गरीबी तथा असमानता

अत्यंत गरीब लोंगो में संकट की स्थितियों में डटे रहने की क्षमता का विकास करना

  • Blog Post Date 19 जनवरी, 2021
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मौजूदा सामाजिक सुरक्षा तंत्र में समावेशन की कमी होने के कारण गरीबों की कमजोरियां और बढ़ जाती हैं और इसके कारण वे संकट के दौरान पर्याप्त मात्रा में सहायता से वंचित रह जाते हैं। इस लेख में शगुन सबरवाल और मैक्सिमिलियन लोहर्ट ने इस बात की चर्चा की है कि कोविड-19 महामारी के फैलने से बिहार में अत्यंत गरीब लोगों के लिए आजीविका परियोजना में निवेश करना किस तरह से उनकी सहायता में वृद्धि करने के साथ-साथ जागरूकता फैलाने के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ है।

 

नवीनतम अनुमानों के अनुसार कोविड 19 महामारी इस वर्ष अतिरिक्त 8.8-11.5 करोड़ लोगों को अत्यधिक गरीबी में धकेल देगी। मौजूदा सामाजिक सुरक्षा तंत्र में समावेशन की कमी होने के कारण गरीबों की कमज़ोरियाँ और बढ़ जाती हैं और इसके कारण वे संकट के दौरान पर्याप्त मात्रा में सहायता मिले बिना रह जाते हैं। भले भारत के 70% विशाल सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम ग्रामीण गरीबों पर केंद्रित हैं, परंतु महामारी से पहले के समय में भी इन मौजूदा प्रणालियों में बड़ी संख्‍या में ऐसे गरीब वंचित रह गए थे जो ज्यादातर अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं।

इन चुनौतियों को स्वीकार करते हुए बिहार की राज्य सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों के सबसे गरीब लोगों को लक्षित करने के लिए ‘क्रमिक वृद्धि दृष्टिकोण‘ को शामिल करने हेतु 2018 में अपने सामाजिक सुरक्षा ढ़ांचे को फिर से तैयार किया था। क्रमिक वृद्धि दृष्टिकोण गरीबों में से सबसे गरीब को ऊपर उठाने का एक परीक्षित दृष्टिकोण है जिसके अंतर्गत अत्यंत गरीब लोगों के लिए स्थायी स्वरोजगार गतिविधियों को उत्पन्न करने हेतु योजनाओं का एक समग्र सेट सम्मिलित होता है। इसमें आम तौर पर एक उत्पादक परिसंपत्ति अनुदान (या तो पशुधन या एक छोटी दुकान), सलाह और उद्यम विकास सहायता, एक अस्थायी नकद वृत्ति, बचत खातों तक पहुंच, स्वास्थ्य जानकारी और अन्य सरकारी सेवाएं शामिल होती हैं।

छह देशों में कठोर प्रभाव मूल्यांकन के जिन श्रृंखलाबद्ध परिणामों ने यह दर्शाया कि क्रमिक वृद्धि दृष्टिकोण उपभोग, आय और कल्याण में प्रभावी होता है, उनके आधार पर तथा साथ ही साथ बिहार में दो नीति पायलटों से सीख लेते हुए बिहार सरकार ने 2018 के इस दृष्टिकोण का दायरा सभी 38 जिलों में 1,00,000 परिवारों तक बढ़ाने का निर्णय लिया। इस कार्यक्रम को सतत जीविकोपार्जन योजना (एसजेवाई)1 कहा जाता है जिसका क्रियान्‍वयन ग्रामीण विकास विभाग के तहत एक स्‍वायत्‍त निकाय, बिहार ग्रामीण आजीविका परियोजना (बीआरएलपी) द्वारा किया जाता है जिसे स्‍थानीय तौर पर जीविका के नाम से जाना जाता है।

