और कॉलोनी के हिस्‍से (जहां अधिकतर दलित3 रहते हैं) से आधे लोगों को शामिल किया गया। यह वैयक्तिक स्‍तर का सर्वेक्षण संज्ञानात्‍मक और गैर-संज्ञानात्‍मक कौशल निर्धारण के साथ-साथ श्रम बल सहभागिता, श्रम परिणाम, और सामाजिक नेटवर्क पर विस्‍तृत जानकारी उपलब्‍ध कराता है। सामाजिक नेटवर्क मॉड्यूल में ‘नाम-सृजक’ पद्धति4 का प्रयोग करते हुए औपचारिक वार्ता की सूचना, और अन्‍य (सामाजिक सरोकार) के साथ वास्‍तविक और संभाव्‍य अनौपचारिक वार्तालाप की विस्‍तृत जानकारी रहती है। औपचारिक वार्तालाप में सहयोजन की सदस्‍यता शामिल है; अनौपचारिक परस्‍पर वार्ता में व्‍यक्ति द्वारा बनाए जा सकने वाले सभी सामाजिक संबंध शामिल हैं। वास्‍तविक संबंधों का आशय व्‍यक्ति द्वारा भूतकाल में स्‍पष्‍ट रूप से बनाए गए रिश्‍तों से संबंधित है जैसे धन उधार दिया हो अथवा लिया हो। संभाव्‍य संबंधों में वे सभी संबंध शामिल होते हैं जिनका उपयोग व्‍यक्ति द्वारा आवश्‍यकता पड़ने पर किया जा सकता है। उदाहरण के लिए ऐसे प्रश्‍न कि नौकरी ढूँढने के लिए एक व्‍यक्ति सहायता हेतु किसकी मदद लेगा। सामाजिक नेटवर्क के पहले उपाय के तौर पर जो हम देखते हैं वह है, नेटवर्क का कुल आकार - जो हमारे द्वारा पाए गए (वास्‍विक और संभाव्‍य) योजकों का योग होता है। दूसरे उपाय के तौर पर जो हम देखते हैं वह है नेटवर्क सघनता, जो पूर्ण आकार की तुलना में नेटवर्क उपयोग से अधिक संबंधित है और संपूर्ण नेटवर्क आकार से वास्‍तविक योजकों के अनुपात के रूप में परिभाषित की जाती है।

हम विश्‍वसनीयता के तीन अलग-अलग उपायों का प्रयोग करते हैं जो अंतर्वैयक्तिक विश्‍वास से संबंधित हैं, अर्थात अन्‍य लोगों में विश्‍वास: 1. “मेरे आसपड़ोस के लोगों पर विश्‍वास किया जा सकता है” (आसपड़ोस में विश्‍वास); 2. “कर्मचारियों में कुटुंबीय सदस्‍य, गैर-कुटुंबीय सदस्‍यों से अधिक विश्‍वसनीय होते हैं” (कर्मचारियों में कुटुंबीय बनाम गैर-कुटुंबीय में विश्‍वास) और 3. “क्‍या आप सामान्‍य रूप से अन्‍य लोगों पर विश्‍वास करते हैं?” (सामान्‍यीकृत विश्‍वास)। इन भिन्‍न प्रकार के प्रश्‍नों को चुन कर पृथक रूप से प्रयोग किया गया क्‍योंकि वे सभी अन्‍य में विश्‍वास के विभिन्‍न पहलुओं को बयां करते हैं जो ग्रामीण दक्ष्रिणी भारत के प्रसंग में महत्‍वपूर्ण हैं, जहां ठेका और पारिवारिक श्रम पर निर्भरता व्यापक रूप से विद्यमान है। इसके अतिरिक्‍त, विश्‍वसनीयता के ये उपाय उच्‍च स्‍तरीय सामाजिक पृथकता (पड़ोस, परिजन) द्वारा संरचित विशिष्‍ट सांस्‍कृतिक प्रसंग और झटके के प्रसंग, दोनों से संबंधित है जिनका प्रयोग पहचान हेतु किया जाता है। वास्‍तव में, कोई व्‍यक्ति नोटबंदी से मिले सदमे को मुख्‍यत: स्‍थानीय वार्तालापों में तीव्रता के तौर पर ले सकता है, जो लोगों में सामान्‍यीकृत विश्‍वसनीयता संबंधी व्‍यापक प्रश्‍न द्वारा आंके जाने पर किसी प्रभाव को नहीं भी बयां कर सकता है।

