समष्टि अर्थशास्त्र

कोविड-19 और एमएसएमई क्षेत्र: समस्या 'पहचान' की

  • Blog Post Date 05 मई, 2020
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Radhika Pandey

National Institute of Public Finance and Policy

radhika.pandey@nipfp.org.in

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Amrita Pillai

National Insitute of Public Finance and Policy

amrita.pillai@nipfp.org.in

हाल ही में 5,000 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि उनमें से 71 प्रतिशत उद्यम मार्च 2020 में भारत में कोविड-19 लॉकडाउन के कारण अपने कर्मचारियों के वेतन का भुगतान नहीं कर पाए। सरकार ने एमएसएमई पर केंद्रित एक प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की है जो शीघ्र आने वाला है। इस पोस्ट में, राधिका पांडे और अमृता पिल्लई ने एमएसएमई की एक व्यापक डेटासेट की अनुपलब्‍धता के कारण लाभार्थियों की पहचान के मुद्दे और लक्षित राहत वितरण के लिए उपयोग करने हेतु संभावित तंत्र का वर्णन किया है।

 

भारत में कोविड-19 लॉकडाउन के कारण सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) संभवतया सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं। वर्तमान में यह क्षेत्र 11.4 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करता है और इसका भारत के जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) में 30 प्रतिशत का योगदान है, इसके साथ यह बात भी महत्‍वपूर्ण है कि देश के निर्यात का आधा भाग इस क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले उत्पादों तथा सेवाओं का है। आपूर्ति-श्रृंखला में गंभीर व्यवधानों के साथ, खासकर उन व्यवसायों में जो आवश्यक सेवाओं का निर्माण या उन्‍हें प्रदान नहीं करते हैं, सरकार के निर्देशों के अनुसार लॉकडाउन के दौरान कर्मचारियों को (किसी भी कटौती के बिना) को वेतन प्रदान किए जाने की क्षमता धूमिल प्रतीत होती है। अखिल भारतीय विनिर्माता संगठन (एआईएमओ) द्वारा किए गए 5,000 एमएसएमई के हालिया सर्वेक्षण में पाया गया है कि उनमें से 71 प्रतिशत उद्यम मार्च के महीने में अपने कर्मचारियों के वेतन का भुगतान नहीं कर पाए। देश भर की रिपोर्टों से ऐसे हीं खतरे का आभास होता है कि किस प्रकार ये व्यवसाय तत्काल पूंजी आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ हैं।

सरकार ने घोषणा की है कि एमएसएमई क्षेत्र पर केंद्रित एक प्रोत्साहन पैकेज शीघ्र आने वाला है। हालांकि यह महत्वपूर्ण है कि ऐसे पैकेज न केवल अल्पकालिक तरलता के माध्यम से अस्थायी राहत प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करता है, बल्कि उनके संभलने के सामर्थ्‍य की परीक्षा लेने वाले मध्यम और दीर्घकालिक मुद्दों का हल करने के लिए भी आगे बढ़ता है। इस क्षेत्र की मदद करने के लिए, वर्तमान योजनाओं में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा घोषित व्यापार निरंतरता के उपाय, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) द्वारा शुरू की गई आपातकालीन क्रेडिट लाइनें, भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (एसआईडीबीआई या सिडबी) द्वारा विशेष रूप से एमएसएमई के लिए वस्‍तुओं की आपूर्ति या कोविड-19 से संबंधित सेवाएं प्रदान करने के लिए घोषित रियायती ब्याज दर पर ऋण, और अन्य उपाय जैसे जीएसटी (वस्‍तु एवं सेवा कर) का भुगतान जून 2020 तक विलंबित करना शामिल हैं। जबकि अल्पकालिक तरलता संबंधी चिंताओं को कम करने के लिए ये अच्छे कदम हैं, एमएसएमई क्षेत्र पर केंद्रित प्रोत्साहन पैकेज को और भी दूरगामी बनाना होगा।

दुनिया भर की सरकारें अपने छोटे व्यवसायों में अधिक विश्वास पैदा करने और ऋण देने के लिए कई उपायों का शुरुआत कर रही हैं। इन उपायों में न केवल अल्पकालिक तरलता प्रदान करना शामिल है, जो वर्तमान में भारत में प्रदान की जा रही है, इनके साथ इनमें, तीन से छह महीने की अवधि के लिए (सीमित) मजदूरी सहायता/सब्सिडी, एक व्यक्ति द्वारा चलाए जा रहे व्यवसायों और सूक्ष्म उद्यमों को सीधे सब्सिडी, किराया एवं अन्‍य उपयोगिता भुगतानों को विलंबित करना, लॉकडाउन अवधि के दौरान कारोबार/राजस्व में कमी के लिए क्षतिपूर्ति, आदि भी शामिल है। भारत को इस तरह के वित्तीय एवं सुरक्षा संबंधी उपायों को भी शुरू करने पर विचार करना चाहिए, परंतु असली चुनौती इन 6.34 करोड़ अनिगमित एमएसएमई की पहचान करने में निहित है, जिनमें से 99 प्रतिशत सूक्ष्म उद्यम हैं जो मुख्‍यत: अनौपचारिक होते हैं।

