सामाजिक पहचान

दस प्रतिशत कोटा: क्या जाति अब पिछड़ेपन की सूचक नहीं रही है?

  • Blog Post Date 06 जून, 2019
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संविधान (124वां संशोधन) विधेयक 2019 सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में 10 प्रतिशत आरक्षण देकर ‘‘आर्थिक रूप से पिछड़े तबकों’’ को आगे बढ़ाने के प्रावधान का प्रयास करता है। इसका मतलब कोटा के आधार के बतौर जाति से फोकस हटना है। इस आलेख में गरीब के रूप में वर्गीकृत लोगों की जाति प्रोफाइल का विश्लेषण किया गया है, और स्पष्ट किया गया है कि अनेक आर्थिक सूचकों में जाति-आधारित असमानताओं की मौजूदगी अभी भी जारी है। 

 

आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के लिए 10 प्रतिशत कोटा के नाम से मशहूर संविधान (124वां संशोधन) विधेयक 2019, भारत की आरक्षण नीति के इतिहास में एक लैंडमार्क है – इसलिए नहीं कि यह हाशिये पर और कलंकित समूहों के लिए कोटा में अंतर्निहित मौलिक उद्देश्य को आगे बढ़ाता है, बल्कि इसलिए कि इसने आरक्षणों के तर्क को पूरी तरह सिर के बल खड़ा कर दिया है। 

सबसे उत्पीडि़त समूहों के लिए आरक्षण की कल्पना ‘क्षतिपूरक भेदभाव’ – अपनी अछूतजातिगत स्थिति के कारण ऐतिहासिक भेदभाव और गहरे लांछन का सामना कर रहे व्यक्तियों के लिए समसामयिक अक्षमताओं के उपचारात्मक उपाय – के रूप में की गई थी। 

आर्थिक आधार पर कोटा और विशेष राइडर के साथ कि यह गैर-अनुसूजित जाति/जनजाति के आर्थिक रूप से पिछड़े तबकों के लिए है, सकारात्मक कार्रवाई की नीति में हुए दो शिफ्ट को दर्शाता है: एक तो यह कि जाति अनिवार्यतः सामाजिक पिछड़ापन की सूचक नहीं है; और दूसरा यह कि आरक्षण का खास उद्देश्य पूर्व में हुए या अभी हो रहे जाति-आधारित भेदभाव का उपचार करना ही नहीं है। साथ ही, नया कोटा कथित रूप से तो आर्थिक रूप से पिछड़े तबकों के लिए है, लेकिन वास्तव में सरकार ने जो आय की 8 लाख रु. प्रति वर्ष सीमा तय की है, उसके नीचे के परिवारों को आर्थिक रूप से कमजोर के रूप में वर्गीकृत कर दिया गया है। सरकार की नीति में ये शिफ्ट कितने वैध हैं? क्या आय के मामले में सरकार द्वारा प्रस्तावित सीमा वास्तव में आर्थिक रूप से प्रतिकूल परिस्थिति को व्यक्त करती है

हमने भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण (आइएचडीएस) के दो राउंड्स के आंकड़ों का उपयोग करके इन प्रश्नों का समधान करने का प्रयास किया है। हमने सबसे पहले आधिकारिक रूप से गरीब घोषित (अर्थात गरीबी रेखा के नीचे स्थित या बीपीएल) लोगों में जाति-आधारित विषमताओं पर मौजूद प्रमाण की जांच की है, और उसके बाद इसकी जांच की है कि 2005 से 2012 के बीच इनमें क्या बदलाव आया है। हालांकि गरीबी रेखा आर्थिक रूप से पिछड़े तबके के लिए कोई तय सीमा नहीं है, लेकिन इस पहले प्रश्न के समाधान के लिए यह आवश्यक प्रमाण है कि क्या जाति ने पिछड़ेपन का सूचक होना बंद कर दिया है? देशपांडे और रामचंद्रन (2019) में हमने शिक्षा, रोजगार, मजदूरी आदि आर्थिक सूचकों में जाति की समग्र विशेषता का सबसे ताजातरीन प्रमाण उपलब्ध कराया है और दर्शाया है कि अनेक सूचकों के मामले में जाति-संबंधी फासले या तो स्थिर हैं या बढ़ रहे हैं। यह देखते हुए कि नया कोटा बिना किसी विशेष जाति समूह का हवाला दिए तथाकथिक आर्थिक रूप से कमजोर समूह के लिए लक्षित है, यह सवाल पैदा होता है कि गरीबों के बीच जाति-आधारित अंतर महत्वपूर्ण हैं या नहीं। 

