गरीबी तथा असमानता

भूख और अनिश्चितता: ओडिशा के खानाबदोश भविष्यश-वक्ताजओं की स्थिति

  • Blog Post Date 30 जुलाई, 2020
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अबिनाश दाश चौधरी, जो भारत में कोविड-19 से जुड़े मानवीय संकट पर पाक्षिक डेटा प्रस्तुत करने के लिए शोधकर्ताओं के एक नेटवर्क के हिस्से के रूप में काम करते हैं, ने इस लेख में दक्षिण ओडिशा के पारंपरिक भविष्‍य-वक्‍ताओं की वर्तमान स्थिति के बारे में बताया है। लॉकडाउन से पहले यह जनजाति अपना जीवन यापन करने के लिए गाँवों और कस्बों में घूमती रहती थी, लेकिन लॉकडाउन के चलते इस जनजाति के लोगों के आने-जाने पर पूर्ण-प्रतिबंध लग गया है जो उनके आय स्रोतों के लिए हानिकारक साबित हुआ है।

 

हम जिस जगह पर हैं वहां हमारी आय बिल्‍कुल नहीं के बराबर है। लोग अपनी हथेलियों को पढ़ने के लिए कभी-कभी एक रुपये का सिक्का दे देते हैं। कभी-कभी जब उन्हें भविष्‍यवाणी अच्‍छी लगती है, तो वे 10 रुपये का नोट भी देते हैं। हमारे भाग्य उनके साथ बंधे हुए हैं - इतना कहकर वडासकर हल्का-सा मुसकुराते हैं। उनका हास्‍यबोध अभी भी शेष है। जब से लॉकडाउन शुरू हुआ था, तब से वे और उनके परिजन कोरापुट जिले के बाइपारीगुडा ब्लॉक में पिछले तीन महीने से बंद हैं। दक्षिण ओडिशा में कोरापुट जिला भारत के सबसे संवेदनशील जिलों में से एक है। भूख, विनाश, गरीबी और जीवन की अनिश्चितता यहां एक परंपरागत तथ्य रहा है।

वडासकर, जो अपनी टुकड़ी के सौ अन्य लोगों के साथ रहते हैं, परंपरागत रूप से भविष्य-वक्‍ता हैं, और गाँवों और कस्बों में घूमते हुए बंजारा जीवन जीते हैं। वे आगे बढ़ने से पहले एक जगह थोड़े समय के लिए रुक जाते हैं। उन्होंने बचपन में अपने माता-पिता से इस कौशल को एक कुल-विद्या के रूप में सीखा है, जिसे वे अगली पीढ़ी को सौंपेंगे। वर्षों तक वे इस ज्ञान और लंबे इंतजार एवं यात्रा के बाद जो थोड़े-बहुत पैसे कमा पाते हैं, उसी पर निर्भर रहे हैं। वे औसतन प्रति-दिन, प्रति परिवार लगभग 200 रुपए कमा पाते हैं जिससे गुजारा चलाना मुश्किल हो जाता है।

घर? बहुत लंबा समय हो गया जब हमारे लिए कोई घर रहा हो। जैसा कि आप या किसी और को हम देखते हैं। लगभग दो दशक पहले, हम 15 परिवार, महाराष्ट्र के नागपुर में अपने गाँव से निकले थे। हम मूल रूप से इसी स्‍थान से हैं,... हालांकि बहुत पहले हमारे निकलने से लगभग दो दशक पहले, हमारे माता-पिता ने भी घूमना शुरू कर दिया था। मेरा जन्म जगदलपुर में हुआ था (जो अब छत्तीसगढ़ राज्य की सीमा में आता है)। हमारे लोग 2000 के दशक की शुरुआत से बाइपारीगुडा आए हैं और दक्षिण ओडिशा के आसपास घूमते रहे हैं। एक के बाद एक गाँव में घूमते हुए हम केवल मानसून को छोड़कर पूरे साल सड़क पर ही रहते हैं”, ज्ञानाची वडासकर टेलीफोन पर बताते हैं।

लॉकडाउन ने हमारे जीवन को अपंग बना दिया...

