मुद्रा तथा वित्त

पीएमसी बैंक की असफलता से सबक

  • Blog Post Date 27 नवंबर, 2019
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K. Srinivasa Rao

Institute of Insurance and Risk Management

kembais@gmail.com

पंजाब एंड महाराष्ट्र को-औपरेटिव बैंक (पीएमसीबी) धोखाधड़ी सामने आने के बाद सितंबर में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने पीएमसीबी पर प्रतिबंध लगाया था। आरबीआई ने यह कदम अपनी निगरानी और नियामक ढांचे को सुधारने के लिए उठाए हैं। पीएमसीबी की असफलता कई बातें सामने लाती है। इस पोस्ट में के. श्रीनिवास राव उन कमियों पर चर्चा कर रहे हैं जो इस संकट का कारण बना है। साथ ही उन कदमों पर भी चर्चा की गई है जिससे वित्तीय कार्य प्रणाली में स्थिरता लाई जा सकती है।

  

2018 में नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) की असफलता के बाद इस साल पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड (PMCB) घोटाले का सामने आना, भारती के वित्तीय क्षेत्र के लिए काफी निराशाजनक बात है। घटना ने बड़ी संख्या में बैंक का इस्तेमाल करने वाले छोटे और सीमांत बैंक जमाकर्ताओं की परेशानी को बढ़ा दिया है। पीएमसीबी एक बहु-राज्य सहकारी बैंक है जिसका संचालन 1984 में शुरू किया गया था। धीरे-धीरे इसने अपनी स्थिति मजबूत की और मार्च 2019 तक इसका कारोबार 200 बिलियन रुपये तक पहुंच गयाडिपोजिट 116 बिलियन रुपये पर, क्रेडिट 84 बिलियन रुपये पर, और 1 बिलियन रुपये के करीब मुनाफा। बैंक की बदनामी तब शुरु हुई जब 43.56 बिलियन रुपये का एक बड़ा ऋण-धोखाधड़ी सामने आया और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को 24 सितंबर 2019 को छह महीने के लिए बैंक के काम-काज पर रोक लगाना पड़ा।

बैंक के काम-काज पर रोक लगाना, नकद निकासी, एडमिनिस्ट्रेटर की नियुक्ति, और बोर्ड का निलंबन, फोरेंसिक ऑडिट के लिए बुलावा, और पीएमसीबी के बंद होने के बाद की घटनाएं मानक नियामक कदम हैं जो हितधारकों के हितों की रक्षा के लिए उठाए गए हैं। हालांकि, वित्तीय इकाई की अचानक विफलता से होने वाले नुकसान को देखते हुए पता चलता है कि छोटे जमकर्ताओं का असहाय समुदाय कितना ज्यादा संवेदनशील है।

पीएमसीबी में जिन्होंने ने अपनी कीमती वित्तीय संसाधन रखे थे, उन्हें वह संसाधन खोने के डर से बेहद परेशानी और पीड़ा का सामना करना पड़ा है। आरबीआई ने पीएमसी बैंक से नकद निकासी की सीमा तय कर दी जिस कारण कई अप्रिय घटनाएं भी सामने आई है। पहले आरबीआई ने प्रति ग्राहक 1,000 रुपये निकालने की अनुमति दी थी। लेकिन जमाकर्ताओं को सख्त दबाव में देखते हुए आरबीआई ने 4 अक्टूबर 2019 को यह सीमा बढ़ा कर 40,000 रुपये कर दी है। इससे करीब 70% जमाकर्ताओं को राहत मिली है।

धोखाधड़ी का तरीका

पीएमसीबी और हाउसिंग डेवलपमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (एचडीआईएल) के प्रमोटरों के बीच प्रतिकूल गठबंधन 1986 से शुरु हुआ था जब सारे उधार मानदंडों और नियामक मानकों का उल्लंघन करते हुए पीएमसी बैंक-जमाकर्ता का संबंध ऋणदाता-उधारकर्ता के सांठगांठ में बदल गया। साल-दर-साल ऋण देने का सिलसिला चलता रहा। एचडीआईएल को 6,500 करोड़ से ज्यादा का ऋण दिया गया। यह नियामकिय सीमा का चार गुना है जो बैंक के कुल ऋण का 73 फीसदी है। यह प्रमुख हितकारों के लिए चिंता का विषय है। पीएमसीबी 6-7 वर्षों तक आरबीआई की नजरों से बचती रही जिसके परिणामस्वरूप धोखाधड़ी की राशि बढ़ कर 43.55 बिलियन हो गई है। पीएमसीबी ने एचडीआईएल को दिया गया ऋण छुपाने के लिए 21,000 से ज्यादा फर्जी खातों का इस्तेमाल किया है। दरअसल इतने बड़े धोखाधड़ी को इतने समय तक छुपा पाना बोर्ड के सदस्यों, शीर्ष प्रबंधन, समवर्ती ऑडिटर, वैधानिक ऑडिटर और दिन-प्रतिदिन के संचालन के लिए जिम्मेदार लाइन प्रबंधन की गलत भागीदारी और मौन सहमति को उजागर करता है।

