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कृषि कानून: वांछनीय होने के लिए डिजाइन में बहुत कुछ छूट गया है

  • Blog Post Date 26 अक्टूबर, 2020
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Sukhpal Singh

Indian Institute of Management Ahmedabad

sukhpal@iima.ac.in

सुखपाल सिंह कृषि विपणन के मौजूदा तंत्र के मद्देनजर कृषि कानून के संभावित निहितार्थों की जांच करते हैं और इसकी डिजाइन में कुछ खामियों को उजागर करते हैं।

कृषि बाजारों पर केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए नए कृषि कानून का घोषित उद्देश्य कृषि बाजारों (एक विषय जो राज्यों के क्षेत्र में आता है) में निजी निवेश को आकर्षित करने के अलावा एक राष्ट्र-एक बाजार प्रणाली स्‍थापित करना और किसानों को अपनी उपज को बेहतर मूल्य पर बेचने के लिए विकल्प प्रदान करना है। लेकिन सरकार द्वारा कई स्तरों पर सुधार के विभिन्न लाभों का दावा करने और उन्‍हें उजागर करने के बावजूद किसान संगठनों और कई राजनीतिक दलों ने इन कानून का विरोध किया है। इस संदर्भ में कृषि उपज मंडियों के विनियमन और संवर्धन (कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) बायपास अधिनियम और अनुबंध कृषि अधिनियम) तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम (ईसीए), 1995 में संशोधन से संबंधित कानून के इन नए दस्‍तावेजों के प्रमुख पहलुओं पर चर्चा करना महत्वपूर्ण है। 

एपीएमसी बायपास अधिनियम, 2020

जहां तक एपीएमसी बायपास अधिनियम या कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम, 2020 का संबंध है, यह विभिन्न राज्‍य कृषि उपज बाजार संबंधी विधानों के अधीन अधिसूचित समझे गए बाजारों के बाहर कृषि उपज का दक्ष, पारदर्शी और निर्बाध अंतर्राज्यिक या राज्‍यों के बाहर व्‍यापार को बढ़ाने की सुविधा प्रदान करता है और इलेक्ट्रॉनिक व्‍यापार के लिए एक सुविधाजनक ढांचा प्रदान करता है। इससे पहले राज्य एपीएमसी अधिनियमों के तहत एक अधिसूचित बाजार क्षेत्र था, जहां से सभी उपज का लेन-देन नामित एपीएमसी यार्ड और सब-यार्ड के भीतर किया जाता था। वैकल्पिक रूप से खरीदारों को मॉडल एपीएमसी अधिनियम, 2003 और बाद में मॉडल कृषि उत्पाद और पशुधन बाजार (एपीएलएम) अधिनियम, 2017 के अनुसार संशोधित एपीएमसी के तहत - मंडियों के बाहर खरीद के लिए स्थानीय एपीएमसी से अनुमति लेनी होती थी, लेकिन फिर भी इस के अंतर्गत वही ‘कर’ या ‘लेवी’ उगाही जाती थी जो उत्पादक बाजार यार्ड के अंदर किए जाने वाले लेन-देन पर वसूला जाता था। यह एपीएमसी बाजार यार्डों के बाहर एक नया 'व्यापार क्षेत्र' बनाता है जहां एक स्थायी खाता संख्या (पैन, भारत में एक आयकर आईडी) रखने वाला कोई भी खरीदार किसान-विक्रेताओं से सीधे खरीद कर सकता है और राज्य सरकार इस तरह के लेन-देन पर कोई कर नहीं लगा सकती है। यहाँ भी हरियाणा में राज्य सरकार द्वारा पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के किसानों को हरियाणा में एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर धान बेचने से रोकने के लिए हाल की कार्रवाई से पता चलता है कि विनियमन के माध्‍यम से अंतर-राज्य बाधाएं दूर करना तब तक आसान नहीं है जब तक राज्य इसमें सामने नहीं आते हैं। इसी तरह पंजाब में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) द्वारा अभी भी एपीएमसी आढ़तियों (कमीशन एजेंटों) के माध्यम से मंडियों से खरीदारी करना इस अधिनियम की भावना के विपरीत संदेश देता है।

