सामाजिक पहचान

शक्ति के पहिए : बिहार साइकल कार्यक्रम के दीर्घकालिक प्रभाव

  • Blog Post Date 13 मार्च, 2019
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Shabana Mitra

Indian Insitute of Management Bangalore

shabana@iimb.ernet.in

बिहार सरकार ने 2006 में स्कूल जाने के लिए साइकल खरीदने के लिए कक्षा 9 की लड़कियों को नकद रुपए देने का एक कार्यक्रम शुरू किया था। वर्ष 2016 में किए गए एक सर्वे के आधार पर इस आलेख में दर्शाया गया है कि इससे लाभार्थियों के लिए अपनी पढ़ाई पूरी करने, कृषि के बाहर अधिक उत्पादक काम खोजने और देर से विवाह करने की संभावना बढ़ गई। हालांकि उनमें से बहुतों को काम करने की अनुमति नहीं दी गई या उन्हें उपयुक्त काम नहीं मिल सका।

  

मुख्यमंत्री बालिका साइकल योजना का आरंभ बिहार सरकार द्वारा 2006 में किया गया था। योजना के तहत कक्षा 9 में नामांकित हर लड़की को साइकल खरीदने के लिए नकद रकम मिलती है ताकि उसका उपयोग वह स्कूल जाने के लिए करे। इसके पीछे यह विचार था कि क्यूंकि जनसँख्या के अनुपात में स्कूलों की संख्या कम है और लड़कियां स्कूल छोड़ देती हैं इसलिए साइकल होने से दूर-दराज के स्कूलों तक पहुंचने का उनका समय घटेगा। इस तरह बिना अधिक निवेश किए उनके स्कूलों को नजदीक किया जा सकेगा। योजना के आरंभिक रिपोर्ट अत्यंत अनुकूल थे। बिना अधिक दुरुपयोग हुए यह योजना कारगर रही थी : पहले साल में ही नामांकन 30 प्रतिशत से अधिक बढ़ गया था (मुरलीधरन एवं प्रकाश 2017) जबकि योजना से रकम का रिसाव 5 प्रतिशत से भी कम था (घटक, कुमार एवं मित्रा 2016)। 

ये परिणाम काफी प्रभावशाली हैं। साइकल पर चलने वाली लड़की महज स्कूल जाने वाली लड़की नहीं है : वह समाज में हुए बदलाव और नए सामाजिक प्रचलनों तथा आकांक्षाओं में हुई वृद्धि को भी दर्शाती है। साइकल कार्यक्रम के प्रभाव का महज नामांकन की संख्या बढ़ने के रूप में मूल्यांकन करना योजना की संभावनाओं को सीमित कर देगा। कुल प्रभाव में समाज में लड़कियों और महिलाओं की भूमिका के बारे में पुरुषों और महिलाओं, दोनो के नजरिए में होने वाले बदलाव को शामिल किया जाना चाहिए। इसलिए इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में हम साइकल कार्यक्रम के दीर्घकालिक प्रभाव का अध्ययन करते हैं (मित्रा एवं मोइन 2017)। 

इसकी स्थापना के दस साल बाद, योजना के पहले लाभार्थियों की उम्र अब बीस वर्ष से अधिक हो गई होगी। वे अपनी जिंदगी के बारे में अनेक महत्वपूर्ण फैसले लेती होंगी। इनमें ये भी शामिल है कि अध्ययन जारी रखना है या नहीं। कुछ मामलों में विवाह करने और बच्चों का जन्म देने के मामले में फैसले भी शामिल होंगे। हम साइकल कार्यक्रम से लाभान्वित लड़कियों के परिणामों की तुलना उन लड़कियों से करते हैं जो 2006 में कुछ वर्ष बड़ी (13-14 वर्ष के बजाय 15-16 वर्ष की) होने के कारण इसका लाभ नहीं ले सकी थीं। हम बिहार की लड़कियों की तुलना पड़ोसी राज्यों – झारखंड और उत्तर प्रदेश – की लड़कियों से भी करते हैं जहां ऐसी कोई योजना लागू नहीं हुई थी। यह सब करने के लिए हमने जनवरी से अप्रैल 2016 के बीच बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के छह जिलों में एक सर्वे किया। उसमें 3,500 परिवारों का सेंपल लिया गया और 20,000 से भी अधिक लोगों का साक्षात्कार लिया गया।1 

