गरीबी तथा असमानता

ड्यूएट: रोजगार को एक सार्वभौमिक अधिकार बनाने की ओर

  • Blog Post Date 22 सितंबर, 2020
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Debraj Ray

New York University

debraj.ray@nyu.edu

देबराज रे का यह कहना हैं कि हमें रोजगार के मुद्दे को एक सार्वभौमिक अधिकार बनाने के रूप में आगे बढ़ाना चाहिए, और ड्यूएट इस दिशा में महत्‍वपूर्ण भूमिक निभाएगा। वे प्रस्‍ताव के दो पहलुओं पर चर्चा करते हैं – श्रमिकों तथा परियोजनाओं पर नजर रखना। 

ज्यां द्रेज़ ने हाल में एक ‘विकेंद्रीकृत शहरी रोजगार एवं प्रशिक्षण’ योजना (संक्षेप में - ‘ड्यूएट’ या ‘डीयूईटी’) का प्रस्‍ताव रखा। उनके शब्‍दों में, “ड्यूएट, शहरी रोजगार आश्वासन की ओर एक महत्त्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है”। इसकी बुनियादी अवधारणा इस बात से ताल्‍लुक रखती है कि राज्‍य सरकारें ‘अनुमोदित सार्वजनिक संस्‍थानों’ को जॉब स्टैम्प (रोजगार मुहर) जारी करेंगी, और ये संस्‍थान, उचित रूप से पंजीकृत श्रमिकों को वेतन के भुगतान के लिए इन मुहरों का प्रयोग करेंगे। श्रमिक (संस्‍थान से प्राप्‍त) इस जॉब स्टैम्प एवं कार्य प्रमाण पत्र को सीधे बैंक खाते में भुगतान हेतु प्रस्‍तुत करेंगे। अधिक जानकारी के लिए मैं आपको ज्यां के प्रस्‍ताव को पढ़ने की सलाह दूँगा। 

मेरा यह मानना है कि हमें रोजगार के मुद्दे को, एक सार्वभौमिक अधिकार बनाने के रूप में आगे बढ़ाना चाहिए, एक ऐसा अधिकार जो शहरी लोगों की तुलना में ग्रामीणों को बढ़ावा देता है। ड्यूएट इस दिशा में एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मजदूरों के विस्‍थापन की बढ़ती हुई प्रवृत्ति, एक ऐसा प्रवाह जो महामारी की बदौलत और भी तीव्र होगा – के मद्देनजर यह अधिकार कुछ हद तक आश्‍वासन (सुरक्षा) प्रदान करता है। अत: मैं इस प्रस्‍ताव का समर्थन करता हूँ। 

इसके बावजूद, इसमें बहुत से ऐसे मुद्दे हैं जिन पर चर्चा की जानी है, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं – इस कार्यक्रम के लिए वित्‍तपोषण (निधि संग्रहण), भारत में ग्रामीण-शहरी प्रवास संतुलन पर इसका प्रभाव, तथा अधिकार के रूप में रोजगार का समग्र सिद्धांत। इन मुद्दों पर मेरे अपने विचार हैं, परंतु मैं इस संगोष्‍ठी में उपस्थित अपने साथियों के लिए छोड़ता हूँ। मैं दो पहलुओं पर अपनी टिप्पणी देना चाहूँगा। पहला है श्रमिकों पर नजर रखना, और दूसरा परियोजनाओं पर नजर रखना।

