सामाजिक पहचान

क्या व्यावसाय के लिए जाति की पहचान अभी भी मायने रखती है?

  • Blog Post Date 25 अगस्त, 2020
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Suanna Oh

Columbia University

sso2118@columbia.edu

आज के भारत में, केवल जातिगत पहचान की भावना के कारण लोग किस हद तक नौकरियों को नजरअंदाज करते हैं? यह लेख ग्रामीण ओडिशा में किए गए एक प्रयोग पर चर्चा करता है जिसमें अस्थायी काम के इच्‍छुक श्रमिकों को एक दिन की नौकरी की पेशकश शामिल है। यह ज्ञात होता है कि श्रमिक अपनी जातिगत पहचान से असंगत कार्य से बचने के लिए कभी-कभी अपनी दैनिक मजदूरी से 10 गुना अधिक आय जितनी बड़ी कमाई तक छोड़ने के लिए तैयार रहते हैं।

 

पहचान - स्वयं के प्रति एक व्‍यक्ति की अवधारणा - मानव व्यवहार का एक शक्तिशाली प्रेरक है। कुछ लोग अपनी पहचान को बनाए रखने से संबंधित चिंताओं के कारण नौकरी के ऐसे अवसरों को नजरअंदाज कर देते हैं जो अन्‍यथा उन्‍हें स्‍वीकार्य होते। एक व्‍यवस्‍था जहां इसके महत्वपूर्ण आर्थिक निहितार्थ हो सकते हैं, वह है भारतीय श्रम बाजार, जिसमें 16.8% पुरुष अभी भी अपनी जाति के पारंपरिक व्यवसाय (कैसन एवं अन्‍य 2019) में कार्य करते हैं। आज के भारत में, जातिगत पहचान की भावना के कारण लोग किस हद तक नौकरियों को नजरअंदाज करते हैं?

इस प्रश्‍न का उत्‍तर देना सरल नहीं है। यद्यपि पहचान की चिंता कुछ जाति समूहों को कुछ व्यवसायों को पसंद करने का कारण बन सकती है, इन समूहों में प्रशिक्षण और बाहरी विकल्पों सहित कई अन्य आयामों के साथ अंतर होता है। इसके अलावा, आमतौर पर पहचान की चिंताओं के प्रभाव को सामाजिक छवि अर्थात, अन्य लोग उसे किस रूप में देखते हैं, से अलग करना मुश्किल है। उदाहरण के लिए, लोग कुछ विशेष नौकरियों को अपनी पहचान बनाए रखने के बजाय सामाजिक प्रतिबंधों और उपहास से बचने के लिए छोड़ने की ओर उन्‍मुख हो सकते हैं।

हालिया शोध (ओह 2020) में मैंने पहला प्रायोगिक परीक्षण किया है कि पहचान की चिंताएं नौकरी की प्राथमिकता को कैसे प्रभावित करती हैं। ग्रामीण ओडिशा में अस्थायी कार्य के इच्‍छुक श्रमिकों को एक दिन की नौकरी की पेशकश करते हुए मैंने दर्शाया कि कुछ नौकरियों को लेने के लिए पहचान की चिंताओं का श्रमिकों की इच्छा पर बड़ा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। निष्कर्ष बताते हैं कि भारतीय श्रम बाजारों के अध्ययन में पहचान के विचारों को शामिल करने की आवश्यकता को जांचते हुए, श्रम आपूर्ति पर पहचान इस व्‍यवस्‍था में एक महत्वपूर्ण बाधा है।

पहचान के बारे में एक प्रयोग की डिजाइनिंग

पहचान के बारे में सामाजिक सिद्धांतों का मानना ​​है कि यह लोगों को उन नौकरियों या कार्यों को करने से बचने के लिए प्रेरित कर सकती है जो अपने स्‍वयं के सामाजिक समूहों से अलग हैं (उदाहरण के लिए, बर्क और स्टेट्स 2009)। इस तरह के प्रभाव मजबूत हो सकते हैं यदि नौकरियों से जुड़े सामाजिक समूहों को अपेक्षाकृत कमजोर सामाजिक स्थिति (ताजफेल और टर्नर 1979) वाला माना जाता है। इसके अलावा, लोग व्यवहार के आंतरिक नियमों (एकरलॉफ और क्रैंटन 2000, बेनाबाउ और टिरोल 2011) का उल्लंघन करने से बचना चाहते हैं। पहचान-असंगत कार्य पर बहुत कम समय खर्च करना भी एक अस्वीकार्य उल्लंघन हो सकता है।

इन विचारों से प्रेरित होकर मैं उन नौकरियों के प्रति लोगों की प्रतिक्रियाओं की जांच करती हूँ जिसमें विशिष्ट जाति समूहों के साथ जुड़े कार्यों पर केवल थोड़ा सा समय बिताना शामिल है। ग्रामीण ओडिशा में जाति लोगों की पहचान का एक केंद्रीय हिस्सा है और जातियों का सामाजिक पदानुक्रम व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त है। इसके अलावा, जातियों और विशिष्ट व्यवसायों के बीच ऐतिहासिक संबंध हैं और ये संबंध अक्सर उन व्यवसायों से जुड़े सरल कार्यों तक विस्तारित होते हैं। प्रयोग से पहले, मैंने जातियों और कार्यों के बीच संबंध स्थापित करने के लिए दो सर्वेक्षण किए और प्रयोग के लिए चयनित सात जातियों की रैंकिंग भी की।

