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कृषि श्रमिकों का निकास और पराली का जलना

  • Blog Post Date 03 फ़रवरी, 2021
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द्यपि श्रमिकों का कम उत्‍पादकता वाले क्षेत्रों से उच्च उत्पादकता वाले क्षेत्रों की ओर स्‍थानांतरित होने की प्रक्रिया को आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन इसके पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव अभी भी काफी हद तक अज्ञात हैं। यह लेख बताता है कि ग्रामीण सड़कों तक पहुंच द्वारा और आसान हो गई कृषि से श्रमिकों की निकासी किसानों को पराली साफ करने के लिए आग का उपयोग करने के लिए प्रेरित करती है जिसमें हालांकि श्रम की बचत तो होती है लेकिन यह विधि प्रदूषणकारी भी है।

 

संरचनात्मक परिवर्तन अर्थात श्रमिकों का कृषि जैसे कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों से विनिर्माण और सेवाओं जैसे उच्च उत्पादकता वाले क्षेत्रों की ओर स्‍थानांतरित होने की प्रक्रिया को आर्थिक विकास के लिए एक महत्वपूर्ण प्रेरक तत्‍व के रूप में देखा जाता है (लूइस 1954)। हालांकि क्या श्रमिकों के ऐसे अंतःक्षेत्रीय स्‍थानांतरण को आसान करने वाली नीतियां पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव डालती हैं, यह एक अनुत्‍तरित प्रश्न है। विशेष रूप से कृषि से बाहर श्रमिकों का स्‍थानांतरण किसानों को श्रम की बचत करने वाली ऐसी तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित कर सकता है जिनसे अधिक कार्बन उत्‍सर्जन होता है। हम भारत में कृषि श्रमिकों द्वारा कृषि कार्यों को छोडने और पराली जलाने के संदर्भ में इस प्रश्न की जांच करते हैं (गर्ग एवं अन्‍य 2020)।

हमारा विश्लेषण भारत के प्रमुख ग्रामीण सड़क निर्माण कार्यक्रम - प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) पर केंद्रित है - जिसने श्रमिकों को कृषि से निकलने की प्रक्रिया को सुविधाजनक बना दिया है। ग्रामीण सड़कों के प्रभाव का अनुमान लगाने के लिए हम पीएमजीएसवाई में पात्रता नियमों का उपयोग करते हैं जो जनसंख्या की देहली सीमाओं (ऐशर एवं नोवोसाड 2020) पर आधारित हैं - इस कार्यक्रम के तहत, ऐसे गांव जिनकी आधार-रेखा जनसंख्‍या (2001 की जनगणना के अनुसार) देहली सीमा से ठीक ऊपर है वहां देहली सीमा के ठीक नीचे की जनसंख्‍या वाले गांवों की तुलना में नई सड़क बनने की संभावना अधिक थी। यह तथ्य कि औसतन अन्य विशेषताओं के समान होने पर देहली सीमा के दोनों ओर के गाँव हमें एक प्रतिगमन विरूपता डिजाइन (रिग्रेशन डिस्कंतटिन्यूइटी डिज़ाइन - आरडीडी)1 का उपयोग करके सड़कों के कारण-प्रभाव को अलग करने के लिए सक्षम बनाते हैं।

हम पीएमजीएसवाई के तहत सड़क निर्माण पर प्रशासनिक जानकारी और पराली जलाने एवं वायु प्रदूषण के उपग्रह आधारित अनुमानों को समेकित करते हैं। 2000 के दशक की शुरुआत से पीएमजीएसवाई का लक्ष्य ऐसे गांवों को सड़क संपर्क प्रदान करना था जो पहले जुड़े हुए नहीं थे ताकि वे गांव सभी मौसमों में सड़कों के माध्‍यम से जुड़े रह सकें। इस कार्यक्रम में 1,000 से ऊपर की जनसंख्‍या वाले गाँवों को प्राथमिकता दी गई थी, उसके बाद 500 से अधिक जनसंख्‍या वाले गाँवों को, और फिर 500 से कम जनसंख्‍या वाले गाँवों को। हमारा नमूना उन राज्यों तक और उस अवधि (2008-2013) तक ही सीमित है जहां इस दौरान जनसंख्या संबंधी इन देहली सीमा नियमों का पालन किया गया था।2 प्रत्येक राज्य के भीतर हम उन सभी योग्य गांवों की पहचान करते हैं जिनकी आधार-रेखा (2001 की जनगणना) पर कोई सड़क संपर्क नहीं था। परिणामस्वरूप हमने लगभग 11,000 गाँवों का एक नमूना बनाया। आकृति 1 में पहले हम दिखाते हैं कि इस नमूने में पीएमजीएसवाई नियमों का पालन किया गया था – देहली सीमा से ऊपर की जनसंख्‍या वाले गांवों में इसके ठीक नीचे के गांवों की तुलना में सड़क प्राप्त करने की संभावना में 23 प्रतिशत की वृद्धि देखी जाती है।

