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क्या ग्रामीण भारत में सड़कों से वोट मिलते हैं?

  • Blog Post Date 29 मई, 2019
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भारत में 2001 में जिन गांवों में पक्की सड़क नहीं थी, ऐसे दो-तिहाई से भी अधिक गांवों को एक बड़े पैमाने के ग्रामीण सड़क कार्यक्रम के तहत सड़कें उपलब्ध कराई गई हैं। क्या कनेक्टिविटी और कल्याण में इन सुधारों के लिए नागरिक चुनावों में सत्ताधारी सरकारों को पुरस्कृत करते हैं? चुनावों और सड़कों के प्रावधान के 2000 से 2017 तक के आंकड़ों का उपयोग करके इस लेख में बताया गया है कि नीति के प्रावधान के बारे में अच्छी जानकारी होने के बाद भी नागरिक नीति के आधार पर मतदान नहीं करते हैं। 

 

विगत 20 वर्षों में भारत की नीतियों का रूपांतरण हुआ है। देश ने शिक्षाधिकार अधिनियम (निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम), प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना, और उज्ज्वला योजना जैसी योजनाओं की शुरुआत देखी है जो ग्रामीण गरीबों की बुनियादी सेवाओं में सुधार पर पूरी तरह केंद्रित रही हैं। लेकिन क्या भारत के ग्रामीण मतदाताओं ने चुनावों में इन नीतियों के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त की है? इस प्रश्न का सकारात्मक उत्तर भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए ही नहीं, इसके लिए भी आशाजनक है कि पूरी दुनिया में लोकतंत्र को कैसे देखा जाता है। आश्चर्य की बात है कि इस पर तो काफी रिसर्च हुए हैं जिनमें प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं कि भारतीय नागरिक सजातीय या अनुयायी होने के आधार पर मतदान करते हैं (जैसे, देखें चंद्रा 2004), लेकिन जो इसका उल्टा प्रश्न है उसकी अनुभवजन्य जांच नहीं की गई है, अर्थात वो आनुभविक प्रश्न कि भारतीय संदर्भ में नागरिक नीतिगत प्रावधानों के लिए मतदान करेंगे या नहीं। मैंने यह दर्शाते हुए इस कमी को दूर करने पर काम किया है कि भारतीय नागरिक नीति के आधार पर मतदान नहीं करते हैं और नीति के प्रावधानों की अच्छी जानकारी उपलब्ध होने पर भी वे वैसा नहीं करते हैं।   

भारत में चुनावी प्रभावों का निरीक्षण करने के लिए सड़कों का प्रावधान सबसे अधिक संभावित मामला है

ग्रामीण सड़कों का अध्ययन सैद्धांतिक आधार पर इस बात की जांच के लिए उपयुक्त है कि नागरिक नीति के लिए मतदान करेंगे या नहीं। इसलिए कि ढेर सारे शोध के साहित्य बताते हैं कि सड़कें नीति के आधार पर मतदान का सबसे उपयुक्त मामला हैं जिसका अर्थ हुआ कि अन्य विकासमूलक नीतियों के लिए भी इसका सामान्यीकरण करने की काफी अधिक संभावना है। अर्थात, अगर हम सड़कों के लिए जवाबदेही नहीं देखते हैं, तो इसकी भी संभावना नहीं है कि हम अन्य नीतियों के प्रति जवाबदेही देखें।1