इस प्रयोग से पता चलता है कि 630 श्रमिकों ने नौकरी पाने की इच्छा जाहिर की जिनमें विभिन्न कार्यों पर कुछ समय खर्च करना शामिल है। सभी प्रस्तावों में एक डिफ़ॉल्ट विनिर्माण कार्य पर काम करना, कुल पांच घंटे का अतिरिक्त कार्य, तथा समान निश्चित मजदूरी प्रदान करना शामिल था। प्रस्‍तावों में अतिरिक्त कार्य अलग-अलग थे, अकेले में किए जाने थे, तथा जाति (स्वयं, उच्च या निम्न जाति, या असंबद्ध) से जुडे कार्यों से अलग थे। अतिरिक्त कार्य के लिए आवंटित समय 90 मिनट जितना अधिक या 10 मिनट जितना कम हो सकता है। श्रमिकों ने 32 विभिन्न प्रस्तावों का मूल्यांकन किया (आठ प्रकार के अतिरिक्त कार्यों और चार समय बदलावों को शामिल करते हुए) और उनसे यह चुनने के लिए कहा गया था कि प्रत्‍येक प्रस्‍ताव को अकेले के रूप में लिया जाए - प्रस्‍ताव को चुनो या छोड़ दो। इस निष्‍कर्ष के अंत में, प्रत्येक श्रमिक के लिए एक प्रस्ताव यादृच्छिक रूप से चुना गया था। यदि श्रमिक प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाएतो कर्मचारी वादा किये गये वेतन प्राप्त करने के लिए काम पूरा कर सकता था।

कई श्रमिकों ने नौकरी के प्रस्तावों को ठुकरा दिया, जिनमें जाति-असंगत कार्यों पर सिर्फ 10 मिनट का समय खर्च करना आवश्यक था

मैं ‘पहचान कार्य' (विशिष्ट जातियों से जुड़े कार्य, यानी कपड़े धोना, चमड़े के जूते बनाना, और शौचालय फर्श की सफाई करना) से जुड़े प्रस्तावों को स्‍वीकार करने की दरों की तुलना 'युग्मित नियंत्रण कार्यों' (समान कौशल को शामिल करते हुए परंतु बिना किसी जाति से जुड़ाव के उपर्युक्‍त अनुसार, अर्थात, खेती के उपकरण धोना, चटाई बनाना, और जानवरों के शेड को साफ करना) को करने वालों से करती हूँ। नीचे दी गई आकृति 1 में अतिरिक्त कार्यों पर आवश्यक समय के मुकाबले प्रस्‍तावित नौकरी को स्‍वीकार करने की औसत दर को दर्शाया गया है। रेखओं की समतलता से पता चलता है कि कार्यों पर अतिरिक्त समय खर्च करने के साथ स्‍वीकार करने की दरें अलग-अलग हैं।

आकृति 1. अतिरिक्त कार्यों पर आवश्यक समय के मुकाबले प्रस्‍तावित नौकरियों को स्‍वीकार करने की औसत दर

आकृति में प्रयुक्त अंग्रेज़ी शब्दों/वाक्यों के अर्थ:

Paired control task: युग्मित नियंत्रित कार्य

Identity task: पहचान कार्य

Take-up rate: नौकरी स्वीकार करने की औसत दर

Time in minutes: समय (मिनट में)

Paired tasks in which the identity tasks are associated with workers’ own castes (and control tasks involve similar skills as these identity tasks): युग्मित कार्य जिनमें पहचान कार्य श्रमिक की अपनी जाति से जुड़े हैं(तथा नियंत्रण कार्यों में पहचान कार्यों के समान कौशल शामिल हैं)

Paired tasks in which the identity tasks are associated with castes with relatively higher status: युग्मित कार्य जिनमें पहचान कार्य सापेक्षिक रूप से उच्‍च जाति से जुड़े हैं

Paired tasks in which the identity tasks are associated with castes with relatively lower status: युग्मित कार्य जिनमें पहचान कार्य सापेक्षिक रूप से निम्‍न जाति से जुड़े हैं