आकृति 1. पीएमजीएसवाई (2008-2013) के तहत सड़क प्राप्त करने वाले गांवों की संभावना

आकृति में आए अंग्रेजी वाक्‍यांशों का हिंदी अर्थ

Population minus threshold – देहली सीमा में से जनसंख्‍या का घटाव

Received Road – प्राप्‍त सड़क

RD Plot (Likelihood of receiving roads) – आरडी अंकन (सड़क प्राप्‍त करने की संभावना)

ग्रामीण सड़कों का आग और वायु प्रदूषण पर प्रभाव

आग संबंधी गतिविधि पर सड़कों के प्रभाव को मापने के लिए हम नासा के एमओडीआईएस (मॉडरेट रेज़ोल्यूशन इमेजिंग स्पेक्ट्रोरेडियोमीटर) - एक्‍वा और टेरा उपग्रह प्रणालियों के आंकड़ों का उपयोग करते हैं। ये उपग्रह प्रतिदिन 1 किलोमीटर स्थानिक विभेदन (रिज़ॉल्यूशन) पर बायोमास की आग से जुड़े अवरक्त विकिरण का पता लगाते हैं (सिज़ार एवं अन्‍य 2006)। हम अपने मुख्‍य परिणाम चर के रूप में उपयोग करने के लिए नमूना गांवों के आसपास 10 किलोमीटर के दायरे में प्रतिदिन देखे गए अग्नि-पिक्सेल आंकड़ों को वार्षिक स्‍तर पर जोड़ते हैं। हालांकि, मीडिया और नीति का ज्यादातर ध्यान दिल्ली के आसपास के इलाकों में पंजाब और हरियाणा में पराली जलने पर केंद्रित है, परंतु उपग्रह के आंकड़े बताते हैं कि हमारे अध्ययन के नमूने में शामिल राज्‍यों सहित देश के कई अन्य हिस्सों में पराली जलाना सामान्य है (आकृति 2)।

आकृति 2. नमूना गांवों में औसत वार्षिक अग्नि गतिविधि

आकृति 3ए जनसंख्या की देहली सीमा पर वार्षिक अग्नि गतिविधि प्रस्तुत करता है। हम देखते हैं कि कार्यक्रम की देहली सीमा से ऊपर के गाँवों में सड़क कार्यों हेतु देहली सीमा से कम जनसंख्‍या वाले गाँवों की तुलना में आग की संख्या में तेजी से उछाल आता है। हमारे अनुभवजन्य अनुमान बताते हैं कि यह वृद्धि प्रति वर्ष लगभग 2.6 अतिरिक्त आग की घटनाओं तक है (नियंत्रण समूह अर्थात वह समूह जिसे सड़क प्राप्त नहीं हुईं थीं के औसत के सापेक्ष 70% वृद्धि)।

आकृति 3ए. जनसंख्‍या की देहली सीमा के आसपास वार्षिक पराली जलाना, 2008-2013

आकृति में आए अंग्रेजी वाक्‍यांशों का हिंदी अर्थ

Population minus threshold – देहली सीमा में से जनसंख्‍या का घटाव

Annual fire count – वार्षिक आग की संख्या

RD Plot (Annual fires) – आरडी अंकन (वार्षिक आग)