अधिक महत्वपूर्ण रूप से इसमें किसान उत्पाद के रूप में भी राज्‍य के भीतर या राज्‍यों में होने वाला व्यापारी-व्यापारी लेन-देन शामिल होता है। इसे कैसे उचित ठहराया जा सकता है, क्योंकि एक बार प्राथमिक लेन-देन पूरा हो जाने के बाद किसान लेन-देन में शामिल नहीं होता है और यह किसान उत्पाद भी नहीं रहता है? यह किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के समान है, जो इस आधार पर आयकर से छूट मांगते हैं कि वे अपने सदस्य किसानों की उपज के साथ सौदा करते हैं जिन्हें आयकर का भुगतान करने से छूट दी गई है। इसके अलावा जिस तरह से ‘व्‍यापारी’ को परिभाषित किया गया है, वह चौंकाने वाला है क्योंकि इसकी परिभाषा में एक खुदरा उपभोक्ता/खरीदार भी शामिल है और सभी को अपने रसोईघरों के लिए किसानों के बाजारों से सब्जियां खरीदने के लिए भी पैन की आवश्यकता होगी।

केवल कुछ राज्यों में ही किसान विरोध क्यों कर रहे हैं? क्‍या एपीएमसी समाप्‍त हो जाएंगी?

नए एपीएमसीबायपास अधिनियम, 2020 और एमएसपी व्‍यवस्‍था के बीच संबंध में गलतफहमी फैलाई की जा रही है कि इस अधिनियम के लागू होने के बाद एमएसपी लागू नहीं रहेगा। यह पहचानना महत्वपूर्ण है कि एमएसपी और एमएसपी पर खरीद नीतिगत संरचना है और एपीएमसी बायपास अधिनियम, 2020 के विपरीत यह कानूनी तौर पर बाध्यकारी नहीं है। किसान संगठनों की यह मांग कि कृषि उपज के सभी खरीदारों के लिए एमएसपी को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए, अतार्किक है क्योंकि अधिकतर मामलों में कृषि उत्‍पादों की कीमतें बाजार द्वारा निर्धारित की जाती है जबकि सरकार उपज का केवल एक छोटा हिस्सा ही खरीदती है। इसलिए एमएसपी को अनिवार्य करना कृषि उत्‍पाद में पूरे निजी व्यापार के लिए हानिकारक होगा। एमएसपी केंद्र सरकार द्वारा किया गया एक वादा है और इसे अन्य खरीदारों पर थोपा नहीं जाना चाहिए जो मांग-आपूर्ति के हिसाब से व्‍यापार करते हैं। यह हाल ही में महाराष्ट्र में स्पष्ट रूप से देखा गया था जब राज्य सरकार ने सभी खरीदारों के लिए एमएसपी को अनिवार्य बनाने हेतु एपीएमसी अधिनियम में संशोधन करने का प्रयास किया था जिससे व्यापारी हड़ताल पर चले गए थे और इसे वापस लेना पड़ा था।

एमएसपी के बारे में किसानों और उनके संगठनों द्वारा व्यक्त की जा रही आशंका व्यापार क्षेत्र और एपीएमसी के बीच असमान अवसरों के कारण से पैदा होती है क्योंकि व्यापार क्षेत्र में कोई कर नहीं होगा जबकि एपीएमसी खरीद में खरीद लागत काफी अधिक होती हैं जैसा कि पंजाब में यह 8.5% है जिसमें 2.5% आढ़तियों का कमीशन शामिल हैं। इसलिए कम खरीद लागत के कारण व्यापारी और यहां तक ​​कि एजेंट एपीएमसी बाजार यार्ड से बाहर निकल सकते हैं और नए व्यापार क्षेत्र (गैर-एपीएमसी क्षेत्र) से खरीद शुरू कर सकते हैं। केंद्र सरकार की एजेंसियां ​​भी किसानों से सीधी खरीद के लिए नए व्यापार क्षेत्र की ओर तत्‍परता पूर्वक स्‍थानांतरित हो सकती हैं (जैसा कि मीडिया रिपोर्टों के अनुसार योजना बनाई जा रही है)। अभी भी किसानों के लिए एमएसपी तक पहुंच जारी रहेगी लेकिन आढ़तियों को नुकसान हो सकता है क्योंकि वे एमएसपी में हर बढ़ोतरी के साथ बढ़ने वाले भारी कमीशन को वसूल नहीं कर पाएंगे। यह प्रभावी रूप से एपीएमसी बाजार को समाप्‍त कर देगा।

