सामाजिक पहचान

क्या हिंसा के भय से भारत में महिला श्रम सप्लाई प्रभावित होती है?

  • Blog Post Date 27 मार्च, 2019
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विकासशील देशों के श्रम बाजारों में काम करने की उम्र वाली महिलाएं महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की अचानक हुई घटनाओं पर होने वाली मीडिया खबरों के प्रति खास तौर से संवेदनशील हो सकती हैं। यह उन्हें काम करने के लिए बाहर जाने से भी रोक सकता है। इस आलेख में शहरी भारत के आंकड़ों का उपयोग करके छानबीन की गई है कि किसी के स्थानीय इलाके में हुई हिंसा की मीडिया रिपोर्ट का महिला द्वारा घर के बाहर जाकर काम करने के फैंसले पर क्या प्रभाव पड़ता है।

 

विकासशील देशों में पुरुषों की तुलना में बहुत कम महिलाओं की सवैतनिक रोजगार में भागीदारी रहती है। इसका महिलाओं पर महत्वपूर्ण दीर्घकालिक प्रभाव पड़ता है : लड़कियों की शिक्षा पर निवेश करने का प्रोत्साहन कम हो जाता है और परिवारों में महिलाओं की मोलतोल की क्षमता घट जाती है। श्रमशक्ति की भागीदारी (एलएफपी) में कमी लाने वाला एक संभावित कारक हिंसा का भय भी हो सकता है। विकासशील देशों के श्रम बाजारों में काम करने की उम्र वाली महिलाएं महिलाओं के साथ हिंसा (जैसे यौन हमला या बलात्कार) की अचानक हुई घटनाओं की मीडिया रिपोर्टिंग के प्रति खास तौर पर संवेदनशील हो सकती है। हाइ प्रोफाइल मीडिया रिपोर्टिंग हिंसा के शिकार होने जैसे अत्यधिक परिणाम को महिलाओं के लिए मुख्य बना देती है और उसके चलते उन्हें काम के लिए बाहर जाने से रोकती है। हाल के रिसर्च में मैंने इस कारक के महत्व की छानबीन शहरी भारत के आंकड़ों का उपयोग करके की है (सिद्दिकी 2018)।   

भारत में महिला श्रम सप्लाई

श्रमशक्ति की भागीदारी (लेबर फ़ोर्स पार्टिसिपेशन (एलएफपी)) के मामले में स्त्री-पुरुष के बीच काफी अंतर होना भारतीय श्रम बाजार की खास पहचान है। वर्ष 2011-12 में काम की उम्र (15 से 65 वर्ष) वाली 20 प्रतिशत भारतीय शहरी महिलाएं ही काम कर रही थीं या काम की सक्रियता से तलाश कर रही थीं। पुरुषों के मामले में यह आंकड़ा 81 प्रतिशत था।1 इसके विपरीत, 2012 श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी अमेरिका में 68 प्रतिशत, यूके में 71 प्रतिशत, स्वीडन में 78 प्रतिशत और जर्मनी में 72 प्रतिशत थी (ओईसीडी की सांख्यिकी)। भारत में महिला श्रमशक्ति सहभागिता दर (एफएलएफपी) अन्य विकासशील देशों की तुलना में भी प्रतिकूल है। वर्ष 1986 से 2006 के बीच के 63 देशों के जनसांख्यिक एवं स्वास्थ्य सर्वे (डीएचएस) के आंकड़ों का उपयोग करने पर भालोत्रा एवं उमाना-अपोंते (2010) ने पाया कि 20 से 49 वर्ष उम्र वाली महिलाओं की रोजगार दर अफ्रीका में 64 प्रतिशत, एशिया में 43 प्रतिशत, और लैटिन अमेरिका में 50 प्रतिशत थी। 

महिला श्रमिकों की आपूर्ति पर हिंसा का प्रभाव

अर्थशास्त्रियों ने इस बात का अनुमान लगाया है कि हिंसा का शिकार होने जैसी कम आशंका वाली घटनाओं का लोगों के व्यवहार पर बड़ा प्रभाव कैसे पड़ सकता है (बेकर एवं रूबीन्सटीन 2011)। इसके पीछे यह विचार है कि अगर महिलाओं के लिए बाहरी काम करने का अत्यधिक परिणाम, हिंसा का शिकार होने के रूप में, प्रमुख हो जाता है, तो इससे भय पैदा होता है और उनकी खैरियत पर बुरा असर पड़ता है। कुछ महिलाएं अपने भय पर काबू पाने के लिए निवेश करती हैं, बशर्ते कि बाहर काम करने से होने वाले लाभ काफी अधिक हों। लेकिन जिन महिलाओं के लिए ये लाभ अधिक नहीं होते हैं, वे बाहर काम करने में कटौती कर देती हैं। इसीलिए उनके व्यवहार पर इसका प्रभाव हिंसा से नुकसान पहुंचने की वस्तुगत आशंका से काफी अधिक महसूस होता है।

