सामाजिक पहचान

भारत में महिलाओं के विरासत के अधिकार और पुत्र की प्राथमिकता

  • Blog Post Date 27 अगस्त, 2020
  • Print Page
Author Image

Sonia Bhalotra

University of Essex

srbhal@essex.ac.uk

Author Image

Rachel Brulé

Boston University

rebrule@bu.edu

Author Image

Sanchari Roy

King’s College London

sanchari.roy@kcl.ac.uk

भारत में अस्वाभाविक रूप से पुरुष-पक्षपाती जनसंख्या लिंग-अनुपात का एक महत्वपूर्ण कारण भारतीय माता-पिता की पुत्र होने की महत्वाकांक्षा है। यह लेख इस बात की पड़ताल करता है कि उनकी यह इच्छा किस हद तक उनकी बेटियों की तुलना में बेटों की मजबूत आर्थिक स्थिति से प्रेरित है - विशेष रूप से पैतृक संपत्ति के संदर्भ में। इस लेख यह पता चलता है कि महिलाओं और पुरुषों की विरासत के अधिकारों को समान करने से  कन्या भ्रूण-हत्या में वृद्धि हुई और यह भी दर्शाता है कि सामाजिक मानदंड कानूनी सुधार में बाधा बने हुए हैं।

भारत में महिलाओं का लापता होना एक महत्वपूर्ण समस्या है (सेन 1990, एंडरसन और रे 2010)। यह अनुमान लगाया गया है कि वर्तमान में 6.3 करोड़ महिलाएँ गायब हैं (आर्थिक सर्वेक्षण, 2017-18), जो एक अस्वाभाविक रूप से पुरुष-पक्षपाती जनसंख्या लिंग-अनुपात का कारक है। इस घटना का एक महत्वपूर्ण कारण भारतीय माता-पिता की पुत्र होने की महत्वाकांक्षा है। बेटियों की तुलना में पैतृक संपत्ति पर उनकी अधिक आर्थिक स्थिति और विशेष रूप से, पैतृक संपत्ति पर उनकी आज्ञा से प्रेरित पुत्रों की यह इच्छा आखिर किस हद तक है? ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो भारतीय महिलाओं को अपने माता-पिता से पैतृक संपत्ति प्राप्त करने का कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं था। समकालीन सोशल मीडिया में #PropertyForHer जैसा व्यापक अभियान यह तर्क देता है कि संपत्ति का अधिकार महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए मौलिक हैं। महिलाओं और पुरुषों की विरासत के अधिकारों की बराबरी करना बेटे की पसंद को प्रभावित कर सकता है? या यह उलटा पड़ सकता है? हाल ही के शोध (भालोट्रा एवं अन्य 2018) में हम पाते हैं कि विरासत कानून में सुधार के कारण भारत में कन्या भ्रूण-हत्या में वृद्धि हुई है। यह धीमी गति से बदलते पितृसत्तात्मक सामाजिक मानदंडों से उत्पन्न होने वाले कानूनी सुधार का एक अनपेक्षित परिणाम था।

शोध की कार्यनीति

1970 और 1990 के बीच अलग-अलग तारीखों पर, पांच भारतीय राज्यों, केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 में संशोधन करके महिलाओं और पुरुषों के लिए समान विरासत के अधिकार की अनुमति दी। 2005 में, केंद्र सरकार ने पूरे देश में समान उत्तराधिकार अधिकारों को अनिवार्य कर दिया, और यह तब हुआ जब अन्य राज्यों ने इस सुधार को लागू किया। बीच के वर्षों में, देर से आए सुधारक शुरुआती सुधारकों के लिए 'नियंत्रण' के रूप में कार्य करते हैं (क्योंकि उनके पास अभी तक हस्तक्षेप नहीं था)। तथापि एक शोध की कार्यनीति जो राज्यों में रुझानों की तुलना करती है, इस तथ्य के प्रति संवेदनशील है कि राज्यों के बीच कई अन्य समय-भिन्न मतभेद हैं जिनमें से कुछ को हम माप नहीं सकते हैं। इस समस्या का समाधान करने के लिए हमने एक कार्यनीति तैयार की जिसके जरिये हम ऐसे परिवारों की तुलना कर सकते हैं (किसी दिए गए राज्य के भीतर भी) जो दूसरे बेटे की महत्वाकांक्षा को छोड़ बाकी सभी रूप से समान हों।