आढ़तियों के लिए सबसे अधिक समस्या वाला पहलू यह है कि वे उपज के लेन-देन को विभिन्न उद्देश्यों के लिए नकदी/उधार के साथ जोड़ते हैं और वे अपने ऋण की वसूली एपीएमसी बाजार में किसानों को होने वाली बिक्री आय से करते हैं। वास्तव में पंजाब में, यहां तक कि एफसीआई और भारतीय कपास निगम (सीसीआई, जिसने इस सीजन में सीधे किसानों से खरीद शुरू कर दी गई है) द्वारा भी किसान की उपज का भुगतान हमेशा से आढ़तिया को किया जाता रहा है, न कि सीधे किसानों को। और यह दो दशकों से एक मुद्दा रहा है। राज्य सरकार ने केंद्रीय एजेंसियों को विभिन्न राजनीतिक अर्थव्यवस्था के कारणों जैसे आढ़तिया लॉबी की ताकत के चलते किसानों को सीधे भुगतान करने की अनुमति नहीं दी है तथा यह भी तथ्‍य है कि कई आढ़तिये बड़े और शक्तिशाली किसान हैं। बेशक आढ़तिये अब नए भारतीय व्यापार क्षेत्र में कॉरपोरेट्स के सूत्रधार या एजेंट होने की एक नई भूमिका प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन वे एक एपीएमसी मंडी की तरह ऋण और उत्पाद/इनपुट बाजारों को आपस में नहीं जोड़ पाएंगे और उन्हें कम कमीशन से संतुष्ट होना पड़ेगा। हालांकि फिर भी इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि नए व्यापार क्षेत्र में खरीदार कम खरीद लागत का कुछ हिस्सा भी उपज के लिए उच्च खरीद मूल्य के रूप में विक्रेता किसानों को देंगे।

यदि केरल जहां कभी एपीएमसी अधिनियम था ही नहीं या बिहार जिसने 2006 में एपीएमसी अधिनियम को रद्द कर दिया था, या महाराष्ट्र जिसने 2018 में एपीएमसी की सूची से फल और सब्जियां को हटा दिया था जैसे राज्यों के अनुभवों से देखा जाए तो यह उम्मीद करना कि इससे कृषि में नए निवेश आएंगे, गलत है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि कानून नीति को प्रतिस्थापित नहीं कर सकते हैं। इसलिए कृषि क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए एक नीति होनी चाहिए। नए निवेश के लिए प्रोत्साहन की आवश्यकता होगी, न कि केवल व्‍यापार में सुगमता की। 

क्या इससे छोटे और सीमांत किसानों को मदद मिलेगी?

कृषि उपज बाजार को बिचौलियों से मुक्ति दिलाना काफी पहले से ही लंबित था-- जिसका अर्थ है आढ़तियों को हटाना। मध्य प्रदेश ने ऐसा 1985 में ही कर लिया था। एमएसपी व्‍यवस्‍था कुछ किसानों और कुछ राज्यों के लिए बहुत अनुचित है और ज्यादातर पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और ओडिशा में गेहूं और धान और कपास जैसी कुछ फसलों मे ही लाभकारी है। इन किसानों की कुल संख्‍या 12.4 मिलियन हैं, जो कि भारत के किसान परिवारों का 10% भी नहीं है, क्योंकि उनमें से ज्यादातर को गेहूं और धान दोनों की पैदावार करने के कारण दो बार गिन लिया जाता है। इन और ऐसे कई अन्य राज्यों में अधिकांश छोटे और सीमांत किसान एमएसपी व्‍यवस्‍था से बाहर हैं। कुछ राज्यों जैसे पंजाब और हरियाणा में एपीएमसी अधिनियम में संशोधन द्वारा आढ़तिया व्यवस्था को समाप्त किया जाना चाहिए और उनकी जगह एफपीओ जैसे प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों (पीएसीएस), अन्य सहकारी समितियों या निर्माता कंपनियों को लिया जा सकता है जैसा कि बिहार, मध्य प्रदेश और अब उत्तर प्रदेश जहां अब एफसीआई और राज्य एजेंसियां ​​गांवों से एपीएमसी मंडियों में न जाकर गांव में ही खरीद करती हैं, जैसे राज्यों में होता है। केवल तभी छोटे और सीमांत किसान यह उम्‍मीद कर सकते हैं कि वे व्यापार क्षेत्र में सीधी खरीद या बाजार में प्रतिस्पर्धा से लाभ के लिए चैनलों की पसंद का उपयोग कर पाएंगे। बेशक इन छोटे और सीमांत किसानों के लिए संस्थागत ऋण तक बेहतर पहुंच की आवश्यकता है।

