समष्टि अर्थशास्त्र

कोविड-19 झटका: अतीत के सीख से वर्तमान का सामना करना – तीसरा भाग

  • Blog Post Date 18 जून, 2020
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श्रृंखला के पिछले भाग में, डॉ. प्रणव सेन ने वर्तमान में जारी संकट के कारण हुई आर्थिक क्षति, और अगले तीन वर्षों में अर्थव्यवस्था के अपेक्षित प्रक्षेपवक्र के अनुमान प्रदान किए थे। इस भाग में, उन्‍होंने उत्‍तरजीविता के चरण पर ध्यान केंद्रित करते हुए सुधार का मार्ग प्रस्तुत किया है। तात्कालिक संदर्भ में जब लॉकडाउन लागू है, दो प्रमुख अनिवार्यताएं होनी चाहिएपहली, अपनी आजीविका खो चुके लोगों की उत्‍तरजीविता, और दूसरी, गैर-अनिवार्य क्षेत्रों में उत्पादन क्षमता। इस तीन महीने की अवधि के दौरान आवश्यक अतिरिक्त राजकोषीय समर्थन का अनुमानित आकलन रु.2,00,000 करोड़ है।

 

सुधार का रास्ता

इसमें शामिल परिमाणों को देखते हुए, केंद्र सरकार के पास वास्तव में व्‍यापक रूप से, तेजी से और निरंतर आधार पर हस्तक्षेप करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। हालाँकि, राजकोषीय हस्तक्षेपों की मात्रा और समय-निर्धारण, दोनों पर सावधानीपूर्वक विचार किया जाना चाहिए क्योंकि दोनों में से किसी एक में भी त्रुटि होने पर अत्‍यंत अप्रत्याशित परिणाम हो सकते हैं। सुधार प्रक्रिया के बारे में तीन अलग-अलग चरणों में सोचना उपयोगी है - उत्तरजीविता, पुनर्निर्माण और सुधार।

उत्तरजीविता चरण

तात्कालिक संदर्भ में जब लॉकडाउन लागू है, दो प्रमुख चिंताएं होनी चाहिए - पहली अनिवार्यता उन लोगों की उत्‍तरजीविता की है जिनकी आय या तो समाप्‍त हो गई है या उसमें भारी कमी आ गई है, और जिसके कारण उन्‍हें अनिवार्य वस्‍तुओं को पर्याप्‍त मात्रा में उपयोग करने की क्षमता से भी समझौता करना पड़ रहा है। इससे न केवल ऐसे लोगों की उत्‍तरजीविता सुनिश्चित होती है, बल्कि यह भी सुनिश्चित होता है कि आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तेजी से कमी न हो जाए, जिससे इस तरह के वस्तु एवं सेवाओं का उत्पादन करने वाले क्षेत्रों के आर्थिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर रूप से समझौता करना पड़ेगा। यह कृषि के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो पिछले छह वर्षों से गंभीर संकट में है। ऐसी आशंकाएँ हैं कि उच्‍च स्‍तरीय आय समर्थन के कारण खाद्य मुद्रास्फीति तेजी से बढ़ सकती है जैसा कि 2009-10 में हुआ था। यह पूरी तरह से गलत भय है क्योंकि 2009-10 में 35 वर्षों में सबसे खराब सूखा पड़ा था, जबकि इस साल बहुत अच्छी फसल हुई है। कहीं अधिक संभावना इस बात की है कि पर्याप्त आय समर्थन के बिना, खेत की कीमतों में गिरावट आ जाएगी1

इस मुद्दे को हल करने के लिए राज्य सरकारों द्वारा उठाए जा रहे उपायों के साथ-साथ पीएम गरीब कल्याण योजना (पीएम-जीकेवाई) बनाई गई है, जिसकी घोषणा 25 मार्च 2020 को की गई थी। अब तक की शामिल राशियां बहुत कम और बड़े पैमाने पर दिशाहीन हैं2 तो प्रश्न उठता है कि - यह पैकेज कितना बड़ा होना चाहिए और इसे किसके लिए निर्देशित किया जाना चाहिए?

