पर्यावरण

कोविड-19, जनसंख्या और प्रदूषण: भविष्य के लिए एक कार्ययोजना

  • Blog Post Date 21 जुलाई, 2020
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Shweta Gupta

University of Hyderabad

shwetagupta9586@gmail.com

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Rishabh Mahendra

Copy Editor | Hindi Lead, I4I

rishabh.mahendra@theigc.org

वर्तमान में चल रही कोविड-19 महामारी के बहुआयामी प्रभाव दिख रहे हैं और इसने हमारे समक्ष दो दीर्घकालिक मुद्दे भी रख दिये हैं। वे हैं - जनसंख्या और प्रदूषण। इस आलेख में ऋषभ महेंद्र एवं श्वेता गुप्ता ने कोविड-19 मामलों पर जनसंख्या घनत्व के प्रभाव का आकलन किया है और यह बताया है कि वायु प्रदूषण से कोविड-19 का क्या संबंध है? साथ हीं उन्होने वर्तमान संकट के संदर्भ में और भविष्य के लिए नीतिगत सुझाव दिए हैं।

 

कोविड-19 के प्रकोप को अब (21 जुलाई तक) लगभग आठ महीने हो गए हैं और इसने 1.48 करोड़ से अधिक लोगों को प्रभावित किया है तथा वैश्विक स्तर पर यह महामारी अब तक 6,13,000 से अधिक लोगों की जान ले चुकी है। वर्तमान में सक्रिय मामलों में से, 52.72 लाख लोग हल्के लक्षणों से संक्रमित हैं और लगभग 59,800 गंभीर या क्रिटिकल1 हैं। इस वायरस ने विश्व स्तर पर गंभीर प्रभाव डाला है। अनेक देशों की आर्थिक एवं विकासात्मक गतिविधियां नाजुक स्थिति में पहुंच गई हैं। इसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे गंभीर खतरा माना जा रहा है।

जबकि पेशेवर चिकित्सक प्रभावितों के इलाज में व्यस्त हैं तथा विश्व भर के वैज्ञानिक इस बीमारी से निदान के लिए टीका विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। दुनिया भर की सरकारों ने अपनी अर्थव्यवस्था को लॉकडाउन (चरम से हल्के तक) लगा कर प्रभावित किया है। लॉकडाउन के परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था में विभिन्न क्षेत्रों की इकयों बंद कर दिया गया है। कोविड-19 के कारण, दुनिया की लगभग एक तिहाई आबादी लॉकडाउन से प्रभावित है। इस महामारी का प्रभाव बहुआयामी हुआ है। प्रथम दृष्‍टया, इसने भुखमरी, गरीबी बढ़ाने, मंदी तथा आपूर्ति श्रृंखला में असमानता के अतिरिक्‍त प्रभावों के साथ स्वास्थ्य संकट पैदा कर दिया है। दो अन्य पहलू ऐसे हैं जो दीर्घावधि के लिए महत्‍वपूर्ण हैं, जिन्‍हें इस महामारी ने हमारे ध्यान में लाया है। वे हैं - प्रदूषण और जनसंख्या (घनत्व)।

कोविड-19, लॉकडाउन और प्रदूषण

भारत की वर्तमान स्वास्थ्य सेवा-क्षमता को देखते हुए, लॉकडाउन से बेहतर कोई उपाय नहीं था। जबकि लॉकडाउन के सामाजिक-आर्थिक परिणाम भयावह हैं, जैसे प्रवासी संकट किन्तु इसने पर्यावरण-गुणवत्ता में सुधार के अनेक उदाहरण हमारे सामने प्रस्तुत किए हैं, जो आज की दुनिया के लिए एक सबक है। जानवर जंगलों से बाहर आकर सड़कों पर स्वतंत्रता से घूम रहे हैं, अधिक संख्‍या में पक्षी अपने पसंदीदा स्थानों की ओर प्रस्थान कर रहे हैं, जलीय जीवों को उन स्थानों पर देखा जा रहा है जिन्हें उन्होंने सदियों पहले छोड़ दिया था, और अन्य स्‍थानों पर वायु और जल की गुणवत्‍ता बेहतर हो गई है। भारत में इनके उदाहरण द्रष्टव्य हैं:

