गरीबी तथा असमानता

ड्यूएट: शहरी रोजगार योजना हेतु एक प्रस्ताव

  • Blog Post Date 16 सितंबर, 2020
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Jean Drèze

Ranchi University; Delhi School of Economics

jean@econdse.org

ज्यां द्रेज़ शहरी क्षेत्रों में रियायती सार्वजनिक रोजगार की एक सरल योजना का प्रस्ताव प्रस्तुत करते हैं, जो कई सार्वजनिक संस्थानों की खुद की पहल के आधार पर बनाई गई है।

संपादक की टिप्पणी:

ज्यां द्रेज़, जिन्होंने मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) की ड्राफ्टिंग में हिस्सा लिया था, वे अब शहरी क्षेत्रों के लिए ड्यूएट (विकेंद्रीकृत शहरी रोजगार और प्रशिक्षण) नामक एक योजना का प्रस्तावित कर रहे है। यह एक सोचा-समझा प्रस्ताव है और एकदम सही समय पर आया है चूंकि ऐसी खबरें हैं कि भारत सरकार पहले से ही कुछ शहरी रोजगार योजना के बारे में सोच रही है। हमें लगता है कि यह सही समय है इस प्रस्तावित योजना के ऊपर बुनियादी के साथ-साथ विस्तृत सार्वजनिक चर्चा ‘आइडियास फॉर इंडिया’ पर हो। इसे ध्यान में रखते हुए, हमने एक संगोष्ठी आयोजित करने का निर्णय लिया है।

ज्यां का प्रस्ताव नीचे पोस्ट किया गया है। ध्यान दें कि यह प्रस्ताव केवल उन लोगों के लिए एक अस्थायी राहत उपाय नहीं है जिन्होंने अपनी नौकरी खो दी है। इसे एक स्थायी संस्थान बनाने के लिए प्रस्तावित किया गया है जो शहरी बेरोजगारी और क्षय के लिए औषध का काम करेगी। यह भी ध्यान दें कि ड्यूएट की प्रेरणा, मानरेगा की प्रेरणा से काफी अलग है। मनरेगा ग्रामीण श्रमिकों को सुस्त समय या सूखे के वर्ष में कृषि रोजगार के अवसर प्रदान करता है। जैसा शहरी उत्पादन के मामले में नहीं होता। फिर भी, शहरी क्षेत्र में बहुत ज्यादा बेरोजगारी है। शहरी क्षेत्र कुछ अवसंरचनाओं का प्रयोग कर सकते हैं, और वहाँ श्रम बल का उसकी क्षमता से कम उपयोग किया गया है। परंतु, अवसंरचनाओं के निर्माण के लिए इस श्रम का उपयोग करने के लिए कोई संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। क्या ड्यूएट इस समस्या का हल हो सकता है?

हम उन सभी लोगों की टिप्पणियों को आमंत्रित कर रहे हैं जो इन मुद्दों के बारे में सोचते है या पूर्व में इन पर काम किया है। कुछ बुनियादी मुद्दे हैं, जैसे कि ‘क्या हमें शहरी बेरोजगारी के दोहरे लक्ष्यों और बहुत आवश्यक पर्यावरण से निपटने के लिए ड्यूएट जैसी किसी चीज की आवश्यकता है?’ या, ‘नगरपालिकाओं को केंद्र सरकार द्वारा अधिक धन प्रसारित करने जैसे सरल उपाय पर्याप्त होंगे?’। ऐसे उपायों को बनाने में घूसख़ोरी और रिसाव जैसे अहम मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करना ज़रूरी है। उदाहरण के लिए - क्या प्लेसमेंट एजेंसियां स्थापित करना नियोक्ताओं एवं कर्मचारियों के बीच मिलीभगत की समभावना की समस्या का हल होगा?