विश्‍वसनीयता पर नेटवर्क के सामान्य प्रभाव का आकलन करने के उद्देश्‍य से हम नोटबंदी के झटके को बर्हिजात (बाह्य) भिन्‍नता के स्रोत के रूप में प्रयोग करते हैं जो सामाजिक नेटवर्क को प्रभावित करता है, लेकिन सीधे तौर पर अन्‍य लोगों में विश्‍वसनीयता को प्रभावित नहीं करता। नोटबंदी को बर्हिजात भिन्‍नता के स्रोत के रूप में प्रयोग करना संभव है क्‍योंकि हमारे लगभग दो-तिहाई नमूनों का साक्षात्‍कार (नवंबर 2016 के) पूर्व में किया गया और अन्‍य तीसरे हिस्‍से का साक्षात्‍कार नोटबंदी के लगभग दो महीने बाद किया गया। पारिवारिक आंकड़े संग्रहण का क्रमिक क्रम लगभग यादृच्छिक रूप में था जिसमें 19 गाँवों के निश्चित और व्‍यवस्थित संग्रहण की योजना नहीं थी। इस प्रकार से, जब हमने पहले उपनमूनों के लगभग दो-तिहाई हिस्‍से का साक्षात्‍कार किया, तो उन्‍होंने अचानक हुए नोटबंदी के झटके को अनुभव नहीं किया था, और अन्‍य तीसरे हिस्‍से ने इसके झटके को महसूस किया और स्थिति का सामना करने के लिए शायद अपने नेटवर्क का प्रयोग किया होगा।

पूर्व शोध, झटके के प्रभाव को बहुतायत तरीकों से कम करने में अनौपचारिक सामाजिक नेटवर्क की सफलता की ओर इशारा करते हैं (गुरेन एवं अन्य 2017) – हमारे अध्‍ययन क्षेत्र के समृद्ध व्‍यक्ति सामाजिक संबंधों और व्‍यवसायिक युक्ति जैसे समयपूर्व प्रदत्‍त (प्रीपेड़) अग्रिमों के माध्‍यम से अपने पुराने नोटों से छुटकारा पाने में समर्थ रहे जबकि गरीब निवासियों ने अनौपचारिक ऋण के लिए अपने नेटवर्क को विनियोजित किया – सभी संबंध विश्‍वसनीयता पर टिके रहे। अब भी, यह न्‍यूनीकरण तंत्र केवल उन लोगों पर लागू होता है जो सामाजिक नेटवर्क पर एकजुट हैं, और यह झटकों से जूझते हुए अपने अ-समान परिणामों को उजागर करता है, संभवत: संपर्क सहित और संपर्क रहित लोगों के बीच की दूरी को बढा रहा है ( फैफचैंप्‍स 2006, गुरेन एवं अन्य 2017)।

परिणाम एवं उपसंहार

कुल मिलाकर, हम पाते हैं कि नेटवर्क की सघनता अनौपचारिक रूप से पास-पड़ौस में स्‍थापित विश्‍वसनीयता के स्‍तरों को बढ़ाती है, और कर्मचारियों के बीच स्‍वजनों में स्‍थापित विश्‍वसनीयता को घटाती है, जबकि नेटवर्क का आकार पास-पड़ौस में विश्‍वसनीयता घटाता है और कर्मचारियों के समूह में स्‍थापित विश्‍वसनीयता को बढ़ाता है।

सभी जातियों एवं लिंगों में भिन्‍नता का विश्‍लेषण यह स्‍पष्‍ट करता है कि संपूर्ण नमूने के ये परिणाम महत्‍वपूर्ण भेदों को छुपाते हैं। मुख्‍यत:, हमारे परिणाम पुरुषों पर लागू होते हैं - क्‍योंकि मजबूत पक्ष दोनों भूमिकाएं निभाता है, जिस तरीके की बातचीत को शामिल किया जा रहा है उस तरीके से महिलाओं के बात करने की योग्‍यता को कम करता है, और इसका अभिप्राय यह भी हो सकता है कि महिलाओं के पास झटकों का सामना करने की भिन्‍न रणनीतियां हो सकती हैं (जैसे जमाखोरी) जो हमारे आंकड़ों में परिलक्षित नहीं होती।