  • 21 दिनों के पहले लॉकडाउन के बाद ‘इंडिया गेट’ के पास अधिक स्‍वच्‍छ वायु (वायु गुणवत्ता सूचकांक के आधार पर) रिकॉर्ड की गई।
  • औद्योगिक फैक्टरियों से कम उत्सर्जन के कारण, दिल्ली की यमुना नदी साफ हो गई है जो इस बात का एक संकेत है कि नदियों को स्वच्छ करना असंभव नहीं है।
  • देश के कुछ हिस्सों में लोगों ने दावा किया कि वर्षों बाद हिमालय काफी दूर से दिखाई दे रहा था। गंगोत्री चोटी 300 किमी दूर से दिखाई दे रही थी। 30 साल में पहली बार 100 मील दूर से हिमालय दिखाई दिया।

भारत में अब तक राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के चार चरण हो चुके हैं (जिनमें 68 दिन शामिल थे) और अभी दूसरा अनलॉक चरण लागू है (पहला 1 जून से लागू हुआ था और दूसरा 1 जुलाई से)। इस लॉकडाउन ने लोगों की आवाजाही और आर्थिक गतिविधियों में कई बढ़ाएँ उत्‍पन्‍न की है। विभिन्न वायु प्रदूषण के कारकों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनॉक्साइड, पार्टीकुलेट मैटर 2.5 (पीएम2.5), पार्टीकुलेट मैटर 10 (पीएम10), नाइट्रोजन ऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, ओज़ोन एवं बेनज़ीन के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार प्रमुख आर्थिक गतिविधियों के रुकने के बाद से भारत में वायु गुणवत्ता में सुधार देखा गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट में दिल्ली में पहली लॉकडाउन अवधि पर ध्यान केंद्रित करते हुए पाया गया कि औद्योगिक उत्सर्जन और जीवाश्म ईंधन के दहन में कमी के परिणामस्‍वरूप पीएम 2.5, पीएम10 की तीव्रता में क्रमशः लगभग 46% और 50% की कमी आई है। इसी प्रकार, परिवहन सेवाओं के नगण्य उपयोग और वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध के कारण नाइट्रोजन ऑक्साइड और कार्बन मोनॉक्साइड की तीव्रता में क्रमशः 56% और 37% की गिरावट आई है। बेंजीन के उत्सर्जन में भी 47% की कमी आई है। सल्फर डाइऑक्साइड की तीव्रता में गिरावट अपेक्षाकृत कम है क्‍योंकि इसके मुख्य स्रोत के रूप में बिजली संयंत्र अभी भी कार्य कर रहे हैं।

लॉकडाउन के कारण हुए स्वच्छ वातावरण को लेकर खुश होने वालों को असंवेदनशील क्यों नहीं माना जाना चाहिए?

पर्यावरणीय जागरूकता से संबंधित कई कारण हैं, लेकिन उस पर चर्चा कभी और की जाएगी। सामान्य परिदृश्य में भी, निम्न या मध्यम आय वाले देशों के लिए, मृत्यु दर का एक बड़ा हिस्सा वायु प्रदूषण से जुड़ा हुआ है। वायु प्रदूषण ने वैश्विक स्तर पर 2017 में 12.4 लाख लोगों की जान ले ली और यह प्रदूषण भारत में होने वाली मौतों का तीसरा सबसे बड़ा कारण है, जो वायुजनित बीमारियों की गंभीरता को दर्शाता है। कोविड-19 के प्रकोप के बाद से, इस महामारी के प्रभाव को कम करने के तरीके खोजने के लिए कई अध्ययन किए गए हैं। अमेरिका में किए गए इस तरह के एक राष्ट्रव्यापी अध्ययन में, सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों ने दावा किया कि प्रदूषित वायु तथा कोविड-19 के प्रभाव की तीव्रता का आपस में धनात्‍मक रूप से सहसंबंध है।

भारत में हानिकारक वायु प्रदूषकों की तीव्रता अधिक है। इसलिए यदि वायु की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ होता तो सांस की तकलीफ के मद्देनजर भारत में मामलों की गंभीरता अधिक हो सकती थी।