24 मार्च को, जब लॉकडाउन का पहला चरण बिना किसी सूचना या सावधानी के लागू कर दिया गया, तो वडासकर एवं 100 अन्य लोगों को पूर्णत: अप्रत्‍याशित परेशानी में डाल दिया, जिनमें 5-10 वर्ष की आयु के लगभग 32 बच्चे भी थे। उनके आवागमन पर इस तरह का पूर्ण प्रतिबंध उनके आय स्रोतों के लिए हानिकारक था। इसने उन्हें झटका दिया, क्योंकि उनके जीने का तरीका अचानक बदल गया था। हमें नहीं पता था कि कहाँ जाना है, क्या करना है, और कैसे बचना है? यह सोचना असंभव था कि हम अगले सात दिनों तक दिन की रोशनी देख भी पाएंगे, फिर... ", वे विस्मित होते हैं। हालांकि स्थानीय सहयोग के साथ-साथ नागरिक समाज के हस्तक्षेपों ने वडासकर और उनके पड़ोसियों को इस अपार कठिनाई में खुद को बचाए रखने में मदद की। हमें दिन में एक बार पका हुआ भोजन दिया जाता था और कुछ दिनों के लिए सूखा राशन - यह एक बुरा सपना था जिसे हमने जिया था। उन्होंने कहा कि हमने रहने के लिए टेंट लगाए और पूरे समय वहीं रहे”, उन्‍होंने आगे कहा।

ज्ञानाची वडासकर और उनके पड़ोसी किसी तरह उन छोटे-मोटे सहयोगों और ओडिशा सरकार द्वारा किए गए सक्रिय उपायों के कारण लॉकडाउन के पहले कुछ चरणों में बचे रहे। सरकार ने कमजोर वर्ग की आबादी को पका हुआ भोजन उपलब्ध कराने के लिए हर पंचायत (ग्राम सभा) में सामुदायिक रसोई सेवाओं की शुरुआत की। राज्य सरकार की अधिसूचना में यह स्पष्ट किया गया था कि प्रत्येक पंचायत को लगभग 100-200 कमजोर वर्ग के व्यक्तियों की पहचान करनी थी, और ऐसे व्यक्तियों की आवश्यक देखभाल स्थानीय प्रशासन द्वारा ब्लॉक अधिकारियों की सहायता से की जानी थी। इसी सेवा तथा स्थानीय देखभाल नेटवर्क के कारण ज्ञानाची जैसे लोग बच सके।

पिछले कुछ हफ्तों में राज्य पर गृह जिलों में पहुंच रहे अपने प्रवासी मजदूरों की देख-भाल के लिए दबाव बढ़ गया और क्‍वारंटीन केंद्रों पर ध्‍यान केंद्रित होने के कारण खाना पकाने से संबंधित सभी गतिविधियाँ अब इन केंद्रों पर केंद्रीकृत हो गईं। “हालाँकि वे दिन भी अब गए। हमें ऐसा कोई भोजन मिले कई सप्ताह हो चुके हैं। धीरे-धीरे लॉकडाउन को हटाए जाने या इस तरह के जो भी कारण हों, परिणाम यह हुआ है कि अब हमें अपने हाल पर छोड़ दिया गया है। हमें मई के दूसरे सप्ताह से किसी से भी किसी प्रकार का भोजन नहीं मिला है और हमें भोजन की व्‍यवस्‍था खुद ही करनी पड़ रही है। यह महीना हमारे लिए सबसे कठिन रहा है। अब हमें पैसा कहां से मिलेगा? हमारी देखभाल कौन करेगा? अब हम क्या करें?”, वडासकर दुविधाग्रस्त हो डर कर पूछते हैं।

विभिन्न ब्लॉकों के गांवों में ऐसे कमजोर समूहों को छोड देना राज्य सरकार की ओर से एक गंभीर चूक सामने आई है, अन्यथा वह अपने नागरिकों की जरूरतों के प्रति लगातार सतर्क रही है।

भारत - कोविड आकलन और प्रतिक्रिया डैशबोर्ड (इंडिया – कोविड अससेस्समेंट ऐंड रेसपोनसे डैशबोर्ड, I-CARD)2 मई के लिए किए गए सर्वेक्षण के निष्कर्षों के अनुसार - दक्षिण ओडिशा3 (कोरापुट जिले के बाइपारीगुडा सहित) के ब्‍लॉकों में पूर्वी ओडिशा4 (आकृति 1) के ब्‍लॉकों की तुलना में भोजन की पहुँच अपेक्षाकृत कम रही है। 1 से 3 के पैमाने पर दक्षिण ओडिशा (2.29 के स्कोर) में पूर्वी ओडिशा (2.67 का स्कोर) की तुलना में भोजन और पानी की पहुँच अपेक्षाकृत कम है।

आकृति 1. ओडिशा में भोजन और पानी तक पहुँच

नोट: I-CARD सर्वेक्षण प्रतिक्रियाओं के अनुसार स्कोर।

इसके अलावा जब I-CARD ने कोरापुट जिले के सर्वेक्षण किए गए ब्लॉकों में भोजन और पानी से संबंधित विभिन्न मुद्दों को देखा, तो यह पता चला कि कमजोर समूहों5 तक पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) की दुकानों, पेयजल और भोजन वितरण (सरकारी/ गैर-सरकारी संगठनों/ व्यक्तियों द्वारा) पहुँच के संबंध में तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है (आकृति2)

