शासन

न्यायपालिका: अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ

  • Blog Post Date 07 फ़रवरी, 2020
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Manaswini Rao

University of California, Berkeley

manaswini.rao@gmail.com

आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 में इस बात को मुख्‍य रूप से दर्शाया गया है कि भारत में ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस (व्यापार करने में आसानी) के लिए सबसे बड़ी बाधा ठेका (अनुबंध) प्रवर्तन और विवाद समाधान है, और यह भी की निचली न्यायपालिकाओं की क्षमता बढ़ाना महत्वपूर्ण है। इस लेख में यह अनुमान लगाया गया है कि अदालत में एक रिक्ति पर एक न्यायाधीश को नियुक्‍त करने से एक साल बाद बैंक ऋण में 0.5% की वृद्धि होती है, जो अदालत के अधिकार क्षेत्र में स्थित फर्मों की ऋण उपलब्धता, उत्पादन और लाभप्रदता को प्रभावित करती है।

 

भारत के माध्‍यमिक विद्यालयों में पढाई जा रही नागरिक शास्त्र की अधिकांश पाठ्य पुस्‍तकों में न्यायपालिका को लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तंभों में से एक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। शासन की दृष्टि से, यह माना जाता है कि न्यायपालिका संविधान में निहित मूल्यों का पालन करते हुए कार्यकारी और विधायी शक्तियों पर नियंत्रक के रूप में काम करना चाहिए। हालाँकि, बाजार और अर्थव्यवस्था के कामकाज में विश्वास की भावना स्थापित करने के माध्‍यम से इसकी भूमिका इस परिभाषा से कहीं अधिक व्‍यापक है। विशेष रूप से, न्यायालय अनुबंधों को लागू करते हैं और वास्तविक अधिकारों को बढ़ावा देते हैं, ताकि कल्याणकारी कार्यों को बेहतर बनाने के लिए संसाधनों को व्यक्तियों और फर्मों में कुशलतापूर्वक आवंटित किया जा सके। तथापि, अनिश्चितताओं और लेन-देन की लागत को कम करने के लिए समय पर प्रवर्तन आवश्यक है, जो दक्षता और इक्विटी दोनों के संबंध में परिणामों को प्रभावित करता है। यदि देशों के अनुसार सह-संबंध को देखा जाए तो प्रति व्यक्ति जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) और मुकदमा चलने की अवधि के बीच एक नकारात्मक संबंध प्रदर्शित होता है (आकृति 1)। क्या इसका अर्थ यह भी है कि धीमी गति से मुकदमा चलना कम वृद्धि का कारण बनता है? मेरे हाल के शोध (राव 2019) में मैंने भारत के जिला अदालतों, स्थानीय बैंक द्वारा ऋण देने के कार्यों, और औपचारिक क्षेत्र की फर्म के परिणामों के बीच के कारण-संबंध का विश्लेषण किया है।

आकृति 1. प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद और मुकदमा अवधि के बीच क्रॉस-कंट्री सह-संबंध

आंकड़ा स्रोत: विश्‍व बैंक के डूइंग बिजनेस (मुकदमा अवधि) और विश्व विकास संकेतक (जीडीपी) से क्रॉस-कंट्री टाइम-सीरीज़ डेटा (2004-2018)

नोट: -0.57 के ऋणात्‍मक ढलान का अर्थ है कि मुकदमा अवधि में 1% की वृद्धि प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद में 0.57% की गिरावट लाता है। 0.25 की मानक त्रुटि का अर्थ है कि ढलान का अनुमान सांख्यिकीय रूप से 0 से भिन्‍न है, अर्थात, यह जुड़ाव सांख्यिकीय रूप से, 95% विश्वास के साथ, महत्वपूर्ण है।