हाल के अनुभवजन्य रिसर्च से पता चलता है कि भारत में घर के बाहर होने पर महिलाओं को होने वाले भय और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का उनके आर्थिक क्रियाकलापों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना संभावित है। मुरलीधरन एवं प्रकाश (2017) ने पाया कि बिहार में लड़कियों को साइकल उपलब्ध कराने पर उनके लिए स्कूल जाना अधिक सुरक्षित हो जाने के कारण माध्यमिक विद्यालयों में उनका नामांकन बढ़ गया। वहीं बोरकर (2018) ने पाया कि महिलाएं गुणवत्ता के लिहाज से दिल्ली विश्वविद्यालय के ऊपरी अर्धांश वाले कॉलेज के बजाय निचले अर्धांश में स्थित कॉलेज को चुनती हैं जिनके बारे में उन्हें लगता है कि वह एक स्टैंडर्ड डेविएशन2 अधिक सुरक्षित यात्रा वाले मार्ग पर है। चक्रबर्ती एवं अन्य (2018) ने भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण के 2005 के क्रॉस-सेक्शनल डेटा3 का उपयोग करके पाया कि जिन शहरी इलाकों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन उत्पीड़न का सेल्फ-रिपोर्टेड स्तर ऊंचा होता है वहां की महिलाओं द्वारा बाहर रोजगार खोजने की संभावना काफी कम होती है।

यौन हमलों के मीडिया कवरेज के बाद सार्वजनिक स्थानों का भय महिलाओं में तनाव और चिंता पैदा कर सकता है और उनको काम करने के लिए बाहर जाने से रोक सकता है। दिल्ली में चलती बस में एक महिला के साथ हुए बलात्कार और उसके बाद हुई मृत्यु की घटना के बाद (जिसकी मीडिया में काफी रिपोर्टिंग हुई थी), 2012 में किए गए एक सर्वे में लगभग 73 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि महिलाओं को अपने इलाके में यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। आधे से अधिक उत्तरदाताओं ने बताया कि ये स्थान हमेशा से असुरक्षित रहे हैं। लगभग 20 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें दिन में भी अकेले बाहर जाने में डर लगता है और 10 प्रतिशत अतिरिक्त महिलाओं ने कहा कि वे अकेले बाहर जाने का साहस बिल्कुल नहीं करेंगी। अंधेरा हो जाने के बाद सुरक्षा संबंधी चिंता जतलाने के मामले में उत्तरदाताओं के अनुपात क्रमशः 63 प्रतिशत और 21 प्रतिशत थे (यूएन विमेन और इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन विमेन, 2013)। 

शोध परिणाम और नीतिगत निहितार्थ

मैंने भारतीय राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण (नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस)) 2009-10 और 2011-12 के चक्रों के श्रम बाजार के आंकड़ों का उपयोग किया और उन्हें भारत के जिलों में अधिक समय तक हुई शारीरिक और यौन हिंसा की मीडिया रिपोर्ट के भौगोलिक आधार पर प्राप्त आंकड़ों के साथ संयुक्त किया (द ग्लोबल डेटाबेस ऑफ एवेंट्स, लैंग्वेज एंड टोन अर्थात जीडीईएलटी)। संयुक्त आंकड़ों का उपयोग करके मैंने किसी स्थानीय क्षेत्र या जिले में गत तिमाही में हुई मीडिया-रिपोर्टेड हिंसा के प्रभाव की छानबीन की कि उनका किसी महिला द्वारा उस दिन काम के लिए बाहर जाने के फैसले पर कोई असर हुआ या नहीं।