इसके अतिरिक्‍त, जाती के आधार पर परिणाम भिन्‍न होते हैं। अलग-अलग जातियों ने नोटबंदी के झटके का प्रत्‍युत्‍तर भिन्‍न अधिग्रहण पद्धतियों के अनुसार दिया। निम्‍नतर जातियों ने अपने स्‍वयं के जाती के लोगों से उधारी को उच्‍चतर जातियों (सामान्‍यत: अपने नियोक्‍ताओं से) से भी उधारी में अंतरित किया। मध्‍यम जातियों ने अपने स्‍वयं के जातियों और उच्‍चतर जातियों से उधारी को लगभग विशिष्‍टत: अपने स्‍वयं के जातियों से ही उधारी में अंतरित किया (90% ऋण)।

अधिग्रहण पद्धतियों में ये परिवर्तन एवं वर्धित सामाजिक नेटवर्क वार्तालापों ने विश्‍वसनीयता के स्‍तर को प्रभावित किया। हालांकि हमने उच्‍चतर जातियों में विश्‍वसनीयता स्‍तरों पर सामाजिक नेटवर्क का कोई महत्‍वपूर्ण प्रभाव नहीं देखा, जिसकी तुलना में दलित और मध्‍यम जाती, झटके के परिणामस्‍वरूप उभरे वार्तालाप के स्‍तरों एवं प्रकारों की सार्थक भिन्‍नताओं को अब भी उजागर करते हैं। निम्‍नतर जाती ने अपने आस-पास के लोगों (सजातीय पास-पड़ौस में) से तथा अपने नियोक्‍ताओं से ऋण लेकर इसका सामना किया। दलितों में, जो अध्‍ययन के क्षेत्र में अधिकतर वेतनग्राही खेतीहर मजदूर के रूप में कार्यरत थे, हमने पाया कि वे अपने नेटवर्क का अधिक तीव्रता (वर्धित नेटवर्क सघनता) से इस्‍तेमाल पास-पड़ौस में ज्‍यादा विश्‍वास कायम करता है।

मध्‍यम जाती अधिक विषम माहौल में रहता है, फिर भी अपनी खुद की खेतीहर भूमि पर कार्य करता है, क्‍योंकि उच्‍चतर जाती के शहरी इलाकों में पलायन ने मध्‍यम जाती को भूमि के पुन: आबंटन हेतु सक्षम बनाया। इस जाती के लोगों ने अन्‍य जाती के सदस्‍यों अथवा ‘जाने-माने लोगों’ से ऋण लेकर स्थिति का सामना किया। बड़ी संख्‍या में संबंधों (नेटवर्क के आकार) ने गैर-पारिवारिक लोगों की तुलना में परिजनों में अधिक विश्‍वास बढ़ाया और पड़ोसियों में विश्‍वास कम किया। इस समूह के लिए, उच्‍चतर नेटवर्क सघनता, किसी के नेटवर्क को अधिक तीव्रता से इस्‍तेमाल करना अपने कर्मचारियों में स्‍थापित विश्‍वसनीयता को कम करता है। हमारी विवेचना यह है कि मध्‍यम जाती को स्थिति का सामना करने के लिए अपने नेटवर्क को बढ़ाना पड़ा, और तब वे कमजोर, अधिक संदिग्‍ध योजकों पर निर्भर हुए जिसके परिणामस्‍वरूप विश्‍वसनीयता में कमी आई।