प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना की सड़कें भारत के पूरे उत्तर-औपनिवेशिक इतिहास में ग्रामीण सड़कों के मामले में सबसे अधिक दिखने वाली बदलाव हैं जिनकी तुलना रेलवे के प्रावधान से ही की जा सकती है। इनका निर्माण जिस पैमाने पर हुआ है उसे नजरअंदाज करना असंभव है। औसत भारतीय गांव का व्यास 2.1 किमी होता है, और इस कार्यक्रम के जरिए बनी सड़कों की औसत लंबाई 4.4 किमी रही है। नीचे दी गयी आकृति 1 में ग्रामीण सड़कों के मामले में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के पहले और बाद में हुए बदलावों को दर्शाया गया है। साथ ही, इस बात के करणीय साक्ष्य मौजूद हैं कि इस योजना की सड़कों से गरीब आर्थिक रूप से ही नहीं लाभान्वित होते हैं, स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि के मामले में सरकारी सेवाओं से भी लाभान्वित होते हैं।योजना की सड़कें उत्तरदायित्व में सुधार लाने वाले पहलुओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। 

आकृति 1. पूर्व में संपर्करहित क्षेत्रों में प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना की सड़कें (पहले - ऊपर में, बाद में - नीचे) 

बहिर्जात सड़क प्रावधान

सड़कें ऐसी नीति होती हैं जो उत्तरदायित्व को दिखाने का एक मज़बूत पक्ष प्रस्तुत करती हैं। वहीं उनके ये फीचर उन्हें राजनीतिक रूप से लक्षित किए जा सकने लायक आकर्षक चुनावी संसाधन और अध्ययन के लिए चुनौतीपूर्ण भी बनाते हैं। सौभाग्यवश, इस स्थायी आनुभविक चुनौती से निपटने के लिए प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना बहिर्जातता (बाहरी अंतर) का विरल स्रोत उपलब्ध कराती है। इस तथ्य के बावजूद कि राजनीतिक प्रभाव इस कार्यक्रम में हर कहीं मौजूद है, पूर्व-निर्धारित और मनमानी जनसंख्या आधारित सीमाएं सड़कों के प्रावधान पर कम से कम आंशिक रूप से तो असर डालती ही हैं। मैंने सड़कों के प्रावधान के प्रभाव को अलग करने के लिए एक इंस्ट्रूमेंट तैयार किया है जो आबंटन में राजनीतिक लक्ष्यीकरण के लिए बहिर्जात है, और प्रशासनिक स्तर पर, जहां सड़क की योजनाएं बनती हैं, सत्ताधारियों के मतों के हिस्से में बदलाव को फोकस करने पर बेहतर अनुमान उपलब्ध कराता है। 

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में सूचनापरक उपकरणों का बेमिसाल उपयोग

नीतिगत प्रावधान में इस बहिर्जातता के अलावा, कार्यक्रम में पारदर्शिता और नागरिकों के लिए सूचना में ऐसा सुधार हुआ जैसा पूरी दुनिया में ऐसे किसी मामले में पहले कभी नहीं किया गया था। आकृति 2 में देखा जा सकता है कि कार्यक्रम में हर सड़क के मामले में सत्यापन किया जाता है कि उस पर विशेष लोगो (प्रतीक चिन्ह) वाला बोर्ड, साइनेज और सूचना-पट लगाए गए हैं या नहीं। राष्ट्रीय ग्रामीण पथ विकास अभिकरण (NRRDA) से संग्रहित किए गए गुणवत्ता संबंधी आंतरिक आंकड़ों का विश्लेषण दर्शाता है कि सभी सड़कों में से लगभग 90 प्रतिशत पर उच्च गुणवत्ता वाला लोगो और/या सूचना-पट लगा होने की पुष्टि की गई है। 

आकृति 2. भारत के राज्यों में लगे प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की सड़कों के साइनेज

2 क. हरियाणा में लगा लोगो बोर्ड

2 ख. उड़ीसा में लगा पूरा साइन बोर्ड

2 ग. झारखंड में लगा व्यापक साइन बोर्ड

स्रोत: (क) और (ख) के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना वेबसाइट, और () के लिए वर्ल्ड बैंक डेवलपमेंट ब्लॉग 

