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क्या भारतीय मतदाताओं को अपने प्रतिनिधियों के कार्यालय में रहते हुए उनकी संपत्ति में वृद्धि होता देख फर्क पड़ता है?

  • Blog Post Date 18 सितंबर, 2019
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S.P. Harish

William and Mary College

spharish@wm.edu

राजनेताओं के लिए वित्तीय सूचनाओं की जानकारी देने की आवश्यकता के तहत अपनी परिसंपत्तियों की घोषणाएं करना पूरी दुनिया में आम बात होती जा रही है। भारत में वित्तीय घोषणाएं राजनीतिक पद के लिए उम्मीदवारी की पूर्वशर्त के बतौर दाखिल किए जाने वाले सार्वजनिक शपथपत्र का हिस्सा होती हैं। प्रयोग और सर्वेक्षण के मूल आंकड़ों के साथ भारतीय शपथपत्रों से प्राप्त आंकड़ों का उपयोग करके इस आलेख में जांच की गई है कि राजनेताओं द्वारा धन-संपत्ति संचय से संबंधित सूचनाएं नागरिकों द्वारा राजनेताओं के मूल्यांकन और मतदान संबंधी उनके अपने व्यवहार को कैसे प्रभावित कर सकती हैं।

परिसंपत्तियों की घोषणाएं - जो राजनेताओं के लिए आय, प्रॉपर्टी और ऋण जैसी अपनी वित्तीय सूचनाओं की जानकारी सार्वजनिक करने के लिए आवश्यक हैं - पूरी दुनिया में आम बात होती जा रही हैं। ऐसे देशों की संख्या जो 1980 में मात्र 22 थी, अब 2015 में 160 से भी अधिक हो गई है। अभी भारत सहित 80 से भी अधिक देशों द्वारा ये घोषणाएं एक हद तक सार्वजनिक की जाती हैं (रोस्सी एवं अन्य 2017)। परिमाणस्वरूप, वित्तीय घोषणाएं भारत और विदेशों में लोगों की बढ़ती रुचि का केंद्र बन गई हैं।

भारत में वित्तीय घोषणाएं राजनीतिक पद के लिए उम्मीदवारी की पूर्वशर्त के बतौर दायर किए जाने वाले शपथपत्रों का हिस्सा होती हैं। इन घोषणाओं में प्रत्याशी के पारिवारिक स्तर की आय का (टैक्स रिटर्न से), प्रॉपर्टी का और ऋणों का स्नैपशॉट होता है।1 अतः शपथपत्र नागरिकों को अपने प्रतिनिधियों की संपत्ति के बारे में जानकारी पाने का स्रोत उपलब्ध कराते हैं।

लगातार चुनावों में भाग लेने वाले उम्मीदवारों के द्वारा क्रमशः की गई घोषणाओं की तुलना करके उनकी संपत्ति में हुए बदलावों की गणना करने की संभावना भी बनी रहती है। प्रेस और नागरिक समाज संगठनों द्वारा नियमित रूप से की जाने वाली इन गणनाओं से राजनीतिक पद के प्रत्याशियों की संपत्ति में, खास कर पदधारियों की संपत्ति में भारी वृद्धि के संकेत मिले हैं (फिसमेंन एवं अन्य 2014)। जैसे, पांच वर्ष के विधानमंडल के कार्यकाल में भारत के विधायकों की संपत्ति में औसत वृद्धि लगभग 350 प्रतिशत रही है (राज्यों के अलग-अलग आंकड़ों के लिए आकृति 1 देखें)। उसी अवधि में तुलना करने पर भारतीय परिवारों की संपत्ति में महज 17 प्रतिशत औसत वृद्धि दिखी है।2

आकृति 1. भारतीय राज्यों के विधायकों द्वारा संपत्ति संचय की दरें

आंकड़ा स्रोत : एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स.