क्या जाति गरीबों के बीच अभी भी महत्व रखती है?

हम सबसे पहले तेंदुलकर समिति की गरीबी रेखा के अनुसार अधिकृत रूप से वर्गीकृत गरीबों (बीपीएल) पर फोकस करते हैं। तालिका 1 में गरीब ब्राह्मणों, गरीब अब्राह्मण उच्च जातियों, और गरीब अनुसूचित जातियों (दलितों) के लिए कॉलम 1-3 में 2005 के और 5-7 में 2012 के चुनिंदा सूचक प्रस्तुत किए गए हैं। 

आय और संपत्ति

वर्ष 2005 में, अनुसूचित जाति को गरीब लोगों की औसत वार्षिक पारिवारिक आय मोटे तौर पर गरीब ब्राह्मणों की औसत आय का 76 प्रतिशत और गरीब अब्राह्मण उच्चजातीय लोगों की आय का लगभग 56 प्रतिशत थी। वर्ष 2012 में यह गरीब ब्राह्मणों की आय का 73 प्रतिशत और गरीब अब्राह्मण उच्चजातीय लोगों की आय का भी लगभग 73 प्रतिशत हो गई। इस प्रकार इन दोनो वर्षों में गरीब दलितों की आय गरीब ब्राह्मणों और गरीब अब्राह्मण उच्चजातीय लोगों से काफी कम थी। सात वर्षों की अवधि में हम दलितों और ब्राह्मणों तथा अब्राह्मण उच्चजातीय लोगों की आय में कुछ कनवर्जेंस (संमिलन) होते देखते हैं, लेकिन गौर करें कि ब्राह्मण और अब्राह्मण उच्चजातीय लोगों के बीच कनवर्जेंस बहुत तेज है। वर्ष 2005 में गरीब ब्राह्मणों और गरीब दलितों की आय के बीच फासला गरीब दलितों की आय का मोटे तौर पर 31 प्रतिशत था। वर्ष 2012 में यह फासला गरीब दलितों की आय का मोटे तौर पर 36 प्रतिशत हो गया।   

भूस्वामित्व या खेती के लिहाज से विषमता और भी तीखी है। जिनलोगों ने खेती में लगे होने की सूचना दी, उनमें 59 प्रतिशत गरीब ब्राह्मणों के पास 2005 में अपनी जमीन या जोत थी और यह आंकड़ा 2012 में बढ़कर 91 प्रतिशत हो गया। गरीब अब्राह्मण उच्चजातीय लोगों के मामले में यह 39 प्रतिशत से बढ़कर 75 प्रतिशत हो गया जो काफी तो है लेकिन ब्राह्मणों की तुलना में कम है। सबसे कम वृद्धि गरीब दलितों के मामले में हुई जो 35 प्रतिशत से बढ़कर 48 प्रतिशत हो गई। 