इसके अलावा, सड़कों के प्रावधान और स्थानीय राजनेताओं के बीच प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करने के लिए कोई भी कसर नहीं बाकी रखी गई है। गांवों में राजनीतिक आयोजनों को आधिकारिक रूप से प्रायोजित किया गया जिनमें राजनेताओं ने आरंभ में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की सड़क का शिलान्यास किया और बन जाने पर उसका उद्घाटन किया। एक सिटिजन मॉनीटरिंग रिपोर्ट में पाया गया कि बड़ी संख्या में नागरिक सूचना-पटों को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के बारे में जानकारी पाने के प्रधान स्रोत के रूप में देखते हैं और वे योजना की सड़कों को अलग से ही पहचान सकते हैं। पॉलिटिकल अफेयर्स सेंटर द्वारा 2011 में संकलित एक सिटिजन मॉनीटरिंग रिपोर्ट के अनुसार, लोग इन सड़कों से होने वाले लाभों के अनुभव, ऊंची जागरूकता, और दैनिक उपयोग की भी जानकारी देते हैं (पॉलिटिकल अफेयर्स सेंटर, 2011)। 

आकृति 3. प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की सड़क के निर्माण के लिए शिलान्यास करते राजनेता

स्रोत: डेली एक्सेल्सियर, 23 फरवरी 2017. 

 

आंकड़े

सड़कों के प्रावधान की चुनावी प्रतिक्रिया की जांच करते हुए, मैंने भारत में 2001 से 2017 के बीच पहली बार बनवाए गए लगभग 1,80,000 बारहमासी सड़कों पर सड़क स्तर के समृद्ध आंकड़े एकत्र किए। मैंने भारत की 2001 और 2011 की जनगणना से मिले 6,00,000 गांवों के आकड़ों के साथ सड़क स्तर के इन आंकड़ों की जियो-कोडिंग (एक स्थान के अनुरूप भौगोलिक निर्देशांक) के लिए ‘फ़जी नेम मैचिंग’ का उपयोग किया। उसके बाद मैंने इन आंकड़ों को 14 भारतीय राज्यों में 1998 से 2017 के बीच हुए चुनावों के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर के निर्वाचन क्षेत्रों के साथ स्थानीय आधार पर जोड़ा।[3] इस डेटासेट में भारत की कुल आबादी का 90 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा, 11,000 चुनावी प्रतिस्पर्धाएं, और सड़क संबंधी कार्यक्रम की लगभग पूरी अवधि कवर हो जाती है। निर्वाचन क्षेत्र आधारित विश्लेषण का एक लाभ यह है कि ऑब्जर्वेशंस की पूलिंग करके मैंने सड़कों की दृश्यता (विजिबिलिटी) के सकारात्मक स्पिलओवर (बाहरी) प्रभावों का हिसाब किया। चूंकि ये सड़कें गांवों को बाजारों से जोड़ती हैं इसलिए नागरिकों का अपने गांव के बाहर की सड़कों के साथ सकारात्मक रूप से प्रभावित होना संभावित है। 

नीचे दाईं ओर दी गई आकृति समय के साथ पूरे भारत में सड़क संपर्क में हुआ भारी बदलाव दर्शाती है। वहीं, बाईं ओर दी गई आकृति राज्य विधान सभा चुनावों में राज्यस्तरीय सत्ताधारियों को प्राप्त मतों के हिस्से में हुए बदलाव को दर्शाती है। दोनो ही नक्शे परिसीमन-पूर्व की अवधि के लिए हैं। दोनो नक्शों में सहसंबंध की कमी स्पष्ट है।   

आकृति 4. परिसीमन-पूर्व की अवधि में राज्यस्तरीय सत्ताधारी दल को प्राप्त मतों के हिस्से और सड़क संपर्क में हुआ परिवर्तन 