आरंभ में, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में कृषि सबसे कम प्रभावित होती है और किसानों की उत्‍तरजीविता के लिए वास्तव में समर्थन की आवश्यकता नहीं होती है। यहां महत्वपूर्ण रूप से यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि खेत की कीमतों में तेजी से गिरावट ना आए और यह बहुत अच्छी फसल से प्राप्‍त होने वाले लाभ को खतम न दे। यह मुख्य रूप से दो चीजों पर निर्भर करेगा - (क) आपूर्ति श्रृंखला संबंधी अव्‍यवस्‍थाएं तुरंत दूर हों, जो एक प्रशासनिक मुद्दा है और इसके लिए वित्तीय सहायता की बहुत अधिक आवश्यकता नहीं होती है; और (ख) खपत वर्ग, विशेष रूप से गरीब जो मुख्य उपभोक्ता हैं, के बीच आय की कमी के कारण कृषि उत्पादों की मांग कम न हो जाए। यह पुन: उन लोगों के लिए आय समर्थन पर वापस ध्‍यान दिये जाने की आवश्‍यकता से संबंधित है जिन्होंने नौकरी खो दी है।

हालांकि, कृषि का एक घटक ऐसा है जिसे तत्काल समर्थन की आवश्यकता हो सकती है, वह है गैर-खाद्य (नकदी) फसल जैसे कपास, जूट, तंबाकू, आदि के उत्पादक। चूंकि इनके उपयोगकर्ता उद्योग बंद हैं, इसलिए इन उत्पादों को तुरंत बेचा नहीं जा सकता है और इनके मूल्य में गिरावट देखी जा सकती है। ऐसे किसानों के लिए कुछ आय समर्थन समझ में आता है। अगर कृषि क्षेत्र को बचाए रखा जाता है, तो बाकी ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी जीवित रहेगी, और उसमें वृद्धि भी होगी3। अवशिष्ट क्षति निश्चित रूप से होगी, लेकिन इसमें से अधिकांश को मनरेगा में बढ़ोतरी के माध्यम से सीमित किया जा सकता है; हालांकि यह बाद के चरण में आएगा4

लॉकडाउन का असली नुकसान देश के शहरी और उप-नगरीय क्षेत्रों में हो रहा है। नौकरी एवं आजीविका का लगभग पूरा नुकसान इन्‍हीं स्थानों पर है, हालांकि इसका छिपा हुआ प्रभाव ग्रामीण भारत पर भी पड़ता है क्‍योंकि शहरी नौकरी/आजीविका के नुकसान में एक बड़ा अनुपात प्रवासियों को होने वाले नुकसान का है। उनमें से ज्यादातर के परिवार गाँवों में रहते हैं और वे अपनी कमाई परिवारों को भेज कर उनकी सहायता करते हैं। अब वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं और इसने श्रमिकों एवं उनके परिवारों दोनों को गंभीर तनाव में डाल दिया है।

तत्‍काल आवश्‍यकता को ध्‍यान में रखते हुए, सरकार द्वारा जन धन बैंक खातों में नकद हस्‍तांतरण करना इस समस्या से निपटने के लिए एक बुरा कदम नहीं है, लेकिन इसमें गंभीर स्तर पर होने वाली बहिष्‍करण त्रुटियां शामिल रहती हैं5। हालांकि, पीएम-जीकेवाई के तहत प्रदान की जाने वाली राशि को बढ़ाया जा सकता है। अपनी नौकरी खो चुके श्रमिकों के लिए इसके तहत ग्रामीण खातों में कम से कम रु.5,000 प्रति माह और शहरी खातों में कम से कम रु.6,000 जमा कराए जाने चाहिए7। यदि हम 12 करोड़ नौकरियों के नुकसान का अनुमान लगाते हैं, तो पुन: रोजगार मिलने होने तक इसमें प्रति सप्ताह रु.12,000 करोड़ का भुगतान शामिल है। एकमात्र समस्या यह है कि उन लोगों की पहचान कैसे की जाए जिन्होंने नौकरी खो दी है या बेरोजगार हैं। यह एक प्रशासनिक मुद्दा है, लेकिन यह असंभव भी नहीं है, बशर्ते सरकार इसमें होने वाली समावेशन त्रुटियों को सहन करने को तैयार हो। हालांकि, भविष्य के लिए, पंजीकरण की एक स्वैच्छिक प्रणाली को लागू करना वांछनीय हो सकता है जिससे ऐसे लोगों तक जल्दी और लक्षित तरीके से पहुंचने में आसानी होगी।