पराली जलाने की घटनाएं बढ़ने से वायु की गुणवत्ता में भी गिरावट आती है। हम वार्षिक औसत पीएम2.5 (डोनकेलेर एवं अन्‍य 2016) के उपग्रह और वायुमंडलीय मॉडल-आधारित अनुमानों का उपयोग करके प्रदूषण को मापते हैं। सुदूर संवेदन आंकड़ों का उपयोग हमें ग्रामीण भारत में जमीनी स्तर के वायु प्रदूषण पर नज़र रखने की कमी से उत्पन्न चुनौतियों को दूर करने में समर्थ बनाता है। आग की घटनाओं पर सड़कों के प्रभाव के अनुरूप हम जनसंख्या उपचार सीमा (आकृति 3बी) के ठीक ऊपर के गांवों के लिए पीएम2.5 में एक बड़ी और सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण वृद्धि देखते हैं। संगत अनुमान पीएम2.5 में 1.3% (0.5 ग्राम/मी3) की वृद्धि दिखाते हैं। प्रदूषण पर यह प्रभाव काफी बड़ा है: साहित्य में मौजूदा 'डोज-प्रतिक्रिया' के अनुमानों (लियू एवं अन्‍य 2019) के आधार पर पीएम2.5 में 0.5 ग्राम/मी3 की वृद्धि का अर्थ यह है कि दैनिक सर्व-कारण मृत्यु दर में 0.03% की वृद्धि होती है।

आकृति 3बी. जनसंख्या की देहली सीमा के आसपास वार्षिक औसत पीएम2.5 (2008-2013)

आकृति में आए अंग्रेजी वाक्‍यांशों का हिंदी अर्थ

Population minus threshold – देहली सीमा में से जनसंख्‍या का घटाव

Annual PM2.5 – वार्षिक पीएम2.5

RD Plot (Annual average PM2.5) – आरडी अंकन (वार्षिक औसतन पीएम2.5)

क्या पीएम2.5 में वृद्धि पराली जलाने के अलावा अन्य तंत्रों द्वारा संचालित है?

वायु प्रदूषण में केवल पराली जलाना ही एकमात्र कारक नहीं है बल्कि ग्रामीण सड़कें भी इसमें योगदान दे सकती हैं। उदाहरण के लिए - नई सड़कें परिवहन को बढ़ाती हैं, और परिणामस्वरूप वे वाहनों से होने वाला उत्सर्जन वायु गुणवत्ता को खराब कर सकती हैं। इनके कारण अन्य प्रदूषण पैदा करने वाली गतिविधियाँ भी हो सकती हैं जैसे कि नई फर्मों का निर्माण या उनकी स्थापना किया जाना। हम आग और प्रदूषण उत्सर्जन के स्रोतों पर सड़कों के मौसमी प्रभाव की जांच करके इस संभावना के लिए परीक्षण करते हैं। हम अपनी नमूना अवधि को कवर करते हुए अनुसंधान और अनुप्रयोग, संस्करण 2 (एमईआरआरए-2) के लिए आधुनिक-युग पूर्वव्यापी विश्लेषण से जलवायु-मॉडल आंकड़ों पर पुन: भरोसा करते हैं। एमईआरआरए-2 उत्सर्जन पर मासिक आंकड़े प्रदान करता है और इन उत्‍सर्जनों को केवल बायोमास जलने से उत्पन्न होने वाले (पराली जलाने से प्रेरित) और अन्य सभी मानवजनित कारकों जैसे कि परिवहन, औद्योगिक उत्सर्जन, या अन्य दहन स्रोतों से उत्पन्न उत्‍सर्जनों में बांटते हैं। यदि पराली जलाना वह प्राथमिक तंत्र है जिसके माध्यम से सड़कों पर प्रदूषण बढ़ता है, तो हम उन महीनों के दौरान उत्सर्जन पर बड़े प्रभाव की उम्मीद करेंगे जब अन्य महीनों की तुलना में सड़कें आग का सामना करती हैं। दूसरा, हमें अन्य स्रोतों की तुलना में बायोमास उत्सर्जन पर अधिक प्रभाव देखना चाहिए।