पढ़ाई पूरी करने की संभावना

हमारा विश्लेषण दर्शाता है कि इस योजना के तहत साइकल पाने वाली किसी लड़की द्वारा दसवीं कक्षा तक पढ़ाई पूरी करने की संभावना साइकल नहीं पाने वाली लड़कियों से 27.5 प्रतिशत अधिक थी। यह योजना का प्रत्यक्ष इच्छित प्रभाव है। हालांकि आश्चर्य की बात यह है कि साइकल से कोई प्रत्यक्ष मदद नहीं मिलने के बाद भी लड़कियों ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। बिहार में उच्च माध्यमिक विद्यालय और कॉलेज आम तौर पर गांवों से दूर हैं और उनकी संख्या बहुत कम है। इसका अर्थ हुआ कि लड़कियां वहां साइकल से नहीं जा सकती हैं। तब भी हमारे परिणाम दर्शाते हैं कि साइकल योजना शुरू होने के बाद स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए पढ़ाई जारी रखने और अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने की संभावना साइकल नहीं पाने वाली लड़कियों की तुलना में 22.9 प्रतिशत बढ़ गई। अतः साइकल माध्यमिक विद्यालयों तक पहुंचने की बाधा दूर करने में ही मदद नहीं कर रही है। यह परिवर्तन का साधन और नई आकांक्षाओं के लिए माध्यम भी है। 

आरेख 1. बिहार में साइकल पाने और नहीं पाने वाली लड़कियों के मामले में चुनिंदा परिणामों की तुलनात्मक संभावना कैसी होती है 

टिप्पणी  : आरेख दर्शाता है कि बिहार में योजना के तहत साइकल पाने वाली किसी लड़की के लिए किसी खास स्तर तक पढ़ाई पूरी करने या विवाह होने अथवा काम करने के मामले में, साइकल नहीं पाने वाली बिहार की लड़की की तुलना में कितनी अधिक संभावना है जबकि दोनो श्रेणी की लड़कियों के लिए अन्य सारी चीजें समान हैं। 

 

साइकल पाने वाली लड़कियों के लिए कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने की संभावना साइकल नहीं पाने वाली बिहार की लड़कियों की तुलना में 5 प्रतिशत अधिक है। हालांकि यह सप्लाई साइड की बाधाओं का संकेत देती है, तब भी बिहार में वास्तव में कॉलेज जाने वाली लड़कियों के निम्न प्रतिशत को देखते हुए यह कोई छोटी संख्या नहीं है। साइकल कार्यक्रम शिक्षा के प्रति मानसिकता बदलने में सक्षम है, जैसा कि स्कूली शिक्षा पूरी करने की उच्च दरों से स्पष्ट होता है। कॉलेज की शिक्षा पूरी करने के मामले में अचानक गिरावट लड़कियों को आगे पढ़ने देने की अनिच्छा के बजाय उनके क्षेत्रों में कॉलेजों के नहीं होने का सूचक हो सकती है। 

अध्ययन करने के लिए लड़कियों के लिए रास्ते खोलने से उनके द्वारा किए जाने वाले अन्य चुनावों पर चक्राकार प्रभाव पड़ता है। हमने दो निर्णयों का अध्ययन किया : काम के प्रति उनकी पसंद और विवाह के संबंध में उनके निर्णय। 

काम संबंधी पसंद

काम के संबंध में हमारे परिणाम दर्शाते हैं कि जिन लड़कियों को साइकल मिली, उनके काम करने की संभावना (कृषि में) कम रहती है। यह देखते हुए कि वे अधिक पढ़ रही हैं, यह आश्चर्यजनक लग सकता है। लेकिन गहराई से छानबीन करने पर हमने पाया कि लड़कियों के लिए उपलब्ध प्राथमिक पेशा कृषि में काम करना था। लड़कियों ने जमीन पर काम करने के बजाय ‘अधिक उपयुक्त’ काम पाने के लिए इंतजार करना पसंद किया। हमारे अध्ययन में पाया गया कि साइकल वाली लड़कियों द्वारा कृषि में काम करने की संभावना 4.17 प्रतिशत कम थी। जब उनसे पूछा गया कि वे काम क्यों नहीं कर रही हैं, तो 45 प्रतिशत से भी अधिक ने कहा कि वे काम करना चाहेंगी लेकिन उनके परिवार के लोग उन्हें अनुमति नहीं देते हैं। वहीं 10 प्रतिशत से अधिक ने कहा कि उन्हें उपयुक्त काम नहीं मिला है।    

अधिक शिक्षा ने लड़कियों की आकांक्षाओं को बदल दिया है और वे अपनी जिंदगी में कुछ अधिक हासिल करने की चाहत रखती हैं। वे कृषि में कम भुगतान वाला काम करने के बजाय कोई उपयुक्त काम पाने के लिए इंतजार करना चाहती हैं। काम की कमी उनके लिए बाधा बनती है। यह भी ऐसी अन्य नीतियों की जरूरत का संकेत देती है जो मुख्यमंत्री साइकल योजना द्वारा किए गए काम के पूरक काम करे। लड़कियों का कई तरीकों से सशक्तिकरण हुआ है, लेकिन अब उन्हें स्वतंत्र होने के साधन उपलब्ध कराने की जरूरत है। इसके लिए अधिक काम उपलब्ध कराने के लिहाज से राज्य द्वारा अधिक प्रयास और नई नीतियों की जरूरत है।    

