सामाजिक पहचान

पोषण में नारी सशक्तिकरण: सशक्तिकरण के विचार

  • Blog Post Date 07 अगस्त, 2019
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Sudha Narayanan

Indira Gandhi Institute of Development Research

sudha@igidr.ac.in

'वीमेनस एम्पावरमेंट इन न्यूट्रिशन इंडेक्स’ परियोजना में शोधकर्ताओं के एक समूह ने बिहार के अररिया, और ओडिशा के गंजाम, रायगड़ा, कंधमाल, और नयागढ़ में नारी सशक्तिकरण, कृषि, और पोषण संबंधी अनेक मुद्दों पर ग्रामीण महिलाओं और सामुदायिक कार्यकर्ताओं से बातचीत की। इस नोट में सुधा नारायणन ने इसकी चर्चा की है कि संसाधनों की कमी वाले ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं सशक्तिकरण के मुद्दे को कैसे देखती हैं। उन्होंने महिलाओं की धारणाओं और नारी सशक्तिकरण की व्यापक संकल्पना के बीच मौजूद फासले पर भी चर्चा की है।

लगभग दो दशक से ‘नारी सशक्तिकरण’ शब्द ने ‘महिलाओं की स्थिति’ और ‘लैंगिक समानता’ जैसे अन्य संबंधित शब्दों को धकियाकर किनारे कर दिया है और अंतर्राष्ट्रीय विकास में नीतिगत दस्तावेजों में गौरवपूर्ण स्थान हासिल कर लिया है। मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स (एमडीजी) ने सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (एसडीजी) के लिए जगह खाली कर दी लेकिन सभी महिलाओं और लड़कियों के सशक्तिकरण का लक्षय एसडीजीज के केंद्र में बरकरार है। वस्तुतः इस लक्ष्य की परिभाषा घरेलू हिंसा से मुक्ति, प्रजनन स्वास्थ्य, और भुगतानरहित कार्य जैसे व्यापक आयामों को शामिल करते हुए विकसित हुई है। तथापि नारी सशक्तिकरण के संपूर्ण विचार पर काफी रचनाओं में विचार-विमर्श किया गया है। अनेक प्रेक्षण इस बात की ओर संकेत करते हैं कि इसे परिभाषित करना पहले जैसा ही मुश्किल है और संभवतः मापना तो और कठिन और व्यर्थ है। नैला कबीर ने सशक्तिकरण की व्यापक समझ को इस रूप में परिभाषित किया है, ‘‘... ऐसे परिप्रेक्ष्य में जीवन संबंधी रणनीतिक चुनाव करने की लोगों की क्षमता में विस्तार, जिसमें उनकी इस क्षमता को पूर्व में नकार दिया गया था’’। उनका तर्क है कि चुनाव करने की क्षमता में परिवर्तन में तीन अंतर्सबंधित आयाम शामिल होते हैं जिनसे पसंद बनती है: संसाधन (वह स्थिति जिसके तहत चुनाव किए जाते हैं), एजेंसी (जो प्रक्रिया के केंद्र में होता है जिसके द्वारा चुनाव किया जाता है), और उपलब्धि (चुनावों का परिणाम)। 

ग्रामीण महिलाएं सशक्तिकरण के विचार को किस तरह से देखती हैं

अगर सशक्तिकरण सचमुच में ऐसी प्रक्रिया है जिसके जरिए महलाएं कर्तृत्व और आत्मनिर्णय प्राप्त करती हैं, तो संसाधनों की कमी वाले ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं सशक्तिकरण के विचार को किस तरह से देखती हैं? जिन महिलाओं को वे सशक्त मानती हैं, उनके साथ वे किन विशेषताओं को जोड़ती हैं, और सशक्त होने की अपनी खुद की भावना में वे किन कारकों को योगदान करने वाला मानती हैं? भारत में ओडि़शा के गंजाम, कंधमाल, रायगड़ा, और नयागढ़ तथा बिहार के अररिया में किए गए बहु-स्थानिक अध्ययन में हम लोगों ने अन्य मुद्दों के साथ-साथ इस मुद्दे की छानबीन करने के लिए नागरिक समाज की संस्थाओं के साथ मिलकर सामुदायिक शोधकर्ताओं और उत्तरदाताओं के साथ एक सघन अभ्यास किया। 

फोटो का श्रेय: कृष्णा रणवाड़े

 