आकृति 2. कोरापुट जिले में भोजन और पानी तक पहुँच

नोट: I-CARD सर्वेक्षण प्रतिक्रियाओं के अनुसार स्कोर।

आकृति में प्रयुक्त अंग्रेजी वाक्‍यांशों के हिंदी अर्थ:

Access to Drinking Water - पेयजल तक पहुंच

Access to MDM - मिड-डे-मील तक पहुंच

Price Increase in essential goods - आवश्‍यक वस्‍तुओं की कीमत में वृद्धि

Food distribution - भोजन वितरण

Access to Cooking Fuel - खाना पकाने के ईंधन तक पहुंच

Access to Private Shops - निजी दुकानों तक पहुंच

Access to PDS shops - पीडीएस दुकानों तक पहुंच

PDS Shops open - पीडीएस दुकानों का खुलना

बाइपारीगुडा के हमारे ब्लॉक विशेषज्ञ ने कहा कि लॉकडाउन की घोषणा के बाद तीन महीनों के राशन को अलग-अलग बस्तियों के लोगों में वितरित किया गया। जिन लोगों को अभी तक राशन नहीं मिला है उन्‍हें राशन उपलब्‍ध कराने के लिए राशन की दुकानें खुली रहती हैं। हालांकि कई गांवों में दुकानें दूर हैं - बस्‍ती से लगभग 8-10 किलोमीटर। इसलिए राशन की दुकानों तक आसानी से पहुंचना मुश्किल है। पहुँच में सुधार के लिए सरकार ने राशन वितरण के लिए राजस्व गांवों को नोडल केंद्र के रूप में बनाया है।

इसके अलावा, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, शुरू में सरकार द्वारा सामुदायिक-रसोई सेवाएं एवं गैर सरकारी संगठनों (गैर-सरकारी संगठन) द्वारा भोजन वितरण एक महीने (अप्रैल में) के लिए किया गया, लेकिन अब यह उतनी तीव्रता के साथ नहीं होता है। इस प्रकार कई कमजोर परिवार जिनमें ज्ञानाची जैसे खानाबदोश भविष्य-वक्‍ता भी शामिल हैं, एक दिन में दो बार भोजन प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

आय में कमी, राज्य विहीनता और जबरन मजदूरी

ज्ञानाची और उनके पड़ोसियों की अनिश्चित स्थिति केवल पके हुए भोजन की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। कमाई का कोई दूसरा साधन नहीं होने और बाजार के क्षेत्रों में कोई चाल नहीं होने के कारण ज्ञानाची और उनके समूह ने पिछले तीन महीनों से अपनी आय खो दी है।

इस बात को ध्यान में रखते हुए I-CARD के सर्वेक्षण निष्कर्ष बताते हैं कि शिल्प श्रमिकों, स्व-रोजगार और गैर-कृषि दैनिक मजदूरी करने वालों की आय में भारी नुकसान हुआ है। 1 से 3 के पैमाने पर – जिसमें 1 निम्‍नको और 3 उच्‍च को दर्शाता है। दक्षिण ओडिशा और विशेष रूप से कोरापुट जिले तथा बाइपारीगुडा ब्लॉक में ऐसे श्रमिकों के लिए आय का नुकसान 3 के स्कोर के साथ उच्च है (आकृति 3)

आकृति 3. दक्षिण ओडिशा में दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों, स्वरोजगार और कुशल शिल्प श्रमिकों की आय में कमी

नोट: I-CARD सर्वेक्षण प्रतिक्रियाओं के अनुसार स्कोर।

आकृति में प्रयुक्त अंग्रेजी वाक्‍यांशों के हिंदी अर्थ:

Income loss - आय में नुकसान

Daily wage labourers - दिहाड़ी मजदूर

Self employed - स्‍व-रोजगार प्राप्‍त

Craft workers - शिल्‍प श्रमिक

हमारे बाइपारीगुडा के ब्लॉक विशेषज्ञ के अनुसार – बाँस के श्रमिकों और कुम्हारों सहित शिल्प-श्रमिक एवं कारीगर परेशान हैं क्‍योंकि उनके सामान की बिक्री नहीं हो रही है। स्वरोजगार प्राप्‍त लोगों में मुर्गीपालन फार्म प्रभावित हुए हैं और कई छोटे दुकानदार अपनी दुकानें बंद करने के लिए मजबूर हैं क्योंकि उनके पास कोई कार्यशील पूंजी नहीं है। दिहाड़ी मजदूरों को भी अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा है।