कोविड-19 का सामना करने के लिए मौजूदा डेटाबेस और तंत्र का लाभ उठाना

जब बिहार में कोविड-19 संकट आया तब वहाँ एसजेवाई पहले से ही चल रही थी। जीविका ने एसजेवाई के माध्यम से सबसे कमजोर परिवारों की पहचान की थी और एसजेवाई डेटाबेस में 70,000 अत्यंत गरीब घर थे। एसजेवाई की नींव रखने में इन निवेशों का लाभ यह हुआ कि सरकार के पास यह जानने का एक सीधा तरीका उपलब्‍ध है कि सबसे संवेदनशील परिवार कौन से हैं और अधिक महत्वपूर्ण बात यह कि उसे संकट आने पर उन तक पहुंचने का एक तरीका ज्ञात था। इसके अतिरिक्त, जीविका के द्वारा पहले ही 35,000 परिवारों को उद्यम परिसंपत्ति सौंपी जा चुकी थी।

मार्च 2020 में कोविड-19 संकट की शुरुआत में तत्काल प्राथमिकता इस बारे में यह जागरूकता बढ़ाने की थी कि लोग वायरस के खिलाफ खुद को और दूसरों को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं। स्थानीय समुदायों और मौजूदा बुनियादी ढांचे एवं संबंधों के साथ इसकी निरंतर भागीदारी के कारण जीविका ने इस प्रयास को कुछ हद तक सुविधाजनक बनाया। उन्होंने 10,00,000 से अधिक स्व-सहायता समूहों और सामुदायिक संगठनों के अपने नेटवर्क का लाभ उठाया। एसजेवाई फ्रंट-लाइन स्टाफ (मास्टर रिसोर्स पर्सन) को कोविड-19, इसके लक्षणों और सामाजिक दूरी एवं हाथ की स्वच्छता जैसे उपायों के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए तैनात किया गया। जीविका ने जागरूकता बढ़ाने के लिए आईवीआर (इंटरेक्टिव वॉयस रिस्पांस) मैसेज, पर्चों, वीडियो और दो-भाग की कॉमिक श्रृंखला का उपयोग किया। एसजेवाई ने बिहार की राज्य सरकार को गरीबों तक तत्काल राहत उपाय पहुंचाने में सक्षम बनाया। जीविका ने एसजेवाई के लाभार्थियों को आपातकालीन उपभोग वृत्ति के रूप में 2,000 रुपये वितरित करने के लिए एक कार्यालय आदेश जारी किया। जीविका के आधिकारिक रिकॉर्ड बताते हैं कि उन्होंने अभी तक एसजेवाई के नियमित उपभोग वृत्ति प्राप्त नहीं कर सकने वाले एसजेवाई परिवारों को प्राथमिकता देते हुए मई 2020 के अंत तक 36,570 एसजेवाई परिवारों को नकद उपभोग वृत्ति वितरित की।

जागरूकता गतिविधियां और राहत उपाय

जे-पाल दक्षिण एशिया में हमने मई और जून 2020 में 1,010 एसजेवाई लाभार्थियों और एसएसजी सदस्यों के बीच कोविड-19 की जागरूकता और प्रभावों का आकलन करने के लिए तेजी से टेलीफोनिक सर्वेक्षण किया2 और पहले से ही अपने उद्यम चला रहे एसजेवाई लाभार्थियों के लिए अगस्त 2020 में एक अनुवर्ती सर्वेक्षण किया। लगभग सभी एसजेवाई लाभार्थियों ने बताया कि उन्होंने कोविड-19 के बारे में सुन रखा था, और 10 में से 6 ने यह बताया कि उन्‍हें सरकारी स्रोतों से यह सूचना प्राप्त हुई थी। अनुवर्ती सर्वेक्षण से पता चला कि लगभग आधे लाभार्थी पूरे लॉकडाउन में लगातार अपने उद्यम चला रहे थे। हालांकि बिक्री का स्तर लॉकडाउन-पूर्व अवधि की तुलना में कम था, फिर भी क्रमिक वृद्धि दृष्टिकोण के स्वरोजगार पर ध्‍यान केंद्रित करने से यह लाभ हुआ कि अधिकांश लाभार्थियों के पास उस समय भी आय का एक स्रोत उपलब्‍ध था जब अन्य आय स्रोत कम या बिल्‍कुल बंद हो गए थे, उदाहरण के लिए - आकस्मिक श्रम।