दूसरी अनिवार्यता, गैर-अनिवार्य क्षेत्रों में उत्पादन क्षमताओं के अस्तित्व से संबंधित है। लॉकडाउन की अवधि को देखते हुए, अब पहले से भी अधिक खतरा इस बात का है कि इनमें से बहुत बड़ी संख्‍या में स्थायी रूप से बंद हो सकते है, खासकर एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों) में से। ऐसी स्थिति में, सुधार का मार्ग बहुत लंबा और कष्टदायी रूप से धीमा होगा क्योंकि यह नए उद्यमियों के प्रवेश करने और नए सिरे से निवेश करने पर निर्भर करेगा।

जैसा कि हमने नोटबंदी प्रकरण से सीखा है, वास्तविक खतरा उनके ऋण को चुकाने में असमर्थता से उत्पन्न होता है। यह खतरा पहले की तुलना में अब बहुत अधिक है। किसी भी घटना में, इस क्षेत्र की उत्पादन संस्थाओं को संभावित नुकसान की समस्‍या को हल करने का सबसे कुशल तरीका है - वित्तीय क्षेत्र में नुकसान को एकत्रित करना या जोड़ देना। ऐसा करने के निम्नलिखित लाभ हैं:

  1. सरकार के पास बहुत बड़ी संख्या में उत्पादन संस्थाओं (लगभग 1.5 करोड़) पर ध्‍यान देने के लिए पहुंच नहीं है। एफआई (वित्तीय संस्थानों) का उपयोग फ्रंट एंड के रूप में करने से इस समस्या का हल निकाला जा सकता है।
  2. सरकार को इस बात का कोई अनुमान नहीं है कि इनमें से प्रत्येक संस्था को कितनी जरूरत है। यह जानकारी मोटे तौर पर वित्तीय संस्थानों के पास उपलब्ध होती है।
  3. सहायता ऋण के रूप में हो या इसे अनुदान के रूप में दिया जाए, इस निर्णय को तब तक स्थगित रखा जा सकता है जब तक कि चीजें स्पष्ट नहीं हो जाती हैं।

आर.बी.आई. (भारतीय रिजर्व बैंक), जिसने नोटबंदी प्रकरण से स्पष्ट रूप से यह सबक सीखा और वित्तीय संस्थानों जैसे बैंकों, एनबीएफसी (नॉन बैंकिंग फाइनन्शियल संस्थानों) और एमएफआई (माइक्रो फाइनेंस संस्थानों) को अपने मानक ऋण संबंधी कार्रवाइयों के लिए अपने विवेकानुसार तीन महीने का ऋण स्‍थगन देने की अनुमति देकर तुरंत प्रतिक्रिया दी, और इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में नकदी भी उपलब्‍ध कराई है। दुर्भाग्य से यह अपर्याप्त है, और वास्तव में कई मायनों में दोषपूर्ण भी।

सबसे पहले, वित्तीय क्षेत्र आरंभ से ही समग्र रूप से जोखिम के खिलाफ था, और अब यह और भी अधिक जोखिम के खिलाफ हो गया है। इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि अगर एफआई द्वारा ऋण स्थगन का फैसला किया जाएगा तो यह उन फर्मों के लिए नहीं किया जाए जिन्हें इसकी सर्वाधिक आवश्यकता है, अर्थात एमएसएमई। यह आशंका निराधार नहीं है क्योंकि बैंकों के एक नमूने के आंकड़ों से संकेत मिलता है कि 70% से कम ऋण खाते ऋण स्थगन के तहत हैं, कुछ बैंकों के लिए यह संख्‍या 20% से कम हैं। हालांकि, अगर एफआई वास्तव में विवेकशील हों, तो उन्हें एहसास होगा कि समय के साथ उनकी वित्तीय स्थिति पर समग्र ऋण स्थगन चयनात्मक की तुलना में अधिक सकारात्मक होगा। कारण यह है कि ऋण स्थगन मंजूर नहीं करने का अर्थ अनिवार्य रूप से यह होगा कि ऋण अगले तीन महीनों के भीतर एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग ऐसेट) बन जाएगा, जबकि यदि ऋण स्थगन प्रदान किया जाता है तो कुछ संभावना है कि यह एनपीए नहीं होगा। लेकिन जोखिम के प्रति अनिच्‍छा इस तरह के तर्क को बाधित करती है।

