सामाजिक पहचान

किसकी शिक्षा मायने रखती है? भारत में अंतर्जातीय विवाहों का एक विश्लेषण

  • Blog Post Date 20 फ़रवरी, 2019
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Arka Roy Chaudhuri

Indian Statistical Insitute, Delhi Centre

arka1985.dgp@gmail.com

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Tridip Ray

Indian Statistical Insitute, Delhi Centre

tridip@isid.ac.in

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Komal Sahai

Indian Statistical Insitute, Delhi Centre

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वर्ष 2011 में भारत में अंतर्जातीय विवाहों की दर 5.82 प्रतिशत के निम्न स्तर पर थी और पिछले चार दशकों के दौरान इसमें कोई वृद्धि का रुझान नहीं दिखा है। इस आलेख में भारत में अंतर्जातीय विवाहों और शिक्षा के बीच संबंध की जांच की गई है। इसमें पाया गया कि अंतर्जातीय विवाह होने की संभावना पर पति-पत्नी की शिक्षा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसके बजाय पति की मां की शिक्षा इसमें भूमिका निभाती है। इसमें भारत में विवाह के बाजारों के किसी विश्लेषण में ‘अरेंज्ड’ मैरेज (माता-पिता द्वारा तय विवाह) की संस्था को मान्यता देने के महत्व को प्रमुखता से सामने लाया गया है।

 

सगोत्र विवाह जाति के लिए वह है जो भारतीय समाज के लिए जाति है। जातिगत सगोत्र विवाह (कास्ट एंडोगेमी) – अपनी जाति की सीमा के अंदर ही विवाह – के प्रचलन का जाति संस्था में केंद्रीय स्थान ही नहीं है; यह जाति आधारित सबसे लोचदार प्रचलनों में से एक भी है। यहां तक कि 2011 में भी अंतर्जातीय विवाह की दर महज 5.82 प्रतिशत थी और पिछले चार दशकों के दौरान इसमें कोई वृद्धि का रुझान नहीं दिख रहा है1। हाल के रिसर्च (रे एवं अन्य 2017) में हमने भारत में जाति में सगोत्र विवाह और शिक्षा के बीच संबंध का अध्ययन किया है। 

इस विषय से संबंधित जो भी साहित्य मौजूद हैं उनमें से अधिकांश साहित्य विकसित देशों के सदंर्भ पर आधारित हैं। उनमें एथनिक एंडोगेमी और शिक्षा के बीच संबंध पर मिले-जुले परिणाम दिखते हैं (क़ियान 1997, फ्रायर 2007, क़ियान एंड लिश्टर 2001, ह्वांग एवं अन्य 1995, गलिकसन 2006)। भारत में राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कोई अध्ययन नहीं किया गया है जिसका मुख्य कारण सम्बंधित आंकड़ों की कमी है। दो मुद्दों के कारण यह काम और भी कठिन हो जाता है। एक तो जाति की परिभाषा बहुत ढीलीढाली और अस्पष्ट है। इसके कारण किसी के द्वारा ‘अंतर्जातीय’ विवाह की किसी परिभाषा के उपयोग को लेकर विश्वसनीयता का गंभीर संकट खड़ा हो जाता है क्योंकि जाति की संबद्धता और जाति संबंधी दूरियां अक्सर अस्पष्ट होती हैं। दूसरा, भारत में विवाह संबंधी बाजार पश्चिमी देशों की तुलना में बहुत अलग ढंग से काम करते हैं (बनर्जी एवं अन्य 2013)। भारत में अधिकांश विवाहों की व्यवस्था माता-पिता द्वारा की जाती है, और इसीलिए विवाह के पार्टनर्स की शिक्षा उनके मैच की जाति संबंधी प्रकृति को कितना प्रभावित करती है यह अनिर्णित प्रश्न है। 

आंकड़े

हमने 2011-12 में किए गए आइएचडीएस-2 (भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण) के सबसे हाल के आंकड़ों का उपयोग किया है। आइएचडीएस राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधि पारिवारिक पैनल सर्वे है जिसमें पूरे परिवार के लिए, परिवार के छोटे बच्चों के लिए, और हर परिवार में ‘पात्र महिला’2 कही जाने वाली 15 से 49 वर्ष उम्र वाली किसी एक विवाहित महिला के लिए विस्तृत सामाजिक-आर्थिक और मानव विकास से संबंधित प्रश्न होते हैं। 