भारत की स्थिति

भारत के जिला अदालतों में मुकदमों का औसत प्रति व्यक्ति बैकलॉग (ढेर) अमेरिका में इसी प्रकार के अदालतों से 10 गुना अधिक है। भारत में संभवत: अधिकांश लोगों के लिए यह अधिक आश्‍चर्य की बात नहीं होगी क्‍योंकि अदालतों में होने वाली देरी और लंबित मामलों की बड़ी संख्‍या को मीडिया द्वारा नियमित रूप से कवरेज दिया जाता है। मैंने जिला अदालतों में न्‍यायाधीशों की रिक्तियों के कारण उत्पन्न हो रहे बैकलॉग की ऊंची संख्या के परिणामस्‍वरूप तीन प्रमुख आर्थिक परिणामों पर पड़ने वाले प्रभाव की जांच की है। सबसे पहले, मैंने बैंक द्वारा ऋण देने के व्यवहार के माध्यम से स्थानीय ऋण बाजारों में ठेका (अनुबंध) लागू किए जाने पर इस बैकलॉग की भूमिका का विश्लेषण किया है। दूसरा, मैंने यह जांच की कि यह औपचारिक क्षेत्र की कंपनियों के लिए ऋण उपलब्धता और उसके बाद उनके उत्पादन और लाभप्रदता को कैसे प्रभावित करता है। तीसरा, मैंने न्यायालयों में अधिक न्यायाधीशों को जोड़कर बैकलॉग को कम करने के परिणामस्‍वरूप लाभ एवं लागत अनुपात का अनुमान लगाया है। परिणाम यह बताते हैं कि एक और न्यायाधीश को जोड़ने से एक जिले में 350,000 ऋणों के आधारभूत स्तर पर बैंक ऋण में 0.5% की वृद्धि होती है। इससे फर्मों को मिलने वाला लाभ 1.6% या यूएस $750 प्रति न्‍यायाधीश बढ़ता है तथा जनता को 8:1 लाभ-दर-लागत अनुपात के अनुसार लाभ की प्राप्ति होती है।

आँकड़े

मैंने 2010 और 2018 के बीच भारत के 195 जिला न्यायालयों में चल रहे 60 लाख अदालती मामलों का एक अनूठा डेटासेट इकट्ठा किया, जिसे औपचारिक क्षेत्र की फर्मों1 से संबंधित पैनल डेटा के साथ मिलाया है। आंकड़ों के विवरण स्‍तर ने मुझे अदालत के कार्यनिष्‍पादन, जिसे मैं निपटान प्रक्रिया कहती हूं, तथा जो न्‍यायिक प्रक्रिया की समयबद्धता को दर्शाती है, को मापने की सुविधा मिलती है। यह संकेतक किसी एक वर्ष में हल किए गए मुकदमों की संख्या और कुल केसलोड का अनुपात है जिसे प्रतिशत के रूप में अभिव्‍यक्‍त किया जाता है। न्‍यायालयों के कार्य निष्‍पादन को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक न्यायाधीश रिक्ति अर्थात न्‍यायालय में न्यायाधीश के रिक्‍त पदों का प्रतिशत है। मेरे प्रतिदर्श में न्यायालयों में न्यायाधीश के औसतन 18 पद हैं, जिनमें से 23% रिक्त हैं।2

फर्मों के बीच मुकदमेबाजी पैटर्न

परीक्षणों से मिलान किए गए फर्मों के आंकड़ों से पता चलता है कि बैंक जिला अदालतों के प्राथमिक उपयोगकर्ता हैं, जहां वे 80% से अधिक मुकदमों में याचिकाकर्ता के रूप में शामिल होते हैं। विशेष रूप से, फर्म प्रतिदर्श में सभी बैंकों के लगभग 50% परीक्षण डेटासेट में मिलान प्राप्‍त होता है। इसके विपरीत, गैर-वित्तीय फर्मों के लिए यह मिलान दर काफी कम (13%) है। बैंकों से जुड़े मुकदमों में निर्णयों के एक यादृच्छिक प्रतिदर्श की जांच करने पर यह संकेत मिलता है कि उनमें से लगभग दो-तिहाई ऋण वसूली से संबंधित हैं। हालांकि एक विशेष मौद्रिक सीमा से अधिक के ऋण-विशिष्ट विवादों पर निर्णय देने के लिए ऋण वसूली अधिकरण जैसे विशेष न्यायाधिकरण हैं, फिर भी जिला सिविल अदालतें अक्सर सामान्य ऋण विवादों के मामलों में अधिनिर्णायक होती हैं। इस तरह के मुकदमेबाजी के सामान्‍य उदाहरणों में व्यक्तियों द्वारा आवास या शिक्षा ऋणों का पुनर्भुगतान और साथ ही फर्मों द्वारा लिए गए छोटे ऋण शामिल हैं। अदालतों में भारी बैकलॉग का अर्थ है कि ये सभी पूंजीगत ऋण अटके हुए हैं जो ऋणदाता बैंक की बढ़ती गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों में जुड़ते जाते हैं।

आकृति 2. फर्मों में मुकदमेबाजी की तीव्रता

नोट: क्षैतिज-अक्ष (वाई-अकसीस) विशिष्‍ट डेटासेट में सेक्टर द्वारा फर्मों का अंश प्रस्तुत करता है जो अदालत के प्रतिदर्श में मुकदमों में लगी हुई हैं। एनबीएफसी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को संदर्भित करता है।

