पर्यावरण

आरबीआई के कार्य (और वक्तव्य) कैसे वित्तीय बाजारों को प्रभावित करते हैं

  • Blog Post Date 08 अप्रैल, 2022
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Aeimit Lakdawala

Wake Forest University

lakdawa@wfu.edu

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Rajeswari Sengupta

Indira Gandhi Institute of Development Research

rajeswari@igidr.ac.in

विकसित देशों में उनके केंद्रीय बैंक द्वारा घोषित नीतिगत दरों में अप्रत्याशित परिवर्तन के चलते वित्तीय बाजारों को लगने वाले मौद्रिक झटके के प्रति पर्याप्त प्रतिक्रिया दर्शाने के लिए जाना जाता है। यह लेख भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के मौद्रिक नीति संबंधी वक्तव्यों और 2003-2020 के दौरान ओवरनाइट इंडेक्स स्वैप दरों में दैनिक परिवर्तनों के आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर दर्शाता है कि भारत में भी यही स्थिति है।

मौद्रिक नीति अर्थव्यवस्था को किस प्रकार से प्रभावित करती है? इस प्रश्न को समझने में एक महत्वपूर्ण पहला कदम यह अध्ययन करना है कि वित्तीय बाजार केंद्रीय बैंक द्वारा नीतिगत घोषणाओं पर अपनी प्रतिक्रिया किस प्रकार देते हैं। ज्यादातर विकसित देशों के बारे में उपलब्ध साहित्य से पता चलता है कि जब भी केंद्रीय बैंक ने अपनी नीति दर में अप्रत्याशित बदलाव की घोषणा की है, तो वित्तीय बाजार के सहभागियों ने इन घोषणाओं1 पर अपनी पर्याप्त प्रतिक्रिया दर्शायी है। लेकिन उन्होंने नीति दर के भविष्य के मार्ग के बारे में नई जानकारी का जवाब भी दिया है।

हाल के एक अध्ययन (लकड़ावाला और सेनगुप्ता 2021) में, हम भारत के सन्दर्भ में मौद्रिक नीति के झटके (अर्थात, अप्रत्याशित घटना) के उपायों का निर्माण करते हैं जो अल्पकालिक नीति दर में बदलाव के साथ-साथ मौद्रिक नीति के भविष्य के रुख के बारे में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा प्रदान किए गए मार्गदर्शन- दोनों को समेटते हैं। हम शेयर बाजार, सरकारी बांड बाजार और मुद्रा बाजार पर इन झटकों के कारण-प्रभाव का अध्ययन करते हैं।

भारत में मौद्रिक नीति का फ्रेमवर्क पिछले कुछ दशकों में काफी हद तक विकसित हुआ है। हमने  एक बहु-संकेतक दृष्टिकोण (एमआईए),जिसमें कोई विशिष्ट मात्रात्मक लक्ष्य नहीं था, से परिवर्तित होकर उत्पादन वृद्धि पर नजर रखने-सहित भारत की मौद्रिक नीति के मुख्य उद्देश्य के साथ 2-6% की सीमा में सीपीआई (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक) मुद्रास्फीति को बनाए रखने को निर्दिष्ट करने वाले एक मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण (आईटी) शासन में प्रवेश किया है। 

हमारी नमूना अवधि (सितंबर 2003-दिसंबर 2020) में आरबीआई के पांच गवर्नरों- वाई. वी. रेड्डी, डी. सुब्बाराव, रघुराम राजन, उर्जित पटेल और शक्तिकांत दास के कार्यकाल शामिल हैं। पिछले दो शासन आईटी की अवधि के साथ मेल खाते हैं जब मौद्रिक नीति निर्णय एक मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) द्वारा लिए गए हैं। गवर्नर राजन के कार्यकाल को एमआईए और आईटी शासन के बीच एक संक्रमण चरण के रूप में माना जा सकता है।