यह प्रमाण दर्शाता है कि गरीब ब्राह्मणों और गरीब अब्राह्मण उच्चजातीय लोगों की तुलना में गरीब दलित आय और संपत्ति के लिहाज से स्पष्ट तौर पर बुरी स्थिति में हैं। भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण (आइएचडीएस) के दौरान 2012 में आर्थिक स्थिति के बारे में अपनी धारणा को लेकर एक प्रश्न पूछा गया था: ‘‘आपके अनुसार आपका परिवार गरीब है, मध्यवर्गीय है या सुविधासंपन्न स्थिति में है?’’ गरीबों द्वारा इस सवाल के जवाब में जातिगत अंतर का विश्लेषण आंखें खोलने वाला है: सिर्फ 40 प्रतिशत गरीब ब्राह्मणों ने खुद को गरीब के रूप में देखा जबकि 77 प्रतिशत गरीब दलितों और सभी दलितों के 57 प्रतिशत हिस्से ने खुद को गरीब के रूप में देखा। अपने बारे में यह धारणा सापेक्ष सामाजिक हैसियत के कारण बनी है जो वस्तुगत आर्थिक प्रतिकूलता के बावजूद गरीब ब्राह्मणों के लिए ऊंची बनी हुई है। वहीं गरीबी रेखा के नीचे नहीं होने के बावजूद यह गैर-गरीब दलितों में नीची बनी हुई है। मध्यवर्ग और सुविधासंपन्न श्रेणियों में भी यही पैटर्न दिखता है। 

तालिका 1. जाति समूहों में गरीब; 2005 और 2012, संपूर्ण भारत 

स्रोत: आइएचडीएस के 2005 और 2012 के पारिवारिक आंकड़ों के आधार पर लेखकों की गणना 

 

शिक्षा

हम देखते हैं कि 2005 में वयस्कों के लिए शिक्षा के औसत वर्ष गरीब ब्राह्मण परिवारों में सर्वाधिक 3.46 वर्ष, उसके बाद गरीब अब्राह्मण उच्चवर्गीय परिवारों में 3.22 वर्ष, गरीब दलितों में 2.36 वर्ष और सभी दलितों में 3.15 वर्ष थे। वर्ष 2012 तक शिक्षा के औसत वर्ष सभी समूहों के लिए बढ़ गए। लेकिन शिक्षा के औसत वर्ष गरीब ब्राह्मण परिवारों के लिए लगभग दो वर्ष बढ़कर 5.55 वर्ष और गरीब अब्राह्मण उच्चवर्गीय परिवारों के लिए लगभग एक वर्ष बढ़कर 4.21 वर्ष हो गए जबकि सात वर्षों के अंतराल में गरीब दलितों के लिए यह मात्र 3.61 प्रतिशत पर पहुंचा। सर्वाधिक शिक्षित वयस्क के लिए शिक्षा के वर्षों की संख्या में भी जाति के आधार पर ऐसा ही फासला दिखता है जिसमें गरीब ब्राह्मणों की शिक्षा के वर्ष गरीब दलितों ही नहीं, सभी दलितों से अधिक थे। 

चूंकि यहां पर चर्चा सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा संस्थानों में कोटा के बारे में हो रही है इसलिए इन पदों के लिए इन समूहों की सापेक्ष पात्रता की जांच करना उपयोगी है। गरीब परिवारों में 12 वर्ष या अधिक शिक्षा1 प्राप्त कम से कम एक सदस्य वाले गरीब परिवारों के अनुपात की जांच दर्शाती है कि 2005 में 22.81 प्रतिशत गरीब ब्राह्मण परिवारों में कम से कम एक सदस्य की शिक्षा 12 वर्ष या उससे अधिक थी जबकि गरीब अब्राह्मण उच्चजातीय परिवारों और गरीब अनुसूचित जाति के परिवारों में यह अनुपात शून्य था। वर्ष 2012 में कोटा का लाभ लेने के लिए पात्र कम से कम एक सदस्य वाले गरीब ब्राह्मण परिवारों का अनुपात बढ़कर 39.37 प्रतिशत हो गया जबकि गरीब अब्राह्मण उच्चजातीय परिवारों और गरीब अनुसूचित जाति के परिवारों के लिए यह अनुपात क्रमशः 16.48 प्रतिशत और 11.71 प्रतिशत ही पहुंचा। इसलिए शिक्षा प्राप्ति के आधार पर गरीब ब्राह्मण परिवार नए कोटा का लाभ लेने के लिहाज से सबसे आगे हैं। 