सशक्तिकरण की परिभाषा बताने के लिए स्थानीय भाषाओं – बंगला, हिंदी, उडि़या, तेती और कुई – में उपयुक्त शब्द पाने की आरंभिक बाधा दूर होने के बाद हम इन समुदायों में महिलाओं द्वारा बताई गई सशक्तिकरण की सरल विशेषताएं जानकर हैरान थे। किसी के सशक्त होने की बार-बार दुहराई जाने वाली परिभाषा थी – बैठक या बाहर काम करने के लिए साहसिक प्रयास करने में सक्षम होना, सार्वजनिक रूप से बोलने में सक्षम होना, और स्पष्ट रूप से कहकर या मांगें रखकर ‘समस्याओं का समाधान करना’। ओडिशा के गंजाम की एक महिला ने कहा कि सशक्त होने का अर्थ प्रतिवादों या रैलियों के दौरान ‘‘सामने खड़ा होना’’ और ‘‘जोर से बोलना’’ है। नेतृत्व और प्रभाव का विचार – जानकारी होने और प्रशिक्षण कार्यक्रम में खुद सीखी गई बातें अन्य महिलाओं को सिखाने का संयोजन – इन धारणाओं पर हावी था । सशक्त होने के लक्षणों में साहस और आत्मविश्वास होने का बार-बार उल्लेख किया गया। जैसा कि बिहार के अररिया में एक महिला ने कहा, ‘‘मैं सशक्त हूं क्योंकि मैं घर से बाहर जाती हूं, अन्य लोगों को काम के लिए बुलाती हूं, और उन्हें अपने साथ बाहर निकलने तथा नई चीजें सीखने के लिए समझाती हूं। मैं कहती हूं कि इससे आपकी जानकारी और समझ-बूझ बढ़ेगी, और आपका परिवार उन्नति करेगा। मैं वृद्धावस्था पेंशन (की मांग के लिए हुई रैली में भाग लेने) के लिए दिल्ली तक गई हूं।’’ एक महिला ने कहा, ‘‘हमें इसका फैसला नहीं करना चाहिए कि कौन सशक्त है और कौन नहीं और खुद को जानकार बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए’’, जबकि दूसरी महिला ने कहा कि कोई भी सशक्त हो सकता है और यह किसी के लिए संरक्षित नहीं है इसलिए इसे सबके द्वारा हासिल किया जा सकता है।

मजे की बात है कि इन गुणों को सहायक गुणों के रूप में देखा गया जो महिलाओं को विभिन्न कार्यों, या ‘‘घर के सभी कार्यों’’ को ‘‘कुशलता के साथ’’ करने में सक्षम बनाएगा। इसमें यह विचार शामिल था कि उसके बाद महिलाओं में अनेक कार्यों को करने और हर चीज का प्रबंधन करने की क्षमता आ जाएगी और वे सुनिश्चित करेंगी कि उनका परिवार तरक्की करे, बच्चों का सही से लालन-पालन हो और उन्हें स्कूल में पढ़ाया जाय। 

सशक्तिकरण के बाहरी परिप्रेक्ष्य

महिलाओं द्वारा स्पष्ट किए गए अनेक पहलू सशक्तिकरण की अधिकांश धारणाओं में महत्वपूर्ण आयामों के बतौर दिखते हैं। फिर भी अनेक ऐसे अन्य महत्वपूर्ण आयाम हैं जो सशक्तिकरण के बाहरी परिप्रेक्ष्यों से आते हैं, अर्थात वह समझ जो शोधकर्ताओं को अकादमिक साहित्य से प्राप्त होती है और सशक्तिकरण के जो पहलू समुदाय के अंदर से नहीं आ पाते। इसमें घरेलू हिंसा से मुक्ति; विवाह की उम्र, और प्रजनन समेत अनेक मुद्दों के संबंध में निर्णय करना; उत्पादक संसाधनों पर कानूनी और अन्य प्रकार का नियंत्रण और पहुंच; और महिलाओं के भुगतानरहित कार्य के बोझ में कमी लाने वाली ढांचागत स्थितियां और सामाजिक प्रचलन शामिल हैं।  

दूसरे शब्दों में अनेक महिलाएं सशक्तिकरण के विचारों को स्पष्ट करने में सक्षम थीं, यहां तक कि अपने परिप्रेक्ष्य में भी और उनके जीवंत अनुभव को अत्यंत असशक्तकारी भी समझा जा सकता है। तो फिर कुछ महिलाओं ने बड़े  सारे सामाजिक प्रचलनों और स्थितियों को असशक्तकारी स्थिति के रूप में क्यों नहीं देखा? 