इस अति जोखिम-विरोधी स्थिति पर दो तरीकों से काबू पाया जा सकता है - गारंटी जारी करके या ऋण स्थगन अनिवार्य करके। इनमें से कोई भी विकल्प आरबीआई के दायरे में नहीं है। यह केवल नियामक स्‍थगन प्रदान कर सकता है, जो वह कर चुका है। इसे आगे ले जाना सरकार पर निर्भर है। सरकार ने मई के पैकेज में कुछ गारंटी दी है, लेकिन काफी नुकसान शायद पहले ही हो चुका है।

इसके अलावा, गारंटी दिया जाना एक हद तक संस्थागत स्तर पर जोखिम विरोध को हल करता है8, लेकिन यह वित्तीय क्षेत्र के अधिकारियों के व्यक्तिगत जोखिम-विरोध को दूर करने के लिए कुछ भी नहीं करता है। ऋण स्थगन को अनिवार्य बनाने को अधिक प्राथमिकता दी जानी चाहिए क्योंकि यह पूरी तरह से संस्था और व्यक्ति दोनों को जोखिम से दूर करता है क्योंकि इसमें विवेक का कोई स्‍थान नहीं है और जिम्मेदारी सरकार में निहित है।

दूसरा, आरबीआई के निर्देश एफआई को ऋण स्थगन अवधि के दौरान ब्याज को संचित करने और ऋण को चुकाने की समय अनुसूची की पुनर्गणना करते समय इसे मूलधन में जोड़ने की अनुमति देते हैं। इसके अलावा, यह स्पष्ट नहीं है कि ऋण चुकाने की अवधि बढ़ाई जा रही है या नहीं। इन दोनों विशेषताओं से एक ऐसी स्थिति पैदा होगी, जहां ऋण सर्विसिंग की लागत ऐसे समय में तेजी से बढ़ेगी, जब न तो उत्पादन और न ही बिक्री अपने पूर्व-लॉकडाउन स्तरों पर लौटी होंगी। यह पुन: पूर्ण रूप से परिहार्य एनपीए को जन्म देगा।

समझदारी की बात यह है कि ऋण स्थगन अवधि को एक "ठहराव" के रूप में घोषित करना होगा, जिसका अर्थ है कि यह केवल तीन महीने की अवधि अस्तित्व में ही नहीं है9। परिणामस्वरूप, समय समाप्‍त होने पर भी ईएमआई (समान मासिक किस्तों) के आकार और ऋण चुकाने की अवधि दोनों के रूप में ही ऋण सर्विसिंग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। निश्चित रूप से इसमें एक लागत है - इस अवधि के दौरान वित्‍तीय संस्‍थान ब्याज आय अर्जित नहीं करेंगे, लेकिन जमाकर्ताओं या बांड धारकों को अपने स्वयं के ब्याज भुगतान दायित्वों को जारी रखने की आवश्यकता होगी। दूसरी ओर, उनके कुल ऋण की मात्रा ऐसा न होने की स्थिति की तुलना में बाद में अधिक हो जाएगी, जो उनके लिए एक लाभ है। इस अंतर को सरकार द्वारा चुकाए जाने पर विचार किया जा सकता है। मई के पैकेज में, सरकार ने ऋण स्थगन को तीन और महीनों के लिए बढ़ा दिया है, और कहा है कि उपार्जित ब्याज को शेष छह महीनों में देय आवधिक ऋण में परिवर्तित किया जाएगा। इससे यह समस्या कुछ हद तक हल होती है लेकिन यह उधार लेने वालों के ब्याज के बोझ को कम नहीं करता है।