Wealth accumulation (5-year % increase) among rerunning incumbents - दुबारा चुनाव लड़ने वाले पदधारियों द्वारा संपत्ति का संचय (5 वर्षों में प्रतिशत वृद्धि)

Mean, Bihar-बिहार का औसत (मीन) Mean, all- सभी का औसत

Median, Bihar- बिहार का माध्य (मीडियन) Median, all-सभी का माध्य

यह केवल भारत में होने वाली कोई अनोखी बात नहीं है। अनेक अन्य देशों में भी इसी प्रकार की गई वित्तीय घोषणाओं से पता चलता है कि राजनीतिक एलीट पद पर रहते हुए अच्छा-खासा धन-संपत्ति संचित करते हैं जो पद पर नहीं रहने वाले उन्हीं के जैसे लोगों से आम तौर पर काफी अधिक होता है (क्लास्नजा 2015, क़्वेरुबिन एवं स्नाइडर 2013)। ऐसे प्रमाण से नागरिकों में संदेह पैदा हो सकता है - या होना भी चाहिए। हालांकि हमें अभी इस बात की बहुत कम जानकारी है कि राजनेताओं द्वारा संपत्ति संचय से उनके बारे में नागरिकों के मूल्यांकन पर कैसा प्रभाव पड़ सकता है।

हाल के शोध (चॉचार्ड एवं अन्य, प्रकाश्य) में हमने जानकारी की इस कमी को दूर करने के लिए काम किया है। भारतीय शपथपत्रों पर भरोसा करके, और प्रयोग तथा सर्वे के मूल आंकड़ों का उपयोग करके हमने तीन परस्पर संबंधित प्रश्नों के बारे में छान-बीन की : राजनेताओं की संपत्ति और उनके पद पर रहते धन-संपत्ति संचय से संबंधित सूचनाओं के बारे में नागरिकों की क्या प्रतिक्रियाएँ रहती हैं? वे बड़े पैमाने पर संपत्ति संचय को भ्रष्टाचार और अन्य गलत दुष्कर्मों के साथ कैसे जोड़ते हैं? और ये मूल्यांकन नागरिकों के मतदान संबंधी व्यवहार को, और संभवतः संपत्ति संचय करने वाले राजनेताओं के चुनाव को कैसे प्रभावित कर सकते हैं?

राजनेताओं द्वारा संपत्ति संचय पर नागरिकों की क्या सोच है

इन सवालों के उत्तर जानने के लिए हमने उत्तर भारतीय राज्य बिहार के मधेपुरा जिले में नागरिकों के सामाजिक रूप से भिन्न नमूनों (सैंपल्स) के बीच दो सर्वेक्षण किए।3 बिहार में विधायकों द्वारा संपत्ति संचय की दर राष्ट्रीय औसत के समान है (आकृति1 देखें)। हमारे पहले सर्वे का मुख्य हिस्सा लैब-इन-द-फील्ड (अध्ययन क्षेत्र की प्रयोगशाला) प्रयोग है जिसमें हमारे उत्तरदाताओं से हमने राजनेताओं को लेकर कई काल्पनिक लेकिन यथार्थवादी प्रोफाइल्स का मूल्यांकन किया। हमने भारतीय राजनीति में आम तौर पर विचारित और परीक्षित दोनो रूप से राजनेताओं के अनेक चरित्र-लक्षणों को अविशिष्ट (रैंडम) ढंग से बदल कर देखा (चंद्रा 2004, चॉचार्ड 2016, वैष्णव 2017), जैसे कि किस पार्टी से जुड़ाव है, जातीयता और आपराधिक चरित्र, और पहली बार राजनेताओं की संपत्ति और उसकी में वृद्धि के बारे में सूचनाएँ भी। इस प्रयोग से हमारे शोध संबंधी प्रश्नों को अच्छी तरह प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे हमारे लिए इस बात की कारणपूर्वक पहचान और तुलना करने की गुंजाइश बनती है कि राजनेताओं के अन्य चरित्र-लक्षणों की तुलना में उनके द्वारा धन-संपत्ति संचय करने को उत्तरदाता कितना महत्व देते हैं। और उससे हमारे लिए नागरिकों द्वारा मतदान संबंधी मूल्यांकन में संपत्ति संचय और राजनेताओं तथा उत्तरदाताओं के अन्य चरित्र-लक्षणों के बीच संभावित संबंध की खोज करने की गुंजाइश भी बनाई।