व्यवस्थागत नियंत्रण की नामौजूदगी

अगर इस पूरे धोखाधड़ी से पहले हुए घटनाओं पर नजर डाली जाए तो स्पष्ट रूप से निम्न कमियां उजागर होती हैं: (i) आंतरिक प्रणालीगत नियंत्रण, रिपोर्टिंग प्रणाली और सुधारात्मक कार्रवाई जो लेनदेन के निरीक्षण का पालन करती हैं, (ii) शीर्ष प्रबंधन वर्ग और दोषी उधारकर्ता के बीच सांठगांठ, (iii) व्हिसलब्लोअर (मुखबिर) नीति को लागू करना, (iv) क्रेडिट प्रशासन में लाइन प्रबंधन की (सीमांत) भूमिका का रूप, (v) ऋण नीतियां जिन्होंने एकल उधारकर्ता में क्रेडिट जोखिम की एकाग्रता की अनुमति दी, (vi) कॉर्पोरेट प्रशासन (सीजी) प्रथाओं का पर्यवेक्षण, जांच करना और विनियामक निगरानी (vii) आरबीआई और सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार द्वारा दोहरे नियामक ढांचे को लागू करना जिसने नियमितता और निरीक्षण की गुणवत्ता को भंग कर दिया और (viii) वैधानिक ऑडिटर्स और और बोर्ड की ऑडिट समिति से दूरी रखना।  परिणामस्वरूप, ये लाखों बैंक ग्राहकों को धोखा देने वाले घोटाले का हिस्सा बन गए जिसने जनता के विश्वास को डगमगा दिया है।

आगे के कदम

धोखाधड़ी में शामिल पीएमसीबी के टॉप प्रबंधन और एचडीआईएल के प्रमोटरों की गिरफ्तारियां बैंक के लाखों निर्दोष ग्राहकों की पीड़ा और परेशानियों को कम नहीं कर सकती हैं। इसलिए जरूरी है कि आत्मनीरिक्षण किया जाए और शासन से ऐसी कमजोरियों को दूर करने का प्रभावी तरीका ढूंढा जाए ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति का सामना ना करना पड़े। इस तरह के उदाहरणों के बावजूद, आमतौर पर, बैंकों और इसके नियामक प्रणाली पर ग्राहक विश्वास रखना जारी रखते हैं। ग्राहकों का विश्वास इस तथ्य के बावजूद भी जारी रहता है कि डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (डीआईसीजीसी) द्वारा जमा बीमा केवल 1,00,000 रुपये तक सीमित कर दी गई है। यह सही समय है जब जमा बीमा की राशि को बढ़ाकर कम से कम 10 लाख कर देना चाहिए और व्यवस्थित रूप से महत्वपूर्ण गैर-बैंकों को भी इसके दायरे में लाया जाए।

ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी पहल की शुरुआत करना जहां बीमाकृत संस्था पर आरबीआई द्वारा प्रतिबंध लगाया जाए जिसके तहत मांगों को डीआईसीजीसी द्वारा जल्द-से-जल्द संसाधित किया जाए। यहां तक कि स्वास्थ्य और रखरखाव के विशेष आकस्मिक मामलों में एड-हॉक राहत भी दिया जा सकता है। जमा की सुरक्षा और वित्तीय प्रणाली की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए बढ़ा हुआ बीमा प्रीमियम,  हितधारकों द्वारा वहन किया जा सकता है।