हम इस परिचय से अपने ‘ड्यूएट’ संगोष्ठी की शुरात कर रहे हैं।

संदर्भ

  • शहरी अनौपचारिक क्षेत्र में बेरोजगारी का आलम है क्योंकि आवधिक लॉकडाउन के कारण लाखों श्रमिकों को अपनी नौकरी गवानी पड़ी है। वे अपनी नौकरी पुनः प्राप्त कर पाएँगे या नहीं, इस बात को लेकर भी अनिश्चितता है।
  • हमारे सार्वजनिक संस्थानों और सार्वजनिक स्थानों (जैसे - स्कूल, कॉलेज, स्वास्थ्य केंद्र, बस स्टैंड, जेल, आश्रय स्थल, छात्रावास, पार्क, संग्रहालय, कार्यालय, इत्यादि) के खराब रखरखाव की पुरानी समस्या है।
  • कई महीनों की लॉकडाउन के बाद खुल रहे सार्वजनिक संस्थानों के परिसर को बहाल कराने के लिए बहुत सारे काम करवाने पड़ेंगे (जैसे - सफाई, पुताई, निराई, सैनिटाईजिंग, मरम्मत, पेंटिंग, नालसाजी, आदि)।
  • लोगों की रोजगार गारंटी अधिनियम में रुचि बढ़ तो रही है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में राहत कार्यों का बहुत कम अनुभव है। प्रस्तावित ड्यूएट योहना शहरी रोजगार गारंटी की दिशा में एक शुराती कदम के रूप में काम कर सकता है।

मूल विचार

  • राज्य सरकार ‘जॉब स्टैम्प (नौकरी मुहर)’ जारी करे और उन्हें स्कूलों, कॉलेजों, सरकारी विभागों, स्वास्थ्य केन्द्र, नगर पालिकाओं, पड़ोसी संगठनों, तथा शहरी स्थानीय निकायों जैसे अनुमोदित संस्थानों को वितरित करे। शुरुआत दौर में ये अनुमोदित संस्थान सार्वजनिक संस्थान होंगे (निजी गैर-लाभकारी संस्थानों पर बाद में विचार किया जा सकता है)।
  • प्रत्येक जॉब स्टैम्प को एक निर्धारित अवधि के भीतर काम के एक व्यक्ति-दिन में परिवर्तित किया जा सकता है, जहाँ अनुमोदित संस्था के द्वारा काम की व्यवस्था और सरकार द्वारा मजदूरी भुगतान (वैधानिक न्यूनतम) कर सकता है। श्रमिकों द्वारा नियोक्ता से प्राप्त जॉब स्टैम्प प्रस्तुत करने पर मजदूरी भुगतान सीधे उनके खातों में किया जा सकता है।
  • श्रमिकों को अनुमोदित नियोक्ता द्वारा पंजीकृत श्रमिकों की एक सूची से चुना जा सकता है, या शायद (मिलीभगत से बचने के लिए) बेहतर यह होगा कि, एक स्वतंत्र ‘प्लेसमेंट एजेंसी’ द्वारा पंजीकृत श्रमिकों को चुना जाए (अधिक जानकारी नीचे दी गयी है)।

तर्क

  • अनुमोदित नियोक्ताओं को बड़ी संख्या में सक्रिय करने से बहुत अधिक रोजगार पैदा करने में मदद मिलेगी।
  • अनुमोदित नियोक्ताओं की यह सुनिश्चित करने में हिस्सेदारी होगी कि काम प्रभावी/सार्थक/उत्पादक हो।
  • इस योजना के संचालन के लिए संस्थाओं को खुद के कुछ कर्मचारियों की आवश्यकता होगी क्योंकि ये संस्थाएं हीं नियोक्ता होंगे।
  • श्रमिकों को न्यूनतम वेतन का समय पर भुगतान करने और संभवतः अन्य लाभों का भी आश्वासन दिया जा सकेगा।