जब किसी श्रमिक की अपनी जाति किसी पहचान कार्य के साथ निकटता से जुड़ी होती है तब पहचान कार्य को स्‍वीकार करने की दर समान कौशल वाले युग्मित नियंत्रण कार्य के बराबर होती है (पैनलों में नीली रेखाओं की ऊँचाई समान है)। हालांकि जब पहचान कार्य श्रमिक की अपनी जाति से मेल नहीं खाता है तब इसके समकक्ष स्‍वीकार करने की दर देखी गई नियंत्रण दर से कम होती है। इसके अलावा, जब संबद्ध जाति अपेक्षाकृत निम्‍न रैंक की होती है तो स्‍वीकार करने की दर और भी कम हो जाती है। पहचान कार्य को स्‍वीकार करने की दर 23 प्रतिशत अंक कम हो जाती है जब इसकी संबद्ध जाति रैंक श्रमिकों की जाति (हरी रेखा) से ऊंची होती है और जब संबद्ध जाति रैंक अपेक्षाकृत निम्‍न (लाल रेखा) होती है तो यह दर 47 प्रतिशत अंक कम होती है।

यह निर्धारित करने के लिए कि पहचान के विपरीत सामाजिक छवि के बारे में चिंताएंस्‍वीकार करने पर प्रभावों की व्याख्या कर सकती हैं, मैंने यह यादृच्छिक किया कि क्या श्रमिकों के फैसलों को उनके पड़ोसियों में प्रचारित किया गया था या नहीं। मुझे इन गोपनीयता 'उपचारों' में स्‍वीकार करने पर समान प्रभाव दिखाई देता है, जिससे पता चलता है कि पहचान इन प्रभावों का मुख्य चालक है। एक संभावित व्याख्या यह है कि श्रमिक सामाजिक परिणामों पर विचार करने से पहले भी कुछ प्रस्तावों को अस्वीकार करने के लिए अपनी जाति की पहचान से आंतरिक रूप से प्रेरित होते हैं। यह बाद के सर्वेक्षण में श्रमिकों की प्रतिक्रियाओं के अनुरूप है, जो प्रस्ताव को ठुकराने के कारणों के रूप में अक्सर शर्म या जाति से संबंधित नियमों की आंतरिक भावनाओं का हवाला देते हैं।

कई श्रमिकों ने अपने दैनिक वेतन के 10 गुना की पेशकश करने पर भी 10 मिनट के लिए जाति-असंगत कार्यों को करने से इनकार कर दिया

मैंने उस मजदूरी की मात्रा निर्धारित करने के लिए एक पूरक प्रयोग किया जिसे श्रमिक अपनी जाति से असंगत कार्यों में संलग्न होने से बचने के लिए छोड़ने के लिए तैयार हों। डिफ़ॉल्ट विनिर्माण कार्य पर एक दिन की नौकरी के लिए श्रमिकों को काम पर रखा गया था। फिर उन्हें अचानक कार्य समय के शेष हिस्से के लिए एक अलग कार्य करने का मौका दिया गया। पहले प्रयोग के समान, कार्य बदलने की पेशकश में पहचान कार्य या युग्मित नियंत्रण कार्य शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा, कार्य बदलने की पेशकश में डिफ़ॉल्ट मजदूरी के अलावा एक बोनस मजदूरी भी प्रदान किया जाना शामिल था। श्रमिक अपनी मूल व्यवस्था को जारी रखने के लिए इन प्रस्तावों को मना कर सकते थे। 43% श्रमिकों ने अन्य जातियों से जुड़े कार्यों पर 10 मिनट खर्च करने से बचने के लिए अपने दैनिक वेतन का 10 गुना बोनस लेने से मना कर दिया। युग्मित नियंत्रण कार्य वाले प्रस्‍तावों की तुलना में यह दर 29 प्रतिशत अंक अधिक है। पुन:, प्रभाव इस बात से अपरिवर्तनीय है कि श्रमिकों के निर्णयों को प्रचारित किया गया था या नहीं।

निहितार्थ

प्रयोगात्मक निष्कर्षों से पता चलता है कि पहचान की चिंता ओडिशा में अनियत मजदूरों के बीच श्रम आपूर्ति के फैसले को बाधित करती है जिससे उन्हें कुछ आर्थिक लागतों पर भी कुछ नौकरी प्रस्तावों को मना करना पड़ता है। यह पहचान चैनल उन कई कारकों में से एक है, जिसके माध्यम से जाति व्यवस्था अभी भी भारतीय श्रम बाजार (मोस 2018, मुंशी 2019) पर प्रभाव डालती है। पहचान के कारण कुछ नौकरियों को करने में विफलता भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रतिभा के असम्‍यक इस्तेमाल में योगदान कर सकती है। इसलिए, यह अध्ययन श्रम बाजार दक्षता का अध्ययन करते समय पहचान चिंताओं से उत्पन्न विकृतियों को ध्यान में रखने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है (जैसे कि कैसन एवं अन्‍य (2019)।

इस लेख का एक हिस्सा मूल रूप से वर्ल्ड बैंक ब्लॉग्स - डेवलपमेंट इम्पैक्ट में प्रदर्शित हुआ था।

लेखक परिचय: सुआना ओह पेरिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में सहायक प्रोफेसर हैं।

1 Comment:

By: Abhi M

Also read भारत में जाति व्यवस्था की उत्पत्ति कैसे हुई? here https://hi.letsdiskuss.com/How-did-the-caste-system-originate-in-India

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