समष्टि अर्थशास्त्र

कोविड-19 का राज्य वित्त पर प्रभाव

  • Blog Post Date 21 मई, 2020
  • Print Page

स्वास्थ्य का विषय राज्य सरकारें देखती हैं, इस लिए जब से भारत में कोविड-19 महामारी की शुरुआत हुई, तब से अलग-अलग राज्यों ने वे सारी प्रतिक्रियाएं अपनाईं हैं जो वे अपने राज्य-स्तरीय विधानों के तहत अपना सकते थे। हालांकि, 24 मार्च को देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के बाद सभी आर्थिक गतिविधियों में से 60% से अधिक को बंद कर दिया गया था, इसके परिणामस्‍वरूप जब राज्यों के खर्चों में वृद्धि हुई, उसी समय उनके अपने करों में अचानक और तेज गिरावट आ गई। इस पोस्ट में, प्रणव सेन उन सभी अलग-अलग प्रकारों के बारे में बताते हैं जिनसे राज्य वित्त को एक विनाशकारी झटका लगा है।

 

सार्स-कोव-2 (जिसे कोविड-19 भी कहा जाता है) महामारी के कारण भारत के सामने, हाल के अन्य समयों की तुलना में, सबसे बड़ी राजकोषीय चुनौती उत्पन्न हुई है। इस समस्या के तीन अलग-अलग आयाम हैं:

(क) बीमार का पता लगाने तथा उनके उपचार की प्रत्यक्ष लागत;

(ख) ‘सामाजिक दूरी’ द्वारा बीमारी के नियंत्रण से जुड़ी लागत और परिणामस्वरूप आजीविका का नुकसान; तथा

(ग) आर्थिक गतिविधि में तेज गिरावट से उत्पन्न कर राजस्व का नुकसान।

स्वास्थ्य का विषय राज्य सरकारें देखती हैं, इस लिए जब से भारत में कोविड-19 महामारी की शुरुआत हुई, तब से अलग-अलग राज्यों ने वे सारी प्रतिक्रियाएं अपनाईं हैं जो वे अपने राज्य-स्तरीय विधानों के तहत अपना सकते थे। रोकथाम, जांच, और उपचार संबंधी कार्य उनके द्वारा किए जा रहे थे; और इस प्रकृया में केंद्र कहीं भी नहीं थी। अधिकांश राज्यों ने लॉकडाउन को किसी न किसी रूप में लागू किया, लेकिन कई आर्थिक गतिविधियों को जारी रखने के अनुमति भी दी। निश्चित रूप से, इनकी सीमाएं राज्यानुसार अलग-अलग थीं। फिर भी, इस तरह के फैसले बीमारी की रोकथाम और न्यूनतम आजीविका की जरूरतों के बीच संतुलन को ध्यान में रखते हुए किए गए थे।

केंद्र द्वारा एकमात्र उपाय किया गया था और वह था मार्च महीने के मध्य में पीएम गरीब कल्याण योजना (पीएम-जीकेवाई) का घोषणा किया जाना - केंद्र सरकार द्वारा सीधे लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) लागू किया गया था - जिसने राज्यों को बीमारी और भूख को प्रबंधित करने की लागत वहन करने में कोई मदद नहीं की थी लेकिन इसने राजनीतिक लोकप्रियता को अवश्‍य बढ़ाया, यद्यपि इसमें शामिल शुद्ध राशि, सकल घरेलू उत्पाद (सकल घरेलू उत्पाद) का केवल 0.4% थी।

फिर 24 मार्च को, प्रधानमंत्री ने देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा की – जो विश्व के अन्य देशों की तुलना में सबसे व्यापक और कठोर है। विशेष रूप से, 60% से अधिक सभी आर्थिक गतिविधियों को बिना किसी सूचना के बंद कर दिया गया था। केवल कुछ सूचीबद्ध ‘आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं’ की अनुमति थी और वह भी शर्तों के साथ। इसने दो मोर्चों पर राज्य के वित्त को एक विनाशकारी झटका दिया। पहला, आजीविका की समस्या और भी विकट हो गई है जिससे राज्यों को नकदी और मुफ्त या रियायती भोजन दोनों प्रकार से अपने मानवीय खर्चों में काफी वृद्धि करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। यह समस्‍या प्रवासी मजदूरों की वापसी से और अधिक जटिल हो गई, जिसने आरंभिक बिंदु से गंतव्य तक, और बीच में हर योजनागत क्षेत्र में सभी राज्यों पर लागत लगाई। दुर्भाग्य से, मूल पीएम-जीकेवाई घोषणा के बाद केंद्र द्वारा कोई और योगदान नहीं दिया गया।

