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कृषि कानून: कृषि विपणन का उदारीकरण आवश्यक है

  • Blog Post Date 23 अक्टूबर, 2020
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कृषि कानून पर अपना दृष्टिकोण प्रदान करते हुए भरत रामास्वामी ने यह कहा है कि कृषि विपणन का उदारीकरण एक आवश्यक कदम है – पूर्व में सभी राजनीतिक विचारधाराओं द्वारा इसका समर्थन किया गया। इसमें बदलाव करना यानि केंद्र द्वारा विधि का उपयोग करना है। खरीद-अधिशेष राज्यों के लिए कोई तात्कालिक लाभ भी नहीं हैं।

संसद ने हाल ही में कृषि बाजारों, कमोडिटी स्टॉक के विनियमन और अनुबंध खेती से संबंधित तीन कृषि बिल पारित किए हैं। मैं उन्हें एक साथ संदर्भित करने के लिए लोकप्रिय शब्‍द कृषि कानून का उपयोग करूंगा। प्रत्येक कानून की उत्कृष्ट व्‍याख्‍या कहीं भी मिल सकती है (उदाहरण के लिए नारायणन 2020 पढ़ें)। नीचे दी गई मेरी चर्चा इस संगोष्ठी द्वारा उजागर किए गए मुद्दों तक ही सीमित है।

भारत में लंबे समय तक सरकार ने कृषि विपणन को कई कारणों से दबाए रखा है - चाहे उपभोक्ताओं की रक्षा करना हो (निर्यात पर प्रतिबंध, भंडारण को रोकना), उत्पादकों की रक्षा करना हो (लाइसेंस व्यापारियों, बाजारों को विनियमित करना, प्रत्यक्ष खरीद पर प्रतिबंध लगाना) या निजी व्‍यापार से राज्य की अपनी खरीद की रक्षा करना हो (एकाधिकार खरीद, आवाजाही पर प्रतिबंध)। 

हालांकि, 1974 में गेहूं के थोक व्यापार के राष्ट्रीयकरण की विफलता के बाद से सरकार पीछे हट गयी है। सरकारी अनाज को सस्ते अनाज के लिए मजबूर करने वाली नीतियों को बड़े पैमाने पर छोड़ दिया गया है। जबकि कुछ उपभोक्ता-उन्मुख प्रतिबंध अभी भी जब-तब आ जाते हैं (उदाहरण के लिए, निर्यात प्रतिबंध), 2000 के दशक की शुरुआत से आधिकारिक समीक्षा ने यह निष्कर्ष निकाला कि राज्य-विधायी कृषि उपज विपणन अधिनियम जो विनियमित मंडियों को स्थानीय एकाधिकार प्रदान करते थे, अब वे उपयोगी नहीं रह गए हैं। ये तथाकथित एपीएमसी (कृषि उपज विपणन समिति) हैं।

इन कारणों को समझना सरल हैं: एकाधिकार ने प्रवेश एवं प्रतिस्‍पर्धा को रोक दिया और विपणन श्रृंखला में निवेश को हतोत्साहित किया। इस स्थिति का हल निकालने के लिए, केंद्र सरकार ने 2003, 2007 और 2017 में मॉडल अधिनियमों का मसौदा तैयार किया, जिनमें से प्रत्येक ने निजी बाजारों के दायरे को सफलतापूर्वक बढ़ाया और विनियमित मंडी के एकाधिकार को कम किया। 2013 में केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय द्वारा गठित 10 राज्यों के कृषि मंत्रियों की एक समिति द्वारा इसी तरह की सिफारिशें की गई थीं। इनमें हरियाणा और पंजाब राज्यों के मंत्री शामिल थे।

वर्तमान के कृषि कानून इन प्रयासों की परिणति हैं जबकि ये कानून राजनीतिक दलों और राज्य सरकारों के बीच आम सहमति से बनाई गई पिछली नीतियों की अनुरूपता को दर्शाते हैं, वे एक अलग दिशा को भी चिह्नित करते हैं। पिछली सरकारों ने मॉडल अधिनियमों का मसौदा तैयार किया लेकिन उन्हें अधिनियमित नहीं किया था क्योंकि उनका मानना ​​था कि यह राज्यों का कार्य क्षेत्र है। मॉडल अधिनियम सिर्फ राज्यों के लिए अपने स्वयं के कानूनों को लागू करने के लिए एक उपयोगी दस्‍तावेज था जिसे उनमें से कई राज्‍यों ने अलग-अलग सीमाओं तक लागू किया था। इसलिए, संसद द्वारा विपणन अधिनियमों का अधिनियमन किया जाना राज्यों के कार्य क्षेत्र में बड़े हस्‍तक्षेप का प्रतीक है।