हमने ऊपर वर्णित पहली चिंता को आइएचडीएस के निम्नलिखित प्रश्न का उपयोग करके दूर किया है : ‘‘क्या आपके पति का परिवार उसी जाति का है जिस जाति का आपका जन्म का परिवार है?” अतः अंतर्जातीय विवाह को खुद परिभाषित करने के बजाय हमने उसे माना है जो उत्तरदाता अपने विवाह के बारे में मानता है क्योंकि वह बात उसकी जीवंत वास्तविकता के ज्यादा करीब होगी3। दूसरे स्थान पर, भारत में विवाह के बाजार की प्रकृति पर विचार करने के लिए हमने दंपति की शिक्षा पर ही नहीं, दोनो के माता-पिता की शिक्षा पर भी विचार किया है।  

प्रसंग सेट करना

चित्र 1 में विवाह के वर्ष के आधार पर अंतर्जातीय विवाहों की दर दर्शाई गई है। यह दर 1970 से 2012 तक 5 प्रतिशत के आसपास रही है और इसमें वृद्धि का कोई स्पष्ट रुझान नहीं दिखता है। तालिका 1 में पति के परिवार की विभिन्न विशेषताओं के आधार पर अंतर्जातीय विवाहों की दर दर्शाई गई है। सांख्यिकीय रूप से एकमात्र महत्वपूर्ण अंतर अन्य अगड़ी जातियों (ओएफसी) और अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) तथा अन्य अगड़ी जातियों और अनुसूचित जातियों (एससी) के बीच हुए अंतर्जातीय विवाहों की दरों के बीच अंतर है4। तालिका का दूसरा पैनल दर्शाता है कि आम समझ के विपरीत, शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में हुए अंतर्जातीय विवाहों की दरों में सांख्यिकीय रूप से कोई अंतर नहीं है। 

अगले दो पैनल में क्रम से – परिवारों के ऐसेट और वार्षिक प्रति व्यक्ति आय – के आधार पर अंतर्जातीय विवाहों की दर दर्शाई गई है। इन दोनो पैमानों में ऐसेट के वितरण के लिहाज से हम जैसे-जैसे सबसे गरीब से सबसे संपन्न चतुर्थांश की ओर बढ़ते हैं, दर में गिरावट आती जाती है। 

चित्र 1. अंतर्जातीय विवाहों की दर के रुझान 1970-2012

टिप्पणी: चित्र में विवाह के वर्ष में अंतर्जातीय विवाहों के वार्षिक प्रतिशत दर्शाए गए हैं।

आंकड़ों का स्रोत: आइएचडीएस-2

 

तालिका 1. परिवार की विशेषताओं के आधार पर अंतर्जातीय विवाहों की दर

आंकड़ों का स्रोत : आइएचडीएस-2

 

विवाह के समय निर्णय लेना

भारतीय विवाह बाजार में अरेंज्ड मैरेज का ढांचा हमारे डेटासेट में स्पष्ट दिखता है। 

तालिका 2 के पहले पैनल में दिखता है कि सभी विवाहों में से 73 प्रतिशत महिलाएं कहती हैं कि उनके माता-पिता (या अन्य रिश्तेदार) ने उनके पति का चुनाव किया था और उनमें से लगभग 70 प्रतिशत की अपने पति से अपने विवाह/ गौना5 के दिन ही मुलाकात हुई थी। यहां तक कि सिर्फ अंतर्जातीय विवाहों के सेट के अंदर भी लगभग 63 प्रतिशत की व्यवस्था माता-पिता या अन्य रिश्तेदारों द्वारा ही की गई थी। यह ऑब्जर्वेशन भी गौरतलब है कि सभी अंतर्जातीय विवाहों में से 98.07 प्रतिशत में विवाह के तत्काल बाद दंपति अपने माता-पिता के साथ ही रहे थे (तालिका 2 का अंतिम पैनल)। ये ऑब्जर्वेशन इस विचार को काफी समर्थन देते हैं कि भारत में विवाहों के किसी विश्लेषण में व्यक्तियों की विशेषताओं के साथ-साथ उनके माता-पिता की विशेषताओं का प्रभाव भी प्रासंगिक होगा। 