शासन की गुणवत्ता और मजबूती इतनी कमजोर है कि कुछ असंतुष्ट तत्व मिलकर लाखों छोटे और सीमांत जमाकर्ताओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं। पिरामिड के निचले हिस्से में इतनी बड़ी संख्या में कम मूल्य के बैंक उपयोगकर्ताओं की परेशानी धीरे-धीरे सूक्ष्म-आर्थिक गतिविधियों को बाधित करता है, जो संभावित रूप से लंबी मंदी को ट्रिगर कर सकता है और अर्थव्यवस्था का पुनरुद्धार में लंबा समय लगा सकता है। इसलिए, सूक्ष्म-वित्तीय संस्थानों की असफलताओं की घटनाओं को कम करने के लिए उचित सुरक्षा उपायों और सक्रिय प्रणालीगत नियंत्रणों का निर्माण करना होगा।

इसलिए सीजी की निगरानी में लापता लिंक को ठीक करने के लिए गंभीर आत्मनिरीक्षण की जरुरत है। वित्तीय क्षेत्र में, अर्थव्यवस्था के शुरुआत के बाद से नियामक सुधार परिवर्तन जारी है और वैश्विक मानकों के साथ संरेखित करने के लिए अच्छी तरह से जांच किए गए हैं। सीजी मानकों को मजबूत बनाने के लिए कई समीतियां बनाई गई हैं लेकिन फिर भी वित्तीय संस्थाओं पर इस तरह का रणनीतिक जोखिम मंडराता रहता है।

सीजी में कमजोरियों के शुरुआती संकेतों को पकड़ने और बोर्ड की उपसमितियों का कामकाज पर ध्यान केंद्रित करने के लिए पर्यवेक्षी और विनियामक प्रणालियों को और ज्यादा मजबूत करना पड़ेगा। मुख्य अनुपालन अधिकारी और मुख्य जोखिम अधिकारी का संस्थानीकरण संवेदनशील बना सकते हैं और जोखिम एवं अनुपालन की दिशा में सांस्कृतिक बदलाव ला सकते हैं, लेकिन उन्हें मजबूत बनाने के लिए अन्य कदम उठाने की जरुरत होगी। जैसा कि वे आंतरिक शीर्ष प्रबंधन टीम का हिस्सा बनना जारी रखते हैं, वे अपनी भूमिका को सीमित करते हुए मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के अधीन रहते हैं। बोर्ड के उम्मीदवार के रूप में नामित करने की बजाय अनुपालन और जोखिम में नियामक को रिपोर्ट करने के लिए पूर्णकालिक बाहरी संसाधनों के रूप में, विशेषज्ञों का एक अंतर-संस्थागत विनिमय की आवश्यकता हो सकती है। अनियमितताओ को ठीक करने के लिए पूर्णकालिक बाह्य निगरानी उपयोगी हो सकती है।

समय के साथ प्रबंधन सूचना प्रणाली (एमआईएस), ऑनसाइट पर्यवेक्षण और जोखिम आधारित पर्यवेक्षण के माध्यम से निरंतर ऑफसाइट निगरानी मौलिक सुधार लाने में सक्षम होना चाहिए लेकिन व्यापार मॉडल पर अधिक गहन और केंद्रित चर्चाएं और वे वास्तव में बैलेंस-शीट जोखिम के प्रबंधन में कैसे सफलता पाते हैं, इसके लिए गुणात्मक तनाव परीक्षण की जरुरत है ताकि वित्तीय संस्थाओं को सचेत किया जा सके।

आरबीआई ने अपने पर्यवेक्षण और नियामक तंत्र को सुधारने के लिए सही कदम उठाए हैं और पीएमसीबी में चल रहे विफलता पर्याप्त संकेत प्रदान करते हैं। वित्तीय प्रणाली के हितधारकों के दीर्घकालिक हितों की रक्षा के लिए जोखिम और निगरानी पर बेहतर बोर्डरूम परामर्श की आवश्यकता होगी जो डेटा एनालिटिक्स के माध्यम से किया जाए। स्थिरता और निरंतरता के प्रबंधन की बारीकियों पर बोर्डरुम शिक्षा के साथ नियामक निर्देश का समर्थन करना पड़ सकता है। गतिशील नियामक ढाल को मजबूत करने के लिए गहन विचार-विमर्श और सहयोगपूर्ण होम-वर्क की जरुरत है। 

लेखक परिचय: के. श्रीनिवास राव नोएडा स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकिंग स्टडीज एंड कॉर्पोरेट मैनेजमेंट (एनआईबीएसकॉम) के निदेशक हैं।

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