मौद्रिक नीति की अप्रत्याशित घटना को समझना 

हम मौद्रिक नीति के झटके2 को मापने के लिए, केवल केंद्रीय बैंक के नीतिगत साधनों में परिवर्तन का उपयोग नहीं कर सकते क्योंकि ये साधन स्वयं विकसित मैक्रो-इकॉनॉमिक स्थितियों के अनुसार बदलते हैं। इसके अलावा, बाजार केवल केंद्रीय बैंक की नीतिगत कार्रवाइयों के अप्रत्याशित घटक पर प्रतिक्रिया करते पाए जाते हैं। इसका मतलब है कि हमें आरबीआई3 द्वारा की गई हर मौद्रिक नीति घोषणा के 'अप्रत्याशित तत्व' को समझने की जरूरत है।

ऐसा करने हेतु, हम मौद्रिक नीति के झटके4,5 के अपने माप का निर्माण करने के लिए ओवरनाइट इंडेक्स स्वैप (ओआईएस) दरों में दैनिक परिवर्तनों का उपयोग करते हैं। ओवरनाइट इंडेक्स स्वैप दरों का उपयोग करने से हम मौद्रिक नीति के साधनों के बावजूद, अल्पकालिक फंडिंग स्थितियों में बदलाव को समझ सकते हैं। यह भारत के संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्षों से आरबीआई ने अपनी मौद्रिक नीति को लागू करने के लिए कई साधनों (उदाहरण के लिए, रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, बैंक दर, नकद आरक्षित अनुपात, आदि) का उपयोग किया है। हम विभिन्न परिपक्वताओं वाली (एक महीने से एक वर्ष तक) ओवरनाइट इंडेक्स स्वैप दरों का उपयोग करते हैं; नीति दर के बारे में घोषणाओं से जुड़े आश्चर्य को पकड़ने के लिए सबसे छोटी परिपक्वता वाली ओआईएस दरें, और नीति दर के भविष्य के पथ के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए मध्यम परिपक्वता वाली ओआईएस दरें।

हम पाते हैं कि सभी परिपक्वताओं वाली ओआईएस दरें आरबीआई की घोषणा के दिनों में लगभग दो गुना अधिक बढ़ जाती हैं। यह एक संकेत है कि ओआईएस बाजार वास्तव में आरबीआई की घोषणा के दिनों में सामने आई जानकारी पर प्रतिक्रिया दर्शा रहे हैं।

हम आगे पाते हैं कि इन दिनों के बारे में सूचना के दो अलग-अलग आयाम सामने आए हैं। जब आरबीआई अल्पकालिक नीति दरों में अप्रत्याशित परिवर्तन (या कोई परिवर्तन नहीं) करता है एक महीने की ओआईएस दर काफी हद तक प्रतिक्रिया करती है। लेकिन मध्यम परिपक्वता वाली ओआईएस दरों (तीन महीने से एक वर्ष तक की) में भी एक महीने के बदलाव के हिसाब से बदलाव होता है। इसका तात्पर्य यह है कि बाजार आरबीआई के सूचना-संचार के अनुसार भविष्य की नीति दरों के बारे में अपनी अपेक्षाओं को संशोधित करते हैं, जो कि अल्पकालिक नीति दर के संबंध में आरबीआई के निर्णय से अधिक होती हैं।

वर्णनात्मक विश्लेषण

यह समझने के लिए कि मौद्रिक आश्चर्यों को पकड़ने में ओआईएस दरें कितनी विश्वसनीय हैं, हम आरबीआई के मौद्रिक नीति वक्तव्यों का वर्णनात्मक विश्लेषण करते हैं- हम यह समझने के लिए कि आरबीआई विकास और मुद्रास्फीति के बारे में भविष्य के अपने दृष्टिकोण और मौद्रिक नीति की संभावित कार्य-प्रणाली की चर्चा के माध्यम से किस तरह के 'फॉरवर्ड गाइडेंस' प्रदान करता है, इस संबंध में आरबीआई के वक्तव्यों को पढ़ते हैं। हम इन घोषणाओं पर भारतीय वित्तीय मीडिया (द इकोनॉमिक टाइम्स अखबार द्वारा हमारे नमूने में प्रस्तुत) की प्रतिक्रियाओं को भी देखते हैं। हम ओआईएस दरों में प्रमुख परिवर्तनों से जुड़ी तिथियों पर भी ध्यान केंद्रित करते हैं। कुल मिलाकर हम पाते हैं कि, मौद्रिक झटके के बारे में हमारे उपाय उन अप्रत्याशित घटनाओं को पकड़ते हैं जो आरबीआई के फैसलों, उनके वक्तव्यों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा और उन तारीखों के आसपास की मीडिया चर्चा के बारे में हमारी समझ के अनुरूप हैं।