रोजगार

नौकरी पाने में अंतरों का विश्लेषण अनेक तरीकों से किया जा सकता है। एक रियलिटी चैक हमें बताता है कि अनियमित श्रम गरीबों के काफी बड़े हिस्से के रोजगार की प्रकृति की विशेषता है। वर्ष 2005 से 2012 के बीच सभी जाति समूहों के लिए सभी काम करने वाले व्यक्तियों में अनियमित काम वाले गरीब व्यक्तियों का अनुपात घट गया, लेकिन सबसे अधिक 14 प्रतिशत अंकों की कमी ब्राह्मणों के लिए हुई जो 85 से 71 रह गया। वहीं, अब्राह्मण उच्चजातीय लोगों के लिए 7 (96 से 89) और दलितों के लिए 5 (97 से 92) प्रतिशत अंकों की कमी हुई। सभी दलितों में भी अनियमित श्रमिकों का अनुपात गरीब ब्राह्मणों की अपेक्षा अधिक था। 

सभी जातियों के गरीबों के लिए औपचारिक क्षेत्र में सरकारी नौकरी दूर का सपना बनी हुई है और 1 प्रतिशत गरीब ब्राह्मण तथा दलित ही सरकारी नौकरियों में हैं। यह तथ्य कि अन्य भौतिक सूचकों में काफी अंतर के बावजूद सरकारी नौकरियों में गरीब ब्राह्मणों और दलितों का समान प्रतिशत होना संभवतः अनुसूचित जातियों के लिए मौजूद आरक्षण के कारण है। 

सभी अनुसूचित जातियों के साथ तुलना

कॉलम 4 और 8 में गरीबों ही नहीं, सभी अनुसूचित जातियों के लिए क्रमशः 2005 और 2012 में सभी सूचकों के मान दर्शाए गए हैं। जाति समूहों की सापेक्ष स्थिति यहां और भी स्पष्ट हो जाती है। इसमें हम देखते हैं कि सभी दलित या तो गरीब ब्राह्मणों के समकक्ष हैं या महज कुछ ऊपर हैं। सारी शिक्षा से दलितों को बाहर रखने की ऐतिहासिक विरासत यहां शिक्षा के वर्षों के लिहाज से दिखती है। सभी दलितों के लिए शिक्षा के औसत वर्ष दोनो ही वर्षों में गरीब ब्राह्मणों से कम हैं। वहीं, अनियमित नौकरियों में सभी दलितों का अनुपात दोनो ही वर्षों में गरीब ब्राह्मणों से अधिक है।

आठ लाख रु. प्रति वर्ष आय: आर्थिक रूप से कमजोर तबका?

अभी तक की तुलना बीपीएल परिवारों पर आधारित रही है, जिन्हें आधिकारिक रूप से ‘‘गरीब’’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है। जो भी यह तर्क देते हैं कि आर्थिक रूप से प्रतिकूल परिस्थिति वंचना की वास्तविक संकेतक है और जाति अब प्रासंगिक नहीं रह गई है, उन सभी के लिए ऊपर प्रस्तुत की गई तुलना रियलिटी चैक होनी चाहिए। 

इस कोटा के मकसद से आर्थिक रूप से कमजोर तबके में उन परिवारों को शामिल किया गया है जिनकी वार्षिक आय 8 लाख रु. से कम है। भारतीय मानव विकास सर्वे में 98.26 प्रतिशत ब्राह्मण परिवारों, 97.93 प्रतिशत अब्राह्मण उच्चजातीय परिवारों और अनुसूचित जाति के 99.75 प्रतिशत परिवारों ने अपनी आय आर्थिक रूप से कमजोर तबके की सीमा से कम होने की सूचना दी है। 