तालिका 2. विवाह के समय निर्णय लेना

आंकड़ों का स्रोत : आइएचडीएस-2

अंतर्जातीय विवाह और शिक्षा

हमारा पहला परिणाम यह है कि खुद व्यक्यिों (पति या पत्नी) के शिक्षा के स्तर का उनके विवाह के अंतर्जातीय होने की संभावना के साथ कोई संबंध नहीं होता है। यह परिणाम विकसित देशों में विवाह बाजार पर केंद्रित मौजूद साहित्य के विपरीत है जिनमें मुख्य रूप से अपनी शिक्षा को अंतर-समूह विवाह पर प्रभाव डालता पाया गया है। 

इसके बाद हमने जांच की कि अपनी शिक्षा की सांख्यिकीय महत्वहीनता साहित्य में खोजे गए विशिष्ट मैकेनिज्म से प्रेरित है या नहीं। फुर्तादो (2012) ने ऐसे दो चैनल बताए हैं जिनके जरिए शिक्षा विजातीय र्विवाह (एक्सोगेमी) की संभावना को प्रभावित कर सकती है जो संभावित विपरीत दिशाओं में काम कर सकते हैं। अगर शिक्षा विभिन्न एथनिक समूहों के सदस्यों को एक-दूसरे की संस्कृति के प्रति अनुकूलनशील (एडैप्टेबल) बनाती है, तो ‘‘सांस्कृतिक अनुकूलनशीलता’’ का प्रभाव अंतर्विवाह की घटना बढ़ा सकता है। वहीं, ‘‘एसॉर्टेटिव मैचिंग’’ के प्रभाव का प्रासंगिक आबादी के औसत शैक्षिक स्तर से अधिक शैक्षिक स्तर वाले किसी समूह के अंतर्विवाहों पर नकारात्मक असर हो सकता है। हमने जांच की है कि व्यक्तियों की अपनी शिक्षा की सांख्यिकीय महत्वहीनता एक-दूसरे को खारिज करने वाले इन प्रभावों से प्रेरित हैं या नहीं। हमारे परिणाम इन विभिन्न चैनलों पर विचार के लिहाज से सशक्त हैं।   

हमने यह भी जांच की कि अपनी शिक्षा की सांख्यिकीय महत्वहीनता ‘स्टेटस एक्सचेंज’ के सिद्धांत (गलिकसन 2006, रोजनफेल्ड 2005, कैलमिन 1998, फ्यू एंड हीटन 2008) के पक्ष में साक्ष्य प्रस्तुत करती है या नहीं। किसी भी अंतर्जातीय विवाह में उच्च जाति का व्यक्ति आम तौर पर अपनी जाति संबंधी स्थिति को निम्न जाति के पत्नी/ पति की शिक्षा के उच्च स्तर से बदल देने में सक्षम होगा – जाति के अंदर विवाह की स्थिति में पत्नी/ पति की शिक्षा का जो स्तर होता उसकी तुलना में। विभिन्न जातियों के लिए शिक्षा और आपसी विवाह के बीच संबंध की दिशा में यह विविधता, शिक्षा और अंतर्जातीय विवाहों के बीच शून्य संबंध का कारण बन सकती है। हमने इस आशंका को ध्यान में रखकर भी जांच की, और उस लिहाज से भी हमारे परिणाम हमारे मूल निष्कर्ष की ही पुष्टि करते हैं। 

माता-पिता की भूमिका?

भारत में अरेंज्ड मैरेज के प्रचलन को ध्यान में रखते हुए हमने अपने व्याख्या करने वाले परिवर्तनशील कारकों (एक्सप्लेनेटरी वैरिएबल्स) के सेट में पति-पत्नी दोनो के माता-पिता के शैक्षिक स्तर को जोड़ा। इसमें हमें पता चला कि पति की मां की शिक्षा का सकारात्मक और सांख्यिकी के लिहाज से महत्वपूर्ण प्रभाव होता है। पति की मां की शिक्षा के वर्षों में 10 वर्ष की वृद्धि के कारण अंतर्जातीय विवाह की संभावना में 1.86 प्रतिशत-अंकों की वृद्धि हो जाती है, जो सेंपल के औसत के लगभग 36 प्रतिशत के बराबर है। 