जहां अनौपचारिकता पनपती है

एमएसएमई क्षेत्र में अनौपचारिकता व्यवसायों की प्रकृति तथा व्यवसायों और श्रमिकों द्वारा साझा किए जाने वाले संबंधों, दोनों में मौजूद है। असंगठित क्षेत्र (अपंजीकृत) में उद्यमों की संख्या सभी अनिगमित गैर-कृषि उद्यमों (निर्माण को छोड़कर) के 99.7 प्रतिशत होने का अनुमान है। यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि अनिगमित व्यवसायों के इस बड़े क्षेत्र का 84.17 प्रतिशत हिस्सा स्‍वामी-प्रबंधित/स्व-नियोजित फर्मों (घरेलू उद्यमों की विशिष्ट विशेषताओं के साथ) का हैं, और अगला उच्चतम हिस्सा उन फ़र्मों का है जो पांच श्रमिकों (सूक्ष्‍म फ़र्मों) को रोजगार देती हैं। इस प्रकार इस देश में अनौपचारिक व्यवसायों का 97.4 प्रतिशत भाग इन दोनों श्रेणियों में बंट जाता है। विभिन्न सरकारी स्रोत इस संबंध में अनौपचारिक रोजगार के विभिन्न स्तरों का हवाला देते हैं, हालांकि इस बात पर सहमति है कि यह संख्‍या 90 प्रतिशत  से अधिक है।

व्यवसायों और श्रमिकों के बीच व्यवस्था के संबंध में, रोजगार की स्थिति गंभीर दिखाई देती है। सबसे हाल ही में किया गया आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (2017-18) के अनुसार गैर-कृषि क्षेत्र में नियमित वेतन/वेतनभोगी कर्मचारियों में से 71.1 प्रतिशत के पास कोई लिखित नौकरी अनुबंध नहीं था, 54 प्रतिशत सवैतनिक अवकाश के लिए पात्र नहीं थे और 49.6 प्रतिशत किसी भी सामाजिक सुरक्षा लाभ के लिए पात्र नहीं थे। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने विशेष रूप से इस बात पर प्रकाश डाला है कि बड़े अनौपचारिक क्षेत्रों वाली अर्थव्यवस्थाओं को इस तथ्य को स्वीकार करने और तदनुसार ऐसे क्षेत्रों में कार्रवाई करने की आवश्यकता होगी जिनमे श्रमिकों का कोई आय प्रतिस्थापन नहीं है और लॉकडाउन उपायों से ये सीधे प्रभावित होते हैं – सबसे अधिक प्रभावित समूहों में से कुछ हैं - स्व-नियोजित व्‍यवसायी, गलियों के दुकानदार, फेरीवाले, निर्माण, परिवहन, घरेलू कामगार, आदि।

इस प्रकार समस्या की भयावहता को समझने के लिए यह एक गंभीर पृष्ठभूमि है - लाभार्थियों की पहचान का मुद्दा।

पहचान में मुद्दे

एमएसएमई इकाइयों और उनके रोजगार प्रोफाइल पर एक व्‍यापक डेटासेट की कमी इस संकट की स्थिति में लक्षित राहत वितरण के मुद्दों को बढ़ाएगी। पिछले 13 वर्षों में इस क्षेत्र के लिए एक समर्पित जनगणना नहीं हुई है तथा भारतीय एमएसएमई पर चौथी और अंतिम जनगणना 2006-07 में की गई थी अत: वर्तमान में इन उद्यमों के बारे में जानकारी उद्योग आधार ज्ञापनों (यूएएम), एमएसएमई डेटाबैंक, और वस्‍तु एवं सेवा कर नेटवर्क (जीएसटीएन) में बिखरी हुई है। पहले दो डेटासेट में उन व्यवसायों द्वारा प्रदान की गई स्व-प्रमाणित, स्वैच्छिक जानकारी होती है जो इन पोर्टलों पर पंजीकरण करना चाहते हैं, जबकि जीएसटीएन पंजीकरण एक सांविधिक आवश्यकता है जो केवल उन्‍हीं कारोबारियों हेतु अनिवार्य है जिनका टर्नओवर 40 लाख रुपए से अधिक है। जून 2019 में एमएसएमई पर एक आरबीआई विशेषज्ञ समिति ने भी अर्थव्यवस्था के इस प्रमुख क्षेत्र पर विश्वसनीय (और अद्यतन) जानकारी उपलब्‍ध करने की बात कही है। यदि सरकार सूक्ष्‍म-व्यवसायों में श्रमिकों की सीधे सहायता करने का निर्णय लेती है या मानिए स्व-नियोजित/स्‍वामी-प्रबंधित उद्यमों के लिए राहत उपायों का एक अलग सेट प्रदान करती है तो पहले यह सुनिश्चित करने का एक ऐसा तरीका ढूँढना होगा जिससे राहत अपने लक्ष्य तक पहुँच जाए। अभी यह स्‍पष्ट नहीं है कि वायरस फैलना कब रूकेगा और लॉकडाउन में ढील कब दी जाएगी, अत: निश्चित है कि एमएसएमई की पहचान करने और घरेलू राहत उपायों को चलाने के लिए वर्तमान में उपलब्ध संरचनाओं/तंत्रों का उपयोग किया जा सकता है। इनमें से कुछ उपायों पर यहां संक्षेप में चर्चा की गई है।