इस प्रस्‍ताव के अनुसार श्रमिकों को (संभवतः) पंजीकृत श्रमिकों के स्‍थानीय पूल से चुना जाएगा। यह मुझे भारतीय नीति के गठन में एक लंबे समय तक रहे आकर्षण की याद दिलाता है, जिसमें भले हमेशा न हो परंतु अधिकतर अवसरों पर अनगिनत नियम शामिल होते हैं, जिनमें से कुछ में कोई वास्‍तविक अंतर्निहित प्रयोजन प्रतीत नहीं होता, और उनमें से अधिकांश में हेराफेरी की गुंजाइश हो सकती है या फिर अपार कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। अब श्रमिकों के पंजीकरण के कार्य को ही लें, तो यह अनिवार्यत: इस प्रश्‍न को जन्‍म देगा (उदाहरण के लिए) कि ये लाखों अनियत प्रवासी वास्‍तव में कहाँ रहते हैं। संभवत:, मनरेगा (महात्‍मा गांधीन राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार आश्‍वासन अधिनियम) तथा ड्यूएट की दो कश्तियों में सवार होने वाले इन श्रमिकों की परछाई अपनी दुर्दशा दर्शाएगी। उसके बाद हम देखेंगे कि अधिकारी तंत्र मनमाने निर्णय लेंगे, भीषण मात्रा में कागज़ी कार्रवाई की जाएगी, वास्‍तविक आवेदनों को रद्द किया जाएगा, और संदिग्‍ध आवेदनों को राजनीतिक कारणों से स्‍वीकार किया जाएगा। 

यदि मुझसे पूछा जाए तो मैं कहूँगा कि भारत को भारत रहने दो। भारत के नागरिकों को उनके ऐच्छिक स्‍थानों पर काम करने दो। हाँ, सरकार से आय लेने के लिए आपको पंजीकरण करना होगा, जैसा कि वर्तमान में मनरेगा रोजगार कार्ड धारक करते हैं, और बैंक खाता या तो उपलब्‍ध कराना होगा या खुलवाना होगा। तब आपको भारत में कहीं भी ‘X’ दिनों तक सरकारी कार्य करने की अनुमति मिलेगी (आपको, आपके परिवार को नहीं)। इस X से अभिप्राय 100 दिन प्रति व्‍यक्ति है। यदि इन 100 दिनों में से 40 दिन बैंगलोर में ड्यूएट परियोजना में इस्‍तेमाल हो गए तो बचे हुए 60 दिन को मनरेगा या कोलकाता में अन्‍य ड्यूएट परियोजना के लिए इस्‍तेमाल किया जा सकता है – मुझे इसी बात की परवाह है। बेशक, ऐसा नहीं होगा क्‍योंकि बड़ी सीधी और समझदारी वाली बात है कि कोई भी व्‍यक्ति, ड्यूएट परियोजना में काम करने के लिए बैंगलोर से कोलकाता के चक्‍कर नहीं काटेगा। लेकिन हमें ऐसे अपूर्ण कानून की जरूरत नहीं है - जिसमें स्‍थानीय निवासियों के हर तरह के दस्‍तावेजों की  जांच और इसके साथ जुड़े हुए घोटाले एवं ऑडिट की आवश्‍यकता हो – जो इसका निषेध करता हो। 

फिर भी यदि हम, शहरी अधिकार के रूप में नहीं बल्कि ग्रामीण अधिकार के रूप में रोजगार में अंतर रखना चाहते हैं तो मनरेगा कार्ड को संपूर्ण भारत का अधिकार दिया जा सकता है और ड्यूएट कार्ड धारक के पास केवल शहरी अधिकार हो सकता है। साधारण बैंक खाते में सरकारी भुगतान की वार्षिक सीमा बहुत आसानी से बाकी चीजों का मॉनीटर कर सकती हैं। इससे ऐसे अनियत प्रवासियों का भी भला होगा जो गांवों और शहरों, दोनों जगहों पर कार्य करते हैं। तथापि, इसके बावजूद मैं एम.एस. धोनी की राह, अर्थात ‘सादगी ही श्रृंगार है’, पर चलूँगा।