हमें जो परिणाम मिलते हैं वे इन परिकल्पनाओं के अनुरूप हैं। हम दिखाते हैं कि आग और उत्सर्जन में वृद्धि सर्दियों की फसल और कटाई के बाद के महीनों (अक्टूबर - मार्च) में केंद्रित है, और साल के बाकी समय के दौरान यह वृद्धि नहीं होती है। सर्दियों के महीने उस अवधि के संगत होते हैं जब कृषि श्रमिकों के चले जाने पर किसान अगले मौसम में फसल रोपण से पहले की छोटी सी समयावधि के दौरान खेतों से कटाई (चावल) अवशेषों को साफ करने या कटाई (गन्‍ना) को कम श्रम पूर्ण बनाने के लिए आग का सहारा लेते हैं। हम यह भी देखते हैं कि पीएम2.5 में वृद्धि बायोमास जलने से उत्सर्जन द्वारा संचालित है, अन्य सभी मानव-जनित स्रोतों से उत्सर्जन पर शून्य प्रभाव पड़ता है। साथ ही, ये परिणाम निश्चित रूप से यह दर्शाते हैं कि प्रदूषण पर समग्र प्रभाव अन्य चैनलों जैसे कि वाहनों के उत्सर्जन, औद्योगिक गतिविधि, या अन्य ऐसे कारकों के बजाय पराली जलाने से संचालित होने की संभावना है।

हमें कैसे पता चलता है कि कृषि श्रमिकों का चला जाना पराली जलाने की घटनाओं में वृद्धि को प्रेरित करता है?

पीएमजीएसवाई (जिसे हम अपने अध्ययन में प्रतिबिंबित करते हैं) के प्रभाव पर पिछले शोध के परिणाम बताते हैं कि ग्रामीण सड़कें कृषि (अशर और नोवोसाड 2020) से श्रमिकों के निकलने को प्रभावित करती हैं। लेकिन मशीनीकरण, पैदावार, संपत्ति, उपभोग या अन्य आर्थिक परिणामों, जो किसानों को पराली जलाने में को प्रेरित कर सकते थे, पर इनका अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ा। हम आधार-रेखा श्रमिक मजदूरी दरों और फसल पैटर्न में उप-नमूना विश्लेषण द्वारा अपने इस मूल दावे को आगे बढ़ाते हैं कि श्रमिकों का निकास पराली जलाने की घटनाओं को बढ़ाता है। यदि कृषि श्रमिकों का बाहर निकलना पराली जलने की घटनाओं में वृद्धि के लिए प्राथमिक चालक होता तो प्रभावों को उन्‍हीं क्षेत्रों में केंद्रित होने की उम्मीद की जानी चाहिए जहां कृषि से श्रमिक बड़ी संख्‍या में बाहर निकलते हैं और जहां चावल या गन्ने की फसलों की अधिक व्यापकता है जोकि ऐसी फसलें हैं जिनमें कृषि मजदूरों के निकल जाने पर आग का उपयोग किया जाना सर्वाधिक लाभप्रद होता है।

हम पाते हैं कि कृषि में श्रमिकों की हिस्सेदारी में गिरावट पर ग्रामीण सड़कों का प्रभाव उन जिलों में सबसे अधिक स्पष्ट है जहां आधार-रेखा स्तर पर सापेक्ष कृषि मजदूरी कम (औसत से नीचे) है। उन जिलों के गांवों में जहां सापेक्ष कृषि मजदूरी अधिक है (औसत से ऊपर), इसका कोई प्रभाव नहीं दिखता है। इन परिणामों से पता चलता है कि सड़कें केवल उन्‍हीं सेक्टरों में श्रमिकों को जाने की सुविधा प्रदान करती हैं जहां श्रमिकों के पुन: आबंटन का रिटर्न सबसे ज्‍यादा होता है। इसके संगत हम पाते हैं कि पराली जलाने की घटनाओं में वृद्धि उन जिलों में केंद्रित है जहां कृषि मजदूरी दर सापेक्षत: कम है। दूसरा, जैसा कि उम्मीद किया जाता है, चावल या गन्ने के अधिक प्रचलन वाले जिलों में ग्रामीण सड़कों का पराली जलाने पर काफी बड़ा प्रभाव दिखता है। अंत में, हम सापेक्ष कृषि मजदूरी दरों और चावल या गन्ना उत्पादन में भिन्नता को जोड़ते हैं। पराली जलाने की घटनाओं में वृद्धि और कण उत्सर्जन अधिक चावल या गन्ने के उत्पादन वाले जिलों में तथा जहां कृषि मजदूरी दरें आधाररेखा पर कम हैं वहां केंद्रित है, जबकि अन्‍य जिलों में यह प्रभाव तुलनात्‍मक रूप से कम प्रदर्शित होता है।