हमने अपने प्रायोगिक सर्वे के पूरक के बतौर दूसरा सर्वेक्षण किया, जिसका लक्ष्य संपत्ति संबधी घोषणाओं और उनमें वर्णित सूचनाएं प्राप्त करने की नागरिकों की जागरूकता, और वास्तविक प्रतिनिधियों द्वारा संपत्ति संचय के बारे में उत्तरदाताओं के अनुमानों की परिशुद्धता का मूल्यांकन करना था।

प्रयोग के परिणाम संकेत देते हैं कि हमारे उत्तरदाता पद पर रहने के दौरान धन-संपत्ति संचय को सख्त रूप से नकारते हैं। जैसा कि आकृति 2 में दर्शाया गया है, प्रयोग में दर्शाए गए राजनेताओं के हर चरित्र-लक्षण के प्रभावों से नागरिकों द्वारा इस बात की औसतन कम संभावना लगती है कि वे अपना काल्पनिक मत उस राजनेता के पक्ष में डालें जिसकी विवरणी में अधिक धन-संपत्ति वृद्धि दिखती हो। जैसे, जिन नागरिकों ने किसी राजनेता की विवरणी में संपत्ति की औसत से अधिक वृद्धि देखी, उनके द्वारा उसे अपना काल्पनिक मत देने की संभावना सपंत्ति नहीं बढ़ा पाने वाले राजनेता की तुलना में औसतन 35 प्रतिशत कम थी। उत्तरदाता अधिक ‘संपत्ति संचित करने वालों’ को अधिक भ्रष्ट, और अधिक हिंसा-प्रवण के रूप में भी देखते हैं जो बिहारी और भारतीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण समस्या है (वैष्णव 2017)।

यही नहीं, पद पर रहे राजनेताओं के रिकॉर्ड का प्रभाव के एलवा- निर्वाचन क्षेत्र में सेवा देने के उनके ट्रैक रिकॉर्ड (या उसकी कमी), तो नागरिकों द्वारा राजनेताओं के मूल्यांकन पर सबसे स्पष्ट प्रभाव संपत्ति संचय का था, यहां तक कि राजनेता की जाति (जिसे उत्तरदाता के सजातीय होने या न होने के जरिए मापा गया था), या राजनेता का दल (जिसे उत्तरदाता के पसंदीदा दल से होने या नहीं होने के जरिए मापा गया था) से भी अधिक था। संपत्ति संचय के प्रभाव के विपरीत, हमें इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला कि राजनेता की संपत्ति कोई मायने रखती है : राजनेता के संपत्ति संचय को स्थिर मानने पर नागरिकों ने धनी या गरीब राजनेताओं का बिल्कुल समान रूप में मूल्यांकन किया।4

आकृति 2. नागरिकों द्वारा काल्पनिक मतदान करने की पसंद पर धन-संपत्ति संचय और राजनेताओं के अन्य चरित्र-लक्षणों का प्रभाव

धन-संपत्ति संचय करने वाले राजनेता दुबारा क्यों चुने जाते हैं

धन-संपत्ति संचय के प्रति हमारे उत्तरदाताओं की सशक्त नकारात्मक प्रतिक्रिया इस बात को लेकर विवादास्पद होती दिखती है कि अपने कार्यकाल में तेजी से संपत्ति संचय करने वाले अनेक भारतीय राजनेता दुबारा जीत हासिल कर लेते हैं।5 संपत्ति संचय करने वालों का निर्वाचन और पुनर्निर्वाचन आंशिक तौर पर ऐसी बात है जिसका पता हम अपने शोध में नहीं लगा सकते हैं – जैसे कि अभियान के वित्तपोषण की क्षमता के कारण संपत्ति संचय करने वाले राजनेताओं की दलों के लिए उपयोगिता। इसलिए, हमने अपने आंकड़ों का उपयोग करके ऐसे अनेक संभव क्रियाविधि की तलाश किया, जिन से नागरिकों का व्यवहार राजनेताओं के बीच बड़े धन संचय की व्यापकता में योगदान दे सकता है। अपने दूसरे सर्वेक्षण के आंकड़ों पर निर्भर करके हमने सबसे पहले यह पाया कि हमारे अधिकांश उत्तरदाताओं को अपने राजनेताओं की घोषणाओं के बारे में जानकारी नहीं है, और उन्हें अपने वास्तविक प्रतिनिधियों के संपत्ति में वृद्धि की मात्रा का बोध नहीं है। यह बताता है कि वास्तविक दुनिया में संपत्ति संचयकर्ताओं के निर्वाचन की उच्च दरों और हमारे प्रयोग में संपत्ति संचय के प्रति उत्तरदाताओं की सख्त नापसंदगी के बीच संबध नहीं होने का कारण सार्वजनिक तौर पर घोषणाओं के उपलब्ध होने के बावजूद नागरिकों का परिचित नहीं होना हो सकता है।