आकृति 1. एसजेवाई लाभार्थियों और एसएचजी सदस्यों की कोविड के बारे में जानकारी

आकृति में आए अंग्रेजी वाक्‍यांशों/शब्‍दों का हिंदी अर्थ

Proportion of respondents – प्रतिक्रिया देने वालों का अनुपात

Not able to recall a single C-19 symptom – कोविड़-19 के किसी एक लक्षण को भी याद न कर पाना

Remembered receiving info from govt. sources – याद रखना कि सूचना सरकारी साधनों से प्राप्‍त हुई

Heard about C-19 – कोविड़-19 के बारे में सुना है

SHG members - एसएचजी सदस्य

SJY Beneficiary - एसजेवाई लाभार्थि

यद्यपि ये निष्कर्ष मोटे तौर पर सकारात्मक हैं फिर भी हमारे सर्वेक्षण में ऐसे क्षेत्रों पर भी प्रकाश डाला गया है जिन पर आगे कार्रवाई की जानी है। हम पाते हैं कि 10 में से 4 एसजेवाई लाभार्थी कोविड-19 के एक भी लक्षण को याद नहीं कर सके और एसजेवाई के केवल आधे लाभार्थियों ने सावधानी के रूप में नियमित रूप से अपने हाथों को धोने (साफ पानी और साबुन तक पहुंच के बावजूद) और मास्क पहनने के बारे में बताया। कुल मिलाकर, एसजेवाई लाभार्थियों को एसएचजी सदस्यों की तुलना में कोविड-19 लक्षणों के बारे में कम जानकारी थी और उन्‍होंने एहतियाती उपाय कम आवृत्ति में अपनाने की जानकारी दी। जब उनसे यह पूछा गया कि लॉकडाउन की शुरुआत के बाद से उन्‍होंने अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए कौन सी रणनीतियां अपनाईं, तो दो-तिहाई एसजेवाई लाभार्थियों ने बताया कि उन्‍होंने परिवार के कुछ सदस्यों के लिए भोजनों की संख्या/आकार को कम कर दिया था, जो एसएजी सदस्यों (53%) की तुलना में काफी अधिक था। आधे से अधिक (55%) एसजेवाई लाभार्थियों ने अपनी नकदी या बैंक बचत में से कुछ का उपयोग किया था, और 42% ने ऋण लिया था। अगस्त में हमारे अनुवर्ती सर्वेक्षण में हमने पाया कि जिनके पास उद्यम थे, उनमें से ऐसे लोगों की काफी बड़ी संख्‍या थी जिनके पिछले महीने के उद्यम की बिक्री लॉकडाउन–पूर्व की अवधि की तुलना में कम रही थी। इससे यह इंगित होता है कि जो लोग अपने उद्यम को चलाने में सक्षम थे, उन्हें भी लॉकडाउन से पहले अपनी उद्यम आय की तुलना में आय हानि का सामना करना पड़ा।

आकृति 2. लॉकडाउन-पूर्व उद्यम की बिक्री की तुलना में पिछले महीने के उद्यम की बिक्री, जैसा कि अगस्त 2020 में बताया गया है

नोट: क्षैतिज अक्ष लॉकडाउन से पहले औसत मासिक बिक्री से विभाजित पिछले महीने के उद्यम की बिक्री का अनुपात देता है। ऊर्ध्वाधर अक्ष ऐसे उत्तरदाताओं के अनुपात को दिखाता है जिनके लिए क्षैतिज अक्ष पर एक विशेष अनुपात लागू होता है। हमारे प्रतिदर्श के समर्थन में पिछले महीने में बिक्री का स्तर लॉकडाउन-पूर्व अवधि की तुलना में कम था (वह प्रतिदर्श क्षैतिज अक्ष पर 1 पर लाल रेखा के बाईं ओर है)।