हालांकि मुखर आलोचना यह है कि यह सुधार समर्थन कीमतों को खतरे में डालेगा और गुपचुप तरीके से उस स्थापित नीति तथा कृषि उपज को लाभकारी मूल्‍यों पर खरीदने की व्‍यवस्‍था को समाप्‍त कर देगा। कानून में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे इन आशंकाओं की सीधी पुष्टि होती हो।

यह कानून न तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को समाप्‍त करने की नीति को न तो सुगम बनाता है और न ही बाधित करता है। यह केवल उन सभी एजेंटों को मुक्‍त प्रवेश की अनुमति देता है जो बाजार स्थापित करने की इच्छा रखते हैं - चाहे वे निजी व्यक्ति हों, सामूहिक निर्माता हों या सहकारी हों। इसका अर्थ यह है कि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) (और अन्य संबंधित खरीद एजेंसियां) पारंपरिक मंडियों में, या इस कानून के तहत स्थापित एक नए बाजार में या अपने स्वयं के परिसर में खरीद कर सकती हैं। इस प्रकार यह तर्क, कि खरीद निश्चित रूप से विनियमित मंडी के समाप्‍त हो जाने की वजह से बंद हो जाएगी, त्रुटिपूर्ण है।

विधेयक राज्य सरकारों को नए निजी बाजारों पर बाजार शुल्क लगाने से रोकता है। इसलिए एक प्रशंसनीय परिदृश्य यह है कि एफसीआई अपनी खरीद को दूसरों के द्वारा या खुद के द्वारा स्थापित नए बाजारों में ले जा सकता है, जिससे राज्य सरकार द्वारा अनिवार्य बाजार शुल्क और कमीशन से बचा जा सकता है। इसलिए, राज्य सरकारों को एपीएमसी बाजार में व्‍यापार बनाए रखने के लिए बाजार शुल्क को कम करना पड़ सकता है।

इसके अपने गुण और दोष हैं। पहले जब राज्य सरकारों ने किसानों से सीधी खरीद की अनुमति दी थी, तब भी उन्होंने भले ही लेन-देन मंडी से बाहर किया हो, उन पर मंडी शुल्‍क लगा कर एकाधिकार के प्रावधानों का फायदा उठाया था। इस प्रकार जिसे एक प्रयोक्‍ता प्रभार के रूप में तर्कसंगत माना गया था। अब वह वास्‍तव में एपीएमसी द्वारा विनियोजित एक कर बन चुका था। इसका नकारात्मक पक्ष देखा जाए – यदि अधिक निवेश की बात छोड़ दें तब राजस्व हानि से राज्यों के लिए अपने निवेशों की फिर से भरपाई करना मुश्किल हो जाएगा। केंद्र-राज्य वित्त के संदर्भ में खरीद-अधिशेष राज्य केंद्र सरकार द्वारा प्रदान किए गए एक नियमित हस्तांतरण को खो देंगे। इसके अलावा उनके किसानों के पास पहले से ही अपना बाजार है - एफसीआई के रूप में। जाहिर है ये कृषि कानून पंजाब और हरियाणा राज्यों को बहुत कम आकर्षित करते हैं। 

यह कानून निगमों के लिए प्रवेश का प्रावधान प्रदान करता है (जैसा कि वह सहकारी या सामूहिक निर्माताओं के लिए करता है, जिनमें से कोई भी आलोचकों के लिए निर्विवादित या शायद स्वागत योग्‍य नहीं है)। क्या निगमीकरण अपरिहार्य है?

निगम रसायनों और मशीनरी की आपूर्ति में पहले से ही बड़े पैमाने पर मौजूद हैं। हालांकि, बड़े निगमों की संकर बीज बाजार में अधिक मौजूदगी नहीं है। संभवतः ऐसा बीज उत्पादन (वैसे भी संविदा उत्पादकों द्वारा किया गया) और वितरण में पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं की कमी के कारण है। बायोटेक को छोड़कर पादप प्रजनन में बड़ी कंपनियों की भूमिका महत्वपूर्ण नहीं हैं। शेष विश्‍व में खुदरा क्षेत्र पर ध्‍यान केंद्रित करने के कारण कॉर्पोरेट्स इससे पीछे की ओर हटे हैं। आमतौर पर किराने का सामान सुपरमार्केट श्रृंखलाओं में प्रवेश करने वाली अंतिम वस्‍तुएं हैं और भारत भी इससे कुछ अलग नहीं है। यह न केवल कृषि विपणन के लिए आंतरिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है, बल्कि शहरीकरण, भूमि की लागत, निजी परिवहन की लागत और छोटे विक्रेताओं के लिए शहरी स्थानों की अनुकूलता पर भी निर्भर करता है।