ऐसा करने के लिए हम पूर्व के अध्ययनों से प्राप्त इस तथ्य का उपयोग करते हैं कि कन्या भ्रूण-हत्या के लिए एक परिवार का प्रेरित हो जाना उनके पहले बच्चे (भालोट्रा एवं कोच्रन 2010, बादाम एवं अन्यआगामी) के लिंग पर निर्भर करता है। इन अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि किसी परिवार में पहली संतान का लिंग अर्ध-यादृच्छिक (काफी हद तक प्रकृति द्वारा निर्धारित) होता है। सहज-बोध यह है कि जिन परिवारों में एक यादृच्छिक ड्रॉ द्वारा पहले जन्म में एक लड़का होता है, वे उन परिवारों की तुलना में बाद की लड़की के लिए अधिक इच्छुक होते हैं जिनकी पहली संतान बेटी होती है। हमें इस तथ्य का और भी पुख्ता प्रमाण मिलता है कि जन्मों के लिंग को नियंत्रित करने की इच्छा का कार्यान्वयन अल्ट्रासाउंड तकनीक के आगमन से बेहद सुगम हो गया था जिससे भ्रूण के लिंग का प्रसव-पूर्व पता लगाया जा सकता था। संक्षेप में, हमारे शोध प्रारूप के जरिए हम यह जांच कर सकते हैं - क्या शुरुआती दौर में सुधार लागू करने वाले राज्यों में रहने वाले परिवारों, जिनमें पहले जन्मी संतान लड़की है और जिनके पास जन्म के बाद के अल्ट्रासाउंड की संभावना है, में जिनमें पहली संतान लड़का है और आगे सुधार लागू होने से पहले या देर से सुधार करने वाले राज्यों में जन्म देने वाले परिवारों की तुलना में दूसरी संतान के रूप में लड़की को पाने की चाह कम होती है?

सुधार लागू होने से कन्या भ्रूण-हत्या में गति आई

निष्कर्षतः, सर्वप्रथम हम पाते हैं कि सुधार से और अल्ट्रासाउंड की उपलब्धता से अवगत माता-पिता जिनकी पहली संतान लड़की है, वे नियंत्रण समूह की अपेक्षा अधिक कन्या भ्रूण-हत्या करते हैं। विशेष रूप से हम इन परिवारों में दूसरी संतान के रूप में एक लड़की के जन्म की संभाव्यता में 3.8-4.3 प्रतिशत अंकों की उल्लेखनीय कमी का अनुमान लगाते हैं। दूसरा, जहाँ लड़कियों का जन्म ऐसे परिवारों में होता है, वहाँ हम पाते हैं कि उनके पहले जन्मदिन से पहले उनके मरने की संभावना अधिक होती है। तीसरा, ऐसे परिवारों में प्रजनन क्षमता बढ़ जाती है, जो पिछले अनुसंधानों के अनुरूप हैं, जिसमें यह दिखाया गया है कि एक तरीका जिससे परिवार अपने वांछित संख्या में बेटों को प्राप्त करते रहते हैं, जब तक उनकी प्रजनन क्षमता बनी रहती है। कुल मिलाकर, इन परिणामों से पता चलता है कि सुधार के कारण बेटे की प्राथमिकता में वृद्धि हुई है। महिलाओं के समूहों के बीच स्वयं-रिपोर्ट किए गए बेटे की पसंद पर डेटा का उपयोग करते हुए हम इस बात की पुष्टि करते हैं कि माता-पिता के पास यह कहने की अधिक संभावना होती है कि वे सुधार के पश्चात बेटियों की अपेक्षा बेटों को अधिक पसंद करते हैं।

हमारे ध्यान में यह भी आया है आया है कि सुधार लागू करने वाले राज्य दक्षिण भारत में स्थित हैं, जो परंपरागत रूप से उत्तर भारत के राज्यों की तुलना में अधिक लिंग-प्रगतिशील है। अपने दम पर, इससे हमें यह उम्मीद हो सकती है कि सुधार के लिए परिवारों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है, लेकिन यह वह नहीं है जो हम पाते हैं।

लचीले सामाजिक मानदंडों की भूमिका

हमारे निष्कर्ष यह बताते हैं कि बेटियों को बेटों के बराबर विरासत का अधिकार देने की कानूनन बाध्यता के कारण माता-पिता बेटियों के होने के विरोधी बन रहे हैं। लचीले पितृ-सत्तात्मक सामाजिक मानदंडों की उपस्थिति में जिसमें विवाहित महिलाएं अपने पति के परिवार के साथ रहने के लिए अपने माता-पिता को छोड़ देती हैं। माता-पिता को इस जोखिम का सामना करना पड़ता है कि बेटियों को दी गई संपत्ति उसके ससुराल वालों द्वारा प्रभावी रूप से नियंत्रित की जा सकती है। यद्यपि माता-पिता कानून को ओवरराइड करने के लिए एक वसीयत लिख सकते हैं। भारत में वसीयतनामा काफी दुर्लभ है। यहां तक कि शहरी क्षेत्रों में भी वसीयतनामे को अदालत में चुनौती दी जा सकती है। ये कारक माता-पिता को बेटे पैदा करने के लिए तरजीह देते रहने के लिए प्रोत्साहन बनते रहेंगे।