आकृति में आए अंग्रेजी वाक्‍यांशों/शब्‍दों का हिंदी अर्थ

Sales levels in past month divided by pre-lockdown monthly sales – लॉकडाउन-पूर्व मासिक बिक्री से विभाजित पिछले महीने में बिक्री स्‍तर

Production of SJY households with enterprises – उद्यमों वाले एसजेवाई परिवारों का उत्‍पादन

Lower sales – निम्‍न बिक्री

Higher sales – उच्‍च बिक्री

हमारे निष्कर्ष कोविड-19 के लक्षणों के बारे में लगातार जागरूकता फैलाने और संकट की शुरूआत में 'सूचना प्रसार' से परे एहतियाती उपायों के महत्व को इंगित करते हैं। इसके अंतर्गत फ्रंटलाइन कर्मचारियों के दैनिक कार्यों में जागरूकता गतिविधियों को 'मुख्यधारा' मे लाने की आवश्यकता होगी। इसे पहचानते हुए जीविका ने एक कार्यालय आदेश जारी किया, जिसमें सभी जिला परियोजना समन्वय इकाइयों (डीपीसीयू) को कोविड-19 और निवारक उपायों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए कहा गया।

यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि एसजेवाई लाभार्थी अन्य ऐसी सरकारी योजनाओं का उपयोग करने में सक्षम हों जिनकी घोषणा संकट की शुरुआत में की गई थी (अन्य सरकारी योजनाओं के साथ मिल जाना एसजेवाईका एक अनिवार्य परिणाम है)। हमारे सर्वेक्षण में खाद्य असुरक्षा के संकेत इंगित करते हैं कि पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) में परिवारों को नामांकित करना प्राथमिकता होनी चाहिए। यद्यपि जीविका ने ‘ग्रामीण संगठनों’ (वीओ) के अपने नेटवर्क के माध्यम से वीओ सदस्‍यों को अपने समुदाय में कमजोरियों के बारे में ज्ञान का लाभ उठाते हुए अपने समुदाय के सदस्यों से ऐसे परिवारों की सूची बनाने के लिए कहा, जिनके बारे में उनका मानना ​​है कि उन्हें अभी तक राशन कार्ड प्राप्त नहीं हुए हैं। उद्यमों वाले एसजेवाई लाभार्थियों में से 80% ने बताया कि उन्होंने कार्डधारकों हेतु बिहार सरकार की एक महीने की मुफ्त राशन योजना का लाभ उठाया है। इन सभी के पास आधार कार्ड3 उपलब्‍ध था जो कि विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक पहुँचने के लिए एक आवश्यक शर्त है।

कोविड-19 संकट को अभी तक पूरी तरह निपटा नहीं जा सका है जबकि एसजेवाई अभी भी कोविड-19 स्थिति से उत्पन्न चुनौतियों का सामना कर रहा है। लॉकडाउन प्रतिबंधों ने एसजेवाई परिवारों को नियमित रूप से व्‍यक्तिश: सहायता प्रदान करना चुनौतीपूर्ण बना दिया था और नए एसजेवाई फ्रंट-लाइन स्टाफ को दूरस्थ रूप से प्रशिक्षित किया जाना था। इसके अलावा इस संकट ने लाभार्थियों को अपने उद्यमों को चलाने और विकसित करने की क्षमता को प्रभावित किया है।

यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि सामाजिक सुरक्षा जाल में सबसे कमजोर समूह शामिल हों