भविष्य-वक्‍ता, जो अपनी पारंपरिक आजीविका खो चुके हैं, बिना किसी भूमि के गैर-नागरिकों का जीवन जीते हैं। उनके पास कोई वैध पहचान पत्र, राशन कार्ड या जॉब कार्ड न होने के कारण वे अपने पास के क्षेत्र में बुनियादी सेवाओं पर कोई दावा नहीं कर सकते। हमें कोई फायदा नहीं हुआ। हमें बचाने के लिए कौन हमें कुछ देगा? एक ही रात में, हम निर्माण मजदूर बनने के लिए मजबूर हो जाते हैं - एक ऐसा काम जो हमने कभी नहीं किया है! हम ईंटें उठा रहे हैं क्योंकि एक निजी ठेकेदार हमें यह काम करने के लिए कुछ पैसे देता है। अगर हम उस काम को नहीं करेंगे तो हमें भूखा सोना पड़ेगा। हम रातों-रात मजदूर में बदल गए!”, ज्ञानाची ने कहा।

पारंपरिक आजीविका खोने, भूख और निरंतर अनिश्चितता ने भविष्य-वक्‍ता समुदाय को असहाय बना दिया है, और उनके व्‍यवसाय की पसंद को छीन लिया है।

चौराहे पर

ज्ञानाची और उनके पड़ौसियों जैसे अधिकतर लोग हताशा और उनके जीवन में अभूतपूर्व अनिश्चितता के कारण केवल राज्य की बुनियादी सेवाओं पर ही निर्भर हैं।

बहु-आयामी, लक्ष्य-उन्मुख दृष्टिकोण से सामुदायिक रसोई की निरंतरता, पीडीएस सेवाओं के सार्वभौमिकरण करने, और रोजगार सृजन या ऐसे लोगों को, जो व्यापक श्रम में शामिल नहीं हो सकते हैं या मानवीय श्रम में बदलाव को नहीं अपना सकते हैं, तत्काल बेरोजगारी मजदूरी सुनिश्चित करने में तथा उनके जीवन को कुछ हद तक सामान्‍य बनाने हेतु उनके पुनर्वास में एक लंबा समय लगेगा।

यह पता लगाना मुश्किल है कि क्या वे कभी वापस उसी स्थिति में जा सकते हैं, जहां वे लंबे लॉकडाउन शुरू होने से पहले थे। ज्ञानाची और उनके परिजनों के लिए पलक झपकते ही जीवन बदल गया। “एक अदृश्य बीमारी और एक प्राणहीन जीवन - जो हमारे पास था वह सब अब चला गया है! हमारा घर कहाँ है? हम कहां जाएं? हमारा क्या होगा? अब तो भगवान जाने। हमारा क़िस्मत हम भी नहीं जानें अब तो!”, ज्ञानाची झुंझला कर कहते हैं, मानो वे यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि उसे अपने भाग्‍य के बारे में कुछ नहीं पता और अब किसी और के भाग्‍य को भी नहीं जान पाएगा।

टिप्पणियाँ:

  1. कोरापुट जिले में 50% से अधिक आबादी जनजातीय है (2011 की जनगणना) और यह नीति आयोग (नेशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया) द्वारा सूचीबद्ध 115 आकांक्षात्मक जिलों में से एक है।
  2. I-CARD, 100 से अधिक नागरिक समाज संगठनों (सीएसओ) के सहयोग से शोधकर्ताओं के एक नेटवर्क की स्वतंत्र परियोजना है जो कमजोर समूहों के संबंध में कोविड-19 मानवीय संकट पर पाक्षिक डेटा प्रस्तुत करता है। यह परियोजना अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा समर्थित है।
  3. दक्षिण ओडिशा के सर्वेक्षण किए गए ब्लॉकों में गजपति जिले के गोसानी, गुम्मा और रायगडा; गंजाम जिले के धारकोट, जगन्नाथपुर और खल्‍लीकोट; कालाहांडी जिले के जयपटाना, कोकसरा और लांजीगढ़; कोरापुट जिले के बन्धुगांव, बाइपारीगुडा, बोरिगुम्मा और कुंदुरा; नबरंगपुर, नयागढ़ और रायगडा जिले के क्रमशः झारिग्राम, नयागढ़, और मुनिगुड़ा शामिल हैं।
  4. पूर्वी ओडिशा के सर्वेक्षण किए गए ब्लॉकों में जाजपुर जिले के दानापुर, धर्मशाला, और जाजपुर ब्लॉक; केंदुझर जिले के चंपुआ, जोड़ा, केंदुझर सदर, और पटाना; तथा मयूरभंज जिले के जोशीपुर और ठाकुरमुंडा ब्लॉकशामिल हैं।
  5. यहां कमजोर समूहों का संदर्भ आर्थिक रूप से सबसे अधिक पीडि़त समूहों से है: https://www.i-card.org/dashboard

लेखक परिचय: अबिनाश दास चौधरी जादवपुर विश्वविद्यालय में तुलनात्मक साहित्य में मास्टर के छात्र हैं। वे अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के प्रोजेक्ट I-CARD से भी जुड़े हुए हैं।

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