अनुभवजन्य रणनीति

न्यायालय के बैकलॉग, मुकदमा समाधानों और दाखिलों में वार्षिक भिन्‍नताएं संभवतया अनदेखी जिला-विशिष्ट समय-भिन्न विशेषताओं जैसे प्रवास प्रवाह, बदलता जिला नीति परिदृश्‍य, या अपराध के बदलते स्तर जो अदालत के कार्यनिष्‍पादन के साथ-साथ उधार देने तथा फर्म के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं, से जुड़ी होती हैं। इसके अतिरिक्त, विपरीत कारणता भी चिंताजनक हैं, जहां आर्थिक और फर्म-विशिष्ट परिणामों में बढ़ते रुझानों के साथ अदालत का कार्यनिष्‍पादन कम हो सकता है। उदाहरण के लिए, फर्मों में तीव्र बढ़ोतरी वाले स्‍थान, जैसे तेजी से बढ़ते शहरों में, उस स्‍थान से संबंधित जिला न्यायालय में अधिक मुकदमेबाजी का कारण बन सकते हैं और बैकलॉग में जुड़ सकते हैं।

भारत की न्‍यायपालिका की विशेषता है कि न्‍यायालय के कार्यनिष्‍पादन और परिणाम मापदंड के बीच संभावित संसहबंधों को प्रेरित करने वाले अप्रत्‍यक्ष कारकों के लिए एक जिला न्‍यायालय में न्‍यायाधीश की रिक्ति जिम्‍मेदार हैं, मैंने इसी विशेषता को यादृच्छिक भिन्‍नता के रूप में प्रयोग करके इसका लाभ उठाया है। विशेष रूप से, यह भिन्नता न्‍यायाधीय की रोटेशन नीति से उत्पन्न होती है जो समय के साथ मौजूदा रिक्तियों को स्थानांतरित करती है। प्रत्येक राज्य के स्तर पर न्‍यायाधीश के रोटेशन को केंद्रीयकृत रूप से कार्यान्वित किया जाता है जिसके अनुसार पद की संवेदनशीलता के कारण किसी न्‍यायालय में न्‍यायाधीश के कार्यकाल को कम अवधि के रूप में निर्धारित किया जाता है। न्यायाधीशों को कभी भी ऐसे ज़िले नहीं सौंपे जाते जो उनके गृहनगर हों या जहाँ उन्हें किसी तरह का कानूनी अनुभव हो। यह नीति मामूली बदलावों3 के साथ सभी भारतीय राज्यों में एक समान है। चूंकि न्यायाधीश न्यायालयों के कामकाज के केंद्र में होते हैं, अत: न्यायाधीश की रिक्ति में किसी भी वृद्धि या कमी का न्‍यायालय के कार्यनिष्‍पादन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

मेरा अनुमान है कि इस कारण-संबंध के दो चरण4 हैं। पहले चरण में न्यायाधीश रिक्ति और न्‍यायालय के कार्यनिष्‍पादन के बीच के संबंधों की जांच की जाती है। दूसरे चरण में न्यायाधीश रिक्ति द्वारा यथा पूर्वानुमानित न्‍यायालय कार्यनिष्‍पादन एवं परिणाम मापदंड के बीच कारण-संबंध का अनुमान लगाया जाता है। पहले चरण का संबंध मजबूत है जो यह दर्शाता है कि न्यायाधीश के कार्यग्रहण में एक प्रतिशत बिंदु की वृद्धि (100-न्यायाधीश रिक्ति) समग्र निपटान दर में 1% की वृद्धि करती है।

आकृति 3. न्‍यायालय के कार्यनिष्‍पादन और न्यायाधीश द्वारा कार्यग्रहण के बीच का संबंध

नोट: ऊर्ध्वाधर-अक्ष (एक्स-अकसीस) और क्षैतिज-अक्ष (वाई-अकसीस) क्रमशः न्‍यायाधीश कार्यग्रहण की निम्‍न दर (100-न्‍यायाधीश रिक्ति) और निपटान दर का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए, ये 0 के आसपास केंद्रित हैं, जो उनके संबंधित माध्यिका या औसत मूल्यों को प्रदर्शित करता है।