महामारी के मद्देनजर इन चुनौतियों के बावजूद एसजेवाई स्पष्ट रूप से अत्यंत गरीबों के लिए आजीविका सहायता में निवेश करने के लाभों को दर्शाती है। तीव्र संकट के समय में पात्र परिवारों की पहचान के लिए नई सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और विस्तृत प्रक्रियाओं को स्थापित करने का समय नहीं है। इस मामले में जीविका ने पहले ही एसजेवाई के माध्यम से सबसे कमजोर लोगों की पहचान कर ली थी और आउटरीच के लिए अपने मौजूदा एसजेवाई डेटाबेस और बुनियादी ढांचे का उपयोग कर सकता था। भारत में सरकारी योजनाओं में समावेशन त्रुटियों को कम करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है जबकि बहिष्करण त्रुटियों को कम करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किया गया है। कोविड-19 महामारी जैसे संकटों के दौरान सामाजिक सुरक्षा प्रणाली से बहिष्करण और भी महंगा पड़ता है। यह कोविड-19 के बारे में सूचना प्रसारित करने और राहत उपायों की पहुंच बढ़ाने के लिए चुनौतियों को और बढ़ा देता है। और जब कोविड-19 तथा राहत उपायों के बारे में जानकारी उन समूहों तक नहीं पहुंच पाती जिनकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब भेद्यता का चक्र बरकरार रहता है। कोविड-19 संकट गरीबों को आर्थिक रूप से लचीला बनाने की तत्काल आवश्यकता पर भी प्रकाश डालता है ताकि भविष्य में उन्हें किसी भी तरह के आघात से बचाया जा सके। एसजेवाई जैसी योजनाएं कमजोर समुदायों को ताकतवर बनाने के लिए एक नए प्रकार के मार्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं।

जैसा कि बिहार में हमारे सर्वेक्षण से देखा गया है, क्रमिक वृद्धि दृष्टिकोण की कई विशेषताएं इसे कोविड-19 के मद्देनजर एक विशेष रूप से प्रासंगिक आर्थिक समावेशी दृष्टिकोण बनाती हैं। इसका स्वरोजगार दृष्टिकोण आर्थिक झटकों से निपटने के लिए परिवारों की क्षमता को बढ़ाता है। अत्यंत गरीबों पर इसका ध्यान केंद्रित होना, सरकार और अन्य सामाजिक एवं सामुदायिक संस्थानों को फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं के एक समर्पित कैडर के माध्यम से उन्‍हें सबसे कमजोर लोगों से सीधे जुड़ने में सक्षम बनाता है जो इन परिवारों की जरूरतों पर प्रतिक्रिया कर सकते हैं। सरकारों को न केवल संकट के समय प्रतिक्रिया-स्‍वरूप बल्कि गरीबों के बीच लचीलापन निर्मित करने के लिए भी आजीविका के अवसरों और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक पहुंच प्रदान करनी होगी। क्रमिक वृद्धि दृष्टिकोण आर्थिक संकटों के दौरान भी परिवारों को लचीला बनाने में मदद करने के लिए एक व्यवहार्य और समग्र आर्थिक समावेशन मार्ग प्रदान करता है।

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टिप्‍पणियां:

  1. ‘स्‍थायी आजीविका प्रोन्‍नयन योजना’ बिहार में 100,000 अत्यंत गरीब परिवारों के लिए स्थायी आजीविका बनाने और जीविका के स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) में प्रतिभागी बन कर नियमित बचत की आदतें सुनिश्चित करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी।
  2. हमने एसएचजी सदस्यों का सर्वेक्षण किया ताकि ग्रामीण महिलाओं का एक अनुमानित तुलनात्मक समूह ज्ञात हो सके।
  3. आधार या विशिष्ट पहचान (यूआईडी) संख्या एक 12-अंकों की पहचान संख्या है जो कि भारत सरकार की ओर से भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) द्वारा भारतीय निवासियों को जारी की जाती है।

लेखक परिचय: शगुन सबरवाल जे-पाल साउथ एशिया में नीति, प्रशिक्षण एवं संचार की निदेशक के साथ-साथ क्लियर (सीएलईएआर) दक्षिण एशिया की निदेशक भी हैं। मैक्सिमिलियन लोह्नर्ट जे-पाल साउथ एशिया में रिसर्च मैनेजर हैं।

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