अनुबंध कृषि, फसल विविधीकरण, और छोटे किसान

यह पहचानना महत्वपूर्ण है कि बीज के क्षेत्र में 1960 के दशक से भारत में अनुबंध कृषि चलन में है और अन्य कृषि उपज में 1990 के दशक से पंजाब और हरियाणा जैसे कई राज्यों में पेप्सिको के साथ टमाटर और आलू की अनुबंध कृषि की जाती है। इसके अलावा कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के मॉडल एपीएमसी अधिनियम, 2003 और बाद में मॉडल कृषि उत्पाद और पशुधन उत्पाद विपणन (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम, 2017 के तहत अधिकांश राज्यों में अनुबंध कृषि की अनुमति दी गई है। तमिलनाडु मॉडल कृषि उत्पाद और पशुधन अनुबंध कृषि और सेवाएं (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम, 2018 के तहत 2019 में अनुबंध कृषि के लिए एक अलग अधिनियम पारित करने वाला पहला राज्य था और हाल ही में ओडिशा ने भी ऐसा ही किया है।

खरीदारों के लिए अनुबंध कृषि एपीएमसी या निजी थोक बाजारों और प्रत्यक्ष खरीद से खरीदने के बाद एकमात्र विकल्प के कारण कॉरपोरेट कृषि का विकल्प उपलब्ध नहीं है, क्योंकि भारत में राज्य-स्तरीय अधिनियमों, जो गैर-कृषकों को कृषि भूमि का स्‍वामित्‍व रखने या उसे पट्टे पर देने से रोकते हैं।

राज्य द्वारा कृषि की आय और रोजगार में सुधार के लिए फसल विविधता लाने हेतु भी कई स्थितियों में एक व्‍यवस्‍था के रूप में अनुबंध कृषि का प्रयास या प्रयोग किया गया है, उदाहरण के लिए 1990 के दशक के दौरान और 2000 के दशक की शुरुआत में, लेकिन इसमें सफलता नहीं मिली। इसमें कोई संदेह नहीं है कि अनुबंध कृषि आम तौर पर उन किसानों को लाभान्वित करती है जो मौजूदा खुले बाजार (थोक) या प्रत्यक्ष खरीद चैनलों में इसकी बिक्री में भाग ले सकते हैं, हालांकि इसमें आम तौर पर उत्पाद की उच्च लागत और उच्च निवेश शामिल होते हैं। हालांकि छोटे धारकों का बाहर रह जाना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि अनुबंध करने वाली एजेंसियां ​​कुछ क्षेत्रों और कुछ फसलों में कुछ अपवादों के साथ अपनी लेनदेन लागत को कम रखने के कारण बड़े किसानों को पसंद करती हैं। जब बड़े किसान इन प्रणालियों का हिस्सा होते हैं तो कभी-कभी छोटे किसान कृषि को अनुबंध पर देने के लिए खुद को बाहर कर लेते हैं। बड़े और मध्यम किसानों के पक्ष में यह पूर्वाग्रह पंजाब जैसे क्षेत्रों में ‘विपरीत पट्टेदारी’ की प्रथा को जारी रख रहा है, जहां साधन संपन्‍न मध्यम और बड़े किसान अनुबंध उत्पादन के लिए सीमांत और छोटे किसानों से भूमि को पट्टे पर ले लेते हैं।

भारत के विभिन्न हिस्सों में अनुबंधित किसानों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा है, जैसे फर्मों द्वारा उत्पादित गुणवत्ता में अवांछित कटौती या उत्पाद की कोई खरीद न करना, कारखाने में देरी से आपूर्ति, विलंबित भुगतान, कम कीमत, खराब गुणवत्ता वाले इनपुट, फसल खराब होने पर कोई मुआवजा न मिलना, उत्पादन की अधिक लागत और यहां तक ​​कि ल्रंबे समय तक अनुबंध की कीमतों में ठहराव जिसे 'कृषि व्‍यापार सामान्यीकरण' के रूप में जाना जाता है।

कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम एक खराब तरीके से डिजाइन किया गया अनुबंध कृषि अधिनियम के अलावा कुछ भी नहीं है। ‘कृषि करार’ शब्द का उपयोग स्वयं ही असामान्य है क्योंकि यह अन्य व्यवस्थाओं जैसे कि फसल साझेदारी या पट्टेदारी करारों के साथ भ्रमित हो रहा है। अनुबंध कृषि मुख्य रूप से अनुबंध के बारे में है और कृषि इसका एक हिस्सा है। सबसे बड़ी धारणात्‍मक समस्या यह है कि इसे कॉरपोरेट कृषि (कॉरपोरेट्स पट्टे या अपने स्वामित्व वाली जमीन पर अपनी कृषि कर रहे हैं) के साथ मिलाया जा रहा है और निश्चित रूप से यह ऐसा नहीं है। अधिनियम स्पष्ट रूप से कहता है कि अनुबंध करने वाली एजेंसी किसान की भूमि पर कोई दावा नहीं कर सकती है और यहां तक कि उसे पट्टे पर भी नहीं दे सकती है।

अनुबंध की खराब डिजाइन और मंडी संबंध 

अनुबंध कृषि के बहुत बुनियादी पहलुओं जैसे कि रकबा, मात्रा और सुपुर्दगी के समय को निर्दिष्ट नहीं किया गया है, जो कि विनियमन करने वाले किसी भी कानून के लिए आवश्यक है क्योंकि ये इस प्रकार की व्यवस्था के अनिवार्य पहलू हैं चाहे वह इनपुट की आपूर्ति के साथ हो या अन्‍यथा हो। सरकारी विज्ञापन में दावा किया गया है कि किसान बिना किसी जुर्माने के किसी भी समय अनुबंध व्यवस्था से हट सकता है। यह भी सच नहीं है और यदि अनुबंध कृषि को सफल होना है तो यह व्यवस्था का हिस्सा नहीं हो सकता है। इस अधिनियम में आधुनिक अनुबंध कृषि प्रथाओं के कई नाजुक पक्षों जैसे अनुबंध-रद्द करने की धाराओं, विलंबित सुपुर्दगियां या खरीद एवं उसमें क्षति और अनुबंध कृषि में 'टूर्नामेंट' जहां किसानों को एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा कराई जाती है और उनके सापेक्ष प्रदर्शन के अनुसार भुगतान किया जाता है (कई देशों में प्रतिबंधित) को भी छोड़ दिया गया है।

यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है कि अधिनियम एपीएमसी मंडी मूल्य या इलेक्ट्रॉनिक बाजार मूल्य के साथ एक संपर्क व्यवस्था के तहत किसानों को बोनस/प्रीमियम मूल्य भुगतान को जोड़ता है जो अनुबंध करार का हिस्सा होना चाहिए। यह अनुबंध कृषि की प्रकृति के खिलाफ है। एक अनुबंध के कई अन्य बुनियादी पहलुओं की तरह, कीमत के मुद्दे को, बातचीत करने के लिए पार्टियों पर छोड़ दिया जाना चाहिए और इसे किसी भी अन्य चैनल खासकर एपीएमसी मूल्य से नहीं बांधा जा सकता। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस कानून को लाने का मूल कारण किसानों को वैकल्पिक चैनल उपलब्ध कराना और एपीएमसीबाजारों के लिए प्रतिस्पर्धा पैदा करना है क्योंकि ऐसा देखा जा रहा था कि वे कीमतों की कुशलता से खोज नहीं कर रहे थे। अब उसी मंडी में वापस जाना अधिनियम के बारे में अच्‍छी धारणा नहीं बनाता।

विनियमन या सुविधा?

यह अधिनियम अपने नियमन के बजाय अनुबंध कृषि तंत्र को सुविधाजनक बनाने और उसके संवर्धन के बारे में अधिक है। यह अधिनियम अनुबंध कृषि की सुविधा के लिए पूर्णत: तत्‍पर है जो इस तथ्य से स्पष्ट है कि इसमें यह उल्लेख किया गया है कि स्टॉक सीमा अधिनियम (ईसीए) अनुबंध-कृषि उपज पर लागू नहीं होगा। किसी अन्य अधिनियम के प्रावधान का इसमें विशेष रूप से क्यों उल्लेख किया जाना चाहिए, जब इसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई लेना-देना नहीं है?