वैश्विक जलवायु के बारे में चिंतित कई लोगों के मन में एक सवाल है - लॉकडाउन समाप्त होने के बाद पर्यावरण का क्या होगा? अभी पर्यावरणीय गुणवत्ता में बदलाव अल्पावधि के हैं, यानी वे उस लॉकडाउन के अस्थायी प्रभाव हैं जिसे कोविड-19 के प्रसार को कम करने के लिए लागू किया गया है। प्रत्‍येक दिन हमारे वातावरण में होने वाली घटनाओं के मिश्रण को 'मौसम परिवर्तन' कहा जाता है। हालाँकि जो वास्तव में मायने रखता है वह है ‘जलवायु परिवर्तन’ जो कि एक लंबे समय तक चलने वाली प्रक्रिया है जिसमें किसी विशिष्ट क्षेत्र में लंबे समय तक मौसम में परिवर्तन पर नजर रखी जाती है। ये निश्चित रूप से ऐसा समय है जो विश्व के नेताओं को वैश्विक तापमान वृद्धि को 2030 तक 1.5 डिग्री सेल्सियस (या इससे भी कम) सीमित करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के तरीकों को खोजने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।

कोविड-19 और जनसंख्या

जनसंख्या घनत्व की पहचान कोविड-19 के प्रसार के एक प्रमुख निर्धारक के रूप में की गई है। रोग के प्रकोप और उसके फैलने की संभावना उन क्षेत्रों में अधिक होती है जहां अधिक जनसंख्या घनत्व अधिक होता है क्योंकि घनी आबादी वायरस के प्रसार के लिए उत्प्रेरक का कार्य करती है। भारत में सख्त लॉकडाउन के कारण शुरुआती चरण में मामलों में वृद्धि-दर धीमी देखी गई है। हालाँकि भारत के भीतर, मामले उच्च घनत्व वाले महानगरों/शहरों जैसे मुंबई, ठाणे, पुणे, दिल्ली, बैंग्लोर, चेन्नई, अहमदाबाद, कलकत्ता आदि में अपेक्षाकृत तेजी से फैले हैं।

जनसंख्या घनत्व के साथ, अन्य कारक जो मामलों की रिपोर्ट की गई संख्या को प्रभावित करता है - वह है परीक्षणों की संख्या। आकृति 1 (ए) और 1 (बी) में परीक्षण के मामले में शीर्ष 15 देशों और उन देशों में प्रति 10 लाख आबादी पर किए गए परीक्षणों की (7 जून की) संख्‍या को दिखाया गया है। इन 15 देशों में से दस देशों (अमेरिका, इटली, स्पेन, यूके, जर्मनी, रूस, फ्रांस, तुर्की, कनाडा और ईरान) में कोविड-19 के सबसे ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं। अन्य पाँच देशों की तुलना में भारत में प्रति दस लाख जनसंख्या पर सबसे कम परीक्षण हुए हैं, परंतु परीक्षण कम होने के बावजूद मामले अभी भी बढ़ ही रहे हैं (आकृति 2)। इसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारत में अधिक परीक्षणों के परिणामस्वरूप रिपोर्ट किए गए मामलों की संख्‍या अधिक भी हो सकती है, जो निश्चित रूप से घने स्थानों में तेजी से संख्या बढ़ेगी।

आकृति 1 (ए). कोविड-19 परीक्षण करने वाले शीर्ष 15 देश (7 जून को)

आकृति 1 (बी). परीक्षण करने वाले शीर्ष 15 देशों में कुल कोविड-19 परीक्षण/दस लाख जनसंख्या (7 जून को)

आकृति 2. भारत में कोविड-19 के पुष्टि किए गए कुल मामलों की प्रवृत्ति (30 जनवरी से 7 जून 2020)

स्रोत: कोविड-19 पर वर्ल्‍डोमीटर आंकडे।

भारत में जिला/शहरवार पुष्टि वाले कोविड-19 मामलों और उनकी संबंधित जनसंख्या घनत्व के बीच सहसंबंध परीक्षण करने पर हमें मजबूत सकारात्मक सहसंबंध प्राप्‍त हुआ। कोविड-19 मामलों के कान्फर्म्ड केसेस पर जनसंख्या घनत्व के प्रभाव के एक आकलन (सरल रेखीय प्रतिगमन2) ने दिखाया कि जनसंख्या घनत्व में प्रति एक वर्ग किलोमीटर में एक व्यक्ति की वृद्धि से किसी शहर/जिले में किसी व्यक्ति का परीक्षण पॉजिटिव आने का जोखिम धनात्‍मक रूप से 0.62 यूनिट तक बढ़ जाता है। दूसरे शब्दों में, यदि किसी शहर/जिले में जनसंख्या घनत्व 1.61 (यह संख्या 24 अप्रैल को 14 थी और 5 मई को 6.85) व्यक्ति बढ़ता है, तो इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि उस शहर/जिले में कोविड-19 के एक अतिरिक्त पॉजिटिव कान्फर्म्ड मामले में वृद्धि होगी। 3 यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह संबंध और भी बिगड़ सकता था यदि भारत में कोई लॉकडाउन नहीं हुआ होता या लोगों ने लॉकडाउन का उतना पालन नहीं किया होता जितना उन्‍होंने किया है।

