गरीबी तथा असमानता

ड्यूएट: सकारात्‍मक दृष्टिकोण के साथ सावधानीपूर्वक कार्यान्‍वयन

  • Blog Post Date 19 अक्टूबर, 2020
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शहरी रोजगार कार्यक्रम हेतु ज्यां द्रेज़ के ड्यूएट प्रस्‍ताव पर टिप्‍पणी करते हुए संदीप सुखटणकर यह विमर्श करते हैं कि संभावित आश्‍वासन और साथ ही इससे जुड़े स्‍वाभाविक मुद्दों (जिनका समाधान किया जाना है) को देखते हुए, यह प्रस्‍ताव कार्यान्‍वयन एवं मूल्‍यांकन के लिए पूरी तरह से तैयार है।

भारत में शहरी रोजगार कार्यक्रम हेतु ज्यां द्रेज़ का महत्‍वाकांक्षी एवं रुचिकर प्रस्‍ताव  (ड्यूएट; विकेंद्रीकृत शहरी रोजगार एवं प्रशिक्षण) कई विचारों को जन्‍म देता है। पहला विचार एक प्रश्‍न है - ड्यूएट क्‍यों जरूरी है? यह दो समस्‍याओं को उजागर करता हुआ प्रतीत हो सकता है – शहरी रोजगार एवं अपर्याप्‍त शहरी आधारभूत संरचनाएं – और एक उपचार से उनके निवारण की कोशिश। तथापि, इस बात पर साफ तौर से ध्‍यान दिए जाने की जरूरत है कि ये समस्‍याएं क्‍यों प्राथमिक हैं, और शायद उन समस्‍याओं के हल तलाशे जाने चाहिए। उदाहरणार्थ, शहरी उच्‍च बेरोजगारी संभवत: बंदिशपूर्ण श्रम कानूनों से संबंधित है, जो औपचारिक एवं अनौपचारिक क्षेत्र के बीच फांसले पैदा करते हैं (‘हैरिस-तोडारो बेरोजगारी’ जिसका संदर्भ अशोक कोटवाल देते हैं), और इन कानूनों का निर्धारण शायद प्राथमिकता हो सकती है। किसी भी हाल में, अशोक ‘क्‍यों’ का प्रश्‍न उठाकर व उसकी जांच करके एक उत्‍तम कार्य करते हैं, अत: मुझे यहाँ और विस्‍तार में जाने की जरूरत नहीं है।

दूसरा विचार – इसे जरूरी मानते हुए – यह है कि यह कार्यक्रम पहले से ही मौजूद क्‍यों नहीं है? इस सवाल के जवाब का सीधा संबंध, शहरी स्थानीय निकायों को राजस्‍व-वृद्धि के दायित्‍व के उचित विकेंद्रीकरण एवं अंतरण में कमी से है। जबकि ग्रामीण स्‍थानीय अधिशासन फल-फूल रहा है, शहरी विकेंद्रीकरण पूर्णता से कोसों दूर है तथा स्‍थानीय अधिशासन बहुत लाचार है (ऑरबैक एवं क्रुक्‍स-विज़नर 2020 देखें)। दिलिप मुखर्जी इन मुद्दों की अतिरिक्‍त जांच करते हुए प्रभावी शहरी विकेंद्रीकरण के भाग के रूप में ड्यूएट पर विमर्श करते हैं, जिसे मैं बिल्‍कुल तर्कसंगत मानता हूँ।