टिप्पणी: दायां पैनल परिसीमन पूर्व की अवधि (1999-2008) में राज्यस्तरीय चुनाव में सत्ताधारी दल के मतों के हिस्से में हुए बदलाव को दर्शाता है जिसे किसी खास निर्वाचन क्षेत्र के लिए लगातार दो चुनावों में सत्ताधारी दल के मतों के हिस्से में प्रतिशत अंतर के रूप में मापा गया है। बायां पैनल उन्हीं चुनावों की अवधि में सड़क संपर्क में हुए बदलाव को दर्शाया गया है जिसे निर्वाचन क्षेत्र में सड़क से जुड़े गांवों के प्रतिशत के रूप में मापा गया है। 

 

फिर भी वैकल्पिक संभावना यह है कि नागरिक सिर्फ अपने बिल्कुल नजदीकी क्षेत्रों में हुई सड़कों की व्यवस्था को ध्यान में रखते हैं। इसके अलावा, नागरिकों के लिए आसपास के व्यापक क्षेत्र में सड़कों के उपलब्ध हो जाने के कारण सड़कों से वंचित रह गए लोग अगर सत्ताधारी दल को दंडित करते हैं, तो उसके चलते जिन स्थानीय क्षेत्रों में नागरिकों के लिए सड़कों की कमी है, वहां सड़कों के प्रावधान का नकारात्मक स्पिलओवर प्रभाव होगा और दोनो के संयुक्त प्रभाव से ये माइक्रो-डायनामिक्स संतुलन में आ सकते हैं। इन चिंताओं के निराकरण के लिए मैंने ‘ट्रीटमेंट’ (सड़कों का प्रावधान) के स्तर पर, अर्थात बूथ-गांव के स्तर पर उत्तरदायित्व की जांच की। मैंने ऐसा देश के सबसे खराब सड़क संपर्क वाले और सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में किया। औसतन 980 मतदाता वाले 1,00,000 से अधिक बूथों के लिए इन जियो-कोडेड सड़कों के डेटासेट को मोटे तौर पर बूथ स्तर के जियो-कोडेड चुनावी डेटासेट के साथ जोड़कर मैंने राजनेताओं के निर्वाचन क्षेत्र में बिल्कुल बूथ स्तर पर मतों के हिस्से में बदलाव पर सड़कों के प्रावधान के प्रभाव का अनुमान किया। नीचे दी गई आकृति 5 में उत्तर प्रदेश में ग्राम स्तर पर सड़कों के प्रावधान की तुलना में बूथ स्तर पर समाजवादी पार्टी के मतों के हिस्से में बदलाव दर्शाया गया है। दोनो नक्शों में सहसंबंध का अभाव है जबकि बाएं नक्शे में इस तथ्य को प्रस्तुत किया गया है कि चुनाव में सत्ताधारी होने का सशक्त नुकसान बूथ स्तर तक चला जाता है। 

आकृति 5. उत्तर प्रदेश में ग्राम स्तर पर सड़कों के प्रावधान की तुलना में बूथ स्तर पर समाजवादी पार्टी के मतों के हिस्से में बदलाव 

टिप्पणी : दाएं पैनल में 2012 से 2017 के बीच समाजवादी पार्टी के मतों के हिस्से में हुआ बूथ स्तर पर बदलाव दर्शाया गया है। हल्के बिंदुओं का अर्थ है कि समाजवादी पार्टी ने 2012 की तुलना में 2017 में मतों का हिस्सा गंवा दिया जबकि गहरे बिंदु मतों में वृद्धि का प्रतिनिधित्व करते हैं। बाएं पैनल में 2000 से 2017 के बीच प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की परियोजना पाने वाले गांवों को काला दर्शाया गया है। 

 