आकृति 3. कान्फर्म्ड कोविड-19 मामले तथा भारत के शहरों/जिलों का जनसंख्या घनत्व (7 जून को)

स्रोत: (i) कोविड-19 पुष्टि किए गए मामले - covid19india.org; (ii) शहरों/जिलों की जनसंख्या और क्षेत्रफल – भारतीय जनगणना (केंसूस) 2011, तथा 2011 के बाद गठित जिलों के लिए जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट।

नोट: * प्रवृत्ति रेखा के समीकरण को संदर्भित करती है।

जनसंख्या और प्रदूषण

यह सर्वविदित तथ्य है कि जनसंख्या वृद्धि के परिणामस्वरूप पर्यावरण को हानि पहुंची है। ग्लोबल वार्मिंग में जनसंख्‍या के प्रत्येक व्यक्ति का प्रत्‍यक्ष योगदान नहीं है लेकिन अप्रत्‍यक्ष रूप से लगभग प्रत्‍येक व्यक्ति का योगदान है। कई पर्यावरणीय चक्र (कार्बन, पानी, नाइट्रोजन, आदि) मानव-गतिविधियों के कारण बाधित होते हैं, और यह पर्यावरणीय नुकसान और वैश्विक जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण बन रहा है।

जनसंख्या-दबाव परिकल्पना के अनुसार, संख्या में वृद्धि (जनसंख्या का) भूमि का अधिक उपयोग करने का कारण बनती है। यह भोजन, ऊर्जा, भवन, खाना पकाने के ईंधन, परिवहन आदि जैसी चीजों के लिए बहुत अधिक मांग पैदा करता है, जिससे सभी प्रकार के प्रदूषण कारक उत्‍पन्‍न होते हैं। इन मांगों को पूरा करने के लिए उत्पादन गतिविधियों को बढ़ाना पड़ता है, जिसके कारण प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास और कमी होती है। नासा (2013) द्वारा किए गए एक अवलोकन के अनुसार, सघन शहरों में वायु प्रदूषण का जोखिम अधिक है। हालाँकि, उन्होंने यह भी बताया कि प्रदूषकों की तीव्रता अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में अलग-अलग होती है। इसका उदाहरण है - यूरोप में दस लाख आबादी वाले शहर में नाइट्रोजन ऑक्साइड की तीव्रता उतनी ही आबादी वाले भारत के एक शहर की तुलना में छह गुना अधिक है। इस दिशा में एक गहन विश्लेषण दुनिया के कुछ हिस्सों में कोविड-19 मामलों की गंभीरता के अन्य कारणों को समझने में मदद कर सकता है।

जनसंख्या घनत्व में वृद्धि प्रदूषण का कारण बनती है जो मनुष्यों के लिए सीधे हानिकारक हो सकता है, और जो वैश्विक औसत तापमान में तेज वृद्धि करके मनुष्यों को कई अन्य तरीकों से प्रभावित करेगा। जैसा कि पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के संबंध में दीर्घकालिक, प्रभावी और कुशल उपायों को तलाश रही है। वर्तमान कोविड-19 की स्थिति ने एक ऐसा मंच तैयार किया है जो उन्हें इसकी योजना तैयार करने में मदद कर सकता है।