कुछ सांख्यिकीय विधियों से मेरे लिए संदिग्ध सहसंबंध वाले अनेक स्रोतों को बाहर रखना संभव हुआ। उनका उपयोग करके मैंने पाया कि किसी स्थानीय क्षेत्र में यौन हमला होने की रिपोर्टों में एक स्टैंडर्ड डेविएशन (अर्थात 3 महीने की अवधि में लगभग 64 रिपोर्ट) वृद्धि होने के कारण किसी महिला के लिए घर के बाहर काम करने की संभावना में महिला श्रम सप्लाई के सेंपल औसत की 3.6 प्रतिशत के बराबर कमी हुई। इसके विपरीत, घर के बाहर काम करने वाली महिलाओं पर शारीरिक हमले की रिपोर्ट का, या घर के बाहर काम करने वाले पुरुष पर यौन हमले की रिपोर्ट का कोई प्रभाव नहीं हुआ।

जिस मॉडल में आर्थिक प्रोत्साहनों की स्थिति में अपने भय पर काबू पाने के लिए महिलाएं निवेश करती हैं (बेकर एवं रूबीन्सटीन 2011), उसी की तरह मैंने भी पाया कि गरीब परिवार की महिला श्रमिकों की आपूर्ति पर स्थानीय हिंसा का कम प्रभाव पड़ता है। दूसरे शब्दों में, यह देखते हुए कि गरीब परिवारों की महिलाओं के लिए अपने भयों पर काबू पाने के लिहाज से मजबूत आर्थिक प्रोत्साहन होता है, वे स्थानीय हिंसा की अधिक खबरों के बाद भी काम करने के लिए घर से बाहर जाने से नहीं हिचकती हैं।

इस शोध के परिणाम भारत में महिलाओं की सुरक्षा संबंधी चिंताएं दूर करने के महत्व पर प्रकाश डालते हैं। अपनाए जा सकने वाले कुछ हस्तक्षेपों में महिलाओं के लिए विशेष परिवहन सुविधा और महिलाओं को यौन हमलों से बचाने वाले पुलिस/कानूनी ढांचों को मजबूत करना शामिल हो सकते हैं। महिला श्रमशक्ति की भागीदारी से आर्थिक आउटपुट में वृद्धि ही नहीं होती, उससे कहीं बढ़कर लाभ होते हैं। श्रमशक्ति की भागीदारी बढ़ने से परिवार में महिलाओं की हैसियत में सुधार होता है (एंडरसन एवं ईश्वरन 2009, ऍटकिन 2009)। यही नहीं, लड़कियों पर मानव पूंजी के निवेश तथा महिलाओं के विवाह और बच्चे को जन्म देने में विलंब संबंधी निर्णयों पर भी इसका काफी अधिक असर पड़ता है (जेंसन 2012, हीथ एवं मोबारक 2015)। महिलाओं की हैसियत पर होने वाले लाभों को देखते हुए महिलाओं पर हिंसा के भय को दूर करने और महिला श्रमशक्ति की भागीदारी को प्रोत्साहित करने वाले हस्तक्षेप डिजाइन करना और उसे अमल में लाना मुख्य निर्णयकर्ताओं के लिए उच्च प्राथमिकता वाला लक्ष्य होना चाहिए। 

लेखक परिचय: ज़हरा सिद्दिकी  यूनिवर्सिटी ऑफ़ ब्रिस्टल में अर्थशास्त्र की सीनियर लेक्चरर हैं।

नोट्स:

  1. भारतीय राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण (नेशनल सैंपल सर्वे) के 68वें राउंड के रोजगार और बेरोजगारी शिड्यूल के आधार पर लेखक द्वारा गणना पर आधारित। श्रमशक्ति की स्थिति को पिछले वर्ष में मुख्य कार्य की स्थिति का उपयोग करके निर्धारित किया जाता है। अगर कोई स्वनियोजित हो, अवैतनिक पारिवारिक श्रम करता हो, नियमित सवैतनिक कर्मी हो, अनियमित श्रमिक हो, या बेरोजगार अथवा काम की तलाश में लगा हो, तो उसे श्रमशक्ति में शामिल माना जाता है।
  2. स्टैंडर्ड डेविएशन एक माप है जिसका उपयोग किसी सेट के मानों का उस सेट के माध्य (औसत) मान से अंतर या फैलाव मापने के लिए किया जाता है।
  3. अनेक लोगों के लिए एक ही समय इकट्ठा किए गए आंकड़ों को क्रॉस-सेक्शनल डेटा कहा जाता है।
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