ऋण देने के व्‍यवहार पर प्रभाव

बैंकों पर मुकदमेबाजी प्रक्रिया के माध्यम से अदालतों का सीधा प्रभाव पड़ता है। चूंकि बैंक न्यायालयों के गहन उपयोगकर्ता हैं, अत: उच्चतर न्यायालय के कार्यनिष्‍पादन से ऋण अनुबंध समय पर प्रवर्तित होने चाहिए और फिर इसे ऋण व्यवहार को प्रभावित करना चाहिए। इस परिकल्पना के अनुरूप, भारतीय रिज़र्व बैंक (RI) द्वारा जिला-स्तरीय क्रेडिट सारांश डेटा का उपयोग करते हुए, मैंने पाया कि निपटान दर में 1% की वृद्धि से ऋण की कुल संख्या में एक वर्ष बाद 0.11% की वृद्धि होती है या किसी न्‍यायालय में रिक्ति के साथ एक और न्यायाधीश को जोड़ देने पर ऋण में 0.5% की वृद्धि होती है। बैंकों में प्रति जिला औसतन 350,000 ऋण खाते हैं अत: इसे देखते हुए यह एक बड़ी बात है।

बैंक के प्रकार के अनुसार एक परीक्षण से पता चलता है कि यह वृद्धि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए और भी बड़ी है, जो देश के सभी बैंकों के लगभग 80% का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसके अलावा, मुझे लगता है कि विनिर्माण और उपभोग की ओर ऋण में महत्वपूर्ण वृद्धि देखी जाती है, जो यह दर्शाती है कि न्‍यायालयों की भूमिका ऋण बाजारों के कामकाज में महत्वपूर्ण हैं, जो अर्थव्यवस्था में उत्पादन और उपभोग को प्रभावित करता है।

आकृति 4अ. बैंक द्वारा ऋण देने पर न्‍यायालय निपटान दर में वृद्धि का प्रभाव 

 

आकृति 4ब. बैंकों से कंपनियों की उधारी पर न्‍यायालय निपटान दर में वृद्धि का प्रभाव

 

नोट: रेखा आकृति, न्‍यायालय निपटान दर और परिणाम मापदंडों के बीच के कारण संबंध का प्रतिनिधित्व दर्शाते हैं। 4अ किसी एक जिले में सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों में ऋण खातों की संख्या के संदर्भ में इस संबंध को दर्शाता है। 4ब बैंकों से फर्मों की ऋण राशि के संबंध को दिखाता है। 4ब में ऊर्ध्वाधर-अक्ष समय तत्‍व को दर्शाता है। यह दिखाया गया है कि किसी दिए गए वर्ष (टी) में न्‍यायालय निपटान दर में सुधार दो वर्ष (टी+2) बाद ऋण लेने की सीमा को प्रभावित करता है। सभी परिणाम मापदंडों को इस प्रकार रूपांतरित किया गया है कि अनुमानों की व्‍याख्‍या प्रतिशत परिवर्तन के संदर्भ में की जा सकती है। अनुमान के आस-पास की त्रुटि पट्टियाँ 95% विश्वास अंतराल को प्रदर्शित करतीं हैं: अर्थात, इस बात की 95% संभावना है कि अनुमान इस सीमा के भीतर निहित है।

फर्म उत्पादन पर प्रभाव

अगला, मैंने अपने प्रतिदर्श न्यायालयों के क्षेत्राधिकार के अंदर पंजीकृत कार्यालय वाली सभी फर्मों पर पड़ने वाले प्रभावों की जांच की। फर्मों के संबंध में, मैं बैंकों से लंबी अवधि के उधार (ऋण लेने से एक वर्ष के बाद चुकाना प्रारंभ) में वृद्धि देखती हूं (आकृति 4ब)। सभी फर्मों में बैंकों से उधार लेने से औसतन वृद्धि होती है, और विशेष रूप से उन कंपनियों के बीच जिनकी पूर्वानुमानित परिसंपत्तियां माध्यिका आकार से कम होती हैं। दूसरी ओर, माध्यिका से अधिक पूर्वानुमानित परिसंपत्तियों वाली फर्मों के बीच बैंक उधार में कोई बदलाव नहीं आता है। बेहतर ऋण उपलब्धता के परिणामस्वरूप, फर्म उत्पादन में सुधार होता है। मैंने पाया कि निपटान दर में 1% की वृद्धि दो वर्ष बाद औसतन, मजदूरी व्यय को 0.2% तक, बिक्री राजस्व को 0.11% तक और लाभ को 0.26% तक बढ़ा देती है। नीचे प्रस्तुत आकृति 5, निपटान दर में वृद्धि से दो वर्ष पहले और दो वर्ष बाद के इस संबंध की व्‍याख्‍या करता है।