शोध परिणाम

सड़कों का प्रावधान उत्तरदायित्व के लिए बाध्यकारी पक्ष पेश करने के बावजूद, मेरे रिसर्च में पता चलता है कि कि सभी जगहों, विश्लेषण के स्तरों और समय के साथ सड़कों के प्रावधान से सत्ताधारियों के लिए चुनावी सहयोग नहीं बढ़ता है, और शून्य प्रभाव स्पष्टतः अनुमानित है। भारत ने नागरिकों ने न तो राज्य के, न 2014 राष्ट्रीय चुनावों में सड़कों के प्रावधान के लिए मतदान किया और न ही इस कार्यक्रम की घोषणा करने वाली राजनीतिक पार्टी – भारतीय जनता पार्टी को चुनावी रूप से इससे फायदा हुआ। उत्तर प्रदेश में अत्यंत विकेंद्रित स्तर पर बूथ स्तर के परिणाम भी निर्वाचन क्षेत्र आधारित निष्कर्षों की ही पुष्टि करते हैं। 

ये परिणाम उन अर्ध/प्राकृतिक प्रायोगिक अध्ययनों के विपरीत हैं जिनमें विवादपूर्ण और अधिकारवादी संदर्भों में भी अधिसंरचना के प्रावधान का काफी प्रभाव दर्शाया गया है (बर्मन, शापिरो और फेल्टर 2011, वायटलेंडर एवं वोथ 2014)। उनमें विकासशील देशों से प्राप्त ऑब्जर्वेशन आधारित प्रमाण (हार्डिंग 2015), और अन्य विकासशील संदर्भों में सार्वजनिक नीतियों के लिए सत्ताधारियों को सहयोग मिलने के प्रमाण पाए गए हैं (लैबोन्न 2013, पोप-ईलीचेज एवं पोप-ईलीचेज 2012)। 

कार्यक्रम के क्रियान्वयन की गुणवत्ता में अंतर के आंकड़ों और भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय विविधता का उपयोग करके मैं इस बात को खारिज कर सकती हूं कि सत्ताधारियों के सहयोग पर सड़कों के प्रावधान के असर का असफल हो जाने का कारण यह नहीं है कि नागरिक भ्रष्टाचार संबंधी चिंता से प्रेरित होते हैं या सड़कों के प्रावधान को श्रेय देने में असमर्थ होते हैं। मैंने पाया कि नागरिक सड़कों की गुणवत्ता में अंतर को लेकर प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करते हैं: न तो वे अच्छी गुणवत्ता वाली सड़कों के ईनाम देते हैं, न खराब गुणवत्ता के लिए दंडित करते हैं। इस संभावना को भी कोई समर्थन नहीं मिलता है कि सांसदों और विधायकों, दोनों की उपस्थिति श्रेय संबंधी त्रुटियों का कारण बनती है। 

भारतीय राजनीति के बारे में इसका क्या कहना है?

लोकतंत्र और विकास के अध्येताओं के लिए भारत का मामला मौलिक है। जहां अध्येता इस बात को लेकर बंटे हुए हैं कि भारतीय नागरिक अपना मतदान करते हैं या मत अपनी जाति को देते हैं, वहीं इस बात के प्रति भी विश्वास बढ़ रहा है कि भारतीय नागरिकों ने अच्छे प्रदर्शन को पुरस्कृत करना शुरू कर दिया है। इस रिसर्च ने पिछले 20 वर्षों का सशक्त प्रमाण उपलब्ध कराकर इस बहस में योगदान किया है कि भारतीय नागरिक नीतिगत प्रावधान के आधार पर मतदान नहीं करते हैं। 

भारत में सत्ताधारी होने के नुकसान को अक्सर शासन करने की कीमत कहा जाता है। इसका व्यापक दस्तावेजीकरण हुआ है लेकिन इसको लेकर भी सीमित समझ ही है। नीतिगत प्रदर्शन के आधार पर मतदान करने के मामले में नागरिकों की कमी यह बताती है कि भारत के संदर्भ में सत्ताधारी होने का लाभ क्यों नहीं मिलता है। सत्ताधारी इस लिहाज से विपक्षियों की तुलना में लाभ की स्थिति में रहते हैं कि वे अपनी सक्षमता का संकेत देने के लिए अपनी नीतियों का अधिक कुशलता से उपयोग कर सकते हैं, जबकि विपक्षी ऐसा नहीं कर सकते हैं। हालांकि नागरिक अगर प्रदर्शन पर विचार नहीं करते हैं, तो सत्ताधारी होने का यह तुलनात्मक लाभ नहीं मिलता है। 