विवाह संबंधी निर्णय

हमने जिस दूसरे निर्णय पर अध्ययन किया वह विवाह संबंधी निर्णय है। भारत में विवाह की उम्र कम रहती है। वर्ष 2011 के जनगणना (सेन्सस) आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं के विवाह की औसत उम्र 21.2 वर्ष (ग्रामीण महिलाओं की 20.7 वर्ष) है जो बिहार में 20.7 वर्ष (ग्रामीण महिलाओं के लिए 20.5 वर्ष) है। कम उम्र में विवाह के साथ अनेक जटिलताएं जुड़ी रहती हैं। हालांकि समाज की मानसिकता को बदलना मुश्किल है। हमने यह आश्चर्यजनक बात पाई की साइकल से स्कूल जाने वाली लड़कियां विवाह देर से कर रही हैं। हमने पाया कि साइकल कार्यक्रम से साइकल पाने वाली लड़कियों की शादी के समय उम्र बिना साइकल वाली लड़कियों से औसतन छह महीने अधिक थी। यह लड़कियों के लिए शिक्षा को आसान बनाने के एक अन्य सकारात्मक पक्ष को दर्शाता है। 

समापन टिप्पणी

कुल मिलाकर साइकल कार्यक्रम के चलते लाभार्थियों की आकांक्षाएं बढ़ी हैं और महिलाओं के बारे में मानसिकता में बदलाव आया है। लड़कियों द्वारा स्कूली शिक्षा पूरी करने, कॉलेज जाने और कृषि से बाहर उत्पादक काम खोजने की संभावना बढ़ गई है। सामाजिक परिप्रेक्ष्य में भी, इससे महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। लड़कियों की कम उम्र में शादी की आशंका घटी है और वे बच्चों को जन्म देने में देर कर रही हैं। 

हमारे विश्लेषण में उन अन्य अड़चनों और बाधाओं की भी पहचान की गई है जिनका सामना साइकल पाने वाली लड़कियों को अपने नए सपने पूरे करने के मामले में करना पड़ता है। उन्हें काम पाने में कठिनाई होती है और उनके इलाके में पर्याप्त अच्छे कॉलेज नहीं हैं। यह भी एक गंभीर बाधा है कि समाज धीमी गति से बदलता है और अनेक लड़कियों को अपनी आकांक्षाएं पूरी करने के लिए अपने घर में अभी भी विरोध-प्रतिरोध झेलना पड़ता है। 

लेखक परिचय : शबाना मित्रा इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, बैंगलोर (आइआइएमबी) के सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी में असिस्टेंट प्रॉफेसर हैं। कार्ले मोइन ऑस्लो यूनिवर्सिटी के इकनॉमिक्स विभाग में स्टडी ऑफ इक्वौलिटी, सोशल ऑर्गनाइजेशन एंड परफॉर्मेंस में प्रॉफेसर हैं। 

यह लेख आइडियाज फॉर इंडिया की अनुमति से पुनर्मुद्रित किया गया है।

नोट: 

  1. प्रविधि (मेथडोलॉजी) संबंधी टिप्पणी : हमारे शोध परिणाम डिफरेंस-इन-डिफरेंस-इन-डिफरेंस (ट्रिपल डिफरेंस) फ्रेमवर्क पर आधारित हैं। हम ने बिहार की साइकल पाने वाली लड़कियों की तुलना कुछ बड़ी (2006 में 15-16 वर्ष की) लड़कियों से और इस तरह पात्र लड़कियों से की है (पहला अंतर)। हमने इस अंतर की तुलना बिहार में लड़कों के बीच ऐसे ही अंतर के साथ की है (दूसरा अंतर)। बड़ी और छोटी लड़कियों के बीच तुलना करने का कोई ट्रेंड अफेक्ट हो, तो वह लड़कों और लड़कियों की तुलना करने पर समाप्त हो जाता है। इस डिफरेंस-इन-डिफरेंस की तुलना हम पड़ोसी राज्यों के ऐसे ही डिफरेंस-इन-डिफरेंस के साथ करते हैं (तीसरा अंतर)। ट्रिपल डिफरेंस के गुणांक से हमें बिहार में साइकल पाने वाली लड़कियों पर साइकल नहीं पाने वाली वैसी ही लड़कियों (हाइपोथिटिकल) की तुलना में साइकल के प्रभाव का पता चलता है। इस वीडियो में ट्रिपल डिफरेंस की धारणा को सामान्य शब्दों में स्पष्ट किया गया है : https://www.theigc.org/multimedia/moving-up-a-gear-can-a-free-bike-help-a-girls-education-in-northern-india/ 
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