इसका एक स्पष्ट अपवाद है। 2007-2009 के वैश्विक वित्तीय संकट (जीएफसी) की अवधि के समय, एक महीने की ओआईएस दरों में आरबीआई की घोषणा के दिनों में बड़े उतार-चढ़ाव दिखाई दिए, जिन्हें आरबीआई के संबंधित वक्तव्यों या मीडिया की प्रतिक्रिया के संदर्भ में  जोड़कर देखना मुश्किल था। इसकी व्याख्या एक संभावना के जरिये की जा सकती थी, वह शायद जीएफसी के दौरान ओआईएस बाजारों में बढ़ी हुई तरलता प्रीमियम की उपस्थिति हो सकती है। हम इसकी भी जांच कर पुष्टि करते हैं कि मौद्रिक संचरण के बारे में हमारे परिणाम इस अवधि से प्रेरित नहीं हैं। हमारी यह खोज मौद्रिक आश्चर्यों को समझने हेतु ओआईएस दरों के उपयोग को मान्य करने के लिए वर्णनात्मक विश्लेषण करने के महत्व की पुष्टि करती है।

इस अवधि के बाहर, मौद्रिक नीति के झटकों के बारे में हमारे उपायों के स्पष्ट उदाहरण मिलते हैं कि इनसे अल्पकालिक नीति दरों के साथ-साथ ब्याज दरों के भविष्य के मार्ग के बारे में अप्रत्याशित घटनाओं को समझा जा सकता है।

उदाहरण के लिए, 8 नवंबर 2016 को विमुद्रीकरण की घोषणा के बाद, मीडिया ने दिखाया कि बाजार 7 दिसंबर 2016 को आरबीआई द्वारा की गई मौद्रिक नीति की घोषणा में नीतिगत रेपो दर में कटौती की उम्मीद कर रहे थे। तथापि, एमपीसी ने रेपो रेट में बदलाव नहीं करने का फैसला किया। यह एक संकुचनकारी मौद्रिक झटका था, जो हमारे मौद्रिक झटके के माप के एक बड़े परिमाण में परिलक्षित होता है।

इसी तरह 25 अक्टूबर 2011 को, गवर्नर सुब्बाराव के कार्यकाल के दौरान, मौद्रिक नीति वक्तव्य में प्रयुक्त वाक्यांश "...और बढ़ोतरी की वारंटी नहीं हो सकती है”, ब्याज दरों के बारे में शांत (उदासीन) दृष्टिकोण रखनेवाले बाजारों के लिए एक स्पष्ट संकेत था। हम यह भी पाते हैं कि यह विस्तारक झटका भी हमारे माप में दर्ज हुआ है।

हालांकि, कई वक्तव्य भविष्य के नीतिगत रुख के बारे में सीधे वक्तव्य नहीं हैं। साथ ही, नमूने में पहले की अवधि के वक्तव्य आर्थिक दृष्टिकोण की विस्तृत चर्चा के साथ अधिक क्रियात्मक हैं। फिर भी, हम अपने झटका (शॉक) माप में एक पर्याप्त गति पाते हैं जो लंबी परिपक्वता वाली ओआईएस दरों पर आधारित है। इससे पता चलता है कि बाजार के सहभागियों को पता था कि वक्तव्य का कौन-सा विशेष घटक अधिक जानकारीपूर्ण था।