राष्ट्रीय स्तर पर आय संबंधी आंकड़े आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। एक अन्य अनुमान से पता चलता है कि 2015 में सभी परिवारों में से 98 प्रतिशत की आय 6 लाख रु. या इससे कम थी। हमें याद रखने की जरूरत है कि दिल्ली के संभ्रांत प्राइवेट स्कूलों में नामांकन के लिए आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के पहचान की आय संबंधी उच्चतम सीमा यह है कि माता-पिता की वार्षिक आय 1 लाख रु. से कम होनी चाहिए। अतः इस कोटा को आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के लिए कोटा के रूप में दिखाना पूरी तरह गलत है। 

गैर-अनसूचित जाति/जनजाति और गैर-अन्य पिछड़ा वर्ग परिवारों के लिए 8 लाख रु. या उससे  कम आय का कोटा तय करके सरकार प्रभावी रूप में पूरी तरह से उन हिंदू उच्चजातीय लोगों के लिए कोटा तैयार कर रही है जो आय संबंधी वितरण में शीर्ष 1 प्रतिशत में शामिल नहीं हैं। इसका अर्थ हुआ कि जाति नहीं, आर्थिक मापदंडों पर कोटा प्रस्तुत करने के बावजूद, यह काफी हद तक जाति आधारित कोटा है, जो कोई भी सामाजिक भेदभाव नहीं झेलने वाली जातियों के लिए लक्षित है। इसके विपरीत, वे कर्मकांडी शुद्धता के पैमाने पर सबसे ऊंचे दर्जे वाले हैं। 

10 प्रतिशत कोटा की वैधता पर सवाल खड़ा करके हम यह सुझाव बिल्कुल नहीं दे रहे हैं कि (वास्तविक) गरीबों के लिए लक्षित संरक्षी, समावेशी या उपचारात्मक उपायों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए। वैसी सार्वजनिक नीतियों में हमारा दृढ़ विश्वास है जो वर्ग, जाति, धर्म, लिंग और अन्य सामाजिक संकेतकों सहित विभिन्न आयामों के लिहाज से विविधता को बढ़ावा दें। 

इसके अलावा, 10 प्रतिशत कोटा के लिए आय संबंधी सीमा से स्पष्ट हो जाता है कि यह वास्तव में गरीबों को लक्षित नहीं कर रही है। इसकी बजाय, यह भ्रम बनाए रखने के लिए कि अच्छी नौकरियां सुनिश्चित करने के लिए कुछ किया जा रहा है, इसके जरिए उच्चजातीय लोगों के लिए हाथ से निकलते जा रहे अवसरों को आरक्षित किया जा रहा है। अगर सरकार गरीबी से निपटना चाहती है, तो उसे विकास प्रक्रिया की प्रकृति को अधिक समावेशी बनाने के साथ गरीबी निवारण कार्यक्रमों को मजबूत करने की जरूरत है। लोक शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति गंभीर बनी हुई है जो सीखने के निम्न स्तर और कुपोषण के उच्च स्तर से व्यक्त होती है। सामाजिक अधिसंरचना में निवेश की और न्यायोचित विकास का मंच देने के लिए आरंभिक जीवन के अवसरों में समानता की ओर लक्षित नीति की सख्त जरूरत है। 

लेखक परिचय: अश्विनी देशपांडे अशोका विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्रॉफेसर हैं। राजेश रामचंद्रन हीडेलबर्ग विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में पोस्ट-डॉक्टोरल फैलो हैं। 

नोट्स :

  1. यह इस अनुमान पर आधारित है कि निम्नस्तरीय सरकारी नौकरी पाने के लिए व्यक्तियों के पास कम से कम माध्यमिक शिक्षा और इंटर कॉलेज में 12 वर्षों तक स्कूलिंग होनी चाहिए। 
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