हालांकि नागरिकों में जागरूकता की कमी इस असंबंधन (डिस्कनेक्ट) का एकमात्र कारण नहीं हो सकती है। अपने प्रयोग की ओर लौटकर हमने इस बात का पता लगाया कि किस हद तक नागरिकों की पसंदों का व्यापक ढांचा वास्तविक चुनावों में राजनेताओं द्वारा संपत्ति संचय की सूचना पर नकारात्मक प्रतिक्रिया होने की बड़ी संभावना कोरोक सकता है। पदधारियों द्वारा संपत्ति में बड़ी वृद्धि के प्रति हमारे उत्तरदाताओं की अस्वीकृति समग्र रूप से मजबूत है, लेकिन दो परिणाम ध्यान देने लायक हैं। पहला, जैसा कि आकृति 2 में देखा जा सकता है कि उत्तरदाताओं ने किसी राजनेता के कार्यकाल के रिकॉर्ड की सूचना को संपत्ति संचय की सूचना की अपेक्षा अधिक महत्व दिया। यह बात तब थी जब हमने प्रयोग में स्पष्ट रूप से संपत्ति के संचय को संदिग्धता के रूप में प्रस्तुत किया था। अतः धन-संपत्ति संचय के बारे में सूचना के संबंध में प्रतिक्रिया नकारात्मक हो सकती है, लेकिन इतनी सशक्त नहीं कि वह राजनेताओं के अन्य चरित्र-लक्षणों या अन्य आयामों पर प्रदर्शन के संबंध में होने वाली प्रतिक्रिया पर हावी हो जाय।

दूसरा, हमने पाया कि बिहार में सबसे बड़ी जाति (यादव) के सदस्य यादवों का प्रतिनिधित्व करने वाले दल - राष्ट्रीय जनता दल (राजद) - के साथ सबसे घनिष्ठता से जुड़े राजनेताओं द्वारा संपत्ति में की गई बड़ी वृद्धि को बर्दाश्त कर लेते हैं। सेंपल की मात्र की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए हम इस शेाध परिणाम के प्रति सतर्क हैं, लेकिन यह पैटर्न मोटे तौर पर यही दर्शाता है कि संपत्ति संचय संबधी सूचना के बारे में नागरिकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया हो सकती है जिसमें कुछ उप-समूह कार्यकाल के दौरान राजनेताओं, खास कर अपने पसंदीदा दल या अपने जाति समूह के राजनेताओं द्वारा संपत्ति संचय के प्रति अपेक्षाकृत अधिक सहिष्णु हो सकते हैं।6

नीतिगत निहितार्थ

इस शोध के परिणाम दर्शाते हैं कि पारदर्शिता के बढ्ने से संभावित लाभों को नीति के क्रियान्वयन, लोगों की जनसांख्यिकी, और अन्य प्रासंगिक कारकों के जरिए सीमित किया जा सकता है। हमारे परिणाम दर्शाते हैं कि मतदाता मोटे तौर पर घोषणाओं की विषयवस्तु से अपरिचित हैं। हमारे शोध परिणाम के साथ अगर जोड़कर देखें तो नागरिक बड़े संपत्ति संचय को नापसंद करते हैं, इसलिए आशाजनक राह यही है कि घोषणाओं की सूचनाओं को प्रचारित करने के बेहतर प्रयास चुनाव के उत्तरदायित्व तंत्र को मजबूत कर सकते हैं। हालांकि सूचना अपनी पूरी संभावनाओं के साथ पहुंचे और चुनावों पर वास्तविक प्रभाव डाले, इसके लिए आवश्यक यह है कि मतदाता केवल जागरूक ही नहीं हों, सूचनाओं को समझें भी। उच्च असाक्षरता दर और भारतीय राजनीति तथा नागरिक जीवन में नागरिकों की कम जुड़ाव इस संबंध में संभवतः महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं।