अन्‍य लोगों पर विश्‍वसनीयता, सामाजिक पूंजी का एक अनिवार्य घटक, विकासशील देशों में विशेषकर महत्‍वपूर्ण है, जहाँ कई लेन-देन अनौपचारिक होते हैं और सामाजिक नेटवर्क के अंदर ही निष्‍पादित होते हैं। परंतु विश्‍वसनीयता के निर्धारक तत्‍वों को स्‍थापित करना कठिन है क्‍योंकि विश्‍वास ‘निष्‍कर्ष है और रिश्‍तों का पूर्वगामी तत्‍व है’ (नोटबूम 2007)। यह अध्‍ययन यह भी स्‍पष्‍ट करता है कि एक समान झटके का समाज में, झटके के परिणामस्‍वरूप पनपने वाले वार्तालाप के प्रकार को देखते हुए विश्‍वसनीयता के स्‍तरों पर भिन्‍न-भिन्‍न प्रभाव पड़ सकता है। मुख्‍यत:, यह दक्षिण भारत के ग्रामीण इलाकों में नेटवर्क में समप्रभाव (आंतरिक प्राथमिकताएँ) प्रदर्शित करता है, जहाँ सजातीय समूह (निम्‍नतर जातियों हेतु पास-पड़ौस, कुटुंब, तथा उच्‍चतर जाती हेतु जाती के अन्‍य सदस्‍य) में होने वाले वार्तालाप विश्‍वसनीयता कायम करते हैं, जबकि बाहरी वार्तालाप या सीमांत संबंधें इसे घटाती हैं। इसके अतिरिक्‍त, मजबूत गुंथे हुए सामाजिक समूहों की विशिष्‍टता वाले माहौल की जाँच करते वक्‍त हमारी प्राप्‍तियां, विश्‍वास के केवल व्‍यापक उपायों पर निर्भर न रहने की महत्‍ता को दर्शाती हैं, जैसे सामान्‍यीकृत विश्‍वास। सामान्‍यीकृत विश्‍वास के हमारे उपायों पर कोई परिणाम प्राप्‍त नहीं हुआ, परंतु जब हम ऐसे विश्‍वास के उपायों को शामिल करते हैं तो बाह्य-समूह की तुलना में अंत:समूह को अधिक स्‍पष्‍ट रूप से परिभाषित करता है (आस-पड़ौस एवं गैर पास-पड़ौस, कर्मचारियों के कुटुंब तथा गैर-कुटुंबीय कर्मचारी)। हमारा शोध इस बात के और भी साक्ष्‍य प्रस्तुत करता है कि आज के ग्रामीण भारत में सामाजिक और आर्थिक निष्‍कर्षों का एक महत्‍वपूर्ण निर्धारक तत्‍व जाती-सदस्‍यता है।

लेखक परिचय: क्रिस्टोफ जलील नोर्डमैन फ्रेंच रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट में सीनियर रिसर्च फेलो है जो कि इंस्टीट्यूट ऑफ लबौर इक्नोमिक्स से संबद्ध है। वर्तमान में उन्हें फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी (भारत), और मिश्रित अनुसंधान इकाई डीआईएएल (आईआरडी, यूनिवर्सिटी पेरिस-डूपाइन, फ्रांस) सौंपा गया है। ऐन हिलगर विश्व बैंक में सामाजिक संरक्षण और नौकरियां वैश्विक अभ्यास में एक अर्थशास्त्री और एक डीआईएएल संबद्ध शोधकर्ता हैं।

Notes:

  1. सर्वेक्षण का आयोजन संधारणीय विकास (आईआरडी) के लिए फ्रेंच पब्लिक इंस्‍टीट्यूट और इंस्‍टीट्यूट फ्रेंकेस डि पॉडीचेरी (आईएफपी) रिसर्चर्स के दल द्वारा किया गया जिसमें इस शोध के लेखक शामिल थे (नार्डमैन एवं अन्य 2017 देखें)। अधिक जानकारी https://neemsis.hypotheses.org पर प्राप्‍त की जा सकती है।
  2. ग्रामीण दक्षिणी भारत में गॉंव मुख्‍यत: वर्ण के आधार पर बंटे हुए हैं ; मध्‍यम और उच्‍चतर वर्ण, गाँवों के जिन हिस्‍सों में रहते हैं उसे ‘ऊर’ कहते हें जबकि निम्‍नतर वर्ण जो दलित हैं, कालोनी में निवास करते हैं। ये हिस्‍से कभी कभार प्रत्‍यक्ष रूप से अलग होते हैं। उदाहरण के लिए कई गॉंवों के सर्वेक्षण में, ऊर क्रॉस कंट्री रोड के एक हिस्‍से में स्थित होता है जबकि कॉलोनी दूसरे हिस्‍से में वर्ण प्रतिनिधित्‍व, स्‍थानीय शब्‍दों का प्रयोग करते हुए व्‍यक्तियों के वर्णों में स्‍वत: वर्गीकरण पर आधारित है जो बाद में दलित, मध्‍यम वर्ण और उच्‍चतर वर्ण में वर्गीकृत हुए।
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