उपरोक्त दलीलें इस बात पर आश्रित हैं कि किसी भी जॉब कार्ड धारक के साथ एक से अधिक बैंक खाता जुड़ा नहीं होना चाहिए। अन्‍यथा वार्षिक सीमा का सत्‍यापन असंभव हो जाएगा। इसके लिए आधार कार्ड से जोड़े जाने की आवश्‍यकता है, जो संभवत: विवाद का विषय है। 

दूसरा मुद्दा परियोजना से संबंधित है। इसके बावजूद भी, श्रमिकों का समूह संगठनों या नियोक्‍ताओं से सांठ-गांठ कर सकता है और बिना कोई कार्य किए जॉब स्टैम्प हासिल कर सकता है, जबकि ‘नियोक्‍ता’ श्रमिकों से नकद राशि हथिया सकते हैं। इस बारे में ज्यां ‘अनुमोदित संस्‍थानों - विद्यालयों, कॉलेजों, सरकारी विभागों, स्‍वास्‍थ्‍य केंद्रों, नगर-निगमों, आस-पास के संघों, शहरी स्‍थानीय निकायों इत्‍यादि’ का उल्‍लेख करते हैं। उन्होंने ‘नियोक्‍ता एजेंसियों’ का भी उल्‍लेख किया है, जो परियोजनाओं पर चौकसी रखेगी और संभवत: घोटालों का सफाया करेगी। अफसोस कि यह एक अंतहीन श्रृंखला है। मैं इन महान ‘निकायों’ – या इन निकायों के संबंधित पदाधिकारियों को पैसों के बदले में जॉब स्टैम्प देते हुए देख सकता हूँ। निधियों का निवल समावेशन- ड्यूएट सर्वेक्षण के अनुसार जिसकी आवश्‍यकता है - स्‍पष्‍टत: इन वित्‍तीय अवसरों को जन्‍म देगा। 

जबकि, मैं इस बात से सहमत हूँ कि नियोक्‍ता एजेंसियों के माध्‍यम से सांठ-गांठ की संभावनाएं कम होंगी, पर मुझे संपूर्ण मानव जाति की शातिरता पर इतना भरोसा है कि मैं इसका दावा नहीं कर सकता। 

यह बहुत जटिल समस्‍या है। परियोजना की कार्योत्‍तर मंजूरी से सांठ-गांठ को रोका जा सकता है, परंतु यह ईमानदार नियोक्‍ताओं को बहुत भारी पड़ेगा। जब परियोजना के पूर्ण होने के पश्‍चात अनुमोदन दिया जाएगा, श्रमिकों के वेतन का भुगतान पहले ही करना पड़ेगा, वो अपनी मुहर लेकर घर चले गए होंगे (चले भी जाना चाहिए)। तब ईमानदार नियोक्‍ताओं के लिए यह बहुत जोखिम भरा होगा कि जिन सरकारी पदाधिकारियों के पास परियोजना अनुमोदन के लिए पड़ी है, उन्‍होंने अगर अनुमोदन नहीं दिया तो? फिर, श्रमिकों को पैसा कौन देगा? 

मेरे कुछ साथी यह महसूस कर सकते हैं कि यह दूसरे दर्जे की समस्‍या है। तो मैं यह कहना चाहूँगा कि भारतीय लोक-नीति की कब्रों में ऐसी दूसरे दर्जे की समस्‍याओं के शव लदे पड़े हैं। कम से कम हम इतना तो कर ही सकते हैं कि इसमें और कंकालों को न दफ्न करें। इसके लिए द्विमुखी सुझाव निम्‍नवत हैं: 

निरीक्षण मंडल के माध्‍यम से यादृच्छिक आधार पर परियोजनाओं की  जांच, जिसमें जाली परियोजनाओं के लिए कड़ा जुर्माना हो, वो तो खैर होगा ही, परंतु मेरे हिसाब से हमें जांचकर्ता को उस जुर्माने की राशि के बराबर का पुरस्‍कार भी देना चाहिए। 