नीति के लिए निहितार्थ

अध्ययन के परिणामों से पता चलता है कि श्रमिकों का कृषि से बाहर निकलना किसानों को आग का उपयोग करने के लिए मजबूर करता है जिसमें हालांकि श्रम की बचत तो होती है लेकिन यह प्रदूषणकारी भी है और इसके परिणामस्वरूप वायु गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। हमारा शोध आर्थिक विकास और पर्यावरण की गुणवत्ता के बीच समझौताकारी समन्‍वय और तालमेल की जांच करने वाले हालिया साहित्य पर आधारित है। कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों में श्रमिक उत्पादकता अंतर की मजबूती ने सरकारों और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों को ऐसी नीतियां विकसित करने के लिए काफी रुचि पैदा की है जो कि सेक्‍टरों में श्रमिकों के पुन: आबंटन में टकराव को कम कर सकें। हमारा शोध इन नीतियों के संभावित प्रतिकूल पर्यावरण संबंधी बाह्य प्रभावों को कम करने हेतु उन्‍हें रणनीति के साथ पूरक करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इस संदर्भ में, भविष्य के शोध किसानों की बढ़ती लागतों की वजह से उन्‍हें कृषि में पराली जलाने का उपयोग करने से संबंधित उनके फैसलों को बदलने हेतु मौद्रिक और गैर-मौद्रिक प्रोत्साहन के डिजाइन और कार्यान्वयन की जांच कर सकते हैं (जैक और जयचंद्रन 2019)।

इस लेख का एक पिछला संस्करण मूल रूप से विश्व बैंक विकास प्रभाव ब्लॉग पर अंग्रेज़ी प्रकाशित हुआ था।

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टिप्पणियाँ:

  1. प्रतिगमन विरूपता डिजाइन एक अर्थमितीय तकनीक है जिसका उपयोग हस्तक्षेप के प्रभाव का अनुमान लगाने के लिए तब किया जाता है जब संभावित लाभार्थियों को कट-ऑफ बिंदु के साथ क्रमबद्ध किया जा सकता है। कट-ऑफ बिंदु के ठीक ऊपर के लाभार्थी कट-ऑफ बिंदु के ठीक नीचे के लाभार्थियों के लगभग समान होते हैं। फिर हस्तक्षेप के कारण-प्रभाव का अनुमान लगाने के लिए कट-ऑफ बिंदु के ऊपर और नीचे की इकाइयों हेतु परिणामों की तुलना की जाती है। पराली जलाने और पीएम2.5(कण पदार्थ) पर ग्रामीण सड़कों के प्रभाव का अनुमान लगाने के लिए, हम एक 'अस्‍पष्‍ट आरडीडी' का उपयोग करते हैं क्‍योंकि पीएमजीएसवाई देहली जनसंख्या नियमों का अधूरे ढ़ंग से अनुपालन करती है।
  2. हमारा नमूना आशेर और नोवोसैड (2020) पर आधारित है जिन्होंने जनसंख्या कीदेहली सीमा हेतु पीएमजीएसवाई नियमों का पालन करने वाले राज्यों की पहचान करने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण सड़क विकास एजेंसी के साथ मिलकर काम किया। हमारे नमूने में छत्तीसगढ़, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा राज्य हैं।

लेखक परिचय: हेमंत कुमार पुल्‍लाभोटला स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर फूड सेक्यूरिटी एंड दी एनवायरनमेंट (एफ़एसई) में एक पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो हैं।

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