हमारे परिणाम दर्शाते हैं कि आरबीआई का 'फॉरवर्ड गाइडेंस' आमतौर पर पॉलिसी रेट के भविष्य के रास्ते के बारे में स्पष्ट नहीं होता है जैसा कि आमतौर पर यूएस फेडरल रिजर्व (फेड) या यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ईसीबी) के मामले में होता है। बजाय इसके, भारतीय वित्तीय बाजार कुछ अपारदर्शी आरबीआई संचार से जानकारी निकालते हैं जो उभरती मैक्रो-इकॉनॉमिक स्थितियों पर चर्चा करते हुए भविष्य की दरों के बारे में बताता है।

वित्तीय बाजारों पर प्रभाव

हम सरकारी बॉन्ड यील्ड (पांच साल और 10 साल की परिपक्वता वाले), स्टॉक रिटर्न (नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध बेंचमार्क निफ्टी 50 इंडेक्स पर रिटर्न) और करेंसी रिटर्न (भारतीय रुपया-अमेरिकी डॉलर विनिमय दर पर रिटर्न) के संबंध में आरबीआई की कार्रवाइयों के संचरण का अध्ययन करने के लिए मौद्रिक झटके के अपने उपायों का उपयोग करते हैं। हम आरबीआई की प्रत्येक घोषणा के सन्दर्भ में एक संकीर्ण दैनिक विंडो में घटना अध्ययन विश्लेषण करते हैं। हम अपने मुख्य निष्कर्षों को संक्षेप में निम्नानुसार प्रस्तुत करते हैं।

नीति दर के बारे में आश्चर्यजनक समाचारों के साथ सरकारी बॉन्ड प्रतिफल और स्टॉक की कीमतों के बीच एक व्यवस्थित सह-संबंध है। संकुचनकारी मौद्रिक झटके सरकारी बॉन्ड यील्ड बढाते हैं और स्टॉक की कीमतों को कम करते हैं लेकिन विनिमय दर को प्रभावित नहीं करते हैं। दस-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड, मौद्रिक नीति के भविष्य के मार्ग के बारे में आरबीआई के वक्तव्यों में प्रकट जानकारी के प्रति अल्पकालिक नीति दरों में अप्रत्याशित परिवर्तनों की तुलना में काफी अधिक प्रतिक्रिया दर्शाते हैं। इसके विपरीत, शेयर बाजार (निफ्टी-50 इंडेक्स) अल्पकालिक नीतिगत दरों में अप्रत्याशित परिवर्तनों के प्रति अधिक प्रतिक्रिया दर्शाता है। मौद्रिक नीति के झटकों के हमारे उपायों के सन्दर्भ में विदेशी मुद्रा बाजार की प्रतिक्रिया व्यवस्थित नहीं होती है।

मुद्रा रिटर्न पर प्रभाव की कमी का एक संभावित कारण यह हो सकता है कि भारतीय रुपया-अमेरिकी डॉलर विनिमय दर को स्थिर करने के लिए आरबीआई नियमित रूप से विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करता है, जैसा कि पटनायक और सेनगुप्ता (2022) ने दर्ज किया है। परिणामस्वरूप, मौद्रिक नीति घोषणाओं के प्रति विनिमय दर की प्रतिक्रिया को समझना मुश्किल हो सकता है।

क्या मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण के साथ कुछ बदला है?