इसके अतिरिक्‍त, बाजारों में हस्‍तक्षेप नहीं करने के स्‍वाभाविक नव-पारंपरिक विचार को नजरंदाज करना कठिन है। परंतु, भारत जैसे स्‍थानों में इन विचारों के कार्यान्‍वयन में बहुत सावधानी बरतने की आवश्‍यकता है, क्‍योंकि यहाँ बाजारों में उतार-चढ़ाव की संख्‍या पहले ही बहुत ज्‍यादा है। उदाहरण के लिए मनरेगा (महात्‍मा गांधी ग्रामीण रोजगार आश्‍वासन अधिनियम) का मामला। जब मेरे सह-लेखक कार्तिक मुरलीधरन, पॉल नीहॉस, और मैं पहली बार कार्यक्रम को पढ़ रहे थे, हमारे प्रारंभिक विचार यह थे कि जहाँ यह कुछ लोगों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करेगा, वहीं संभावना है कि यह अर्थव्‍यवस्‍था की कुशलतापूर्वक वृद्धि न कर सके। हमने यह सोचा, हालांकि यह ग्रामीण मजदूरी दरों को बढ़ाएगा, परंतु इसकी बदौलत निजी क्षेत्र के रोजगार में भीड़-भाड़ हो सकती है। तथापि, हमारे वो प्रारंभिक विचार बदल गए, क्‍योंकि हमने महसूस किया कि सामान्‍य समतुल्‍यता प्रभाव का मकसद कार्यक्रम में न केवल ग्रामीण मजदूरी दरों को बढ़ाना था, बल्कि इसने समग्र रोजगार में भी वृद्धि की (मुरलीधरन एवं अन्य, 2020)। इसका कारण था कि ग्रामीण नियोक्‍ताओं को क्रय का एकाधिकार प्राप्‍त है, और रोजगार आश्‍वासन ने इस अधिकार की शक्ति को कम कर दिया, इस प्रकार कौशल में इज़ाफा हुआ और ग्राम के आम निवासी की आय में सार्थक रूप से वृद्धि हुई। 

समानत:, एक शहरी ड्यूएट भी कौशल में वृद्धि करने वाला साबित हो सकता है। शहरी इलाकों में इस बात की संभावना कम है (हालांकि संभव तो है) कि नियोक्‍ता का व्‍यावसायिक बल, बड़ी चिंता का विषय हो। तथापि, कामगार की वर्धित उत्‍पादकता एवं खोज-बीन हेतु कम भागादौड़ी, वर्धित कुशलता के अन्‍य स्रोत हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, हम जानते हैं कि अच्‍छे खान-पान और अच्‍छी निद्रा से शहरी कामगार भी अपनी उत्‍पादकता बढ़ा सकते हैं, हेदर स्‍कोफील्‍ड, फ्रैंक शिलबैक, एवं सह-लेखक द्वारा उत्‍कृष्‍ट शोध के मद्देनजर। कई सारी मजबूरियां – कामगारों एवं नियोक्‍ताओं के बीच व्‍यावहारिक, ऋण, ‘बंदी दुविधा (प्रिजनर्स डाइलेमा)’1 जैसे मुद्दों – का अभिप्राय यह हो सकता है कि वर्तमान में ये आसान उत्‍पादकता वृद्धि निवेश नहीं किए जाते हैं, और शायद ड्यूएट इन निवेशों की शुरूआत कर दे। इसके अतिरिक्‍त, हम यह भी जानते हैं कि विश्व भर के श्रम बाजारों में खोज-बीन हेतु भागादौड़ी काफी महंगी है; बैनर्जी एवं चिपलंकर का हालिया अध्‍ययन भारत से विशिष्‍ट साक्ष्‍य उपलब्‍ध कराता है। नियोक्‍ता एजेंसियों तथा/अथवा ड्यूएट द्वारा प्रदत्‍त कार्य अनुभव प्रारूप के माध्‍यम से इन लागतों को कम करके सार्थक आर्थिक लाभ उत्पन्न कर सकते हैं। 