हमारे अन्य परिणाम संभवतः इस आशावादिता को और भी कमजोर कर देते हैं कि वित्तीय घोषणाओं से मतदाताओं को अपने प्रतिनिधियों द्वारा संपत्ति संचय को बाधित करने में मदद मिल सकती है। नागरिकों को घोषणाओं के बारे में सूचित कर देने पर भी आवश्यक है कि राजनेताओं की ईमानदारी उनके मतदान संबंधी फैसलों में प्रमुखता से झलके। अगर मतदाता बुनियादी लोक सेवाओं की मांग को प्राथमिकता देने के लिए बाध्य हों, जो होना नहीं चाहिए, तो यह भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है — काल्पनिक राजनेताओं के ऑफिस रिकॉर्ड पर हमारे उत्तरदाताओं द्वारा दिए गए काफी बल से तो ऐसा ही प्रमाण मिलता है। चूंकि वित्तीय घोषणाओं की सूचनाओं को प्रचारित करने वाले संस्थानों, समूहों और संगठनों का इन प्रासंगिक कारकों पर कोई नियंत्रण नहीं होता है, इसलिए हमारे शोध परिणामों का सुझाव है कि भारतीय राजनीतिक व्यवस्था की बड़ी समस्याओं के लिए सूचना प्रचार संबंधी पहलकदमियां कोई रामबाण नहीं हैं।

लेखक परिचय: साइमन चॉचार्ड कोलंबिया विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ पब्लिक एंड इंटरनेशनल अफेयर्स में तुलनात्मक राजनीति के लेक्चरार हैं। एस.पी. हरीश, विलियम एंड मैरी कॉलेज में शासन-विधि के सहायक प्रोफेसर हैं। मार्को क्लास्नजा जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर हैं, तथा एडमंड वॉल्श स्कूल ऑफ फॉरेन सर्विस और सरकारी विभाग में संयुक्त नियुक्ति भी हैं।

Notes:

  1. शपथ-पत्रों में वित्तीय सूचनाओं के अलावा संपर्क और परिवार संबंधी बुनियादी जानकारी, प्रत्याशी की उम्र, पेशा, शिक्षा, आपराधिक रिकॉर्ड, और किस पार्टी से जुड़ाव के संबंधित जानकारी रहती है।
  2. भारत के विधायकों के बारे में अनुमान एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के आंकड़ों पर आधारित हैं। और भारतीय परिवारों के लिए स्रोत भारत मानव विकास सर्वेक्षण (इंडिया ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे) है।
  3. यहअध्ययन 2015 में अप्रील से जून के बीच हुआ था। लैब (प्रयोगशाला) आधारित सर्वे में 1,020 लोगों का सर्वेक्षण किया गया था। फील्ड सर्वेक्षण के लिए सेंपल की संख्या 323 राखी गयी थी।
  4. यह राजनेताओं की पारिवारिक पृष्ठभूमि पर लागू होता है : हमारे उत्तरदाताओं ने संपन्न परिवारों से आने वाले राजनेताओं को गरीब से अमीर हुए राजनेताओं या मध्यवर्ग की पृष्ठभूमि वाले राजनेताओं के समान दर्जा हीं दिया है।
  5. कार्यकाल के दौरान अधिक संपत्ति संचय करने वाले पदधारियों के दुबारा निर्वाचित होने की संभावना दर संपत्ति में कम वृद्धि करने वाले पदधारियों से अधिक है।
  6. यह बताने के बावजूद कि अपने पूरे सेंपल में हमने यह प्रमाण नहीं पाया कि औसत उत्तरदाताओं ने संपत्ति संचय के मूल्यांकन में पक्षपातपूर्ण मूल्यांकन का गठन किया हो।अपने जाति या अपने पसंदीदा दल के संपत्ति संचय करने वालों के बारे में उनलोगों ने अन्य जाति या कम पसंदीदा दलों के संपत्ति संचयकर्ताओं के प्रति भिन्न राय रखा हो।
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