विचार-विमर्श और निष्कर्ष

माता-पिता की भूमिका पर हमारे शोध परिणामों के दूसरे भाग में दो तरीके की बारीकियां हैं। एक तो यह कि सिर्फ पति की मां की शिक्षा से अंतर्जातीय विवाह का अनुमान लगाया जा सकता है, उसके पिता की शिक्षा से नहीं। दूसरे, पत्नी के माता-पिता की शिक्षा का अंतर्जातीय विवाह की संभावना से कोई जुड़ाव नहीं है। हमने पहले पक्ष को इस तरह से समझने की कोशिश की है। अधिकाधिक साहित्य में इस बात के साक्ष्य मिलते हैं कि अधिक शिक्षित महिला की परिवार में मोलतोल (बार्गेनिंग) करने और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ जाती है (जैसे कि बीगल एवं अन्य 2001, डॉस 2013, टॉमस 1994)। यह भी अच्छी तरह डॉक्यूमेंटेड है, खास कर विकासशील देशों के संदर्भ में, कि पिता की अपेक्षा मां अपने बच्चे की जरूरतों के प्रति अधिक रिस्पांसिव होती है (डफ्लो 2000, डफ्लो एंड यूद्राइ 2004, फ्राइडबर्ग एंड वेब 2006)। क्योंकि हम हो चुके विवाहों को देख रहे हैं, ये विवाह उपलब्ध सभी संभावित मैचों में से सबसे अधिक अनुकूल मैच रहे होंगे। उसके बाद अगर सामाजिक रीति-रिवाजों से प्रेरित और बेटे के लिए सर्वोत्तम परिणाम के प्रति कम संवेदनशील पिता जाति के अंदर विवाह संबंधी व्यवधान पर जोर देता है, तो जाति के अंदर मैच बाधित या सीमित (कंस्ट्रेन्ड) ऑप्टिमम ही हो सकता है। अंतर्जातीय विवाह होने की अधिक संभावना तब है जब परिवार में मोलतोल और निर्णय लेने के अधिकार की बढ़ी क्षमता से शक्तिसंपन्न शिक्षित मां इस व्यवधान से पार पाकर बेटे के लिए सर्वोत्तम परिणाम पा सकती है।   

दूसरे पहलू की एक सरल व्याख्या यह हो सकती है कि भारत में होने वाली शादियों में वर के परिवार की मोलतोल की क्षमता अधिक होती है। एक अन्य संभावित व्यख्या यह हो सकती है कि शिक्षा का वधू के परिवार के लिए होने वाले अंतर्जातीय विवाह के कलंक पर पर्याप्त शमन करने वाला प्रभाव नहीं हो सकता है जिन्हें इस मामले में अपेक्षाकृत अधिक कीमत चुकानी पड़ती है।   

निष्कर्ष रूप में, हमारे विश्लेषण में भारतीय विवाह बाजार के किसी विश्लेषण में अरेंज्ड मैरेज की संस्था को स्वीकार करने के महत्व को प्रमुखता से सामने लाया गया है। संयुक्त रूप से हमारे परिणाम के ये दोनो पक्ष संकेत देते हैं कि अरेंज्ड मैरेज के सेट-अप को स्वीकार कर लेने के बाद कोई इस बात को समझ सकता है कि अपने विवाह के मामले में अपनी शिक्षा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसके बजाय उसके माता-पिता की शिक्षा कहीं अधिक मायने रखती है। 

लेखक परिचय: त्रिदिप रे इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिट्यूट (आईऐसआई) दिल्ली सेंटर के इकनॉमिक्स और प्लानिंग यूनिट में प्रॉफेसर हैं। अर्का रॉय चौधुरी आईऐसआई में विजिटिंग असिस्टेंट प्रॉफेसर हैं। कोमल सहाय आईऐसआई में रिसर्च स्कॉलर हैं।

 नोट्स 

  1. यह आइएचडीएस-2 (भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण) के आंकड़ों का उपयोग करके लेखकों द्वारा की गई गणना पर आधारित है।
  2. इसमें वैसी महिलाओं को शामिल किया गया है जो अभी विवाहित हों या विधवा हो गई हों।
  3. द हिंदू में 13 नवंबर 2014 को प्रकाशित सोनाल्दे देसाई का साक्षात्कार देखें।
  4. यहां ये संक्षिप्त शब्द भारत में जाति की प्रशासनिक श्रेणियों के लिए प्रयोग किये गए हैं।
  5. गौना भारत में बाल विवाह की प्रथा से जुड़ा हुआ है। गौना का आयोजन विवाह के कई वर्षों के बाद किया जाता है। गौना के पहले दुल्हन अपने मायके में रहती है। दांपत्य जीवन की शुरुआत गौना के बाद ही होती है।
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