फरवरी 2016 में, भारत ने आधिकारिक तौर पर आईटी को मौद्रिक नीति ढांचे के रूप में अपनाया और मौद्रिक नीति निर्णय लेने के अधिकार आरबीआई गवर्नर से एमपीसी को दिए। आईटी की ओर क्रमिक शुरुआत पिछले वर्ष हुई जब राज्यपाल राजन ने औपचारिक रूप से यह निर्दिष्ट करते हुए कि भारत आईटी को अपनी मौद्रिक नीति ढांचे के रूप में अपनाएगा, वित्त मंत्रालय के साथ मौद्रिक नीति फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर किए।

आईटी के आगमन के साथ, मौद्रिक नीति यकीनन अधिक अच्छी तरह से स्पष्ट हो गई और मुद्रास्फीति और विकास (माथुर और सेनगुप्ता 2019) पर अधिक ध्यान देने के साथ आरबीआई संचार अधिक सुव्यवस्थित हो गया। यह पूछना स्वाभाविक है कि क्या इस शासन परिवर्तन से मौद्रिक झटके या उनके संचरण की गतिशीलता में बदलाव आया है।

इस प्रश्न के उत्तर में हम पाते हैं कि यदि हम अपने नमूने को आईटी/एमपीसी के पूर्व और बाद के युग में अलग करते हैं तो आरबीआई की घोषणा के दिनों में ओआईएस दर में परिवर्तन का आकार लगभग समान होता है। इसका तात्पर्य यह है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि आईटी शासन में आरबीआई के फैसलों से बाजार अधिक (या कम) हैरान थे। हालांकि आरबीआई गवर्नर के शासन में वित्तीय बाजार की प्रतिक्रिया में पर्याप्त भिन्नता है। विशेष रूप से गवर्नर राजन के कार्यकाल के दौरान मौद्रिक झटकों के प्रति बॉन्ड यील्ड और स्टॉक की कीमतों की प्रतिक्रिया से पता चलता है कि बाजार केवल आरबीआई के वक्तव्यों पर ध्यान दे रहे थे, और नीति दर में अप्रत्याशितता पर प्रतिक्रिया नहीं दर्शा रहे थे। बाद की एमपीसी व्यवस्था के तहत, बॉन्ड मार्केट ने रेपो दर में केवल अप्रत्याशित परिवर्तनों (या कोई परिवर्तन नहीं) पर प्रतिक्रिया करने के बजाय, मौद्रिक नीति वक्तव्यों में प्रकट जानकारी का जवाब देना बंद कर दिया। आईटी अवधि के दौरान, शेयर बाजार ने या तो नीतिगत दर के झटके या भविष्य की दरों के बारे में जानकारी में अप्रत्याशित परिवर्तनों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दर्शायी।

निष्कर्ष

हम भारत के सन्दर्भ में मौद्रिक नीति के झटके के एक नए उपाय का निर्माण करते हैं, और इन झटकों का उपयोग आरबीआई की नीतिगत कार्रवाइयों के प्रभाव को समझने के लिए आसानी से किया जा सकता है। हम पाते हैं कि भारतीय स्टॉक और बॉन्ड बाजार आरबीआई की मौद्रिक नीति क्रियाओं और संचार पर सावधानीपूर्वक ध्यान देते हैं, और मौद्रिक झटके के प्रति दृढ़ता से प्रतिक्रिया दर्शाते हैं।

हालांकि, भारत में वित्तीय बाजार नीतिगत दरों में बदलाव (या कोई परिवर्तन नहीं) पर यदि अपेक्षित हो तो, कोई प्रतिक्रिया नहीं दर्शाते हैं। इसके बजाय, बाजार केवल घोषणाओं के अप्रत्याशित घटक पर प्रतिक्रिया दर्शाते हैं। जबकि आरबीआई यूएस फेड या ईसीबी के विपरीत अपने वक्तव्यों में स्पष्ट रूप से आगे का मार्गदर्शन (फॉरवर्ड गाइडेंस) नहीं देता है, भारत में वित्तीय बाजार आरबीआई के आधिकारिक सूचना-संचार से नीति दर के भविष्य के पथ के बारे में पर्याप्त जानकारी प्राप्त करते हैं।