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिनियम के शीर्षक में ‘कृषक सशक्तिकरण और संरक्षण के पहलुओं’ का उल्लेख किया गया है जबकि इसकी विषय-वस्‍तु में इस पर कोई ध्‍यान नहीं दिया गया है। यहां तक ​​कि एपीएमसी बायपास अधिनियम के शीर्षक में भी संवर्धन और सरलीकरण है न कि विनियमन। अंत में किसी भी कानून का प्रमाण इसके कार्यान्वयन में है, लेकिन जहां तक किसान हित की सुरक्षा का संबंध है, इन अधिनियमों की डिजाइन में वांछनीय होने के लिए बहुत कुछ छूट गया है। 

संशोधित आवश्यक वस्तु अधिनियम किस प्रकार अच्‍छा है?

संशोधित ईसीए प्रमुख अनाज, खाद्य तेल, दलहन और प्याज एवं आलू की फसलों के भंडार के लिए छूट प्रदान करता है - हालांकि अभी भी ईसीए से पूर्णत: मुक्‍त नहीं हैं। भारत जैसे देश में ऐसी पूर्ण स्वतंत्रता कभी भी संभव नहीं हो सकती है, जहां कृषि एक ही समय में उत्‍पादक और उपभोक्ता हित दोनों से संचालित होती है - उदाहरण के लिए यहां तक ​​कि एमएसपी भी उत्‍पादक और उपभोक्ता दोनों के हित को ध्यान में रखते हुए निर्धारित किया जाता है। यह छूट कृषि उपज के विभिन्न उपयोगकर्ताओं जैसे निर्यातकों, प्रोसेसर और सामान्य रूप से मूल्य श्रृंखला प्रतिभागियों के लिए बिना सीमा के बड़े स्टॉक की अनुमति देती है। फिर भी युद्ध, अकाल, गंभीर प्राकृतिक आपदा, और असाधारण मूल्य वृद्धि के कारणों के लिए स्टॉक सीमा लगाने का विकल्प बरकरार है। संशोधित ईसीए, 2020 में स्टॉक सीमाएं तब लागू होती हैं, जब बागवानी उपज का मूल्‍य पिछले वर्ष/पांच-वर्षीय औसत मूल्य से 100% और खराब न होने वाली वस्‍तुओं के मूल्‍य पिछले वर्ष/पांच वर्षीय औसत मूल्‍य से 50% अधिक हो जाएं। यह तथ्य कि राज्यों द्वारा किसी भी तरह से इन प्रावधानों को परिभाषित किया जा सकता है, को हाल ही में उस समय देखा गया था जब खराब हो जाने वाले उत्‍पाद पर ईसीए के प्रावधानों को थोड़ा सम्‍मान देते हुए प्याज के निर्यात पर पूर्ण प्रतिबंध (विदेश व्यापार महानिदेशक द्वारा) लगाया गया था। इस तरह की कार्रवाई निवेशकों को विनियमन की संगतता के बारे में कोई विश्वास नहीं देती है।

ये ईसीए छूटें विभिन्न मूल्य-श्रृंखला प्रतिभागियों के दृष्टिकोण से अच्छी लगती हैं, लेकिन किसानों को सीधे मदद नहीं कर सकती हैं। वास्तव में ईसीए को 'कम धारदार’ करना उन व्यापारिक कंपनियों के लिए लाभकारी होगा जो कीमतों पर अटकलें लगाती हैं। केवल कुछ एफपीओ बेहतर कीमतों और प्रसंस्करण/मूल्य संवर्धन के लिए अपनी उपज के भंडारण हेतु इसका उपयोग करने में सक्षम हो सकते हैं। एफपीओ को तभी लाभ हो सकता है जब उनके पास वेयरहाउस हैं, और वे मूल्‍य संवर्धन करने वाली किसी भी गतिविधि जैसे प्रसंस्करण, भंडारण, पैकिंग, परिवहन और वितरण में शामिल हैं। 

इस छूट का उपभोक्ता को लाभ नहीं मिलता क्योंकि यह वास्तव में बड़ी जमाखोरी और इसके परिणामस्‍वरूप उच्च उपभोक्ता मूल्यों का कारण बन सकता है। इस ईसीए सुधार का एक और महत्वपूर्ण पहलू निर्यात प्रतिबंधों को दूर करना है, जो कि किसानों को स्थिर निर्यात बाजार में पहुंच प्रदान करके अप्रत्‍यक्ष रूप से लाभान्वित कर सकता है।

लेखक परिचय: सुखपाल सिंह गुजरात स्थित भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) अहमदाबाद के सेंटर फॉर मैनेजमेंट इन एग्रीकल्चर (सीएमए) में प्रोफेसर हैं।

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