जी हाँ, इससे, उत्‍पीड़न की समस्‍या तुरंत खड़ी हो जाएगी कि जांचकर्ता उचित परियोजनाओं को भी जाली के रूप में प्रस्‍तुत कर सकते हैं। इसके लिए परियोजना की संतोषजनक रूप से पूर्णता हेतु दस्‍तावेजीकरण के लिए दिशानिर्देश होने चाहिए जिनपर जांचकर्ताओं द्वारा कोई विरोध नहीं दर्शाया जा सकता, उदाहरणार्थ, अपशिष्‍ट निष्‍कासन, निर्माण कार्य, भवनों की रंगाई-पुताई, इत्‍यादि। इससे इस बात पर भी बंदिश लग जाएगी कि किस प्रकार की परियोजनाओं पर कार्य किया जा सकता है। विशेष रूप से, परियोजनाओं को वास्‍तविक परिणाम के पैमाने पर बड़ा और मुश्किल से मापी जा सकने वाली सेवाओं के मामले में अपेक्षाकृत छोटा होना होगा। यह एक समस्‍या हो सकती है, परंतु किसी निरीक्षण प्राधिकारी की साख पर भरोसा करने की असमंजस्‍ता से छोटी समस्‍या होगी। 

इस संबंध में, मैं व्‍यवसायों पर छूट के बारे में अपना मत प्रकट कर अपनी बात समाप्‍त करना चाहूँगा। जरा सोचिए, मौजूदा नियोक्‍ताओं को जॉब स्टैम्प उपलब्‍ध कराई जाए, शायद गैर-लाभकारी संगठनों को और उनसे श्रम लागत के एक छोटे अंश की छूट देने को कहा जाए। जैसा कि ज्यां का मानना है कि इससे निवल रूप से रोजगार पर कम प्रभाव पड़ेगा – यह इस बात पर निर्भर होगा कि एक संस्‍था कितना पूंजीगत श्रम प्रतिस्‍थापन करने को राजी है, जबकि समानांतर रूप से स्टैम्पों के लिए नियत बजट और भी बड़ेगा। 

इन सब बातों पर विचार करना बहुत आवश्‍यक है, लेकिन जिस बात पर मैं ध्‍यान आकर्षित करना चाहता हूँ वो है कि लागत को बांट लेने से जाली-श्रमिकों की समस्‍या फीकी पड़ जाएगी। मान लीजिए की सब्सिडि दर 50% है, तो एक नियोक्‍ता एक श्रमिक के साथ दूसरा मुफ्त में पा सकता है। यदि दूसरे श्रमिक की सीमांत-उत्‍पादकता शून्‍य है तो योजना में पूर्व स्‍तर की तरह ही फेर-बदल की गुंजाइश है। परंतु यदि श्रमिक की सीमांत-उत्‍पादकता सकारात्‍मक है, तो हेरा-फेरी को बढ़ावा देने वाली चीजें काफी हद तक खत्‍म हो जाती हैं। इस नजरिए से, जब मौजूदा व्‍यापारिक गतिविधियों में लागत को बांटा जाता है और ये पूर्णत: रोजगार मुहरों पर आश्रित नहीं होती हैं, तो तंत्र में हेरा-फेरी को बढ़ावा देने वाले समग्र तत्‍वों में कमी आ जाती है। इसके संभावित खतरे यह हो सकते हैं कि - व्‍यापार के परिणाम शायद वैसे नहीं होंगे जैसा हम बढ़ाना चा‍हते हैं, और साथ ही निवल रोजगार लाभ भी कम होगा। 

मुझे उम्‍मीद है कि इन टिप्‍पणियों को पूरी तरह से सकारात्‍मक रूप में लिया जाएगा न कि नकारात्‍मक, क्‍योंकि यह ड्यूएट निश्चित ही लागू करने लायक है।

लेखक परिचय: देबराज रे फ़ैकल्टि ऑफ आर्ट्स अँड साइन्स के सिल्वर प्रोफेसर, और न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। 

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