एमएसएमई क्षेत्र को लक्षित राहत वितरण हेतु उपयोग करने के लिए संभावित तंत्र

एमएसएमई के प्रचार और विकास के लिए स्थापित एक वित्तीय संस्थान, सिडबी को लक्षित ऋण वितरण में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। बैंक ने पहले ही आपातकालीन सहायता ऋण की घोषणा कर दी है और इस क्षेत्र में वित्तपोषण और पुनर्वित्त के प्रयासों में तेजी लानी चाहिए। यह इस तथ्य के अनुसार अधिक महत्व रखता है कि गैर-खाद्य ऋण के क्षेत्रीय परिनियोजन पर आरबीआई के फरवरी 2020 तक आंकड़ों के अनुसार, कुल बकाया बैंक ऋण में एमएसएमई का हिस्सा गिरकर 5.37 प्रतिशत हो गया है (मार्च 2019 में 5.58 प्रतिशत की हिस्सेदारी थी)। बैंक ऋण में घटते हिस्से के साथ जुड़ा हुआ एक और परेशान करने वाला तथ्य यह है कि एमएसएमई का भारित औसत ऋण दर 11.24 प्रतिशत है, जो विभिन्न खंडों के बीच दूसरा उच्चतम है। इन उद्यमों को सस्ता ऋण देने की आवश्यकता को अतिश्‍योक्‍तिपूर्ण नहीं कहा जा सकता है और इस क्षेत्र में सिडबी के विशाल नेटवर्क एवं अनुभव के कारण, वह इस एजेंडा को चलाने के लिए आदर्श संस्थान होगा।

हाल के दिनों में एनपीए में इन संपार्श्विक-मुक्त ऋणों के संबंध में मुद्रा योजना में गंभीर चिंताएं दिखाई दी हैं। हालांकि, इस योजना का लाभ उठाने वाले उद्यमों के बारे में जानकारी इस संकट में सामान्य उद्यम पहचान के लिए महत्वपूर्ण होगी। इन ऋणों में से अधिकांश को शिशु श्रेणी में स्वीकृत किया जाता है, यानी रु. 50,000 तक का ऋण और इसके लाभार्थियों में अधिकांश महिलाएं हैं। वित्तीय वर्ष 2018-19 तक लगभग 1.3 करोड़ खातों ने इन ऋणों को प्राप्त किया है, और इस योजना के आरंभ से प्रत्येक वर्ष 1 करोड़ उद्यमों द्वारा इस योजना का लाभ उठाए जाने की सूचना मिली है। वित्तीय संस्थानों को संभावित फर्म आकार, क्षेत्र एवं रोजगार प्रोफ़ाइल, स्थान तथा ऐसे अन्य विवरण स्थापित करने के लिए मुद्रा लाभार्थियों और उनके रोजगार प्रोफ़ाइल के बारे में जानकारी इकट्ठा करने में सक्षम होना चाहिए।

जैसा कि पिछले खंड में बताया गया है, यूएएम और एमएसएमएई डेटाबैंक भी उद्यमों की बेहतर पहचान करने के लिए अतिरिक्त साधन हैं। भले उनके पास सत्यापित जानकारी नहीं है, व्यावसायिक इकाइयों द्वारा प्रदान की गई स्वैच्छिक और स्व-प्रमाणित जानकारी उपयोगी साबित हो सकती हैं; उदाहरण के लिए, यूएएम पंजीकरण पोर्टल इन इकाइयों द्वारा 'कार्यरत व्यक्तियों' के संबंध में एक सांकेतिक आंकड़ा प्रदान करता है। आज की तारीख में यूएएम पोर्टल में 1.2 करोड़ पंजीकरण दर्ज हैं जबकि एमएसएमई डेटाबैंक में दर्ज पंजीकरण काफी कम यानि 160,000 हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि इन दो डेटासेट के आंकड़े एक दूसरे में हैं या नहीं। इसके बावजूद यह माना जा सकता है कि एमएसएमई मंत्रालय के साथ 1 करोड़ एमएसएमई के बारे में बुनियादी जानकारी आसानी से उपलब्ध होगी।