दूसरा, चूंकि व्यावहारिक रूप से सभी राज्यों को कर (मुख्य रूप से वस्‍तु एवं सेवा कर (जीएसटी))   ‘गैर-अनिवार्य’ वस्‍तुओं एवं सेवाओं से प्राप्त होते हैं, राजस्व निहितार्थ वास्तव में गंभीर थे। यह उपाय, केवल अप्रैल 2020 के लिए राज्यों के अपने कर संग्रह को लगभग 40% तक कम कर देगा। यह निश्चित रूप से सत्‍य है कि केंद्र को भी इतनी ही राशि की हानि होगी, लेकिन उसके पास अन्य कर हैं जो जारी रहेंगे - मुख्य रूप से आयकर, कॉर्पोरेट कर और सीमा शुल्क। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र के जीएसटी राजस्व का लगभग 40% राज्यों के साथ साझा किया जाता है, जिसका अर्थ है कि गिरावट के एक महत्वपूर्ण हिस्से को वास्तव में राज्यों द्वारा वहन किया जाता है। इसका कुल परिणाम राज्यों के स्वयं के करों में अचानक और तेज गिरावट के रूप में सामने आया है, और वह भी बिल्‍कुल उसी समय जब उनके खर्चों में तीव्र वृद्धि हुई थी।

यह ध्‍यान रखा जाना चाहिए कि केंद्र की तुलना में राज्यों को 'बजट की भारी कमी' का सामना करना पड़ता है, जिसका अर्थ यह है कि वे केवल उतना खर्च कर सकते हैं जितना उन्हें करों से मिलता है (खुद के करों के साथ-साथ वित्त आयोग द्वारा अधिदेशित केंद्रीय करों का एक हिस्सा), केंद्र से गैर-सांविधिक हस्तांतरण, और राज्य के उधार के रूप में केंद्र जो अनुमोदन प्रदान करता है। यह निश्चित है कि केंद्र अपनी कर हानि के होते हुए भी, वित्त आयोग के अनुसार, बिना किसी कटौती के अप्रैल 2020 के लिए राज्यों के केंद्रीय करों के हिस्से को जारी करने के बारे में बाध्य हो गया है, लेकिन वह इससे अधिक एक पैसा भी नहीं देगा।

जो कुछ भी पहले से ही राज्य के राजस्व में थोड़ा-बहुत बचा हुआ था, उसे भी रोक लिया गया, जिससे स्थिति और बदतर बन गई। "आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं" की मूल सूची में, दो वस्तुएं थीं जो राज्य कर राजस्व के लिए कुछ सहायता प्रदान करती थीं - शराब और ई-कॉमर्स। लगभग सभी राज्य, जहां निषेध नहीं किया गया है, वे अपने स्वयं के कर राजस्व का 30 से 40 प्रतिशत शराब से एकत्रित करते हैं; और ई-कॉमर्स (विशेष रूप से ई-रिटेलिंग) गैर-अनिवार्य वस्‍तुओं की बिक्री की अनुमति देता है, जिनके लिए जीएसटी चुकनी होती है। 14 अप्रैल को, लॉकडाउन का विस्तार करते हुए, केंद्र सरकार ने बिना कोई उचित कारण बताए, इन पर प्रतिबंध लगा दिया। यह राज्य करों को लगभग 25 से 30 प्रतिशत के बीच और घटा देगा, जो अन्यथा उसे प्राप्‍त होते।

राज्यों का राजकोषीय संकट यहीं खतम नहीं होता। उन्‍हें तीन अन्य प्रहारों का भी सामना करना पड़ा है। सबसे पहले, केंद्र ने चुपचाप 10 मंत्रालयों/विभागों को छोड़कर बाकी सभी पर 5 से 10 प्रतिशत की कटौती की घोषणा की है, जिसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है। कई वर्षों के अनुभव को देखते हुए इसका परिणाम काफी स्पष्ट है - पूरी कटौती केंद्र प्रायोजित योजनाओं (सीएसएस) पर की जाएगी। सीएसएस ऐसी योजनाएं हैं जो राज्यों द्वारा लागू की जाती हैं, लेकिन केंद्र द्वारा वित्तपोषित होती हैं, और यह केंद्र से राज्यों को किए जाने वाले गैर-सांविधिक हस्‍तांतरण का एक बड़ा हिस्सा होती हैं। आमतौर पर, जब भी केंद्र द्वारा खर्च में कोई कटौती की जाती है तो व्यावहारिक रूप से सभी मंत्रालय/विभाग ऐसे बजट शीर्षों को बचाते हैं जो सीधे उनके द्वारा नियंत्रित होते हैं। सीएसएस इस श्रेणी में नहीं आते हैं और व्यावहारिक रूप से सभी लागत-कटौती समायोजन उनमें किए जाते हैं।

