मानव विकास

जनभाषा? मातृभाषा में पढ़ाई शिक्षा को कैसे प्रभावित करती है

  • Blog Post Date 12 जून, 2019
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Tarun Jain

Indian Institute of Management Ahmedabad

tarunj@iima.ac.in

2016 में जारी किए किए गए राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रारूप में मातृभाषा में शिक्षा, खास कर स्कूल के रचनात्मक वर्षों के दौरान मातृभाषा में शिक्षा के महत्व पर जोर दिया गया था। इस कॉलम में दक्षिणी भारत की बड़े पैमाने की ऐतिहासिक घटनाओं के डेटा का उपयोग करके स्कूलों में मातृभाषा के उपयोग और शैक्षिक उपलब्धि के बीच लिंक को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। इसमें पाया गया कि मातृभाषा में शिक्षा के कारण प्राथमिक और माध्यमिक स्तर की स्कूली शिक्षा के दौरान शैक्षिक उपलब्धियों में लगातार वृद्धि हुई।   

 

2016 में जारी किए गए राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रारूप में मातृभाषा में शिक्षा, खास कर स्कूल के रचनात्मक वर्षों के दौरान मातृभाषा में शिक्षा के महत्व पर जोर दिया गया था। कई भाषाएं सीखने की बच्चों की जन्मजात क्षमता को स्वीकार करते हुए प्रारूप में सुझाव दिया गया कि, ‘‘सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अगर चाहें, तो मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाकर स्कूलों में कक्षा 5 तक शिक्षा प्रदान कर सकते हैं।’’

स्कूलों में किस भाषा में शिक्षा दी जाय, यह सवाल नया नहीं है। वर्ष 1938 में लिखते हुए जाकिर हुसैन कमिटी ने देशज (वर्नाकुलर) शिक्षा का पक्ष लिया था, जो 1964 में प्रख्यात शिक्षाशास्त्री डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता वाली समिति और 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति द्वारा भी प्रतिध्वनित हुआ। इसके बावजूद बच्चों की मातृभाषा और शिक्षा की भाषा के बीच मिसमैच दूर नहीं किया जा सका और कोठारी ने पाया कि, ‘‘भारत को छोड़कर दुनिया के किसी भी देश में शिक्षा की भाषा और विद्यार्थी की भाषा में यह संबंध विच्छेद नहीं देखा जाता है।’’

समाचारों में मातृभाषा से भिन्न भाषाओं में शिक्षित प्रवासी बच्चों की सफलता का गुणगान किया जाता है। अगर कम उम्र में ही बच्चे नई भाषाओं के प्रति अनुकूलित हो जाते हैं, तो मातृभाषा का प्रभाव उतना महत्वपूर्ण नहीं हो सकता है, और नीतिनिर्माता महज कुछ राष्ट्रीय भाषाओं में ही पढ़ाकर दक्षता बढ़ा सकते हैं।

क्या मातृभाषा में शिक्षा शैक्षिक उपलब्धि के लिए बहुत महत्वपूर्ण है?

दक्षिण भारत में बड़े पैमाने की ऐतिहासिक घटनाओं के आंकड़ों का उपयोग करके प्राप्त किए गए नए प्रमाण स्कूलों में देशज भाषा के उपयोग और शैक्षिक उपलब्धि के बीच इस लिंक को स्पष्ट करते हैं (जैन 2016)।

औपनिवेशिक दौर के प्रांतों का निर्माण भाषा का ज़्यादा ध्यान रखे बिना किया गया था। दक्षिण भारत में अधिकांश प्रांतीय सीमाएं ब्रिटिश सेना की जीत के परिणामस्वरूप तय की गई थीं जिसमें कंपनी शासन का विस्तार समुद्रतट से अंदर के हिस्सों तक होने के कारण कई प्रांतों को मिलाकर एक कर दिया गया था जबकि कुछ हिस्से स्थानीय शासकों के अंतर्गत ही रह गए थे।  