यद्यपि, वर्तमान प्रस्‍ताव में अभी कई मुद्दे हैं और इस विचार को आगे बढ़ाने से पहले उनका समाधान ढूँढने की आवश्‍यकता है। मुझे विश्‍वास है कि ज्यां इसे मानते हैं और सार्वजनिक वाद-विवाद संभवत: प्रस्‍ताव को बेहतर बनाने की एक कोशिश है। देबराज राय पहले ही इसमें बंदोबस्‍त संबंधी कुछ मुद्दों का जिक्र कर चुके हैं, जिनमें से सबसे पहले है मनरेगा के साथ सार्वभौमिकीकरण और अधिकारी तंत्र की प्रक्रियाओं को सुव्‍यवस्‍थित करने की आवश्‍यकता। इसके अतिरिक्‍त मेरी चिंताएं प्रबंधन हेतु प्रोत्‍साहन और धोखाधड़ी से जुड़ी हैं। उदाहरणार्थ, मौजूदा प्रस्‍ताव कहता है कि “यह सुनिश्चित करने में अनुमोदित नियोक्‍ता की भूमिका होगी कि कार्य उत्‍पादक है”; परंतु, चूंकि स्‍थानीय निकाय इसके लिए भुगतान नहीं कर रहे हैं, तो यह सुनिश्चित करने के लिए क्‍या प्रोत्‍साहन है कि कार्य वास्‍तव में पूर्ण होंगे? दूसरा, मैं सच में नहीं समझ पा रहा कि ‘नियोक्‍ता एजेंसियां’ के प्रयोग से कुरीति का सामना कैसे होगा; मनरेगा समतुल्‍य में सर्वव्‍यापी ग्रामीण ‘संविदाकार’ होंगे, जिसे सामान्‍यत: भ्रष्‍टाचार बढ़ाने और कार्यक्रम की विश्‍वसनीयता को कम करने के लिए जाना जाता है। कुल मिलाकर, यह सुनिश्चित करने के लिए कि छूट प्राप्‍त कार्य का लेन-देन वास्‍तव में हुआ है, एक तंत्र स्‍थापित किए जाने की आवश्‍यकता है। 

दृष्टिगोचर संभावित आश्‍वासन और साथ ही इससे जुड़े स्‍वाभाविक मुद्दों, जिनका समाधान किया जाना है, को देखते हुए, यह प्रस्‍ताव कार्यान्‍वय एवं मूल्‍यांकन के लिए पूरी तरह से तैयार है। प्रणब बर्धान के कुछ सुझावों के अनुरूप छोटे नगरों में शायद स्‍थानीय सरकारी प्राधिकरण को इस कार्यक्रम के कार्यान्‍वयन का अधिकार दिया जा सकता है। यथोचित नमूने के साथ, कार्यान्‍वयन को संपूर्ण राष्‍ट्र में विस्‍तारित करने से पहले पूर्ण रूप से जांचा जा सकता है। 

लेखक, पॉल नीहॉस को उनकी सहायक टिप्‍पणियों के लिए धन्‍यवाद देते हैं। 

नोट्स: 

  1. क्रीड़ा सिद्धांत में, एक बंदी की दुविधा का संदर्भ ऐसी स्थिति से होता है जिसमें दो व्‍यक्ति अपने स्‍वार्थ के लिए कार्य करते हुए कोई इष्‍टतम परिणाम नहीं दर्शाते, क्‍योंकि दोनों ही पक्ष किसी अन्‍य प्रतिभागी के बलबूते पर स्‍वयं की रक्षा करते हैं। एक बहुत ही तर्कसंगत विचार-विमर्श के फलस्‍वरूप दोनों प्रतिभागी स्‍वयं को ऐसी दशा से भी खराब हालत में पाते हैं जो तब उत्‍पन्‍न होती जब उन दोनों ने निर्णय-लेने की प्रक्रिया में भाग लिया होता। 

लेखक परिचय: संदीप सुखटणकर, यूनिवरसिटि ऑफ वर्जीनिया के अर्थशास्त्र विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं, और साथ हीं वे ब्यूरो ऑफ रिसर्च एंड इकोनॉमिक एनालिसिस ऑफ डेवलपमेंट (बीआरईएडी) तथा जमील पौवर्टी एक्शन लैब (जे-पाल) के साथ सहबद्ध हैं।


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