दूसरा, विश्व में तेल की कीमतों में भारी कमी ने भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाने के अवसर पैदा किए हैं। पहले कई बार ऐसे राजस्व अवसर केंद्र और राज्यों के बीच साझा किए जाते थे। परंतु इस बार, केंद्र ने राज्यों द्वारा ऐसी संभावना से अवगत होने से पहले ही अपने स्वयं के करों को बढ़ाकर इस पूरे क्षेत्र पर अधिकार जमा लिया है। ऐसी स्थिति में जब परिवहन प्रतिबंधों और परिवहन उद्योग द्वारा गंभीर कठिनाइयों का सामना करने के कारण पेट्रोलियम उत्पादों की मांग में भारी कमी आई है, राज्यों द्वारा अपने स्वयं के करों को बढ़ाने की किसी भी संभावना को प्रभावी ढंग से रोक दिया गया है (हालांकि कुछ छोटे राज्यों ने ऐसा किया है)।

तीसरा, बिजली पैदा करने वाली केंद्रीय कंपनियों ने मांग की है कि राज्य किसी भी बिजली की खरीद के लिए अग्रिम भुगतान करें। इससे राज्यों के सामने अत्‍यधिक दुविधापूर्ण स्थिति उत्‍पन्‍न हो गई है। इस समय नकदी की भारी कमी की स्थिति में, बिजली के लिए अग्रिम भुगतान को करने के लिए उन्हें कहीं और खर्च में कटौती करनी पड़ेगी और शायद उनमें उनके मानव कल्याण के कार्य भी शामिल होंगे। दूसरी ओर, यदि बिजली काट दी जाती है, तो चल रही सभी गतिविधियों और लोगों के रहने की स्थिति पर इसके अनगिनत असर पड़ेंगे। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि यह आपसी समझौता किस प्रकार क्रियान्वित होगा।

इस प्रकार, राज्यों के पास एकमात्र विकल्प यह है कि वे अपने उधार को बढ़ाएं। जहां तक ​​राज्य की उधार सीमा की बात है, केंद्र ने अभी तक वर्ष के लिए किसी भी अतिरिक्त उधार की अनुमति नहीं दी है। राज्यों को स्वीकृत वार्षिक सीमा के भीतर आरंभिक चरण में अपने उधार कार्यक्रम को क्रियान्वित करने की अनुमति दी गई है। वास्तव में, इसका मतलब यह है कि जब तक भविष्य में उधार की सीमा में छूट नहीं दी जाती है तब तक राज्यों को उनके द्वारा किए जा रहे खर्च में बड़े पैमाने पर कटौती करनी होगी।

उनके सामने इस विकट स्थिति को देखते हुए, कई राज्यों ने अतिरिक्त राज्य सरकारी बॉन्ड खरीदे हैं और आशानुरूप इसके लिए एक बडी कीमत का भुगतान किया है। इन अतिरिक्त बॉन्डों पर ब्याज दर पहले की 7.5% से लगभग 1.5 अंक बढ़ गई, जिसका अर्थ है कि इन उधारों पर लगभग 20% की अतिरिक्त भविष्य ब्याज का भुगतान करना होगा। वर्तमान स्थिति के अनुसार, केंद्र अभी भी 7% से कम ब्याज पर उधार ले सकता है और राज्यों को उधार दे सकता है, लेकिन इस बात का कोई संकेत नहीं है कि इस पर विचार किया जा रहा है या नहीं। यह दुखद परिस्थिति आने वाले कुछ समय में भी जारी रह सकती है, और कई राज्यों के पास अपने बजट पर बड़ी स्थायी देनदारियां रह जाएंगी।

यदि यह सब पर्याप्त नहीं था, तो केंद्र ने इस घाव पर और नमक छिड़क दिया। केंद्र द्वारा पीएम-केयर्स फंड की स्थापना की गई है, जो एक अपारदर्शी, विवेकाधीन और स्‍पष्‍ट रूप से गैर-लेखा परीक्षण योग्‍य निधि है, और जिसका उपयोग कॉर्पोरेट्स के सीएसआर (कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्‍व) खर्चों के लिए किया जा सकता है। यह प्रावधान मुख्यमंत्री राहत कोष में नहीं किया गया है जो सभी राज्यों को मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्‍थापित किया गया है। नतीजतन, भले ही कॉर्पोरेट उन राज्यों का सहयोग करना चाहें जहां वे स्थित हैं, केंद्र द्वारा लगाए गए नियम उन्‍हें ऐसा करने से रोक देते हैं।

इस प्रकार, जब परिस्थितियों के बादल छंट जाएंगे तब तक राज्य सरकारों की वित्‍तीय स्थिति अत्‍यंत दयनीय हो जाएगी और उन्हें अपनी दैनिक गतिविधियों को जारी रखने के लिए केंद्र के सामने हाथ फैला कर खड़ा होना पड़ेगा।

लेखक परिचय: डॉ प्रणव सेन इंटरनैशनल ग्रोथ सेंटर (आई.जी.सी.) के कंट्री डाइरेक्टर हैं।

No comments yet
Join the conversation
Captcha Captcha Reload

Comments will be held for moderation. Your contact information will not be made public.

संबंधित विषयवस्तु

समाचार पत्र के लिये पंजीकरण करें