19वीं सदी के मध्य तक भारत में अधिकतर मानकीकरण का सहारा लिए बिना देशज प्रणाली के आधार पर शिक्षा दी जाती थी, और शिक्षा मुख्यतः सामाजिक और आर्थिक रूप से संभ्रांत लोगों तक ही सीमित थी। बाद में, जब ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों ने अपने जीते हुए क्षेत्रों के प्रशासन पर ध्यान देना शुरू किया, तो उनलोगों ने लिपिकीय पदों के लिए संभावित कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने और पश्चिमी पंरपराओं तथा औपनिवेशिक शासन की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिहाज से औपचारिक शिक्षा शुरू की। वर्ष 1954 के वुड्स डिस्पैच के परिणामस्वरूप अधिकांश प्रांतों में शिक्षा की भाषा के रूप में प्रभावी देशज भाषा का उपयोग किया जाता था। जैसे, मद्रास प्रांत के तेलुगूभाषी जिलों को छोड़कर जो अभी वर्तमान आंध्र प्रदेश राज्य में हैं, अधिकांश जिलों में शिक्षा की भाषा के बतौर तमिल का उपयोग किया जाता था।

फलतः, अधिक संख्या बल वाली मातृभाषा और प्रांत की राजभाषा कुछ जिलों में समान थीं (मेल खाने वाले अर्थात मैच्ड जिले) जबकि अन्य जिलों में समान नहीं थी (बेमेल अर्थात मिसमैच्ड जिले)। जैसे, हैदराबाद रियासत में 1950 के दशक तक शिक्षा की भाषा अधिकांशतः फारसी/ऊर्दू थी, जो निज़ाम के राज में बहुत सारे निवासियों की मातृभाषा नहीं थी। वर्ष 1886 में लिखते हुए हैदराबाद के शिक्षा विभाग के मोतमान जंग ने उल्लेख किया कि, ‘जहां तक जन शिक्षा की बात है, तो जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए स्कूल इस अनुपात में होने चाहिए : तेलुगू 4, मराठी 3, कन्नड़ 1, और फारसी 1। हालांकि तथ्य इससे भिन्न स्थिति दर्शाते हैं, अर्थात फारसी 4, मराठी 2, तेलुगू 1, और कन्नड़ 0’।  

आकृति 1. दक्षिण भारत के प्रांतों में मातृभाषा बनाम राजभाषा: मैच्ड और मिसमैच्ड जिले                

मेल खाने वाले जिलों की बेमेल जिलों से तुलना करना दीर्घकालिक शैक्षिक परिणामों पर स्कूलों में शिक्षा के माध्यम के बतौर मातृभाषा के उपयोग के प्रभावों पर स्वाभाविक ऐतिहासिक प्रयोग करने जैसा है। भारत की जनगणना के जिला-स्तरीय आंकड़े दर्शाते हैं कि मातृभाषा में शिक्षा के कारण शैक्षिक उपलब्धियों में लगातार वृद्धि हुई जो आजादी के बाद भी 1980 के दशक तक जारी रही। 

सबसे अधिक प्रभाव प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पर पड़ा जो अधिकांशतः मातृभाषा में दी जाती थी। खास कर उन जिलों में, जहां विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा दी जाती थी, साक्षरता दर बेमेल जिलों से 18 प्रतिशत अधिक थी। माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के मामले में तो यह दर 25.2 प्रतिशत अधिक थी। विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा में अंतर बहुत कम था जो आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि औपनिवेशिक दौर में माध्यमिक के बाद की अधिकांश शिक्षा अंग्रेजी में दी जाती थी।   

वर्ष 1956 में फजल अली आयोग की अनुशंसाओं के बाद, सरकार ने दक्षिण भारत में राज्यों की सीमाओं को सख्त भाषाई आधार पर पुनर्गठित किया। पुनर्गठन के बाद सभी राज्यों में लागू किया गया मुख्य नीतिगत परिवर्तन स्कूलों में शिक्षा के माध्यम के बतौर राजभाषा का उपयोग करना था। इसका अर्थ हुआ कि उसके बाद अधिक संख्या में विद्यार्थियों को मातृभाषा में शिक्षा दी जानी शुरू की गई। क्या पूर्व में बेमेल रहे जिलों ने बाद की शैक्षिक उपलब्धियों में ‘कैच-अप’ कर लिया? 