आगे की संभावनाएं

  • दुरुपयोग से बचने के लीये, जॉब स्टैम्प का उपयोग जायज़ कार्यों की एक सूची तक सीमित किया जा सकता है। लेकिन यह सूची काफी व्यापक होनी चाहिए, केवल रखरखाव तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए।1
  • कार्यों की सूची इतनी व्यापक नहीं होनी चाहिए कि सार्वजनिक संस्थानों की मौजूदा नौकरियों को विस्थापित कर दें।
  • सभी ड्यूएट रोजगार योजना मौजूदा श्रम कानूनों में निर्दिष्ट श्रमिक सुरक्षा और कल्याण मानदंडों के अधीन होनी चाहिए।
  • 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी शहरी निवासियों को ड्यूएट के तहत पंजीकरण करने के लिए योग्य माना जाना चाहिए, और विशेष पंजीकरण अभियान या प्लेसमेंट एगेंसियान कम आय वाले इलाकों में स्थापित किया जा सकता है।
  • यह योजना कुशल एवं अकुशल, दोनों तरह के श्रमिकों के लिए होगा। किसी कुशल श्रमिक को नियोजित करते वक्त एक अकुशल श्रमिक को सहायक के रूप में नियोजित किया जा सकता है, जो इस योजना को प्रशिक्षित करने तथा कौशल निर्माण करने का तत्व प्रदान करेगा। भविष्य में प्रशिक्षित सुविधाओं विकसित की जा सकती है या ढूँढी जा सकती है, उदाहरण के लिए किसी गैर-लाभकारी प्लेसमेंट एजेंसियों द्वारा, यदि कोई हो।
  • कुछ लागत-साझेदारी की व्यवस्था को शुरू किया जा सकता है, जिसके तहत अनुमोदित नियोक्ता मजदूरी का एक छोटा सा हिस्सा भुगतान करेंगे, या निःशुल्क जॉब स्टैम्प की जगह उन जॉब स्टैम्प को खरीदेंगे। इससे यह सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी कि काम प्रभावी/उत्पादक हो। हालांकि इससे रोजगार सृजन में कमी आएगी। परंतु लागत-साझेदारी की व्यवस्था जटिल है, शायद शुरुआती दौर में इसे न लागू करना सही रहेगा।
  • सार्वजनिक संस्थानों के बीच जॉब स्टैम्प के आवंटन के लिए सरल मानदंडों की आवश्यकता होगी। इन संस्थानों के बीच जॉब स्टैम्प के सीमित आदान-प्रदान पर विचार किया जा सकता है।
  • कार्यों की निगरानी, निरीक्षण, आडिट और मूल्यांकन के लिए नगर पालिका स्तर पर एक स्वतंत्र प्राधिकरण नियुक्त या नामित किया जा सकता है।
  • राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (एनयूएलएम) संभवतः ड्यूएट में भी भूमिका निभा सकता है।
  • ड्यूएट आसानी से किसी जिले या नगर पालिका में एक परीक्षण के तौर पर शुरू किया जा सकता है।

प्लेसमेंट एजेंसी

  • प्लेसमेंट एजेंसी की मुख्य भूमिका ज़रूरत पड़ने पर पंजीकृत कामगारों को अनुमोदित नियोक्ताओं को आवंटित करना होगा। लेकिन प्लेसमेंट एजेंसी अन्य प्रयोजनों को भी पूरा कर सकती है, जैसे कि श्रमिकों के कौशल को प्रमाणित करना, श्रमिकों को शोषण से बचना और उनके लिए सामाजिक लाभों की व्यवस्था करना।
  • प्लेसमेंट एजेंसी के लिए विभिन्न विकल्पों पर विचार किया जा सकता है, जैसे: (क) स्थानीय सरकार द्वारा संचालित नगर पालिका के लिए एक एकल एजेंसी; (ख) एक श्रमिक कोऑपरेटिव; (ग) कई प्लेसमेंट एजेंसियां, जो गैर-लाभकारी संगठनों या सहकारी समितियों के रूप में काम कर सकती हैं।