अर्थव्यवस्थाओं के संकुलन के परिणामस्‍वरूप आर्थिक-पर्यावरणीय संतुलन

अर्थव्यवस्थाओं के संकुलन का अर्थ लागत में कटौती की रणनीति के एक हिस्से के रूप में कई उत्पादन इकाइयों को एक दूसरे के करीब खोलने से है। इससे एक ओर शहरीकरण होता है और आर्थिक विकास में बढ़ोतरी होती है, वहीं दूसरी ओर यह दबाव भी बढ़ाता है जो पर्यावरण के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। आर्थिक विकास के कारक जो संकुलन पैदा करते हैं उनमें रोजगार, प्रौद्योगिकी, और संपर्क सुविधा आदि शामिल है। बेहतर आर्थिक संरचना एवं बेहतर स्वास्थ्य सेवा तथा शिक्षा सुविधाओं की उपलब्धता के कारण ये शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या घनत्‍व में वृद्धि में योगदान करते हैं। उच्च जनसंख्या घनत्‍व से भीड़, यात्रा में देरी, ध्वनि प्रदूषण तथा अन्य पर्यावरणीय निम्‍नीकरण होते हैं। शहरी हॉटस्पॉट अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें और अन्य विभिन्न प्रदूषकों को उत्‍सर्जित करते हैं। इसलिए संकुलन की अर्थव्यवस्थाएं आर्थिक विकास को जन्म तो दे सकती हैं। लेकिन यह पर्यावरणीय लागतों के साथ आती हैं जिन्हें मापना मुश्किल है। वर्तमान स्थिति में, भीड़-भाड़ अप्रत्यक्ष रूप से दुनिया भर में कोविड-19 के प्रसार का एक माध्यम बन गया है।

हम इस संबंध में सात व्यापक सिफारिशें प्रदान करते हैं जिससे भारत (और इसी तरह अन्य अर्थव्यवस्थाएं) अपनी जनसंख्या और प्रदूषण संबंधी चिंताओं को दूर कर सकता है। हमारी सिफारिशों की सीमाएँ हो सकती हैं क्योंकि ये समस्याएँ जटिल हैं जिनका कोई सीधा समाधान नहीं है। ये सीमाएँ आगे के शोध और विश्लेषण के लिए अवसर प्रदान करती हैं।

सिफारिशें

तात्‍कालिक उपाय

घर से कार्य करने की संस्‍कृति को नियमित प्रक्रिया के रूप में बढ़ावा देना: लॉकडाउन के कारण विभिन्न संगठन, जो अपने कर्मचारियों द्वारा दूरस्‍थ रह कर कार्य करा सकते थे, उन्‍होंने अपने कर्मचारियों को घर से कार्य (वर्क फ्रम होम) करने के लिए कहा। इसकी अपनी सीमाएं भी थीं, लेकिन कोई अन्य विकल्प नहीं था। अध्ययनों में बताया गया है कि कार्य करने के समय में लचीलेपन के परिणामस्वरूप उत्पादकता बढ़ती है तथा कार्य-जीवन संतुलन बेहतर होता है। सरकारें इसे एक मानक बनाने की योजना बना सकती हैं, जिसमे कंपनियां अपने कार्यालय से कार्य करने के दिनों को सीमित कर दें और अपने कर्मचारियों को हर सप्ताह कम से कम एक बार घर से कार्य करने का विकल्‍प प्रदान करें। इससे सड़क पर वाहनों की संख्या कम हो जाएगी जिससे भीड़भाड़ और प्रदूषण में कमी आएगी। यदि भविष्य में दुबारा कभी अभी जैसी स्थिति उत्पन्न होती है तो ऐसी व्यवस्था के साथ, नियोक्ता और कर्मचारी वर्तमान लॉकडाउन जैसी स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहेंगे।

ई-वाहनों के उपयोग को प्रोत्साहित करना: सामाजिक दूरी की आवश्‍यकता तथा भीड़भाड़ वाले स्थानों से भय के कारण कुछ लोगों द्वारा सार्वजनिक परिवहन के साधनों को छोड़ कर निजी परिवहन के साधनों का उपयोग किए जाने की संभावना है। ऐसा अनुमान है कि लॉकडाउन के बाद पुरानी कारों और बाइक की मांग में बढ़ोतरी होगी। एक पर्यावरणीय या पारिस्थितिक-आर्थिक परिप्रेक्ष्य से यह आदर्श होगा कि सरकार इस अवसर का उपयोग ई-वाहनों के उपयोग को प्रोत्साहित करने हेतु इससे संबंधित चुनौतियों जैसे कि अधिक अग्रिम लागत, चार्जिंग के बुनियादी ढांचे आदि को दूर करने के लिए करें।