तीसरा, ऋण स्‍थगन एनबीएफसी और एमएफआई द्वारा बैंकों से लिए गए ऋणों हेतु नहीं है। चूंकि इन संस्थानों द्वारा लगभग 40% ऋण बैंकों से लिए गए हैं, इसलिए यह ध्‍यान में रखते हुए कि उनका भंडार बैंकों की तुलना में बहुत कम है, यह उनके लिए बहुत बड़ा बोझ है जिसे वे वहन नहीं कर पाएंगे। इसके अलावा, एमएसएमई की पहुँच बैंकों की तुलना में इन संस्थानों तक ज्यादा है, और इस शर्त के कारण उन्हें अपने ऋणों को वापस लेना पड़ेगा और वे अपने ग्राहकों को कोई ऋण स्थगन की सुविधा नहीं देंगी। इससे एमएसएमई क्षेत्र में भंयकर समस्‍या हो जाएगी। मई के पैकेज में, सरकार ने समस्या को हल नहीं किया है लेकिन बैंकों द्वारा एनबीएफसी बॉन्ड की खरीद के माध्यम से एनबीएफसी का समर्थन करने के लिए नकदी संबंधी उपाय किया है। हालांकि, यह स्पष्ट है कि छोटे और कमजोर एनबीएफसी को यह समर्थन नहीं मिलेगा और उन्हें अपना प्रबंध स्‍वयं करना होगा जिसके प्रभाव फिर उनके ग्राहकों पर दिखाई देंगे।

पहले से ही काफी समय बीत चुका है, लेकिन फिर भी आरबीआई के आदेश द्वारा इन कमियों और सरकार द्वारा दिए गए कुछ नकदी समर्थन को तुरंत ठीक किया जाना चाहिए। हालांकि, यह पर्याप्त नहीं है। उत्पादन इकाइयों को उत्पादन फिर से शुरू नहीं हो जाने तक कई लागत वाली वस्तुओं जैसे किराया, उपयोगिताओं पर होने वाले खर्च और अपने श्रमिकों के वेतन का आंशिक भुगतान करना जारी रखना होगा। इनकी पूर्ति करने के लिए, एफआई को अतिरिक्त ऋण देना होगा क्योंकि अधिकांश कार्यशील पूंजी का उपयोग पहले ही किया जा चुका होगा। ये मात्राएँ इतनी बड़ी नहीं हैं, और मौजूदा कार्यशील पूंजी सीमाओं की अतिरिक्त 20-25% मात्रा पर्याप्‍त हो सकती है। सौभाग्य से, सरकार ने इस समस्या का समाधान किया है। चूँकि आवधिक ऋणों की माँग बहुत ही कम होने वाली है, इसलिए बैंकों को बिना अधिक परेशानी के इसका प्रबंधन करने में सक्षम होना चाहिए।

नकदी समर्थन के अलावा, एक सबसे महत्वपूर्ण कदम जो सरकार को उठाना चाहिए, वह है केंद्र सरकार द्वारा अपने सभी अवैतनिक बकायों का तुरंत भुगतान करना। केंद्र द्वारा राज्यों, करदाताओं, निर्यातकों और इसके आपूर्तिकर्ताओं एवं विक्रेताओं के लिए बड़ी मात्रा में भुगतान किए जाने से फिलहाल कुछ हद तक उनके तनाव को कम करेगा, जो कुल मिला कर सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1% या रु.2,00,000 करोड़ होगा। ये भुगतान शीघ्र किए जा सकते हैं क्योंकि वे पहले से ही प्रतिबद्ध और स्वीकृत हैं। इसलिए, इसके लिए सामान्य थकाऊ सरकारी प्रक्रियाओं से गुजरने की जरूरत नहीं है। सरकार ने घोषणा की है कि वह अपने विक्रेताओं को बकाया राशि का भुगतान 45 दिनों में करेगी, लेकिन इसमें शामिल मात्रा स्पष्ट नहीं है। ऐसा लगता है कि यह इसके संपूर्ण बकाया का केवल एक छोटा सा हिस्सा होगा, अन्यथा इसे बड़ी धूमधाम से घोषित किया जाता। हालांकि, यह बजट में निहित व्यय कार्यक्रम की लागत पर नहीं किया जाना चाहिए।