बाजार का आकलन कि कौन-सा विशेष साधन (क्रियाएं या शब्द) अधिक प्रभावी है, गवर्नर के शासन में भी बदलता है। उदाहरण के लिए, ऐसा लगता है कि गवर्नर राजन के कार्यकाल के दौरान बाजारों ने आरबीआई के वक्तव्यों पर सबसे अधिक ध्यान दिया और यह बाद के एमपीसी के शासन में ठीक उलट हो गया। इसका तात्पर्य यह है कि मौद्रिक नीति के बारे में आगे के मार्गदर्शन (फॉरवर्ड गाइडेंस) पहलू पर विचार किए बिना सूचना प्रसारण पर आईटी के प्रभाव के बारे में निष्कर्ष निकालने की कोशिश संभावित रूप से अधूरी है।

हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि आरबीआई के आईटी-पूर्व और बाद के दृष्टिकोण के बजाय, गवर्नरशिप में बदलाव के संदर्भ में आरबीआई के नीति निर्माण में शासन में बदलाव के बारे में सोचना शायद अधिक सहायक है। इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं है कि आईटी की शुरुआत के साथ मौद्रिक अप्रत्याशितता का आकार बदलता है।

हमारे शोध के फल के रूप में, हमने मौद्रिक नीति झटके के बारे में अपने उपायों और नीति घोषणा तिथियों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया है। हमें उम्मीद है कि इससे भारतीय मौद्रिक नीति पर भावी शोध में मदद मिलेगी।

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टिप्पणियाँ:

  1. प्रमुख हालिया उदाहरणों के लिए, अल्ताविला एवं अन्य (2019) और स्वानसन (2021) देखें।
  2. हम केंद्रीय बैंक द्वारा घोषित नीतिगत दरों में अप्रत्याशित परिवर्तनों को इंगित करने के लिए 'मौद्रिक झटका’ और 'मौद्रिक आश्चर्य' का 'झटके' के साथ परस्पर-उपयोग करते हैं।
  3. हमारे नमूने में आरबीआई की घोषणा की तारीखें उन तारीखों से मेल खाती हैं जब रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, बैंक दर और नकद आरक्षित अनुपात में परिवर्तन (या कोई परिवर्तन नहीं) के बारे में जानकारी सामने आई थी। ये घोषणाएँ वक्तव्यों, परिपत्रों या प्रेस-विज्ञप्तियों का उपयोग करके की गई थीं। हम कुल 115 आरबीआई घोषणा तिथियों का विश्लेषण करते हैं। इन घोषणा तिथियों में वे तिथियां शामिल नहीं हैं जब आरबीआई ने अपने खुले बाजार संचालन (ओएमओ) के बारे में जानकारी जारी की थी। इन खरीद या बिक्री कार्यों का उद्देश्य मुख्य रूप से बाजार में तरलता को स्थिर करना था और इसलिए, ये घोषणाएं नीति दर के भविष्य के पथ के बारे में जानकारी से संबंधित नहीं हैं।
  4. ओआईएस अनुबंध डेरिवेटिव हैं जिसमें पार्टियां फिक्स्ड और फ्लोटिंग ब्याज दर भुगतानों का आदान-प्रदान करती हैं। फ्लोटिंग दर भुगतान आम तौर पर ओवरनाईट इंटरबैंक दर से जुड़ा होता है जो केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति साधन के लिए एक अच्छा प्रॉक्सी है। भारत के संदर्भ में, मुंबई इंटरबैंक ऑफर रेट (एमआईबीओआर) ओआईएस दरों के लिए प्रासंगिक फ्लोटिंग रेट है जिसका हम अध्ययन करते हैं। भारत में ओआईएस बाजार के बारे में अधिक जानकारी के लिए ऋतुराज और कुमार (2021) देखें।
  5. हम पाते हैं कि यदि हम मौद्रिक झटके के निर्माण के लिए बदले में टी-बिल दरों (तीन महीने और एक वर्ष) का उपयोग करते हैं तो मौद्रिक संचरण मोटे तौर पर समान है।

लेखक परिचय: एमित लकड़ावाला वेक फॉरेस्ट यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं। डॉ. राजेश्वरी सेनगुप्ता भारत के मुंबई में इंदिरा गांधी विकास अनुसंधान संस्थान (IGIDR)में अर्थशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

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