कंजेशन टैक्स और सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना: भारत जैसे देश में, परिवहन के निजी साधन केवल ज़रूरत (लचीलापन, आराम, आदि) के लिए ही नहीं हैं, बल्कि वे प्रतिष्‍ठा के प्रतीक भी बन गए हैं। निजी वाहनों के अंधाधुंध उपयोग से भीड़, वायु और ध्वनि प्रदूषण होता है और सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में वृद्धि होती है। इसलिए ऐसी नीतियों और योजनाओं को तैयार करना आवश्यक है जो सार्वजनिक परिवहन (बस, ट्रेन, मेट्रो, आदि) के उपयोग को और अधिक आकर्षक बना सकें4। कुछ शहरों (सिंगापुर, लंदन, स्टॉकहोम और न्यूयॉर्क) में पहले से ही भीड़ कर लागू किया गया है, लेकिन जहां कहीं भी इसकी जरूरत हो, इसे संभव बनाने के लिए आम सहमति की आवश्यकता है। घनी आबादी वाले शहरों/कस्बों में यातायात की भीड़ से जुड़े मुद्दों के समाधान के अलावा, राजस्व का उपयोग सार्वजनिक परिवहन की गुणवत्ता और मात्रा में सुधार के लिए किया जा सकता है।

दीर्घकालिक उपाय

प्रौद्योगिकी का आधुनिकीकरण या पारिस्थितिक-आर्थिक को अलग करना: मानव जनसंख्या बढ़ रही है और इसके कारण विभिन्न वस्तुओं की मांग बढ़ रही है। यद्यपि तकनीक में ऐसी प्रगति हो रही है जो किसी संसाधन की उत्पादकता में सुधार करने में मदद करती है लेकिन निरपेक्ष रूप से संसाधन घटते रहते हैं। इसलिए अधिकतम जनसंख्या के उस आकार को निर्धारित करना आवश्यक है जिसे पृथ्वी सहन कर सकती है। इसके साथ-साथ ऊर्जा के नवीकरणीय, स्वच्छ स्रोतों का उपयोग करने और स्‍वच्‍छ प्रौद्योगिकियों में निवेश करने हेतु अधिक प्रयास करने की भी आवश्यकता है। पारिस्थितिक-आर्थिक को अलग करने या प्राकृतिक संसाधन के उपयोग को अलग करने का अर्थ है आर्थिक गतिविधि की एक इकाई पर संसाधनों (प्राथमिक) के उपयोग की दर को कम करना। इस विचार का अर्थ यह नहीं है कि मनुष्यों को भूखे रहने के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए या संसाधनों तक पहुंचने के लिए मना किया जाना चाहिए। यह तो उत्पादन गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने पर जोर देता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाएं प्रदान करना (पीयूआारए): समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए यह विचार भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा दिया गया था। 2011 में, भारत की 31.36% शहरी आबादी कुल भूमि क्षेत्रफल के केवल 6.77% पर रहता था। इसलिए, यह बिल्‍कुल स्पष्ट है कि शहरी क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों पर अधिक दबाव है, जिसे कम करने की आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में उन्नत तकनीकों और बुनियादी ढांचे को समान रूप से उपलब्‍ध कराया जाना चाहिए, जो कम जनसंख्या घनत्व वाले गांवों/कस्बों में एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों) को स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में अवसर पैदा करने से, पीयूआरए प्रवासन को कम करेगा जिससे संकटग्रस्त प्रवासी मजदूरों की समस्‍याओं को कम करने में मदद मिलेगी।

स्मार्ट शहरों के बजाय जलवायु स्मार्ट शहरों का विकास करना: सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) 11 के अनुसार, सतत विकास को प्राप्त करने के लिए, शहरों और मानव बस्तियों को समावेशी, सुरक्षित, लचीली और टिकाऊ (पर्यावरण) होना चाहिए। शहरों और शहरी बुनियादी ढाँचों की योजना बनाते समय हरियाली (पर्यावरण के अनुकूल) दृष्टिकोण अपनाना चाहिए जिसका लक्ष्‍य आबादी को कुछ हॉटस्पॉट्स में सघनता से बसाने के बजाय उसे एक समान स्‍तर पर फैलाना होना चाहिए। यह इस प्रकार सुनिश्चित किया जा सकता है कि प्रत्‍येक नई इमारत हरित इमारत हो, हरित क्षेत्र का विस्तार हो, वायु की गुणवत्ता में सुधार हो, और अच्छी जल और अपशिष्ट प्रबंधन नीतियां हों। प्रत्येक क्षेत्र को जनसंख्या घनत्व की एक लक्ष्य श्रेणी निर्धारित करनी चाहिए जो टिकाऊ हो, और इसे प्राप्त करने हेतु किए गए उपायों को अपनाया जाना चाहिए।