उत्तराधिकार सुधार लागू करने के बाद पितृ-सत्तात्मक मानदंड बदल गए हैं या नहीं, इसकी जांच करके हम इस स्पष्टीकरण की बहुलता का आकलन करते हैं। हम वृद्ध माता-पिता की वयस्क बेटों के साथ ही रहने की प्रवृत्ति पर न कोई महत्वपूर्ण प्रभाव पाते हैं, और न ही बेटियों की उनके पैदायशी परिवारों में शादी करने की संभावना में लगातार वृद्धि।

निष्कर्ष

हम पाते हैं कि पैतृक संपत्ति प्राप्त करने के लिए पुरुषों के साथ महिलाओं के अधिकारों को प्रदान करने वाला कानून भारत में पुत्र की प्राथमिकता को बढ़ाता है। हमारा तर्क यह है कि यह एक ऐसा मामला है जहाँ कानूनी सुधार सांस्कृतिक मानदंडों की दृढ़ता से निराश है, वहीं भारत में महिलाओं के आर्थिक अधिकारों को स्थापित करने के लिए समर्थन व्यापक नहीं है। पुरुषों के बीच महिलाओं के अधिकारों के व्यापक समर्थन को मानव पूंजी निवेश वृद्धि (डोएपके एवं टर्टिल्ट 2009) में रिटर्न के रूप में उभरने का तर्क दिया जाता है। जबकि 1990 के दशक से भारत में मानव पूंजी का औसत रिटर्न बढ़ रहा है और महिलाओं की शिक्षा पुरुषों के साथ समान रूप से बदल रही है। महिलाओं को अभी भी अपनी शिक्षा को श्रम बाजार रिटर्न (फील्ड एवं अन्य 2016) में परिवर्तित करने के लिए उल्लेखनीय बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। हम इस बात का प्रमाण देते हैं कि अक्सर सामाजिक संस्थाओं के अनदेखे आयाम महिलाओं की आर्थिक उन्नति में बाधक हो सकते हैं: यह परंपरागत सोच, कि बेटे वृद्धावस्था में सुरक्षा प्रदान करते हैं, नहीं बदली है और माता-पिता की अपने बेटों पर निर्भरता को टालने के लिए कोई व्यवस्थित रूप से राज्य पेंशन प्रदान नहीं किया गया है (ब्रुलिस 2018)।

यद्यपि भारत के उत्तराधिकार सुधारों के पारित होने को निम्न जाति की महिला विधायकों का समर्थन था, लेकिन ऊँची जाति की महिला विधायकों का नहीं (क्लॉट्स-फिगुएरस 2011)। इस प्रकार यह स्पष्ट नहीं है कि इस सुधार में सभी महिलाओं का समर्थन है। सामाजिक मानदंडों को बदलने के लिए स्कूल जाने वाले वर्षों में लड़कियों और लड़कों दोनों की सोच जब लचीली हो और वह भी तब जब महिलाओं की शादी नहीं हुई हो, तब उनको लक्षित करने के लिए बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप की आवश्यकता हो सकती है (धार एवं अन्य 2018)।

लेखक परिचय: संचारी रॉय किंग्स कॉलेज लंदन में विकास अर्थशास्त्र में वरिष्ठ व्याख्याता (एसोसिएट प्रोफेसर) हैं। सोनिया भलोत्रा यूनाइटेड किंगडम में स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ़ एस्सेक्स में अर्थशास्त्र की प्रॉफेसर हैं। राहेल ब्रूली बोस्टन यूनिवरसिटि में फ्रेडरिक एस पारडी स्कूल ऑफ ग्लोबल स्टडीज में ग्लोबल डेवलपमेंट पॉलिसी की एसोसिएट प्रोफेसर और ग्लोबल डेवलपमेंट पॉलिसी सेंटर के ह्यूमन कैपिटल इनिशिएटिव की कोर फैकल्टी हैं।

No comments yet
Join the conversation
Captcha Captcha Reload

Comments will be held for moderation. Your contact information will not be made public.

संबंधित विषयवस्तु

समाचार पत्र के लिये पंजीकरण करें