धारणाओं में कमी

इसके लिए हमारी ओर से तीन संभावित स्पष्टीकरण प्रस्तुत हैं। एक स्पष्टीकरण यह है कि अनेक सामुदायिक शोधकर्ता संघों/ यूनियनों और गैर-सरकारी संगठनों के क्रियाकलापों के हिस्से के बतौर सेल्फ हेल्प ग्रुप्स और सामूहिक कार्रवाई में शामिल रहे हैं। इसीलिए सशक्तिकरण के उनके अपने चरित्र चित्रण संभवतः उनके हाल के वर्षों के अनुभवों पर केंद्रित रहे हों। एक वैकल्पिक स्पष्टीकरण यह है कि महिलाएं अपने परिवार के अंदर फैसले लेने और परिवार के अंदर संसाधनों और यहां तक कि सार्वजनिक वस्तुओं पर नियंत्रण की क्षमता जैसे मुद्दों को अस्थिर और सक्रिय रूप में देखती हैं  जो परिवार के अंदर उनकी अपनी स्थिति के साथ बदलते रहते हैं। वही महिला जो कर्तृत्व से रहित हो और इसलिए संभवतः बहू के रूप में अशक्त हो लेकिन सास के रूप में अधिक सशक्त हो जाती है । अनेक साक्षात्कारों में यह बार-बार आने वाली थीम थी कि सास की तुलना में बहुओं की संसाधनों तक बहुत कम पहुंच और अधिकांश मामलों में बहुत कम चलती थी। अतः महिलाओं ने इन्हें संभवतः एक तरह से ऐसे प्रचलनों के हिस्से के बतौर स्वीकार कर लिया था जिन्हें बदलना जरूरी नहीं था।

या अधिक संभावना इस बात की हो सकती है कि अशक्त कर रही ढांचागत स्थितियों और मानकों के व्यापक निर्देशों को अभी भी ठोस तरीके से चुनौती नहीं दी जा सकी है और/ या संभवतः उनलोगों ने रणनीतिक रूप से ऐसा नहीं करना और झगड़ा नहीं मोल लेना चाहा है। ऐसा लगता है कि अनेक महिलाओं के लिए संसाधनों पर नियंत्रण और संसाधनों के आबंटन में महत्वपूर्ण पकड़ होने के बावजूद उनका जीवंत अनुभव अभी भी उन्हें कमजोर ठहराता है। जैसे, कि यह तय कर लेने के बाद भी कि क्या खरीदना, पकाना, और परोसना है, वे अक्सर भूखी ही सो जाती हैं। ‘‘अगर हम अधिक बोलें या तर्क करें तो अधिक असहमति होगी.... तो फिर अपना मूड क्यों खराब करें .... इसीलिए हमलोग अधिक तर्क नहीं करती हैं’’, एक सामुदायिक शोधकर्मी ने कहा।

ऐसा लगता कि सेल्फ हेल्प ग्रुप्स और अन्य सामूहिक उपक्रमों ने अपने अधिकारों के बारे में महिला सदस्यों की जागरूकता बढ़ा दी है, और समूह में होने पर महिलाओं ने इस बात से ताकत हासिल कर ली है कि वे अपने अधिकार अकेली नहीं मांग रही हैं। अगर महिलाओं के लिए परिणामों में सुधार नहीं भी होता है, तो भी समुदायों की ओर से मुद्दे उठाने वाली गतिविधियों में सार्वजनिक क्षेत्र में भागीदारी पर उनके लिए दंडों या दंडात्मक कार्रवाइयों का जोखिम कम रहता है। इन महिलाओं को संघर्ष में कानूनों और कार्यक्रमों के लिहाज से राजसत्ता के कुछ तत्वों का सहयोग भी मिलता है। इसके विपरीत, स्पष्ट बोलने की बात तो छोड़ ही दें, महिलाएं घरेलू या निजी मामलों में सशक्तिकरण के अपमान को शायद ही कभी स्वीकार भी करती हैं। यह तथ्य दर्शाता है कि अपने परिवार में अधिकार बोध और प्रचलनों को चुनौती देना संभवतः अधिक मुश्किल है। ऐसा भी हो सकता है कि पुरुषों को किसी गैर-सरकारी संगठन या नागरिक समाज संस्था के हिस्से के बतौर अपनी पत्नियों के काम कम डरावने और अधिक ग्राह्य लगे बजाय कि अगर वे अपने परिवार में संसाधनों और अधिकारों पर दावा करें । बिहार के अररिया में एक शोधकर्ता ने जब श्रमिकों के अधिकार पर प्रशिक्षण में भाग लेना शुरू किया, तो उसने कहा कि ‘‘लोग, खास कर पुरुषों ने कहा : तुम प्रशिक्षण में क्यों भाग ले रही हो, तुम तो साक्षर भी नहीं हो, यह तुम्हारा काम नहीं है ...’’ और कहा कि ‘‘नीतीश कुमार (राज्य के मुख्यमंत्री) तो पागल हो गए हैं, उन्होंने महिलाओं को बहुत आवाज और आजादी दे दी है।’’ कुछ महिलाओं का दावा था कि लोग अब इसे स्वीकार करने लगे हैं और उनके पति और बच्चे अब उनके काम पर गर्व भी करते हैं। 