निहितार्थ

अन्य बहस-मुबाहिसों के बीच लोकतांत्रिक शासन के लिए इन शोध परिणामों के महत्वपूर्ण निहितार्थ हैं। अनेक अफ्रीकी देशों में अधिसंरचना संबंधी प्रावधान बढ़ने के साथ लोकतांत्रिक शासन के अध्येताओं को इन शोध परिणामों से चिंतित होना चाहिए। उत्तरदायित्व के मेकैनिज्म के जरिए पैदा होने वाले चुनावी प्रोत्साहन विकासशील लोकतांत्रिक देशों में सेवा की उपलब्धता में सुधार के लिए मुख्य साधन के बतौर मौजूद हैं (वर्ल्ड बैंक, 2003)। लेकिन मतदाता अगर नीतिगत प्रावधान के प्रति प्रतिक्रिया नहीं दर्शाएं, तो लोक हित के प्रावधान या सेवा प्रदान में सुधार के लिए चुनावी प्रोत्साहन समय के साथ कम हो सकते हैं जिसके चलते ये महत्वपूर्ण कार्यक्रम या तो त्याग दिए जाएंगे या इनका खराब तरीके से क्रियान्वयन होगा।

लेखक परिचय: तनुश्री गोयल ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय के नफ़ील्ड कॉलेज में पीएचडी कैंडिडेट हैं।

 नोट्स:

  1. मौजूद साहित्य बताते हैं कि मतदाता उन परिणामों के लिए उत्तरदायित्व को लागू करते हैं जो : समृद्धि बढ़ाते हैं, सक्षमता का संकेत देते हैं, जिसके लिए राजनेता श्रेय का दावा करते हैं, और जो दिखाई देने वाले होते हैं। प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना की सड़कें इन पहलुओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। चुनावी उत्तरदायित्व की समीक्षा के लिए देखें हीली एवं मल्होत्रा (2013), और सड़कों में ये चुनावी गुण क्यों हैं, इस पर विशेष चर्चा के लिए देखें हार्डिंग (2015)।
  2. अग्गरवाल (2018ए) ने पाया कि जिन क्षेत्रों में प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत सड़कें बनवाई गईं, वहां के परिवारों ने कम कीमत होने, और बाहरी सामानों की उपलब्धता, कृषि प्रौद्योगिकियों का उपयोग, और छोटे बच्चों का स्कूलों में नामांकन बढ़ने की सूचना दी। एशर और नोवोसाद (2018) ने अधिक पारंपरिक अनुमान किए और पाया कि सड़कें श्रमिकों को सिर्फ गैर-कृषि कार्य पाने की गुंजाइश देती हैं। संभवतः सबसे महत्वपूर्ण लाभ शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार के मामले में हुआ है, लेकिन अदुकिया, एशर और नोवोसाद (2019) ने पाया कि जिन क्षेत्रों में इस योजना के तहत सड़कें बनी हैं, वहां बच्चे स्कूलों में अधिक समय तक रहते हैं और मानकीकृत परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। सड़कों से महिलाओं के आने-जाने और स्वास्थ्य देखरेख की उपलब्धता में भी सुधार हुआ है (अग्गरवाल 2018बी)।
  3. भारत में 2008 में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण हुआ जिसके कारण दोनो स्तरों पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं में भारी बदलाव आ गया। इसके कारण डेटासेट में ब्रेक हुआ और मैंने राज्य और राष्ट्रीय, दोनो स्तरों पर परिसीमन के पहले और बाद के लिए अलग-अलग डेटासेट बनाए। 

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