इसलिए, इस तीन महीने की अवधि के दौरान, अपने सभी देनदारियों को खत्म करने के लिए आवश्‍यक राजकोषीय समर्थन इतना बड़ा नहीं है क्योंकि यह अनिवार्य रूप से यह सुनिश्चित करने के लिए है कि गरीबों और बेरोजगारों को अनावश्यक रूप से नुकसान न उठाना पड़े। अनुमान है कि आवश्यक अतिरिक्त राजकोषीय समर्थन लगभग रु.2,00,000 करोड़ होगा जिसमें पीएम-जीकेवाई के रूप में रु.80,000 ट्रिलियन शामिल है। चूंकि इसमें से अधिकांश प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) है, इसलिए इसे तुरंत जारी किया जाना चाहिए।

श्रृंखला के अगले भाग में (शनिवार 20 जून को पोस्ट किया जाना है), डॉ. प्रणव सेन पुनर्निर्माण चरण अर्थात लॉकडाउन हटाए जाने के बाद चार महीने की अवधि और सामान्य आर्थिक गतिविधि को जून 2020 से फिर से शुरू करने की अनुमति पर चर्चा करेंगे, और उसके बाद सुधार चरण पर चर्चा करेंगे।

नोट्स:

  1. कृषि क्षेत्र पहले से ही कृषि उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला के लिए मंडी कीमतों में गिरावट के साथ इस समस्या का सामना कर रहा है।
  2. पीएम-जीकेवाई, जो कि सकल घरेलू उत्पाद का लगभग8% है, मौजूदा योजनाओं की पुन: प्रस्‍तुति और कुछ अतिरिक्तता के रूप में है। अतिरिक्तता सकल घरेलू उत्पाद का केवल लगभग 0.4% है। राज्यों द्वारा वहन की जा रही लागतों का अभी तक कोई अनुमान नहीं है।
  3. ग्रामीण भारत मौसम संबंधी घटनाओं के कारण समय-समय पर लगने वाले आपूर्ति झटकों से अभ्‍यस्‍त है, इसलिए यहां इससे मुकाबला करने वाले तंत्र मौजूद हैं।
  4. अप-स्केलिंग में केवल शुरू किए गए कार्यों की मात्रा में बड़ी वृद्धि करना ही शामिल नहीं है, बल्कि इसमें प्रत्‍येक परिवार के काम के दिनों की संख्या को 100 प्रति वर्ष की वर्तमान सीमा से बढ़ा कर इसे कम से कम 150 तक किया जाना शामिल होगा। लेकिन यह केवल तब हो सकता है जब केंद्र सरकार इस तरह के काम की अनुमति देती है।
  5. अब ऐसे कई वैकल्पिक तंत्रों की पहचान की जा सकती है जो इस समस्या का समाधान करेगा। जन धन खातों के साथ राशन कार्ड और मनरेगा सूची एक बेहतर विकल्प प्रदान करते हैं।
  6. पीएम-जीकेवाई के अंतर्गत जन धन खातों में तीन महीने की अवधि के लिए रु.500 या रु.1,000 प्रति माह अंतरित किए जाते हैं।
  7. ये संख्या गरीबी रेखा के आधार पर है।
  8. वित्‍तीय संस्‍थान इस तरह की गारंटी के परिणामस्वरूप की जाने वाली अपरिहार्य सरकारी लेखा परीक्षा के बारे में चिंता करेंगे। पिछले ट्रैक-रिकॉर्ड को देखते हुए इस तरह की लेखा परीक्षाएं काफी डरावनी होती हैं।
  9. इसके समकक्ष व्‍यवस्‍था श्रम कानूनों में मौजूद है (और सरकार अक्सर इसका इस्तेमाल स्‍वयं श्रम मामलों पर करती है)। इसे अकार्य दिवस कहा जाता है, और इसे हड़ताल की समयावधि में तब लागू किया जाता है जब श्रमिक को मजदूरी प्राप्‍त नहीं होती परंतु इस अवधि को उसकी सेवा में व्‍यवधान के रूप में नहीं गिना जाता।

लेखक परिचय: डॉ प्रणव सेन इंटरनैशनल ग्रोथ सेंटर (आई.जी.सी.) के कंट्री डाइरेक्टर हैं।

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