जन धन1, आधार2 और मोबाइल (जेएएम) तिकड़ी का उपयोग सरकार द्वारा लॉकडाउन में घोषित प्रथम प्रोत्साहन पैकेज के तहत प्रत्यक्ष नकद अंतरण प्रदान करने के लिए किया जा रहा है। जेएएम पर राज्य-वार उपस्थिति अलग-अलग होती है, लेकिन यह ऐसे दैनिक वेतनभोगी और आकस्मिक श्रमिकों के लिए वेतन सहायता अंतरण के लिए उपयोग करने हेतु एक अच्छा तंत्र हो सकता है जो लॉकडाउन में आवाजाही प्रभावित होने के कारण अपने नियोक्ताओं से भुगतान (नकदी में) एकत्र करने में असमर्थ रहे हैं। यदि एमएसएमई में श्रम/कार्यबल के लिए वेतन के रूप में सहायता की जाती है, तो जेएएम एक हस्तांतरण तंत्र के रूप में उपयोग करने के लिए आदर्श होगा। आईएलओ द्वारा भी वेतन (और प्रोत्साहन) सहायता कार्यक्रम को बहुत महत्त्वपूर्ण बताया जाता है, जिसकी हालिया रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि भारत, ब्राजील और नाइजीरिया जैसे देशों को मजदूर वर्ग की गरीबी को रोकने के लिए 'अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यबल के प्रमुख हिस्‍सेदारी' के साथ इस तरह की वेतन सहायता प्रदान करने की आवश्यकता होगी।

यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि भले बड़े व्यवसायों के लिए कर में कटौती आवश्यक हो सकती है, लेकिन ऐसे उपाय अनौपचारिक क्षेत्र में नहीं हो पाएंगे जहां रोजगार एवं टर्नओवर आयकर का भुगतान करने या जीएसटी के तहत पंजीकृत होने के लिए आवश्यक न्यूनतम सीमा को पूरा नहीं करेगा। अनौपचारिक श्रमिकों तथा 5 से 10 श्रमिकों वाले छोटे, सूक्ष्म उद्यमों के लिए राहत को इस तरह से लक्षित करने की आवश्यकता होगी कि यह उनके जीवन और आजीविका को बचाने के लिए समय पर उन तक पहुंचे। भारत में इन व्यवसायों और श्रमिकों की पहचान करने में ट्रेड यूनियनों और अन्य श्रम बाजार संस्थान महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। सरकार को विनिर्माण तथा खुदरा व्यापार संघों के साथ सहयोग करने और उनके द्वारा अपने सदस्य व्यवसायों के साथ किए जा रहे सर्वेक्षणों के निष्कर्षों पर ध्यान देने की आवश्यकता होगी।

अनौपचारिक क्षेत्र का समर्थन करने के लिए स्थायी संरचनाओं की स्‍थापना काफी समय से लंबित हैं, और आशा है कि इन्‍हें संकट सुधार के तुरंत बाद स्थापित किया जाएगा। अभी के लिए, यह स्पष्ट है कि पैसा वास्तविक चुनौती नहीं है, लक्षित कमजोर समूह को सीधे राहत देने के लिए आदर्श तंत्र चुनना वास्‍तविक चुनौती होगी।

नोट्स:

  1. जन धन योजना वित्तीय समावेशन हेतु विभिन्‍न वित्तीय सेवाओं, जैसे बैंकिंग बचत तथा जमा खाते, प्रेषण, ऋण, बीमा, और पेंशन तक किफायती तरीके से पहुंच सुनिश्चित करने के लिए एक राष्ट्रीय मिशन है। यह वित्तीय समावेशन अभियान अगस्त 2014 में शुरू किया गया था।
  2. आधार भारत सरकार की ओर से भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) द्वारा जारी की गई 12-अंकों की एक व्यक्तिगत पहचान संख्या है। यह हर निवासी के बायोमेट्रिक पहचान को दर्शाता है, और इसे भारत में कहीं भी पहचान और पते के प्रमाण के रूप में प्रयोग करने हेतु बनाया गया है।

लेखक परिचय: राधिका पांडे नई दिल्ली स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (एनआईपीएफ़पी) के मैक्रो-फाइनेंस ग्रुप में कंसल्टेंट हैं। अमृता पिल्लई नई दिल्ली स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (एनआईपीएफ़पी) के आर्थिक मामलों के विभाग (डीईए) (वित्त मंत्रालय) के अनुसंधान कार्यक्रम में काम करने वाली एक वकील तथा नीति शोधकर्ता हैं।

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