अनेक महिलाओं के लिए सशक्तिकरण की प्रक्रिया शुरू हुई है

यह बात सच है कि बैठकों में भाग लेने, बोलने, और अपनी समस्याएं हल करने की महिलाओं की बढ़ती क्षमता बहुत बड़े बदलाव के लिए अंकुर भर हो सकती है। लेकिन इस बात के संकेत मौजूद हैं कि महिलाएं इस बात को लेकर जागरूक हैं कि बड़े मुद्दे बरकरार हैं। जैसे, अनेक महिलाओं ने मजदूरी में असमानता के बारे में खुलकर कहा: ‘‘क्या पुरुष दो हाथ से काम करते हैं और महिलाएं एक हाथ से काम करती हैं कि महिलाओं को कम मजदूरी मिलती है?’’ वे महिला-प्रधान परिवारों के सामने मौजूद समस्याओं को भी कबूल करती हैं: ‘‘छोटे बच्चों वाली विधवा को तब तक समस्याओं का सामना करना पड़ता है जब तक बच्चे बड़े नहीं हो जाते हैं।’’ सार्वजनिक दायरे में चलने वाली सशक्तिकरण की प्रक्रिया निजी दायरे में कब और कैसे पहुँचती है और परिवार के अंदर सशक्तिकरण में कब परिणत होती है इस पर ध्यान देने की जरूरत है। जहां भारत में ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण को समझने और उसमें सहयोग करने के लिए बहुत कुछ करना बाकी है, वहीं इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अनेक लोगों के लिए यह प्रक्रिया – जो की सही में एक ‘प्रक्रिया’ है – शुरू हो चुकी है।

यह नोट 'वीमेनस एम्पावरमेंट इन न्यूट्रिशन इंडेक्स (पोषण में नारी सशक्तिकरण सूचकांक) शीर्षक परियोजना के हिस्से के बतौर मई से जुलाई 2016 में किए गए गुणवत्तापरक फील्डवर्क पर आधारित है। इनोवेटिव मेथड्स एंड मैट्रिक्स फॉर एग्रीकल्चर एंड नुट्रिशन एक्शन्स(इम्माना ग्रांट्स) विकसित करने के लिए परियोजना को कंपिटीटिव रिसर्च ग्रांट द्वारा वित्तीय सहायता प्रदान की गई है। इम्माना का वित्तपोषण यूके ऐड और यूके सरकार द्वारा किया जाता है। समुदाय के अंदर के पच्चीस प्रशिक्षित शोधकर्ताओं ने 255 उत्तरदाताओं का वाइस रिकॉर्डर पर मौखिक बयान रिकॉर्ड किया, जिसमें नारी सशक्तिकरण, कृषि और पोषण से संबंधित अनेक समस्याएं शामिल थीं।

यह परियोजना कॉलेबरेटिव रिसर्च एवं डिस्सेमिनेशन (CORD), इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च (IGIDR), यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्सस ऐट ऑस्टिन, और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशन (हैदराबाद) की पहल है। हमारे साथ साझेदारी के लिए हम जेजेएसएस, अग्रगामी, संभव, प्रदान, और अन्वेषा के और इस शोध को कार्यरूप देने के लिए हम अनेक सामुदायिक शोधकर्ताओं के आभारी हैं। अनुराधा डे, मार्जिया फोंटाना, भारती कुलकर्णी, और एरिन लेंट्ज भी चर्चा और टिप्पणियों के लिए धन्यवाद के पात्र हैं।

नोट में प्रकट किए गए विचार अनिवार्यतः उन संस्थाओं के विचारों को व्यक्त नहीं करते हैं जिनसे लेखिका सम्बंधित हैं।

लेखक परिचय: सुधा नारायणन इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च, मुंबई में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

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