रैखिक से वृत्तीय अर्थव्यवस्था की ओर जाना: आपूर्ति-श्रृंखला व्यवधानों के कारण हमारे पास दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों को चलाने के लिए कम संसाधन हैं, जिसने हमें यह महसूस करने में मदद की है कि हम अपनी आवश्यकताओं को कम चीजों से भी पूरा कर सकते हैं। यह अनुभव हमें कोविड-19 के बाद की दुनिया में, अर्थव्यवस्था के एक रैखिक रूप से पुन: उपयोग संकल्‍पना वाली या वृत्‍तीय अर्थव्यवस्थाओं में स्थानांतरित करने के लिए मदद कर सकता है। एक पुन: उपयोग संकल्‍पना वाली अर्थव्यवस्था वह होती है जहां कच्चा माल उत्पादन प्रक्रिया में जाता है और उत्पन्न होने वाले अपशिष्‍ट को पुनर्चक्रित किया जाता है और इसका पुन: उपयोग किया जाता है जब तक यह एक ऐसा अपशिष्‍ट न बन जाए जो पुनर्चक्रण के योग्य न हो। फिर इसे पर्यावरण में फेंक दिया जाता है। एक बेहतर तरीका यह है कि गैर-पुनर्चक्रण योग्य अपशिष्‍ट को भी उपयोग में लाया जाए। दूसरी ओर, वृत्‍तीय अर्थव्‍यवस्‍था, टिकाऊपन के विचार की ओर अधिक रहती है क्योंकि यह उपभोग, और पुन: उपयोग के साथ-साथ उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों द्वारा पुनर्चक्रण के विचारों पर कार्य करती है। एक वृत्‍तीय अर्थव्यवस्था के कामकाज को केवल एक आर्थिक संरचना नहीं बल्कि जीवन जीने का तरीका माना जाना चाहिए। उत्पादकों से लेकर उपभोक्ताओं तक, प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर और कुशल उपयोग की दिशा में योगदान देना अर्थव्यवस्था की हर एक इकाई की जिम्मेदारी है। एक वृत्‍तीय अर्थव्यवस्था (या कम से कम पुन: उपयोग अर्थव्यवस्था) उत्पादकता में सुधार करने में मदद करेगी, जो बदले में लाभप्रद भी होगी। ऐसी नीतियों के उदाहरणों में भारत में सड़क बनाने के लिए प्लास्टिक का उपयोग किया जाना, सिंगापुर के लैंडफिल परिनियोजन मॉडल और आर्मेनिया की जल प्रबंधन प्रणाली शामिल हैं।

लेखक डॉ प्रणव सेन के बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं के लिए उनके आभारी हैं। इस लेख के सारे विचार तथा उनकी ज़िम्मेदारी लेखकों की है।

टिप्पणियाँ:

  1. 21 जुलाई 2020 को कोविड-19 पर वर्ल्डोमीटर डेटाबेस से लिये गये आंकड़े।
  2. प्रतिगमन परिणाम 27.8% के r-वर्ग के साथ 99% (एक 99% विश्वास अंतराल मूल्यों की एक सीमा है जो यह बताता है कि इस बात की 99% संभावना है कि मूल्यों की इसी श्रेणी में जनसंख्या का औसत होगा) विश्वास अंतराल पर सार्थक हैं। यह परिणाम निकालते वक्त यह माना गया है कि अन्य कारक जैसे परीक्षणों की संख्या, वायु प्रदूषण तीव्रता, लॉकडाउन की तीव्रता, आदि नहीं बदलते हैं।
  3. अमेरिका में किए गए इसी प्रकार के अध्ययन के ऐसे ही परिणाम मिले।
  4. सरकारी आंकड़ों के आधार पर टाइम्स ऑफ इंडिया में एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी, जिसमें कहा गया था कि भारत में हर 10,000 लोगों के लिए केवल 4 बसें हैं, जबकि चीन में हर 1,000 लोगों के लिए 6 बसें हैं।

लेखक परिचय: ऋषभ महेंद्र इंटरनैशनल गोर्थ सेंटर (इंडिया) में कॉपी एडिटर तथा हिन्दी प्रभारी हैं। श्वेता गुप्ता ने हाल ही में यूनिवरसिटि ऑफ हैदराबाद से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की है।

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