संबन्धित अनुभव

  • कुछ देशों में इसी तरह की सब्सिडि आधारित रोजगार योजनाएँ हैं, उदाहरण के लिए - कई यूरोपीय देशों की “सेवा वाउचर योजनाएँ” (एसवीएस)। बेल्जियम में सफाई और इस्तरी जैसी घरेलू सेवाओं के लिए एक बहुत लोकप्रिय एसवीएस है। इस योजना का इस्तेमाल 2016 में हर 5 से 1 घर ने किया था।

रोजगार गारंटी की ओर

  • ड्यूएट के सहारे मांग-आधारित ‘रोजगार गारंटी’ की ओर बढ़ना आसान होगा। इसके लिए नगर पालिका को एक अंतिम उपाय नियोक्ता के रूप में काम करना होगा जो उन श्रमिकों को रोजगार प्रदान करेगा जो काम की तलाश/मांग कर रहे हैं, पर उन्हें अन्य अनुमोदित नियोक्ताओं से कोई काम नहीं मिल रहा। वैकल्पिक रूप से, ड्यूएट शहरी क्षेत्रों में एक बड़े रोजगार गारंटी कार्यक्रम का हिस्सा बन सकता है।

इस आलेख से संबन्धित ज्यां द्रेज़ द्वारा लिखा एक कार्य यहाँ पढ़ें: https://www.bloombergquint.com/opinion/an-indian-duet-for-urban-jobs

इस आलेख का मूल संस्करन अँग्रेजी में प्रकाशित किया गया था, जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं: https://www.ideasforindia.in/topics/poverty-inequality/duet-a-proposal-for-an-urban-work-programme.html

नोट्स:

  1. एक संभावित सूची के तत्वों को यहाँ पढ़ा जा सकता है (अँग्रेजी में) - https://cse.azimpremjiuniversity.edu.in/wp-content/uploads/2019/04/SWI2019_Urban_Job_Guarantee.pdf (इस नोट के लिए एक उपयोगी पूरक)

लेखक परिचय: ज्यां द्रेज़ रांची विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में मानद प्रोफेसर हैं।

प्रस्ताव पर दृष्टिकोण एवं टिप्पणियाँ:,

ड्यूएट: अनौपचारिक श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा को शामिल करने हेतु विस्तार करना - अमित बसोले (अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी), रक्षिता स्वामी (सोश्ल अकाउंटिबिलिटी फोरम फॉर एक्शन एंड रिसर्च)

ड्यूएट: कुछ व्यावहारिक चिंताएं - अश्विनी कुलकर्णी (प्रगति अभियान )

ड्यूएट: औद्योगिक नीति के दृ‍ष्टिकोण से - स्वाति धींगरा (लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस)

ड्यूएट: अनुकूलनीय कार्यान्वयन हीं समाधान - यामिनी अय्यर (सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च)

ड्यूएट: सकारात्‍मक दृष्टिकोण के साथ सावधानीपूर्वक कार्यान्‍वयन - संदीप सुखटणकर (यूनिवरसिटि ऑफ वर्जीनिया)

ड्यूएट: लागत और लाभों की तुलना - फ़रज़ाना अफरीदी (भारतीय सांख्यिकी संस्थान दिल्ली)

ड्यूएट: दूसरे देशों के अनुभवों से सीखना - मार्टिन रेवेलियन (जॉर्जटाउन यूनिवरसिटि)

ड्यूएट: 'कैसे' से पहले 'क्यों' को संबोधित करना - अशोक कोटवाल (आइडियास फॉर इंडिया)

ड्यूएट: रोजगार सृजन को शहरी स्थानीय निकायों में विकेंद्रीकृत करना - दिलीप मुखर्जी (बोस्टन यूनिवरसिटि)

ड्यूएट: छोटे शहरों के सार्वजनिक कार्यों में रोजगार कार्यक्रम - प्रणब बर्धन (यूनिवरसिटि ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले)

ड्यूएट: रोजगार को एक सार्वभौमिक अधिकार बनाने की ओर - देबराज रे (न्यू यॉर्क यूनिवरसिटि)

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