आकृति 5. वेतन बिल, बिक्री राजस्व और फर्मों के मुनाफे पर अदालत की निपटान दर में वृद्धि का प्रभाव

नोट: ऊर्ध्वाधर-अक्ष समय तत्‍व को दर्शाता है। इससे पता चलता है कि किसी वर्ष (टी) में अदालत की निपटान दर में सुधार एक-दो साल बाद परिणामों को प्रभावित करता है। सभी परिणाम उपायों को इस प्रकार परिवर्तित किया गया है ताकि अनुमानों की व्‍याख्‍या प्रतिशत परिवर्तनों के संदर्भ में की जा सके। अनुमानों के आसपास की त्रुटि पट्टियाँ 95% विश्वास अंतराल का प्रतिनिधित्व करती हैं, अर्थात्, इस बात की 95% संभावना है कि यह अनुमान इस सीमा के भीतर है।

नीति प्रभाव

एक जिला न्‍यायालय में रिक्ति पर एक और न्यायाधीश की नियुक्ति से निपटान दर 6% तक बढ़ जाती है। यह, प्रति फर्म रु.53,000 के लाभ के रूप में परिवर्तित हो जाता है, जो रुपये 33 लाख के माध्यिका लाभ की आधाररेखा पर 1.6% से अधिक की वृद्धि के रूप में है। प्रति जिले औपचारिक क्षेत्र की लगभग 800 फर्मों और बुनियादी विनिर्माण एवं सेवाओं पर मूल्‍य संवर्धित कर की 18% दर के साथ, राज्य संभावित रूप से प्रत्‍येक जिले से अल्‍पावधि कर के रूप में लगभग रु.76 लाख कमा सकता है। दूसरी ओर, एक जिला न्यायाधीश का औसत वार्षिक वेतन रु.10 लाख से कम होता है। इस प्रकार, न्यायाधीश रिक्ति को कम करने से कर राजस्व के संबंध में लगभग 8:1 का निहित लाभ-लागत अनुपात होता है। यह देखते हुए कि कानून और न्याय क्षेत्र के लिए वार्षिक बजटीय परिव्यय 2019 के व्यय के दस प्रतिशत से भी कम है, अत: जिला न्यायपालिका में रिक्तियों की समस्या को दूर करने के लिए सार्वजनिक व्यय में वृद्धि के लिए एक उचित कारण है।

नोट्स:

  1. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकॉनॉमी (सीएमआईई) द्वारा संकलित विशिष्‍ट डेटासेट।
  2. 12% के मानक विचलन के साथ औसत निपटान दर 14% है। निपटान के समय एक मामले की औसत परीक्षण अवधि लगभग 500 दिनों के मानक विचलन के साथ 617 दिन है। मानक विचलन एक ऐसा मापदंड है जिसका उपयोग किसी सेट के माध्‍य मान (औसत) से उस सेट के मानों के विचलन या फैलाव की मात्रा का परिमाण बताने के लिए किया जाता है।
  3. मैंने राज्‍य-वर्ष नियत प्रभावों को शामिल करते हुए किसी भी राज्य-विशिष्ट समय-भिन्न अंतरों के लिए गणना की है। इसके साथ मैंने जिला-नियत प्रभावों को शामिल करके किसी भी समय-अपरिवर्तनीय जिला-विशिष्ट अनदेखी विशेषताओं के लिए भी गणना की है। इसका अर्थ यह है कि मेरे सांख्यिकीय मॉडल में न्‍यायालय के चर और परिणाम उपायों में केवल जिले के अंदर भिन्‍नता का उपयोग किया गया है।
  4. सांख्यिकीय मॉडल को द्विचरणीय लघुत्‍तम वर्ग आकलन के रूप में जाना जाता है जो साधनभूत चर (इन्स्तृमेंटल वेरियबल - आईवी) डिजाइन को संचालित करता है। आईवी डिजाइन कारण अनुमान के लिए एक ऐसी तकनीक है जो व्याख्यात्मक चर में यादृच्छिक भिन्नता के रूप में प्रयोग करने पर आधारित है ताकि परिणाम/निर्भर चर के साथ परिणामी सह-संबंध को कारण के रूप में माना जा सके। 

लेखक परिचय: मनस्विनी राव अम्रीका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (बर्कले) में स्थित कृषि और संसाधन अर्थशास्त्र विभाग (ऐग्रीकल्चरल अँड रेसोर्स इक्नोमिक्स डिपार्टमेंट) में एक पीएचडी विद्वान हैं।

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