हालांकि निजी पूंजी का प्रवेश नए बाजारों के लिए उच्च गुणवत्ता के उत्‍पादों में आने वाले अवसरों को खोलता है जिन्‍हें निर्यात और समृद्ध शहरी बाजारों को आपूर्ति की जाती है। ऐसे बाजारों को पारंपरिक बाजारों से ज्यादा प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं करना पड़ेगा। जैसे-जैसे आय बढ़ेगी, गुणवत्‍ता को प्राथमिकता देना नए बाजारों द्वारा पारंपरिक बाजारों को विस्थापित करने के लिए प्रेरित करेगा। हालाँकि, अभी इस दिशा में एक लंबा रास्ता तय करना है।

अनुबंध खेती इन नए बाजारों का पूरक है। यह आपूर्ति की खरीद का एकमात्र तरीका हो सकता है क्योंकि गुणवत्ता ही वह विशेषता है जो इन निजी बाजारों को अलग करती है और जिसके लिए उन्हें किसानों के साथ समन्वय और उन्हें खरीद का आश्वासन प्रदान करने की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, मिलों को कपास के लंबे रेशों की आवश्‍यकता हो सकती है लेकिन किसान कपास के छोटे रेशों का उत्पादन करते हैं क्योंकि मुख्य बाजार चैनल इन वस्तुओं को अलग-अलग नहीं करते हैं और इसलिए उच्च गुणवत्ता वाले लंबे रेशों का उत्‍पादन करने वाले किसानों को इसका लाभ नहीं मिलता है।

अनुबंध खेती एक आसान व्यवस्था नहीं है क्योंकि डिफ़ॉल्ट के प्रलोभन उस समय अधिक ऊंचे होते हैं जब प्रवर्तन की लागत अधिक होती है। जब विकल्प होते हैं तो डिफ़ॉल्ट की अधिक संभावना होती है। यही कारण है कि अनुबंधित खेती मानकीकृत वस्तुओं के लिए बाजारों की जगह नहीं लेती है। ऐसी वस्तुओं के लिए एपीएमसी बाजारों द्वारा दी गई गहराई और तरलता की बराबरी कर पाना मुश्किल होगा।

प्रतिबंधों के न होने से उद्यम संबंधी ऊर्जा के लिए इतने अवसर उत्‍पन्‍न होते हैं जिनका पूर्वानुमान लगाना भी कठिन है। पिछले कुछ वर्षों में, कृषि में तकनीकी स्टार्ट-अप का ध्यान मुख्‍य रूप से मांग के साथ आपूर्ति का समन्वय करते हुए नए बाजारों का निर्माण करने पर केंद्रित रहा है। नए कानून इस गति को और बढ़ाएंगे।

संक्षेप में, मेरा विचार है कि कृषि विपणन का उदारीकरण विविधतापूर्ण कृषि और अधिक कृषि आय के लिए आवश्यक कदम है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह एक जादू की छड़ी नहीं है। विविधीकरण और विकास की प्रक्रिया को अनुसंधान एवं विकास, प्रौद्योगिकी प्रसार, ऋण और बीमा के समर्थन की आवश्यकता है। यदि किसानों को विपणन संघों में संगठित किया जाए तो विकास की प्रक्रिया बहुत अधिक समावेशी होगी। यह भी स्पष्ट है कि कृषि बाजार (चाहे एपीएमसी या प्रस्तावित नए बाजार हों) को विनिमय, भुगतान और बाजार डेटा एवं बुद्धिमत्ता की शर्तों पर प्रशासन की आवश्यकता है।

जैसे-जैसे पंजाब और हरियाणा में विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं, किसानों को नहीं लगता कि वे लंबे समय तक इसी दृ‍ष्टिकोण को बनाए रख सकते है। विनियमित मंडियों की खराब भौतिक स्थिति और उनकी स्वयं की कमजोर सौदेबाजी की स्थिति के बावजूद, किसान मंडी व्यापारियों के साथ अपने संबंधों की जटिलता को पहचानते हैं, वे वर्तमान व्यवस्थाओं के बिगड़ने के बारे में बेशक काफी चिंतित हैं। ये संबंध लचीले ढंग से सूचना, सलाह और ऋण प्रदान करने के साथ जुड़े हैं, जिसने कृषि बाजारों को नोटबंदी के विघटनकारी प्रभाव से निपटने में सक्षम बनाया था। जबकि कानून एमएसपी के लिए अप्रासंगिक हैं। जिस तरह से उन्हें केंद्र-राज्य विधायी सीमाओं के बारे में चिंता किए बिना लागू किया गया है उससे किसानों और राज्य सरकारों को लग सकता है कि सरकार पूर्व की संस्थागत व्यवस्था और प्रतिबद्धताओं से बाध्य नहीं है।

लेखक परिचय: भरत रामास्वामी अशोका यूनिवरसिटि में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं।

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