जनगणना के जिला-स्तरीय आंकड़े दर्शाते हैं कि पुनर्गठन का साक्षरता, मिडिल-स्कूल की शिक्षा पूरी करने और मैट्रिक पास करने की दरों पर बड़ा और महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। उस समय तक बेमेल रहे जिलों में मेल खाने वाले जिलों से अधिक वृद्धि दरें दिखीं और बेमेल जिले उनके समकक्ष पहुंच गए। खास कर साक्षरता के मामले में वृद्धि दर 37 प्रतिशत, मिडिल स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के मामले में 56 प्रतिशत, मैट्रिकुलेशन के मामले में 60 प्रतिशत और कॉलेज से स्नातक होने के मामले में 51 प्रतिशत अधिक थी। इस प्रकार, औपनिवेशिक दौर के प्रांत – जहां भाषाई अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक, दोनो तरह के क्षेत्र थे – दीर्घकालिक शैक्षिक परिणामों में अंतर से पीड़ित थे, राज्यों के पुनर्गठन से ये फासले मिट गए लगते हैं।   

शिक्षा नीति के लिए निहितार्थ

वर्ष 1968 में पेश पहली शिक्षा नीति में त्रिभाषी फार्मूला3 प्रस्तावित किया गया था। शिक्षा का चेहरा उस समय से काफी बदल गया है। हाल के वर्षों में ग्रामीण भारत में भी अंग्रेजी में शिक्षा की मांग बढ़ती दिखी है। इसलिए आश्चर्य की बात नहीं है कि नई शिक्षा नीति पर 2016 में प्रस्तुत टी.एस.आर. कमिटी की रिपोर्ट में सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी पढ़ाने का प्रस्ताव किया गया था। साथ ही, स्कूल के पाठ्यक्रम में संस्कृत और अनेक विदेशी भाषाएं पढ़ाने का भी सुझाव दिया गया था। इस विचार को यूरोप में काफी स्वीकृति प्राप्त है जहां स्कूल जाने वाले 60.8 प्रतिशत विद्यार्थी अपनी देशज भाषा के अलावा दो या अधिक विदेशी भाषाएं सीखते हैं। मनोविज्ञान में हुए शोध अध्ययनों में पाया गया है कि बहुभाषी विद्यार्थियों में काफी बेहतर कॉग्नीटिव (संज्ञानात्मक) और नॉन-कॉग्नीटिव स्किल होते हैं जो स्कूल सिस्टम में इनपुट और क्वालिटी के मामले में लगातार कमी का सामना करने के दौरान काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। चूंकि भारत में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में प्रवास बढ़ रहा है इसलिए अनेक भाषाएं सिखाना प्रवासी विद्यार्थियों को अपनी मातृभाषा से जुड़ी पहचान बरकरार रखते हुए अपने नए घरों में एकीकृत करने का बेहतर जरिया हो सकता है। 

जैसा कि 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी गौर किया गया था कि, ‘‘भारतीय भाषाओं और साहित्य का सशक्त विकास शैक्षिक और सांस्कृतिक विकास की अनिवार्य शर्त है। जब तक ऐसा नहीं होता है, तब तक लोगों की रचनात्मक ऊर्जा मुक्त नहीं होगी, शिक्षा के स्टैंडर्ड में सुधार नहीं होगा, लोगों के बीच ज्ञान का प्रसार नहीं होगा, और बुद्धिजीवी तथा आम आदमी के बीच का फासला अगर बढ़ेगा नहीं तो घटेगा भी नहीं।’’

लेखक परिचय: तरुण जैन इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट अहमदाबाद में अर्थशास्त्र के एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। रेवती सूर्य नारायण कॉर्नेल विश्वविद्यालय के नीति विश्लेषण और प्रबंधन विभाग में स्नातक छात्र हैं। 

नोट्स:

  1. भारत के बोर्ड ऑफ कंट्रोल के प्रेसिडेंट सर चार्ल्स वुड ने 1954 में हाउस ऑफ कॉमन्स को एक व्यापक योजना प्रस्तुत की थी जो लॉर्ड डलहौजी को संबोधित थी। योजना अंग्रेजी और देशज भाषा के जरिए ज्ञान के प्रसार के बारे में थी जिसे ‘‘वुड्स डिस्पैच’’ के नाम से जाना जाता है। उसमें अन्य चीजों के अलावा सभी जिलों में एंग्लो-वर्नाकुलर स्कूलों की स्थापना, महत्वपूर्ण शहरों में सरकारी कॉलेजों, और भारत की तीन प्रेसीडेंसी में प्रत्येक में एक विश्वविद्यालय स्थापित करने की अनुशंसा की गई थी।
  2. निज़ाम हैदराबाद के वंशानुगत शासक का शीर्षक था
  3. त्रिभाषी फार्मूला में हिंदीभाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और एक आधुनिक भारतीय भाषा (कोई दक्षिण भारतीय भाषा हो तो बेहतर) और गैर-हिंदीभाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषा के अध्ययन की अनुशंसा की गई थी। 
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